बढ़ती गरीबी का सबब
मुद्दा
बढ़ती गरीबी का सबब
देविंदर शर्मा
अर्थव्यवस्था के विकास में कुछ भयावह गड़बड़ी है. भारत आर्थिक उदारीकरण के 18 साल बाद
बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है, लेकिन ऊंचे विकास के बल पर गरीबी हटाने और भुखमरी
मिटाने के वायदे पूरे नहीं हो पाए हैं. वास्तव में, गरीबी और विषमता घटने के बजाय
और बढ़ गई है. आर्थिक विकास जितना बढ़ रहा है उतनी ही गरीबी भी बढ़ रही है.
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता
में एक विशेषज्ञ समिति ने रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में
37.2 प्रतिशत लोग गरीब हैं. यह आंकड़ा 2004-05 में किए गए 27.5 प्रतिशत के आकलन
से करीब 10 फीसदी अधिक है. इसका मतलब है कि पिछले 11 वर्र्षो में अतिरिक्त 11
करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे सरक गए हैं. एक तरफ गरीबों की संख्या बढ़ रही है
और दूसरी तरफ अरबपतियों की. आर्थिक विकास बढ़ती आर्थिक विषमता को नहीं दर्शाता
है.
उदाहरण के लिए भारत के 30 धनी परिवारों की संपत्ति भारत की संपदा की एक-तिहाई
है. इन तीस परिवारों के हाथों में जितना धन आता रहेगा, उतनी ही देश की समृद्धि
बढ़ती रहेगी. इस प्रकार मुट्ठी भर अमीर बढ़ती गरीबी का बदसूरत चेहरा छिपा लेते
हैं. अगर ये तीस परिवार अमेरिका या यूरोप में बस जाएं तो भारत की 7.9 प्रतिशत
विकास दर घटकर 6 प्रतिशत रह जाएगी.
अगर आप भारत की विकास दर को छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के परिणामस्वरूप
अर्थव्यवस्था में हुई वृद्धि को घटाएं तो भारत की असल आर्थिक विकास दर 4
प्रतिशत तक लुढ़क जाएगी. जो भी हो, विकास दर का उलझा हुआ गणित जितना बताता है
उससे अधिक छुपा लेता है. पहले पोषक तत्वों के आधार पर गरीबी का अनुमान लगाया
जाता था, जिसका मतलब था कि मासिक आय इतनी होनी चाहिए कि शहरों में 2100 कैलोरी
और गांवों में 2400 कैलोरी ऊर्जा खरीदी जा सके.
पिछले कुछ सालों से इस मानदंड की तीखी आलोचना हुई और आखिरकार योजना आयोग ने
आकलन की एक नई पद्धति सुझाई. इसमें जीवन के लिए जरूरी अनेक वस्तुओं का गुलदस्ता
पेश किया गया, जिसमें भोजन, ईंधन, बिजली, कपड़े और जूते शामिल हैं. इसी के
अनुसार तेंदुलकर समिति ने बताया है कि 41.8 प्रतिशत आबादी यानी करीब 45 करोड़
लोग प्रति माह प्रति व्यक्ति 447 रुपये रुपए पर गुजारा कर रहे हैं. दूसरे
शब्दों में वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं. 45 करोड़
लोग रोजाना 14.5 रुपये भी नहीं कमा पा रहे हैं. मुझे हैरानी होती है कि 14
रुपये से अधिक और 25 रुपये से कम कमाने वाली ग्रामीण आबादी को गरीबी रेखा से
ऊपर बताया जाता है. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अब भी पूरा प्रयास उलझी हुई
आंकड़ेबाजी में गरीबी को छिपाने का हो रहा है.
दरअसल, भारत की गरीबी रेखा भुखमरी रेखा का ही दूसरा नाम है. भारत सरकार ने जो
गरीबी रेखा खींची है वह तो पेट भरने में ही चुक जाएगी. इस रेखा से नीचे रहने
वाले लोगों को गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की श्रेणी में रखा जाता है. इनके
लिए सरकार को खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करनी पड़ती है. इस प्रकार इन
लोगों पर सरकार द्वारा गरीबों के भोजन के लिए अनुदान की रकम खर्च होती है.
जितने अधिक गरीब होंगे उतना ही अधिक खाद्यान्न अनुदान देना पड़ेगा.
अगर सरकार तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट को स्वीकार कर लेती है तो खाद्यान्न अनुदान का
बिल 47,917 करोड़ रुपये हो जाएगा, जबकि अब तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए
खाद्य अनुदान के रूप में मात्र 28,890 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा रहे हैं. मुख्य
रूप से इसी कारण सरकार गरीबों की संख्या कम रखना चाहती है.
भारत के गरीबी के मानदंड विश्व में सबसे तंग हैं. मुझे सही संख्या छिपाने का कोई
आर्थिक औचित्य नजर नहीं आता, किंतु राजनीतिक रूप से यह भयावह विचार है. प्रत्येक
सरकार गरीबी के अनुमानों के पीछे भुखमरी के आंकड़ों को छिपा ले जाती है. पता नहीं
सरकार जरूरी वस्तुओं की सूची में जूते, साइकिल, सिलाई मशीन, लैंप, वाटर प्यूरीफायर
आदि कब शामिल करेगी?
मीडिया हमें समझाने का प्रयास करेगा कि यह आर्थिक मसला है, राजनीतिक नहीं. 2007 में
अर्जुन सेनगुप्ता समिति, जिसे आधिकारिक रूप से नेशनल कमीशन आन एंटरप्राइज इन
अनआर्गेनाइज्ड सेक्टर कहा जाता है, की एक रिपोर्ट आई थी. इसमें बताया गया था कि देश
की 77 प्रतिशत आबादी यानी करीब 83.6 करोड़ व्यक्ति 20 रुपये प्रतिदिन भी खर्च नहीं
कर पाते हैं. यह रिपोर्ट विद्यमान गरीबी की सही तस्वीर पेश करती है.
मासिक आय के अलावा गरीबी अनुमान में मानव विकास सूचकांक भी शामिल किया जाना चाहिए,
जो संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने तैयार किया है. गरीबी के आकलन में
स्वास्थ्य, शिक्षा के साथ-साथ पानी और शौचालय की उपलब्धता को भी शामिल किया जाना
चाहिए. इस प्रकार के घटकों को शामिल करने के आधार पर ही व्यापक गणना की जानी चाहिए
और इसी गणना के आधार पर गरीबी रेखा का पुनर्निर्धारण होना चाहिए.
भारत में गरीबी का दो रूपों में वर्गीकरण होना चाहिए. भुखमरी रेखा श्रेणी में
भुखमरी के शिकार लोगों की गणना होनी चाहिए. इन्हें खाद्यान्न के अलावा सीधे-सीधे
नगदी भी दी जानी चाहिए. अन्यथा, वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का स्थान सूडान और
रवांडा से भी नीचे आएगा.
भूख रेखा से ऊपर वालों को ही वास्तव में गरीबी रेखा में शामिल करना चाहिए. इन्हें
कुछ कम मात्रा में खाद्यान्न देने के अलावा अन्य जरूरतें भी पूरी करनी चाहिए.
आर्थिक विकास समावेशी होना चाहिए. भारत ने विकास का जो रास्ता पकड़ा है वह सही नहीं
है. आर्थिक उदारीकरण के बाद तेजी से बढ़ती आर्थिक विषमता ने अनदेखे सामाजिक-आर्थिक
खतरे पैदा किए हैं, जो राष्ट्रीय ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं.
25.12.2009, 15.53 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित