रगों में जिंदगी नहीं मौत भर दी
रगो में दौड़ा दी मौत
उमारह जमाली
कोलकाता से
ठसाठस भरी हुई लोकल ट्रेन में एक
दूसरे पर गिरते पड़ते लोग ,चिपचिपाती गर्मी और उमस से सबका हाल बेहाल.. ,पसीने की
गंध और खुली टोकरियों से उठती कच्ची मछली की दुर्गन्ध...जैसे साँस लेना भी दुश्वार
हो. हर स्टेशन के साथ डब्बे में एक शोर घुसता है और साथ में थोड़ी सी हवा.
लेकिन यह हवा सबके हिस्से की हवा नहीं है. कम से कम 5 साल की रिमी के लिए तो नहीं
ही है, जिसे उसके भाई राजू ने गोद में उठा रखा है.
रिमी थैलेसीमिया, एचआईवी और हेपेटाइटिस बी से पीड़ित है और उसे मासिक रक्त परिवर्तन
और स्वास्थ्य परीक्षण के लिए महीने में 4 से 5 बार कोलकाता लाना पड़ता है. आज उसे
पहली बार उसका भाई राजू कोलकाता ले कर जा रहा है.
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अब राजू पर है रिमी की जिम्मेवारी |
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रिमी के परिवार ने यह निर्णय लिया है कि राजू
की स्कूल की पढाई बंद कर दी जाए..इस के सिवा कोई और चारा ही
नही है |
एक हाथ से अपनी 5 साल की बहन को गोद में उठाए राजू अपने दूसरे हाथ से सहारे के
लिए डब्बे में लगे हैंडल को जोर से पकड़े रहने की कोशिश करता है लेकिन हर बार
पसीने की चिपचिपाहट से हाथ फिसल जाता है. जैसे एक-एक कर उसकी जिंदगी की खुशियां
फिसलती चली गई हैं. वह बेबसी के साथ अपनी छोटी बहन की ओर देखता है और उसकी
आंखों से आंसू छलकने लग जाते हैं.
चौबीस परगना के तालदा गांव की रिमी
को एचआईवी संक्रमण अपने माता या पिता से विरासत में नही मिला. थैलेसीमिया की शिकार
रिमी अपने नियमित रक्त परिवर्तन के दौरान एक सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों की
अक्षम्य और जानलेवा लापरवाही का शिकार हो गई. अस्पताल के कर्मचारियों की लापरवाही
से उसे एचआईवी और हेपेटाइटिस संक्रमित रक्त चढ़ा दिया गया और अब वह कतरा-कतरा मौत
से जूझ रही है.
पश्चिम बंगाल में थैलेसीमिया से ग्रस्त कम से कम 300 ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें
अलग-अलग अस्पतालों में इसी तरह की लापरवाही का सामना करना पड़ा और अब एच आई वी से
ग्रस्त ये बच्चे अपनी मौत का रास्ता देख रहे हैं.
ईलाज नहीं मौत मिली
एक दिन पहले ही पश्चिम बंगाल के बसंती में पंचायत इलेक्शन के दोरान हुई भयावह हिंसा
की चपेट में आ कर राजू और रिमी की मां कनक सरदार की मृत्यु हुई है और अभी उनका एक
दूसरे अस्पताल में पोस्टमार्टम चल रहा है.
पोस्टमॉर्टम हाउस के बाहर हाथों में अपना सर थामे रिमी के पिता शंखो सरदार करुण
स्वर में कहते हैं- “सब कुछ ख़त्म हो गया है..रिमी का क्या होगा? वह कल से तकलीफ से
तड़प रही है..उसको बहलाना केवल कनक ही जानती थी..वह कल से बुखार में भुन रही है और
अपनी मां को ढूँढ रही है ..हम उससे कहते हैं कि तुम्हारी मां अभी टौफी लेने गई
है..लेकिन हम कब तक उसको सभालेंगे..हमारा तो जीवन ही बिखर गया.”
शंखो की चिंता अकारण ही नही है.
शंखो एक प्राइवेट अस्पताल के आपातकालीन विभाग में ढाई-तीन हज़ार प्रतिमाह कमाने
वाले एक अस्थाई एंबुलेंस चालक हैं. कल तक उनकी पत्नी कनक घर की तमाम ज़िम्मेदारी
सँभालने के साथ-साथ रिमी को महीने में कई-कई बार चेकअप और रक्त परिवर्तन के लिए
लाने ले जाने की ड्यूटी मुस्तैदी से अंजाम देती थीं. रिमी को 24 घंटे बुखार रहता है
और हेपेटाइटिस के कारण उसका पेट असामान्य तौर पर बढ़ा हुआ है. वह ठीक से खड़ी भी नही
हो सकती है और उसकी साथ हर समय किसी का रहना ज़रूरी है.
अब घर के काम काज और पढ़ाई के बोझ के साथ रिमी की देख भाल और उसको लेकर हर महीने
कलकत्ता के चक्कर काटना यह तमाम जिम्मेदारियां अनायास ही राजू के नाज़ुक कंधों पर आ
पड़ी हैं .वह ये सब किस तरह कर पायेगा ? उसकी आंखों में माँ की मृत्यु के दुःख के
अलावा ये सवाल भी साफ नज़र आ रहा है.
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यह पिछले महीने की बात है, जब रिमी की मां कनक कलकत्ता अस्पताल की सीढ़ियों पर रिमी
को गोद में ले कर बैठी अपने परिवार की और रिमी की त्रासदी के बारे में बता रही थी-
“ रिमी का थैलेसीमिया से पीड़ित होना ही हमारे लिए मुसीबतों के पहाड़ से भी बढ कर
था. हम ग़रीब लोग उससे ही लड़ते-लड़ते पस्त हुए जा रहे थे कि रिमी को एड्स हो गया..हम
जानते हैं किसी की भूल के कारण हमारी बिटिया मौत के मुंह में जा रही है..जब वह
पीड़ा से रोती है तो यह सोच कर कि मैं इसके लिए कुछ भी नही कर सकती मेरे दिल के
टुकड़े टुकड़े होने लगते हैं. ”
अब
रिमी को लेकर यह चिंता करने वाली कनक इस दुनिया में नहीं हैं.
एड्स यानी छूत की बीमारी
रिमी के पिता शंख को अभी भी उम्मीद है कि एक दिन कोई न कोई एड्स का इलाज खोज
निकालेगा और रिमी की ज़िंदगी बच जायेगी लेकिन अभी अपनी पत्नी कनक की मृत्यु के बाद
पैदा हुई परिस्थितियों से वह बिल्कुल ही हताश हो उठे हैं.
अपने बेटे के साथ खाना बना रहे शंख कहते हैं- “ मैं बमुश्किल तीन हजार माहवार कमाने
वाला मजदूर आदमी हूँ ..न छुट्टी ले सकता हूँ और न ही अपनी बेटी की देखभाल के लिए
कोई आया रख सकता हूँ..बिटिया को तो 24 घंटे की देखरेख की आवश्यकता है.”
और रिमी ? बुखार में तपती हुई रिमी बस एक ही बात बुदबुदाती रहती है- “ माँ कोथाय?
..आमी माएर काछे जाबो..अमी शुदु माँ के चाई.” ( माँ कहाँ है? मुझे माँ के पास जाना
है .मुझको माँ चाहिए).
“रिमी के साथ बहुत बुरा हुआ”. बीड़ी का जला हुआ टोटा मसलते हुए तालदा गाँव के एक
वृद्ध बिप्लब मंडल कहते हैं.. “ अगर शंख के पास पैसा होता तो भी कोई उसके घर नही
फटकता..उसके घर में रिमी जो है..एड्स है उसे एड्स..अछूत है अभागी एकदम ..कोई भी
उसकी देखरेख करने या घर के काम काज में मदद करने के लिए राज़ी नही होगा..”
मंडल बिना रुके कहते जाते हैं – “शंख अगर रिमी के लिए दूसरी शादी भी करना चाहे तो
यह भी असंभव है..उसके माथे पर तो एड्स ग्रसित बच्चे के बाप होने का ठप्पा लगा
है...ये दुनिया बड़ी निर्दयी है साहब...मैं बूढा ख़ुद दूसरो का मोहताज..चाह कर भी उन
लोगों के लिए कुछ कर पाना मेरे बस की बात नहीं ”.
रिमी के प्रति समाज की दुर्भाग्यपूर्ण अवहेलना न सिर्फ़ उसके परिवार ने बल्कि स्वयं
रिमी ने भी बहुत खुले तौर पर महसूस की है.
रुंधे गले से शंख कहते हैं –“ मैंने अक्सर देखा की कनक चौखट पर बैठी चुपचाप रो रही
है और उसके ठीक सामने आँगन मैं रिमी अकेली बैठी अपनी गुडियों से खेल रही है. कभी
कभी वह अपनी मां से फरमाइश करती थी कि उसको मैदान मैं सब बच्चों के साथ खेलना
है..वह पूछती थी कि मां उसको बाहर ले कर क्यों नही जाती..उस समय कनक की आंखों की
बेबसी देख कर मेरा दिल पानी पानी हो जाता था ..रिमी के इस सवाल का कि मेरे पास कोई
क्यों नही आता?, कनक कभी उत्तर तो न दे सकी परन्तु वह स्वयं उसकी सहेली बन गई..जो
उसके साथ मिल कर कभी गुड्डे गुडियों के ब्याह रचाती तो कभी मिटटी के घरोंदे बनाया
करती थी.”
300 से अधिक बच्चे हुए शिकार
जाहिर है, कनक के जाने से रिमी ने ना सिर्फ़ अपनी मां को बल्कि अपनी एकमात्र सहेली
को भी खो दिया, जो उसके साथ खेल खेलती थी और रात-रात भर जाग कर उसकी तीमारदारी करती
थी और सुबह होते ही उसको ले कर कभी इस अस्पताल तो कभी उस अस्पताल के लिए निकल पड़ती
थी.
अब रिमी के परिवार ने यह निर्णय लिया है कि राजू की स्कूल की पढाई बंद कर दी
जाए..इस के सिवा कोई और चारा ही नही है
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जब दो साल पहले रिमी के रक्त परीक्षण में एचआईवी के लक्षण पाए गए तो घर के लोग चौंक
गए. परिवार ने आरोप लगाया कि इसके लिए या तो सरकारी ब्लड बैंक या नील रतन अस्पताल
जिम्मेवार है, जहाँ उसको खून दिया जाता था. अस्पताल प्रबंधन ने कनक और शंख दोनों का
रक्त परीक्षण करवाया लेकिन दोनों के रक्त में एच आई वी के कोई लक्षण नहीं मिले.
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दिन रात बुखार से तड़पती है रिमी |
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हेपेटाइटिस के कारण उसका पेट असामान्य तौर पर
बढ़ा हुआ है. वह ठीक से खड़ी भी नही हो सकती. |
कोलकाता थैलेसीमिक एंड एड्स प्रेवेंशन सोसायटी के सचिव शैलेन घोष कहते हैं- “
पिछले पाँच सालों में पश्चिम बंगाल में लगभग तीन सौ थैलेसीमिक बच्चों को एच आई
वी संक्रमित रक्त दिए जाने के कारण एड्स हुआ है.”
श्री घोष को आशंका है कि अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे मिल सकते हैं, जो इस
तरह की लापरवाही के कारण एड्स के शिकार हुए हैं. वे बताते हैं कि भारत वर्ष में
ब्लड बैंकों में रक्त की कुल युनिट में से 2 से 3 प्रतिशत सामान्यतः एचआईवी से
संक्रमित होती हैं. विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि रिमी और सैंकडों अन्य
थैलेसीमिक बच्चों के एचआईवी के शिकार होने का बड़ा कारण अस्पतालों में रक्ताधान
के दौरान असुरक्षित उपकरणों और प्रदूषित ब्लड किट्स का इस्तेमाल है.
जांच, पेंच और उपाय
इस बीच रिमी के पिता शंख सरदार ने मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया है. शंख
कहते हैं- “ मैं एक ग़रीब आदमी हूँ ..इसलिए मैं अपनी बीमार बेटी को सरकारी
अस्पताल ले कर गया था..मेरी बिटिया की हालत के लिए सरकारी हस्पताल जिम्मेवार है
या फिर ब्लड बैंक ..इस पूरे मामले की जांच होनी चहिये और जो भी दोषी पाया जाए
उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि कल फिर कोई बाप अपने बच्चे की ऐसी
हालत देखने को मजबूर न हो.”
विशेषज्ञों की राय में अगर पूरे मामले की जांच की जाए तो अस्पताल या ब्लड बैंक
को इस पूरे मामले में घेरा जा सकती है लेकिन इसमें भी कई पेंच हैं. शैलेन घोष
के अनुसार रिमी के एचआईवी और हेपेटाइटिस बी संक्रमण के लिए अस्पताल प्रबंधन
सारा दोष विंडो पीरियड के सर मढ़ कर अपना पल्ला झाढ़ने की कोशिश करेंगे लेकिन
एचआईवी के लिए तो हर ब्लड बैंक में रक्त परीक्षण की पूरी व्यवस्था होती है.
घोष कहते हैं- “ रक्त दान के लिए जमा की गयी तमाम रक्त यूनिटों की समुचित जांच
डीएनए पीसीआर परीक्षण द्वारा होनी चाहिए. यह महंगा जरुर है लेकिन एक निर्दोष
जीवन तो अमूल्य है.”
हालांकि दूसरे विशेषज्ञ इस तरह के परीक्षण में भी कई खामियां देखते हैं.
चेन्नई की विख्यात एड्स विशेषज्ञ और समाज सेविका डाक्टर पिनागापानी मनोरमा का कहना
है कि पीसीआर टेस्ट एड्स की रोकथाम के लिए बहुत ही कारगर उपाए है किंतु यह इतना
महंगा है कि अगर इसको अनिवार्य कर दिया जाए तो रक्त की कीमतें इस हद तक बढ़ सकती हैं
कि हमारे देश में ग़रीबों के लिए अत्यन्त विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी.
डाक्टर मनोरमा के अनुसार “ इस समस्या का समाधान इसी तरह संभव है कि विश्वसनीय
व्यक्तियों से ही रक्त लिया जाए. इसके अलावा दानदाताओं में भी ज़िम्मेदारी और
ईमानदारी की भावना जागृत करने की आवश्यकता है.”
परन्तु शंख घोष का दर्द इस तरह के तर्क वितर्क से परे है - “हम तो बेमौत ही मारे गए
..हम लोग तो कही यौन सम्बन्ध बनाने नही गए थे..न ही हम नशे के लिए किसी सुई वुई का
इस्तेमाल करते थे ..हम ग़रीब तो बस हमारी बेटी का इलाज करवाने हस्पताल गए और उसके
लिए हेपेटाइटिस और एड्स के रूप में तिल तिल कर होने वाली मौत खरीद लाये.”
25.05.2008, 05.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित