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यह किसका कोपेनहेगन है...

मुद्दा

 

यह किसका कोपेनहेगन है...

प्रदीप शर्मा


आखिरकार कोपनहेगन में ‘धरती को बचाने का अंतिम अवसर’ घोषित किए जाने के बावजूद राष्ट्रों का महासम्मेलन बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे खत्म हो गया. दुनिया भर के पर्यावरणविदों, राजनेताओं, बुद्धिजीवियों और संगठनों के इस महाकुंभ को दुनिया ने बहुत ही सधी हुई टिप्पणियों के साथ दुनिया भर के मीडिया और अखबारों की नजरों से देखा. सबको इसके निष्कर्षों की भी प्रतीक्षा थी, लेकिन अंततः यह प्रतीक्षा ‘कंफ्यूशन एट कोपेनहेगन’ के साथ समाप्त हो गई.

कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन


हमेशा की तरह यह वैश्विक सम्मेलन भी पुर्वानुमानों को झुठला नहीं सका. कोपनहेगन सम्मेलन आरंभ होने से पहले ही सवाल उछलने लगे थे और इस सम्मेलन के खत्म होते न होते इस सम्मेलन के रेशे बाहर आने लग गये. सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि इस पुर्वानुमान के साथ सम्मेलन को प्रायोजित करने या इसके पीछे मानवजन्य कार्बन उत्सर्जन को सारी दुनिया के सामने एक अकाट्य सत्य की तरह स्थापित करने की जो कोशिशें हुईं, उसका सच क्या था ?

इस सम्मेलन ने राष्ट्रों के एक नए किस्म के ध्रुवीयकरण को भी काफी ठोस रूप में लाने का एवं पहचाने जाने का अवसर दिया, जिसे यूरोप-अमरीका धुरी से अलग बेसिक राष्ट्रों (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत, चीन) का ध्रुव समझा जा सकता है. जा़हिर है, ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस सम्मेलन ने प्रत्यक्ष तौर पर जो भी ताना-बाना बुना हो, अप्रत्यक्ष रुप कथित ग्लोबल वार्मिंग के लिए मानव जन्य कार्बन डायआक्साईड उत्सर्जन को स्थापित करना और अंततः उसके बहाने राष्ट्रों का नवीन ध्रुवीकरण ही इसके उद्देश्य थे. नोबेल पुरस्कार से नवाज दी गई अलगोर की बहुचर्चित फिल्म ‘एन इनकन्वीनियंट ट्रूथ’ को देखते-देखते दुनिया के सभी हिस्सों में यह आम समझ बनने लगी कि धरती गर्म हो रही है और उसका कारण मानव जनित उत्सर्जित कार्बनडाइ आक्साइड एवं ग्रीन हाउस गैसे हैं. तेजी से यह स्थापना सामने आई कि इन स्थितियों के कारण हमारी पृथ्वी के पर्यावरण और उसके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग गया है.

ग्लोबल वार्मिंग के नाम से प्रसिद्ध इस प्रक्रिया के बारे में अचानक छोटे-छोटे शहरों से लेकर कोपेनहेगन तक चर्चा, गोष्ठी, प्रदर्शनों की बाढ़-सी आ गई. विकासशील देशों में हाल में ही आए हालांकि पुराने तकनीकों पर आधारित उद्योगों के माथे पर यह ठीकरा फूटने लगा कि शहर से लेकर ध्रुवीय प्रदेशों तक इनके द्वारा किए जा रहे प्रदूषण और उनसे बढ़ रहे तापमान की चपेट में हैं. पूरी पृथ्वी आसन्न बाढ़ और भयानक अकाल की ओर बढ़ रही है.

जबकि हकीकत ये है कि इन उद्योग धंधों के कारण स्थानीय स्तर पर निश्चित ही प्रदूषण और तापमान में बढोत्तरी हुई है, लेकिन इन उद्योग-धंधों को ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ना असल में विससित राष्ट्रों की एक सोची-समझी साजिश है. इसे समझने के लिए अगर आप पिछले सौ सालों के आंकड़ें देखें तो वैश्विक तौर पर शहरों का औसत तापमान बढ़ा है लेकिन गांवों के औसत तापमान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है.

तो फिर धरती गरम कैसे हो रही है? यह जानना अपने आप में दिलचस्प है कि वायुमंडल में उपस्थित मुख्य घटक ग्रीन हाउस गैस, कार्बनडाइ आक्साइड का मुख्य स्त्रोत मानव उत्सर्जित कार्बन-डाइऑक्साइड (एंथ्रोपोजेनिक सीओटू) न होकर प्राकृतिक क्रियाओं से उत्पन्न कार्बन-डाइऑक्साइड है, जो कि नैसर्गिक घटनाओं से कम-ज्यादा होती रहती है. उपलब्ध सभी उपक्रमों एवं प्रक्रियाओं द्वारा मानव उत्सर्जित कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमंडल में सिर्फ 3 फीसदी है, जबकि 97 फीसदी कार्बन-डाइऑक्साइड का मुख्य स्त्रोत पृथ्वी के 70 फीसदी हिस्से में उपस्थित समुद्र में घुला हुआ कार्बन-डाइऑक्साइड है.

विभिन्न समयों में विभिन्न भू-वैज्ञानिक एवं अन्य सौर कारणों से पृथ्वी के सतह के तापमान में परिवर्तन होता रहता है, जिससे गर्म होने पर समुद्र में घुला हुआ कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमंडल में आ जाता है और सतह ठंडी होने पर वापस समुद्री जल में घुल जाता है.

इसका एक अच्छा उदाहरण 1880 से 1940 के बीच का समय है, जिसमें वैश्विक औसत तापमान 0.5 डिग्री सेंटीग्रेट बढ़ गया था. जर्मन वैज्ञानिक ई जी बेक का 2007 का शोध पत्र बताता है कि 1840 के वायुमंडल में सीओटू का घनत्व 290 पीपीएमवी (पार्ट्स पर मिलियन वाल्यूम) से अत्यधिक बढ़कर 1940 में 440 पीपीएमवी हो गया था, जो आज की तारीख में कथित तौर पर उपस्थित सीओटू के घातक घनत्व से भी 60 पीपीएमवी ज्यादा था.

वैज्ञानिक मारलेंड जी एन्फ्रेस एंड बोडेन के 2006 का एक शोध बताता है कि तब मानव जनित कार्बन उत्सर्जन आज की तुलना में 30 गुना कम था. 1990 के शोध में यह बात सामने आई कि 1949 से 1970 के बीच वैश्विक तापमान औसत लगभग 0.3 डिग्री सेल्शियस कम हो गया और वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड का स्तर घट कर 330 पीपीएमवी हो गया. एंडरसन व अन्य वैज्ञानिकों के द्वारा 2004 में प्रकाशित अन्य शोध पत्र भी यही बात बर्फीले प्रदेशों के बारे में कहते रहे हैं.
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