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बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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इस्लाम के नाम पर

मुद्दा

 

इस्लाम के नाम पर

राम पुनियानी


हाल में गुजरात में दंगा-पीड़ित मुसलमानों के लिए राहत शिविर चला रहीं इंग्लैंड की मुस्लिम परोपकारी संस्थाओं ने राहत शिविरों व कालोनियों में रह रहे मुसलमानों को आगाह किया कि यदि उन्होंने ''इस्लामिक आचार संहिता'' का पालन नहीं किया तो उनको मिल रही सहायता बंद कर दी जायेगी. इस ''आचार संहिता'' के अनुसार रहवासी न तो टीवी देखेंगे और न संगीत सुनेंगे, उनके बच्चों की शिक्षा केवल मदरसो में होगी, पुरूषों को एक विशेष तरह की टोपी लगानी होगी और महिलाओं को हिजाब पहनना होगा. पुरूषों को दाढ़ी रखना भी जरूरी होगा.

इसके साथ ही, ''तबलीगी जमात'' ने भी इन मुसलमानों को ''इस्लाम के अनुरूप'' व्यवहार करने की हिदायत दी और इस हिदायत का पालन न करने वालो को गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहा.

मुसलमान औरतें


इन राहत शिविरों में रह रहे मुसलमान पहले से ही बहुत बदहाल जिंदगी बिता रहे हैं. उन्हें सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिल रही है और वे सामाजिक बहिष्कार के भी शिकार हैं. राहत शिविरों में रह रहे कुछ लोगों ने स्थानीय मौलानाओं के जरिए आने वाले इन निर्देशों का विरोध भी किया परंतु उन्हें मार-पीट कर चुप करा दिया गया. समाज, वहां रह रहे मुसलमानों को उन भौतिक और भावनात्मक दीवारों को ढ़हाने नहीं दे रहा है, जिन्हें सरकार और समाज ने उनके चारों ओर बना दिया है.

मौलाना उन्हें स्वतंत्रता से जीने नहीं दे रहे है. दकियानूसी तत्व न तो उन्हें आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने दे रहे हैं और न ही नौकरियॉ. उन्हें समय के साथ चलने नहीं दिया जा रहा हैं.

गोधरा ट्रेन आगजनी के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा में-जो कि असल में गोधरा का बदला लेने के नाम पर राज्य प्रायोजित कत्लेआम था- बड़ी संख्या में मुसलमान मारे गए थे. राज्य सरकार ने आधे-अधूरे मन से राहत शिविर स्थापित करने के अपने कर्तव्य को निभाया. पीड़ितों के आंसू सूखे भी नहीं थे कि सरकार ने राहत शिविर बंद कर दिए.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना था कि ''बच्चे पैदा करने वाली इन फैक्ट्रियों'' को चालू रखने की कोई जरूरत नहीं है. पत्थरदिल राज्य प्रशासन के पीछे हट जाने के बाद, कुछ परोपकारी संस्थाओं ने पीड़ितों की मदद करने के लिए अपने काम के दायरे को बढ़ाया. उनके प्रति समाज के शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण के चलते असहाय मुसलमानों को मस्जिदों में शरण लेनी पड़ी. मस्जिदों ने उन्हें शरण तो दी परंतु साथ ही उन पर तथाकथित इस्लामिक जीवन शैली भी लाद दी. गुजरात के मुसलमान इस जीवन शैली के आदी नहीं थे.

राज्य सरकार द्वारा दिया गया मुआवजा न तो समुचित था और न ही संबंधित प्रावधानों के अनुरूप था. नतीजतन, पुनर्वास का पूरा काम कट्टरवादी मुस्लिम धर्मार्थ संस्थाओं के नियंत्रण में आ गया और उन्होंने शरणार्थियों पर दकियानूसी नियम लादने शुरू कर दिए.

