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उम्मीदों वाली साईकल

मिसाल-बेमिसाल

 

उम्मीदों वाली साईकल

बिजू नेगी


हम में से कई लोग यह नहीं स्वीकार करना चाहते हैं कि मौसम को प्रभावित करने वाली गैसों को छोड़ने में चार पहियों वाली गाड़ियों का बहुत बड़ा योगदान है. इसके लिए आप चाहें तो हैनरी फोर्ड को दोषी ठहरा सकते हैं या फिर न्यूनतम आयोजित कार-नुमाइश को, लेकिन इससे कोई भी इंकार करने की स्थिति में नहीं है कि कारों को शुरू से एक हसीन सपने की तरह पेश किया गया है. नैनो के निर्माण के पीछे रतन टाटा ने भी स्कूटर पर सवार एक मध्यम वर्गीय परिवार के तथाकथित दर्द व कुंठित स्वप्न का बहाना लिया था.

मिश्किन-कोपनहेगन साईकिल

हमें कभी ये पाठ नहीं पढ़ाया गया, कम से कम आधुनिक युग में तो नहीं ही, कि ये चार पहियों वाले वाहन हमें एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने के लिए मात्र एक सुविधा हैं. इसके उलट कारें अब समाज में अपनी हैसियत जताने का प्रतीक बन गई हैं. ये वाहन सिर्फ ईंधन ही नहीं पीते बल्कि उस से कहीं ज्यादा जहर हवा में उगलते भी हैं - कार्बन डायोक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑकसाइड, बेन्जीन और क्या कुछ नहीं. जिससे हमारी सड़कों की घुटन बड़ी है, खुली साँस लेने की जगहें सीमित हुई हैं, धुँआ और कोहरा में इज़ाफा हुआ है और लोगों में श्वास रोगों की अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. दुनिया में अधिकांश लोग युद्वों में नहीं बल्कि सड़कों पर मरते व घायल होते हैं. अकेले भारत में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 5 लाख सालाना है.

पर फिर भी, चार पहियों वाले वाहन हमारे आराध्य देव हैं.

जलवायु को लेकर कोपनहेगन में आयोजित सम्मेलन में इन्हीं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए नवयुवकों द्वारा सार्वजनिक बसों व रेलों से उतरते यात्रियों को बैज बाँटते देख अच्छा लगा, जिस पर लिखा था, ''सार्वजनिक वाहन का प्रयोग करने के लिए धन्यवाद.'' और यह देख-जान कर तो और भी अच्छा लगा कि शहर में कारों व मोटर-साईकलों के बनिस्बत साईकलों की संख्या अधिक है. एक पूरे हफ्ते में मैने वहां मात्र दो या तीन से अधिक मोटर-साईकिल नहीं देखी.

ऐसे में मुझे अपने यहां के शूरवीर युवकों की बहुत याद आई जो अपने मां-बाप से जिद कर बगैर इनके घर से बाहर निकलना नहीं चाहते. और कोपहेगन में यह देख कर तो मेरा उत्साह और भी बढ़ा कि इस कालजई सवारी में भी अब, प्रतिर्स्पधा साईकलों के बाद; आम उपयोग के लिए भी कुछ आविष्कार होने लगे हैं.

यानी कोपनहेगन में सभी कुछ निराशजनक नहीं था!

मिश्किन जिंदाबाद !
वहां दो-तीन प्रदर्शित साईकल आविष्कारों में एक था- कोपनहेगन व्हील. इसका अनावरण शहर के मेयर ने 15 दिसंबर को किया. इस साईकल का पहला मूर्त रूप राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान, भोपाल में हुआ था. आविष्कारक थे, वर्तमान भारतीय प्रबंधन संस्थान, कोलकाता के व तब इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के विद्यार्थी मिश्किन इंगेवले.

मिश्किन एक विद्युत चालित साईकल का निर्माण तो कर सके पर बहुत खुश नहीं हुए. उनके अनुसार, ''उसमें बैटरी का भार ज्यादा था लेकिन मैं सीमित छात्र बजट के साथ उस पर काम कर रहा था, इसलिए ज्यादा सुधार नहीं कर पाया.'' पर साईकल उनके मन पर सवार हो गई और उस पर सोचते-सोचते उन्हें गत वर्ष मैसाच्यूसैट्स तकनीकी संस्थान, अमरीका में उस पर आगे काम करने का मौका मिला. वहां बाकायदा दस लोगों के एक दल ने इस पर काम किया और एक साल के अथक प्रयास के बाद कोपनहेगन व्हील का ईजाद हुआ.

कोपनहेगन व्हील का अनावरण यूरोपीय सड़कों पर तो हो गया पर भारत की सड़कों पर इसकी परीक्षा अभी होनी है, जो खासा चुनौतीपूर्ण होगा.

यूँ देखने में कोपनहेगन व्हील एक साधारण साईकल दिखती है, जो शायद इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है कि उसमें साईकल की मूल सरलता को बरकरार रखते हुए, उसे आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है. और यह पूरी की पूरी तकनीक उसके पिछले पहिए में रखी गई हैं.

इस कोपनहेगन व्हील के पहिए के हब या गरारी स्थल में एक इलैक्ट्रिकल मशीन बैठाई गई है जो एक मोटर अथवा जेनरेटर या मिश्किन के शब्दो में, एक 'री-जेनरेटर'; की तरह काम करती है. साईकल जब ढालान पर दौड़ रही हो या जब ब्रेक लगाई जाती है जो वह मशीन उससे उत्पादित उर्जा को संचित कर उसे संभावित उर्जा में परिवर्तित कर चार लीथियम बैटरियों में स्टोर करती है, जिसका उपयोग बाद में, जैसे चढ़ाई चढ़ते वक्त किया जा सकता है.

पसंद अपनी-अपनी
कोपनहेगन व्हील में एक और उपकरण है- एक आई-फोन, जो उसके हैण्डिल पर बैठाया गया है. इस 'स्मार्ट' फोन के जरिए साईकल सवार चलाने का तरीका चुन सकता हैं, जिसके तीन विकल्प हैं. एक, 'असिस्ट मोड' या सहायक विकल्प जिसमें पिछले पहिए पर लगे मोटर में संचित की गई उर्जा भेजी जाती है, जो साईकल का पैडल चलाने के सहयोग करती है.

दूसरा विकल्प है, 'एक्सरसाइज़ मोड' या शारीरिक अभ्यास विकल्प जिस से चलाते वक्त पैडल पर जोर लगाना पड़ता है. और तीसरा है, 'ऑफ मोड' या निष्क्रिय विकल्प जिससे साईकल एक आम साईकल की तरह चलती है.

पहिए में लगे यंत्र द्वारा एकत्रित अन्य जानकारी, जैसे आसपास हवा की गुणवत्ता- आखिर हम मौसम परिवर्तन के परिपेक्ष्य में बात कर रहे हैं न!, सड़क की स्थिति अथवा यात्रा मार्ग भी, ब्लूटूथ के जरिए आई-फोन तक पहुँचती है.

असली परीक्षा
कोपनहेगन व्हील का अनावरण यूरोपीय सड़कों पर तो हो गया पर भारत की सड़कों पर इसकी परीक्षा अभी होनी है, जो खासा चुनौतीपूर्ण होगा. हालांकि मिश्किन इसके लिए तैयार व इच्छुक हैं, क्योंकि इन सड़को पर दौड़ने के बाद ही वह इसे एक सफल आविष्कार मानेंगे. वे कहते हैं, ''देश की खराब से खराब सड़क पर भी इस साईकल की सघन जाँच के नियोजन पर मैंने काम शुरू कर दिया है.''

जब यह जाँच पूरी हो जाएगी और उसका व्यापक उत्पादन होने लगे तो मिश्किन इंगेवले देश में रोजमर्रा का सफर करने वालों के लिए साईकल के एक ऐसे मॉडल का आविष्कार प्रस्तुत कर चुके होंगे, जो आकर्षक होगा और आर्थिक दृष्टि से संभव व शारीरिक तौर से उपयोगी भी.

हाँ, बस, देश की यातायात, शहरी नियोजन, सड़क निर्माण, आदि की नीतियां साथ देते हुए साईकल सवारों और पैदल चलने वालों को थोड़ी सी अहमियत दे सकें तो कोपनहेगन व्हील जैसा उदाहरण शहरी यातायात की मुश्किलों व मौसम परिवर्तन की समस्याओं का एक अच्छा समाधान हो सकता है.

24.01.2010, 18.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kamaldixit (kmldixit@gmail.com) bhopal

 
 It is really a wonderful research and it again give hope that our scientists are of world level if they are given support to prove them. I hope this cycle will come to bhopal again with a fruitful test report. congrats to miskin. 
   

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