|
|
|
द ग्रेट अमेरिकन ड्रामा
कोपेनहेगन 2009
द ग्रेट अमेरिकन ड्रामा
बिजू नेगी,
कोपेनहेगन से लौटकर
तो आपने नूरा कुश्ती का मजाहिरा फरमाया?
पिछले कई महीनों से, मौसम परिवर्तन को लेकर और स्वयं कोपेनहेगन के महत्वपूर्ण
सम्मेलन के दौरान, जो दांव-पेंच दुनिया की सरकारें चला रही थीं, वह वास्तव में नूरा
कुश्ती ही थी. यह सब जानते थे, पर न जानने का स्वांग रच रहे थे. शायद, सभी हताश थे,
और बेताब - लोग बेताब थे मौसम संकट के समाधान के लिए, और सरकारें बेताब थीं
अपने-अपने हित में कोई समझौता हो जाने के लिए.
लेकिन यह समझौता होता कैसे? साल-भर तो छात्रों ने पढ़ाई व तैयारी कुछ की नहीं और ऐन
इम्तहान के वक्त पूरी हड़बड़ी मचाते रहे! ठीक उसी तरह कोपेनहेगन से कुछ ही पहले,
संयुक्त राज्य अमरीका व चीन ने कार्बन विसर्जन में कटौती की घोषणा यूं कर डाली,
गोया वे जतलाना चाह रहे हों कि वे इस मामले में अति गंभीर हैं या फिर वे बाकी
दुनिया को बेवकूफ मान रहे थे. कुछ हक्का-बक्का रह गए भारत ने भी, चीन को बाजी मारते
देखते, अपनी ओर से कार्बन कटौती की घोषणा कर डाली, और जतला दिया कि हो न हो भारत
वास्तव में बेवकूफ ही है- कुछ इस कदर जी-हजूरी और दयनीयता से भरी घोषणा थी वह.
कोपेनहेगन वार्ताओं को लेकर यह बात खास थी कि शायद ही किसी अन्य वैश्विक सम्मेलन की
परिणती की पूर्व घोषणा या भविष्यवाणी इतनी सही की गई हो, जितनी कि मौसम परिवर्तन पर
इस सम्मेलन की. इतना ही नही, यह भविष्यवाणी उसकी असफलता को लेकर थी; यहां तक कि
विश्व की सरकारों के मुखियाओं के वहां पहुंचने से पहले ही उनके सरकारी अफसरान
अपनी-अपनी सरकारों का बचने का रास्ता भी निकालने लगे थे, ताकि घर लौट कर लोग यदि
पूछें कि 'वहां से क्या ले कर आए' तो वे कह सकें कि हमने तो पहले ही कह दिया था!
कोपेनहेगन वार्ता की होने से पहले असफलता का एक अहम कारण यह था कि हालांकि इस
वार्ता के महत्व से सभी सरकारें बहुत पहले से ही परिचित थीं पर किसी ने भी इसके लिए
कोई तैयारी नही की, ना ही इस संदर्भ में अपनी स्थिति स्पष्टत: तय की. और यह
जग-जाहिर था. सिर्फ एक ही देश था, जिसने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी- संयुक्त
राज्य अमरीका. अमरीका ने अपने उद्योगों और कंपनियों के हित में, क्योटो प्रोटोकॉल
को मानने से इंकार कर दिया था और एक विशुद्ध कार्बन व्यापार का अनोखा समाधान पेश
किया, जो न तो कार्बन उत्सर्जन कबूलता है और सिर्फ मुनाफे का खेल है. और जहां तक
अन्य देशों का सवाल है, वे पूरा का पूरा समय अमरीका व अन्य जी-8 देशों की ओर ही
मुंह बाएं खड़े रहे. मानो, 'गोडो के इंतजार' में हों!
तो क्या हुआ अगर कोपेनहेगन वार्ता की कहानी पहले से ही सबको पता थी. ठीक बम्बईया
फिल्म की तरह उसमें नाटकीय मोड़ आते रहे, जैसे डेनमार्क, इंग्लैण्ड व स.रा.अमरीका
द्वारा गुप्त तौर पर तैयार किया गया मसविदा ''डेनिश टैक्ट'' का लीक हो जाना. पटकथा
में एकाएक मोड़ आ गया. विकसित व विकासशील देशों के बीच खाई एकदम स्पष्ट हो गई. माफ
करें, हम वाकई किसी मसालेदार बम्बईया फिल्म के दर्शक होते, यदि अफ्रीकी व न्यून
विकसित देशों का यर्थाथ इतना त्रासक व भयंकर न होता.
बेचारा डेनमार्क- एक अच्छे मेंजबान होने के चक्कर में वह एक सफल वार्ता चाहता था और
उसकी तय असफलता से घबरा कर हेरा-फेरी में पड़ गया. और भारत? अपनी स्थिति तो और भी
दयनीय रह गई, किसी धोबी के कुत्ते की तरह- न घर का, न घाट का, और जिसे अफ्रीकी व
जी-77 देशों ने चेतावनी तक डे डाली व अपने मुख्य वार्ताकार सत्य सरण को एकाएक
मशविरा के लिए देश लौटना पड़ा.
इन वार्ताओं में, भारत की काफी किरकिरी हुई है. वह विकसित देशों के फूट डालो, राज
करो के खेल में फंस गया नजर आ रहा है. यूं तो विकसित देशों ने यह प्रयास अन्य देशों
के साथ भी किया, पर अपने उतावलेपन व औहदे की वजह से भारत इसमें अलग ही नजर आया.
भारत सरकार को गंभीर आत्म-मंथन कर, बहुत सारे सवालों का जवाब ढूंढना है कि एक
अत्यंत विघटित दुनिया में उसे कहां खड़ा रहना है, कि वह कहां खड़ा रहना चाहता है. उसे
न तो विकसित देशों का पूरा विश्वास हासिल है, और अब वह विकासशील देशों व न्यून
विकसित देशों के अविश्वास का पात्र बन बैठा है. स्वयं देशवासियों का भी विश्वास उस
पर नही है कि वह उनकी संयुक्त चिंताओं का स्पष्ट प्रतिनिधित्व कर भी सकता है कि
नही.
आगे पढ़ें
कोपेनहेगन में सरकारी अखाड़े के बाहर- स्व यं मुख्य स्थल बेला
सेंटर में, व शहर में अन्य जगह क्लीमाफोरम व 'होपनहेगन' में चर्चाएं व जोश अधिक
जीवंत रहे. प्रदर्शनियां, गोष्ठियां, कार्यशालाएं- एक के बाद एक. काफी मुश्किल भी
हो जाता था कि किसमें जाया जाए, कहां नही. इस दुविधा में यह भी स्पष्ट हुआ कि मौसम
परिवर्तन सिर्फ कार्बन उत्सर्जन कटौती का मुद्दा नही है, कि मौसम संकट के और भी
अधिक गहरे पहलू व समस्याएं हैं, जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं. न्याय का
मुद्दा है कि अमीर देश मौसम परिवर्तन के सर्वाधिक जिम्मेवार हैं और गरीब देश उससे
सर्वाधिक प्रभावित; ऐतिहासिक ऋण का मुद्दा है, जिसे विकसित देशों को चुकाना है; या
फिर, खाद्य व कृषि का मुद्दा जिन पर मौसम संकट की पहली मार पड़ती है और जिन्हें
सरकारी वार्ताओं ने बिल्कुल ही दरकिनार कर रखा है.
वाकई, देखा जाए तो पिछले कुछ सालों में यूं लगता रहा है कि दुनिया की सरकारों के
लिए विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कटौती ही एक मात्र चिंता का विषय रहा
है. जो भी सरकारी वार्ताएं हुई हैं, जो भी सरकारी बयान जारी होते रहे हैं, उन सभी
में लगभग यही एकमात्र मांग उठती रही है.
विकसित देशों के लिए यह बहस सुखद स्थिति थी क्योंकि इसी एकमात्र चिंता के चलते
विकसित देशों द्वारा वार्ताओं का रुख 'मिटिगेशन' से 'अडैपटेशन' की ओर करना आसान
रहा. इसके चलते मौसम परिवर्तन की समस्या के बहाने बाजार के दरवाजे पूरे खोल दिए गए
और मौसम परिवर्तन एक गंभीर चिंता का विषय न होकर, व्यापार का अवसर बन गया.
कोपेनहेगन में विकसित देश क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यता को पूरी तरह अस्वीकार करते
रहे और विकासशील देश जो स्वयं क्योटो प्रोटोकोल को अधिक लोकपरक, सशक्त, यर्थाथपूर्ण
व बाध्यपूर्ण बनाने के लिए कमर कसे हुए थे, अन्तत: उस मूलत: कमजोर क्योटो प्रोटोकोल
को ही बचाने के लिए आवाज उठाते रह गए.
पर अपनी असफलता में भी कोपेनहेगन कुछ नए दृष्टांत देने में सफल हुआ है. कोपेनहेगन
को यह श्रेय तो देना ही होगा कि उसने स्पष्ट दर्शा दिया कि जो देश-चाहे विकसित या
विकासशील-मौसम परिवर्तन को मात्र एक व्यावहारिक अवसर मानते है, वे सभी हमाम में
नंगें हैं .
|
हम यह भी सुनिश्चित करें कि संयुक्त राष्ट की मौसम
परिवर्तन वार्ताएं मात्र व्यापर पर न हो, बल्कि सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक ऋण तथा
खाद्य व कृषि जैसे विषय उनके केन्द्र में रहें. |
यह समझ अब लोगों को एक वैकल्पिक ''लोक प्रोटोकॉल'' की ओर प्रेरित कर रही है जो मौसम
संकट की जमीनी समस्या से दो-चार हो, और जो समुदायों को स्वयं अपनी समस्याओं का हल
खोजने के लिए सशक्त बना सके. ऐसे लोक प्रोटोकॉल पर नागर समाज व लोग संगठनों में
खासी चर्चा व सहमति भी बनती दिखी.
कोपेनहेगन की असफलता से निकली एक सफलता यह भी रही कि उसने नागर समाज व लोग संगठनों
को आगाह किया है कि लोगों के बीच कार्य करते उन्हें लोक संघर्षों की धार पैनी कर
उसे और सघन बनाना होगा. इसे स्वीकार करते हुए, कोपेनहेगन में विविध संस्थाएं व
संगठन आपस में कुछ करीब आए है, जो उससे पहले तक अपने-अपने वास्तविक व ख्याली
विभेदों व अंह: के चलते एक दूसरे से दूरी ही बनाए रखते थे. वे भी मजबूर हुए हैं
स्वीकार करने के लिए कि वास्तविक समाधान सिर्फ एकजुट संघर्ष से ही आ सकता है.
तो क्या कोपेनहेगन की असफलता हमें एक और मौका देती है? बेशक सरकारों को लग रहा हो
कि कोपेनहेगन निर्णय को सुधारने के लिए उनके पास अभी एक और साल है पर वास्तविक डर
तो न्यून विकसित देशों व अल्प द्वीप देशों के लिए है, जिनके लिए शायद अवसर अब ना के
बराबर रह गए हैं.
हम इन द्वीपों व देशों के बगैर किसी भी भविष्य का स्वप्न नही देख सकते. ना ही हम
अगले साल की मौसम वार्ता का इंतजार कर सकते हैं. भारत की जिम्मेदारी अधिक है क्यों
कि मलद्वीप, बांग्लादेश व श्रीलंका हमारे पड़ोस में है, जहां मौसम परिवर्तन का खतरा
अधिक है. जरूरी है कि हम तुरंत जी-77 के समर्थन में व विशेषकर ब्राजील, दक्षिण
अफ्रीका व चीन व सं.रा. अमरीका के साथ मिलकर कोपेनहेगन में जो अंतिम निर्णय किए गए
है, उसको उजागर करते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट करें. साथ ही,
जी-8 देशों को मौसम संकट से उबरने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए बाध्य करें. हम यह
भी सुनिश्चित करें कि संयुक्त राष्ट की मौसम परिवर्तन वार्ताएं मात्र व्यापर पर न
हो, बल्कि सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक ऋण तथा खाद्य व कृषि जैसे विषय उनके केन्द्र में
रहें.
कोपेनहेगन हवाई अड्डे के भीतर एक पोस्टर ने नजर खींची. ग्रीनपीस संस्था द्वारा
प्रायोजित उस पोस्टर में बूढ़ा चुके स्पेनी राष्टपति को सन् 2020 में यह कहते हुए
दिखाया गया- “ मै क्षमा चाहता हूं. हम विनाशकारी मौसम परिवर्तन को रोक सकते
थे...हमने नही रोका.” ऐसे ही पोस्टर विश्व के अन्य बड़े नेताओं को लेकर भी हैं. पता
नहीं, उन्होंने स्वयं ये पोस्टर देखे होंगे कि नहीं. पर हम यही उम्मीद करना चाहेंगे
कि यह स्वीकारोक्ति सच साबित न हो.
बिजू नेगी पैन-एशिया पैसीफिक, मलेशिया, में
हैं व खाद्य संप्रभुता, पारिस्थितिकीय खेती व मौसम परिवर्तन विषयों पर कार्य करते
हैं.
22.12.2009, 13.58
(GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | Punita Singh (singh.punita3@gmail.com) Delhi | | | | आपने बहुत अच्छा लिखा है. अमरीका आज भी हमारे लिये खतरा ही बना हुआ है. कुदरत से खिलवाड़ विश्व को महंगा पड़ेगा. | | | | | |
| | वंदना सिंह चौहान न्यू पाटलीपुत्रा कॉलोनी, नियर बोरिंग कैनाल रोड, पटना, बिहार | | | | यह और कुछ नहीं, केवल अमरीका की नौटंकी थी। आज जिस तरह से अमरीका की लिप्सा बढ़ी है, उसने पूरी मानव जाति को संहार के कगार पर खड़ा कर दिया है. यह दुखद है कि लोग इस सच को समझना नहीं चाहते. बिजू जी, क्षमा करेंगे यह कहने के लिए कि एनजीओ सेक्टर के लोगों ने अमरीका और उसके द्वारा विश्व समुदाय को डराने के लिए किए गए दुष्प्रचारों को सबसे अधिक दुनिया भर में फैलाने का काम किया है. यह दुखद है. | | | | | |
| | Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) , Noida | | | | आपने सही लिखा है कि अमरीका को छोड़ कर किसी को भी अपने एजेंडे का पता नहीं था। अमरीका ने ही तो यह सब कुछ खेल खेला। आपको बधाई कि आपने इतनी साफगोई से लिखा। | | | | | |
| | Sanjeev Duggar (Sanjeev.duggar@gmail.com) , Doda, J&K | | | | क्योटो प्रोटोकॉल के तहत चालीस औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए 1990 के आधार पर मानक तय किए गए. भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर यह पाबंदी बाध्यकारी नहीं थी. अब तक 184 देश इस पर अपनी सहमति जता चुके हैं. लेकिन ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने अब तक क्योटो संधि को लागू नहीं किया है.
अमेरिका अब भी अपने पुराने रुख पर कायम है कि प्रोटोकाल के तहत विकासशील देशों के लिए भी लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए. उसकी दलील है कि चीन और भारत जैसे देशों पर भी बाध्यकारी पाबंदियां होनी चाहिए.अमेरिका, कनाडा और जापान जैसे विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन कम करने की कोई तय सीमा मानने को तैयार नहीं, वहीं भारत,चीन और ब्राजील जैसे देश विकसित देशों की और उंगलियां उठा रहे हैं. ऐसे में मामला पहले आप-पहले आप पर फंसा हुआ है. | | | | | |
| | Ajay T K Banglore | | | | It's not a situation of pride getting in the way of admitting they were wrong, this is a case of thieves being caught and pretending like it never happened. These people are only invested in climate "change" because they know they can tax the rest of the planet with it if they can just get some binding international accord signed. Don't fall for it. Vote every single pro-climate-change con man out of office when their term is up. The elite in the governments of this world have made enough off of our backs. | | | | | |
| | Anjay Tiwari , Noida, India | | | | CO2 is not pollution, higher temps cause more CO2 not the other way around. Other planets are warming just like the earth. We have had higher periods of CO2 prior to the industrial revolution. The polar bear population has risen from 5,000 in the 1950's to about 25,000 now, the biggest threat to polar bears was hunting (300/year killed). Even if their habitat was in danger from environmental conditions they would probably adapt like the brown bear. Solar activity has the biggest impact on the global temp. Other factors include the earths orbit, planetary wobble, volcanic activity. We haven't been warming in the last 8-10 years and may be entering a cooling period. The fact that the environmental-terrorists have changed their hypothesis midstream (Global warming to climate change) is suspect and should require re-evaluation. Over 35,000 scientists disagree with the federal-grant dependent, politically motivated pseudo-scientists about AGW. Being skeptical of AGW does not make one anti-environment, in fact just the opposite, I would rather money be spent on real environmental problems than fictional ones. Follow the money, AGW is not about the environment, it's about money, control and big gov'nt. It's also about a decline in journalism. This is bigger than Watergate, Enron, Big Tobacco. Prosecute Climate-gate, revoke Nobel Prizes...the World has been punked. | | | | | |
| | Dr. Kumar kartik , Ranchi | | | | बहुत सुंदर लिखा है आपने बिजू भाई. लेकिन आप मेरी इस राय से सहमत होंगे कि बहुत बड़ी संख्या में एनजीओ भी इस तरह के ड्रामा में सहयोग कर रहे हैं और कोपेनहेगन में भी यह हुआ है. | | | | | |
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
|