इन कालोनियों को एक नज़र देखने से ही इनके निर्माताओं की मानसिकता समझ में आ जाती है. इन कालोनियों में मकान बहुत छोटे हैं व मस्जिदे बहुत विशाल हैं. इन समुदायों में मौलानाओं का गहरा प्रभाव है और ईश्वर के इन सौतेले पुत्रों की शिक्षा के लिए केवल मदरसे उपलब्ध है.

गुजरात में सन् 2002 की हिंसा के पहले, वहॉ का मुस्लिम समुदाय व्यापार-व्यवसाय, आधुनिक शिक्षा आदि की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा था. दंगों के कारण मुसलमानों में घर कर गए असुरक्षा के भाव ने इस प्रक्रिया को न केवल रोक दिया है बल्कि उसकी दिशा भी पलट दी है.

मुसलमानों की बदहाली को प्रशासन व समाज द्वारा नजरअंदाज किए जाने से हालात और खराब हुए हैं. गुजरात के अल्पसंख्यक एक अजीब से भँवर में फॅस गए हैं. एक ओर योजनाबद्ध कत्लेआम ने उनमें असुरक्षा व असहायता का भाव भर दिया है तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी राजनीति से नियंत्रित राज्य ने अपनी सभी कानूनी सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारियों से किनारा कर, मुसलमानों को उनके हाल पर छोड़ दिया है.

मुसलमानों को दकियानूसी, परंपरावादी, कट्टर आदि न जाने क्या-क्या कहा जाता है परंतु कोई इस बात पर विचार नहीं करता कि वे आखिर ऐसा क्यों हैं. गुजरात में आज मुसलमान जिस दौर से गुज़र रहे हैं, कमोबेश वही हालात देश के अन्य उन मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में भी है, जहाँ सांप्रदायिक हिंसा हुई है.

यह सर्वज्ञात है कि दंगों में मुसलमान ज्यादा मारे जाते हैं. जहाँ देश की आबादी में उनका प्रतिशत 13.4 है, वहीं दंगों में जान गँवाने वालों में 80 प्रतिशत मुसलामान होते हैं. इसके कारण उत्पन्न हुई असुरक्षा की भावना ही मुस्लिम समुदाय की परंपरावादिता की जड़ में है.

हम यह भी जानते हैं कि मुस्लिम समुदाय एकसार नहीं हैं. उसमें अनेक विभिन्नताएं और विविधताएं हैं. सन् 1990 तक, बड़ी संख्या में मुस्लिम लड़के और लड़कियॉ आधुनिक पेशों को अपना रहे थे. वे शिक्षक, डाक्टर, इंजीनियर, वकील, पत्रकार आदि बन रहे थे. सन् 1992-1993 के मुंबई दंगों ने मुसलमानों को गहरा आघात पहुंचाया. उनकी आर्थिक हालत में गिरावट आई और वे असुरक्षा के भाव से ग्रस्त हो गए.

मुंबई हिंसा से मुस्लिम समुदाय धीरे-धीरे उबर ही रहा था कि गुजरात हो गया. इस सबका नतीजा यह हुआ है कि मुसलमान एक कुचक्र में फंस गए हैं. असुरक्षा की भावना के कारण वे अपने में सिमटते जा रहे हैं और उनके मुख्यधारा से कटने को उनको कटघरे में खड़े करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. एक ओर यह दुष्प्रचार किया जाता है कि मदरसों से आतंकवादी पढ़ कर निकल रहे हैं तो दूसरी ओर मुस्लिम बच्चों के लिए मदरसों में पढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा जा रहा है. मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने का कोई आधार नहीं है. केवल अमरीका की सी.आई.ए. द्वारा पाकिस्तान में स्थापित किए गए मदरसे इसका अपवाद थे. इन मदरसों में अफगानिस्तान पर काबिज रूसी सेना से लड़ने के लिए लड़ाके तैयार किए जाते थे.

जहाँ तक भारतीय मदरसों का प्रश्न है, पूरे विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि वे केवल कुरान पढ़ा रहें हैं, आतंकवाद नहीं.

अधिकांश भारतीय मुसलमानों की हालत आज वैसी ही है, जैसी कि प्राचीन भारत में शूद्रों की थी. समाज उनके साथ गुलामों सा व्यवहार करता था और गुलामी को ही उनका धर्म-शूद्र धर्म-कहा जाता था. शूद्र भी अलग-थलग रहने के लिए मजबूर किए जाते थे. दूसरा उदाहरण अफ्रीकी-अमरीकियों का है, जिन पर श्वेत अमरीकी घोर अत्याचार करते थे. उन्हें उनके लिए निर्धारित बस्तियों में रहना पड़ता था. उन्हें न तो सम्मान प्राप्त था और न ही कोई नागरिक अधिकार.

पिछले तीन दशकों में भारत में तेजी से उभरी दक्षिणपंथी राजनैतिक ताकतें भी राज्य तंत्र और सामाजिक सोच में घुसपैठ बना कर ऐसा ही कुछ कर रहीं हैं. वे समाज पर पुरातन मूल्य लाद रहीं हैं और दूसरे दर्जे के नागरिकों की ऐसी श्रेणी तैयार कर रहीं हैं जो कि श्रेष्ठी वर्ग की दया पर जिन्दा रहे. ऐसी स्थिति को जितनी जल्दी बदला जा सकता है, बदलना चाहिए.

 

12.12.2009, 20.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Javed Anwar (javedia@rediffmail.com) Durg (C. G.)

 
 Excellent Sanjay Kumar Shekhar. You wrote exactly what is correct. Religion never teach fight but we follow religion and fight for religion. It is disgrace. 
   
 

deepak kumar (deepak211305@gmail.com) begusarai

 
 इस बात में किसी को दोष देना सरासर गलत है. 
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 बहुत ही अच्छा लेख है, मेरी शुभकामनाएं. 
   
 

Animesh Arya () Delhi

 
 इस्लाम के नाम पर जो हो रहा है वही इस्लाम का असली चेहरा है. जो विकृत तो है ही, भयावह भी है. लेकिन इसके बहाने राम पुनियानी सारा दोष मोदी पर मढ़ते नजर आ रहे है. जो वह हमेशा ही करते हैं. अच्छा हो कि मुस्लिम समाज खुद अपने भीतर झांककर खुद को सुधारे और राम पुनियानी जैसे उनके वकील इस आत्ममंथन में मुस्लिम समाज की मदद करें. 
   
 

संजय कुमार शेखर नोयडा

 
 डाक्टर अधूरा, लगता है आपने दुनिया में संप्रदायों का इतिहास पर गौर नहीं किया है. आप एक बार इतिहास पर गौर करतीं तो पातीं कि दुनिया में सभी धर्मों ने केवल युद्ध ही पैदा किये हैं. यहां तक कि बुद्ध तक ने. धर्म सीखाता तो अच्छी बातें है लेकिन हम सब उसको मानते कहां है. उसके नाम पर केवल फसाद ही करते हैं 
   
 

Dr. Adhura (adhura.arya@gmail.com) Rohtak

 
 इस बात में किसी को दोष देने सरासर गलत है जिस धर्म के कारण आप की दयनीय हालत हुई है उसका सीधा धर्म ही जिम्मेदार है या ये कहे कि उसकी रूढ़िवादिता ही जिम्मेदार है.

जब तक आप परिवर्तन नहीं लाओगे तो आप इससे भी बुरे हो जाओगे. यहां तो आप दूसरे धर्म को दोष दे रहे हो जहां एक ही धर्म है वहां क्या हाल है, इस पर विचार करो फिर किसी को दोष दो. गति ही जीवन है का टेटवाद छोड़ो, फिर देखो आप उन्नति को प्राप्त हो जाओगे.
 
   
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