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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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नये साल का पुराना सबक

मुद्दा

नये साल का पुराना सबक

कनक तिवारी


इक्कीसवीं सदी का नया दशक कैलेन्डर के गर्भगृह से जन्म ले चुका है. यह दशक अब तक के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण लेकिन विध्वंसक कालखण्ड के रूप में, यदि इतिहास बचा, तो याद किया जाएगा. पूरी दुनिया के सामने 'हैप्पी न्यू इयर' का नारा हंसने की कोशिश में रोने लगता है. वह नारा बनते बनते सुबकने लगता है.

नया साल


दुनिया सिमट रही है. देश एक दूसरे के करीब आ रहे हैं. बाज़ार घर-घर में घुस गया है. भाषाएं मिट रही हैं. जीवन की हविश बढ़ रही है और मकसद छिटक रहा है. हिंसा के नए नए आयाम अट्टहास कर रहे हैं. कुछ अरसे के बाद आदमी का गोश्त ही आदमी के लिए सबसे बड़ी डेलिकेसी बनने का खतरा लिए हुए है. ऐसे में यह नया दशक मुबारकबाद मांगता है. टेलीफोन, ई-मेल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दूरर्दशन सहित सभी माध्यमों और अखबारों में 'हैप्पी न्यू इयर' का कोरस दुनिया में गूंजता गूंजता थक रहा है.

इस दशक की हिंसा का असली शिकार हमारी धरती है. बल्कि पूरी पृथ्वी, कोपेनहेगन में तथाकथित विकसित देशों, जिन्हें राक्षसी देश कहना चाहिए, अपनी जिद मनवाने की कोशिश में तथाकथित विकासशील अर्थात उन पर निर्भर देशों को प्रदूषण दूर करने के नाम पर चपत लगाते पाए गए. जो देश दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण पैदा करते हैं, प्राकृतिक संसाधनों को अपनी अय्याशी का आधार बनाते हैं, अपनी सड़ी गली दवाइयां गरीब मुल्कों के जिस्म में घुसेड़ देते हैं, अपना तेल बचाकर दुनिया के गरीब मुल्कों का तेल जलाते रहते हैं, अपनी अश्लील संस्कृति को दुनिया के नौजवानों के लिए नया सांस्कृतिक बोध बनाते हैं, जो अपनी गोरी चमड़ी के मुकाबले काली चमड़ी के लोगों को जानवर समझते हैं, वे दुनिया में विकासशील देश कहलाते हैं.

वे मुल्क जो उनकी गुलामी करते हैं, उनकी वैचारिक जूठन से तृप्त होने को मज़बूर होते हैं, नौकरियां करने और अपमानित होने उन देशों में जाकर बस जाते हैं, अपनी निजी और पड़ोसी से होने वाली लड़ाइयों में उनकी मध्यस्थता मज़बूर होकर कुबूल करते हैं, उनके राजनीतिक आकाओं को नोबेल पुरस्कार के लायक समझकर उनकी कोर्निश बजाते हैं, अपने देश की अस्मत और अस्मिता को उनके हाथों बेचकर उसे नया देश बनाना मानते हैं, वे सब विकासशील कहलाते हैं.

इस पूरे ग्लोब में धरती, जल, जंगल और हवा सबके लिए उपलब्ध हो जाए-इस प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को भी चुनौती दी जा रही है. चुनौती शेर की शक्ल में ऊपर से नीचे की ओर बहने वाली पहाड़ी नदी पर खड़ा विकसित देश गुर्रा रहा है और मेमने की शक्ल में विकासशील देश जूठा पानी पीते हुए उस पर पानी को गंदला करने का झूठा आरोप स्वीकार कर रहे हैं. जिन विकासशील देशों में ऐसा वहां का नेतृत्व स्वीकार कर रहा है, वह जीत कर सरकार भी बना रहा है.

वहां के मतदाता विकसित देशों के शैतानी प्रचार के सामने इस कदर आशंकित और आतंकित हैं कि वे अपनी अपनी देशज संस्कृति, इतिहास और परंपरा को भूलकर अपना एक नया देश बनाने के बदले पश्चिम का उपनिवेश बनते जा रहे हैं. हर वह जश्न मनाया जाता है जो ये विकसित देश हुक्मनामे के बतौर विकासशील देशों को दे रहे हैं. हर वह समझ चिंतन का केन्द्र बन रही है जो ये विकसित देश कुछ गुलाम किस्म के बड़े बुद्धिजीवियों के मार्फत विकासशील देशों में परोस रहे हैं. बड़े बड़े अखबार भाषा को विकृत कर रहे हैं और राष्ट्रीय समझ को भी.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पश्चिमी समझ के अनुवाद की जुगाली करता रहता है. फिल्मकार 'स्लमडॉग मिलेनियर' जैसे चित्रों को राष्ट्रीय गौरव समझता रहता है जबकि वह सुंदर चेहरे पर चेचक का दाग कहा जाना चाहिए. निर्वस्त्र होती कमनीय स्त्रियां दार्शनिकों, लेखकों, विचारकों और चरित्रवान व्यक्तियों के मुकाबले समाज की नायिकाएं बन गई हैं और मध्यवर्गीय ललनाओं की हीरोइनें.

सबसे बड़ा हमला अब आदिवासियों पर हो रहा है. उनसे सब कुछ छीना जाकर अब उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं और लाखों करोड़ों लोगों को विकास के नाम पर खानाबदोश बनाया जा रहा है. दुर्बुद्धि के राजनेता अपने आपको आर्थिक सुधारों का प्रणेता बनाकर खलनायकी और अंतत: इतिहास में दलाली कर रहे हैं. मनुष्य को एक यांत्रिक इकाई समझा जा रहा है. पूंजी का इतना बड़ा हमला मनुष्य पर हो रहा है जिसकी केवल कल्पना की गई होगी लेकिन वह यथार्थ यह दशक अपनी छाती पर झेलेगा.

पूंजीपति मंत्रियों और सरकारी अफसरों को घूस देने के बदले खुद सरकार में शामिल होते जा रहे हैं. ईमानदार, चरित्रवान, गरीब और मूल्यों को तरजीह देने वाले व्यक्ति गंवार समझे जा रहे हैं.

जंगलों के चोर, डकैत, ठेकेदार, कोयला और लौह अयस्क का अवैध उत्खनन करने वाली कंपनियां, बिजली चोरी के सरताज, हवा और पानी में ज़हर घोलने वाले कारखानों के मालिक, भ्रष्ट समाचार पत्रों को घूस देकर लोकप्रिय बनते घोषित होते मंत्रिगण कब्रगाह बनते समाज के गौरव बताए जा रहे हैं. यह दशक भारत जैसे विकासशील देश में यदि पूरा लौह अयस्क, कोयला, मैगनीज, तांबा वगैरह का उत्खनन करने का दोषी पाया जाएगा तो मनाविनाश के भविष्य का कारण भी बनेगा. पूरी दुनिया में ज़मीनें छिन रही हैं. जंगल कट रहे हैं. पीने के पानी को कारखानों में धकेला जा रहा है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

ठीक पड़ोस में फार्म हाउसों में सुरा और सुंदरी लबालब होती हुई 'हैप्पी न्यू इयर' का नृत्य कर रही हैं. बेरोजगारों, गरीबों, भिखारियों, वेश्याओं, एड्स, हृदय और आंख के बीमारों, उपेक्षित वृद्ध नागरिकों, बाल श्रमिकों, परित्यक्ताओं, अनाथों आदि की करोड़ों में संख्या बढ़ रही है और उसके बरक्स सैकड़ों में अरबपति धनाढय अट्टहास कर रहे हैं. अब लखपति शब्द का अर्थ गरीबी में होता है. चोर, डकैत, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी, घूसखोर, सांसद और विधायक होकर मंत्रिमंडल में हैं. पूंजीपति मंत्रियों और सरकारी अफसरों को घूस देने के बदले खुद सरकार में शामिल होते जा रहे हैं. ईमानदार, चरित्रवान, गरीब और मूल्यों को तरजीह देने वाले व्यक्ति गंवार समझे जा रहे हैं. शिक्षक, श्रमजीवी पत्रकार, लिपिक, पोस्टमैन, रिक्शा चालक वगैरह होना उपहास का प्रमाणपत्र हो गया है.

दुनिया ज्वालामुखी के लावे पर बैठी है. यदि लोग बेदखल हो जाएंगे तो सशस्त्र क्रांतियों को कौन रोकेगा. यदि धरती से उसके खनिजों को खोद लिया जाएगा तो रिक्टर स्केल पर 8 की संख्या का अनायास भूकंप कैसे बचेगा. प्रकृति से इतनी छेड़छाड़ की जाएगी तो प्रकृति को भी अप्राकृतिक कदम उठाने से कौन रोक पाएगा.

यह तथाकथित आर्थिक सुधार का नाटक, विकास का दंभ, दुनिया को आधुनिक बनाने का दावा, जी ड़ी पी मुद्रास्फीति और आर्थिक समृद्धि का नाटक यदि भूमि अर्थात् ज़मीन अर्थात् खेत अर्थात् जंगल अर्थात् किसान अर्थात् आदिवासी अर्थात् गरीब का पिंड छोड़ दे तो विशेष आर्थिक क्षेत्र, आर्थिक उदारवाद, वैश्विक पूंजीवाद, अंबानियों, टाटाओं, बिल गेट्स, ओबामा, विश्व व्यापार संगठन, यूरो डॉलर, विश्व बैंक, मधु कोड़ा, डी ज़ी पी राठौर, नारायण दत्त तिवारी, टाइगर वूड्स, ओसामा बिन लादेन, मदनवाड़ा कांड वगैरह से लदी फदी दुनिया को गांधी के शब्दों में कतार में खड़ा अंतिम व्यक्ति नए साल की मुबारकबाद अपनी उखड़ती सांस में भी क्यों नहीं देना चाहेगा.

01.01.2010, 14.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

GAURAVTRIVEDI (GAURAVPRESS@GMAIL.COM) LUCKNOW

 
 This is decided and we can't do anything except only talking. So राम नाम जपो और जिंदगी के मज़े लो. 
   
 

bhoopender (bhoopen1980@gmail.com) bhilai

 
 समस्या तो बिल्कुल सही है पर इसे रोकेगा कौन? शुरुआत कहां से होगी ? 
   
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