विदेशियों को मताधिकार क्यों
मुद्दा
विदेशियों को मताधिकार क्यों
रघु ठाकुर
अप्रवासी भारतीय शब्द का
जो अर्थ निकाला जाता है, वह अधिकतर भावनात्मक है, वरना अप्रवासी जैसी कोई स्थिति
नहीं बनती. दरअसल, इस शब्द की शुरुआत आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व चीन में हुई थी. जब
चीनी सरकार ने उन चीनियों को अपने दस्ते का चौथा हिस्सा बताया था, जो चीन से बाहर
रहते हैं. उन्होंने राष्ट्रवाद की भावना के आधार पर चीन सरकार की अपील का
प्रत्युत्तर दिया था और अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा चीन को भेजना शुरु किया था.
उस जमाने में चीन ने विश्व बैंक और अमेरिकी पूंजी को नीति
के तौर पर नकारा था तथा अपने देश के मूल निवासियों की जमा पूंजी को अपने देश के
विकास के लिये सहयोग के रूप में स्वीकारा था. परंतु यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है, कि
उन चीनियों को जो विदेशी नागरिक बन चुके हैं, कभी भी चीन में मताधिकार नहीं दिया
गया था.
8 जनवरी 2010 को भारत सरकार ने अप्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में उन्हें भारत में
मताधिकार देने का ऐलान किया है. सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री डॉ.
मनमोहन सिह ने कहा कि शीघ्र भारत सरकार अप्रवासी भारतीयों को भारत में मताधिकार
देगी और उनसे अपील की, कि वे आकर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करें. भारत सरकार
के इस निर्णय की प्रक्रिया की शुरूआत अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल
में हुई थी. परंतु उनकी पार्टी के चुनाव हारने के बाद वह प्रक्रिया वहीं रुक गई.
पिछले पांच वर्षों में मनमोहन सिंह अपनी उत्कष्ट इच्छा के बावजूद इस लंबित निर्णय
को क्रियान्वित नहीं करा पाये. उनके पहले कार्यकाल में यह इसलिये भी कठिन था,
क्योंकि आरंभ के वर्षों में उनकी सरकार वामपंथियों के समर्थन पर निर्भर थी और वे
आश्वस्त नहीं थे, कि यह फैसला वे वामपंथियों को हजम करा सकेंगे. परंतु अब सरकार
उनके नियंत्रण में है. और इसलिए वे अपनी इस दबी हुई इच्छा को पूरा करने के लिये
सक्रिय हुए हैं. वैसे भी चीन में साम्यवादी विचारधारा की एक दलीय प्रणाली है.
जिसमें चुनाव प्रक्रिया एक दल के सीमित गुट के पंजों में कैद रहती है.
चीन में राजनैतिक लोकतंत्र या दलीय लोकतंत्र नहीं है. बल्कि एक दल का एक गुटीय
लोकतंत्र है और जिसे लोकतंत्र कहना भी लोकतंत्र का मजाक है. दुनिया के किसी भी देश
में यह नियम नहीं है, कि उसके देशी मूल के नागरिकों को मत देने का दोहरा अधिकार
दिया जाये.
दरअसल अप्रवासी और देशी मूल के बीच फर्क है. आज भारत के जो लोग विदेशों में जाकर
बसे हैं, जो कई पीढियों से वहां रह रहे हैं, वे उन बाहरी देशों के मतदाता हैं.
उन्हें भारतीय मूल का तो कहा जा सकता है, अप्रवासी नहीं. अप्रवासी तो वह इन्सान या
पक्षी कहलाते हैं, जो अल्प प्रवास के लिये अपने देश से बाहर जाते हैं और फिर लौट
आते हैं. अप्रवासी का वास्तविक अर्थ अल्प प्रवासी है. जो लोग विदेशी नागरिकता ले
चुके हैं. वे भारतीय मूल के तो हैं, पर भारतीय नहीं हैं.
यह भी विचित्र है, कि भारत सरकार के अपने कानून के अनुसार कि कोई भी व्यक्ति देश
में दो स्थानों पर मतदाता नहीं हो सकता. ऐसा होना भी दण्डनीय अपराध है. परंतु वहीं
सरकार देश के बाहर बस चुके विदेशी नागरिकों को भारत का नागरिक और मतदाता बनाने को
बेताब है. सरकार का यह निर्णय भारतीय मूल के उन लोगों पर लागू नहीं होगाजो
पाकिस्तान और बांग्लादेश से लौटकर या वहां रहते हुए भारत के मतदाता बनना चाहते हैं.
इसीलिये जब जम्मू-काश्मीर में फारुख अब्दुल्ला तत्कालीन की सरकार ने प्रस्ताव पारित
किया था, कि पाकिस्तान या पाक अधिकृत कश्मीर में रह रहे काश्मीरी अगर वापस आना
चाहते हैं, तो उन्हें वापिस भारतीय नागरिक बनाया जायेगा, तब उस प्रस्ताव का विरोध
तत्कालीन केन्द्र सरकार ने भी किया था. मैं मानता हूं, कि फारुख अब्दुल्ला सरकार का
वह निर्णय पूर्णत: असंवैधानिक था. परन्तु क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है, कि वही
केन्द्र सरकार अब भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को भारत का मतदाता बनाना चाहती है
और मतदाता के अधिकार में पता व सम्पत्ति अंर्तनिहित है.
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जो लोग केवल मुनाफे के लिये भारत को चाहते हैं ,लेकिन घाटे
के नाम पर उससे बचना चाहते हैं, उनकी भारत के प्रति न कोई निष्ठा है न कोई वफादारी. |
इस तरह अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में निर्यातक या उत्पादक मात्र नहीं, बल्कि
फुटकर बाजार की बड़ी खिलाड़ी बन रही हैं. और इसलिए संसद के सामाजिक राजनैतिक चरित्र
को बदलने के लिये भारत के प्रधानमंत्री- जिनको मूल निष्ठा अमेरिका, यूरोप और
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अर्थव्यवस्था एवं वैश्वीकरण में हैं और जो ब्रिटेन में
जाकर अपने आपको ब्रिटिश शासन प्रणाली के मुरीद के रुप में प्रस्तुत करते हैं और
गौरवान्वित महसूस करते हैं, वे अब विदेशी पूंजी के मालिकों को भारतीय राजनीति के
सूत्र अपने हाथों में लेने के लिये खुली दावत दे रहे हैं. इन अप्रवासी भारतीयों की
भारत में कितनी निष्ठा है इसके दो प्रमाण हमारे समक्ष हैं. पहला-
जब वैश्वीकरण के आरम्भिक दौर में भारत सरकार ने भारत के विकास के लिये पूंजी
लगाने का आमंत्रण दिया था, तब वास्तव में कितनी पूंजी भारत में आई थी? भारत के
सार्वजनिक क्षेत्र में आज सकल पूंजी 70 लाख करोड़ से ऊपर है. जबकि अप्रवासी भारतीयों
की कुल पूंजी 6 हजार करोड़ मात्र आई थी. यदि अप्रवासी भारतीयों ने विदेशों में जमा
अपनी पूंजी का 1 प्रतिशत भी भारत में लगाया होता, तो यहां 60 लाख करोड़ रुपये की
पूंजी लग जाती. इतना ही नहीं उन्होंने यहां से कमाई पूंजी को भारतीय बैंकों में
नहीं रखा, बल्कि सीधे विदेशों में अपने खातों में पहुचा दिया.
दूसरा, जब वैश्विक मंदी का दौर शुरू हुआ तब इन अप्रवासी
भारतीयों ने यहां के अपने कारखानों में लगी अंश पूंजी को निकालना आरंभ किया, उसी का
परिणाम था, कि भारतीय बैंकों से बड़ी पूंजी बाहर चली गई थी. देश का शेयर मार्केट तथा
सरकार का आर्थिक गणना का आधार सेन्सेक्स धराशायी हो गया था. जाहिर है, कि जो लोग
केवल मुनाफे के लिये भारत को चाहते हैं ,लेकिन घाटे के नाम पर उससे बचना चाहते हैं,
उनकी भारत के प्रति न कोई निष्ठा है न कोई वफादारी.
अप्रवासी भारतीय नामक मतदाता भारत की भ्रष्ट चुनाव प्रणाली को और अधिक भ्रष्ट
करेंगे. यहां अपनी राजनैतिक पकड़ कायम करेंगे और संसद के नियंत्रक सूत्रों को उसी
प्रकार हाथ में ले लेगें, जिस प्रकार आज देशी पूंजी और कालेधन के मालिक गांवों में
जाकर जमीन खरीद कर न केवल किसान बन जाते हैं, बल्कि ग्रामीण राजनीति को अपने
नियंत्रण में लेते हैं.
इस प्रकार की घटना से उन्हें दो प्रकार के फायदे होते हैं. यह भी हमें ध्यान में
रखना होगा कि अमेरिका ने और पश्चिमी देशों ने समूची दुनिया के गरीब देशों में
बड़ी-बड़ी जमीनें खरीदकर अपना मालिकाना हक हासिल कर लिया है. आज न केवल दक्षिण
अफ्रीका बल्कि समूचे अफ्रीकी भूभाग की अधिकांश जमीनों के मालिक और उच्च तकनीक के
कृषि के मालिक यही अमेरिका और यूरोप के पूंजी पति लोग हैं. भारत सरकार पिछले कई
वर्षों से पैदावार बढ़ाने के लिये विदेशी पूंजी आमंत्रित करने के प्रयास में लगी है.
पता नहीं, वह यह क्यों नहीं देख पाती कि जिन अफ्रीकी देशों में कृषि के क्षेत्र में
अमरीकी पूंजी लगी है, वहीं सर्वाधिक भुखमरी हैं. पैदावार बढ़ाने के नाम पर अपनी
जमींदारी हासिल करना और स्थानीय निवासियों को भूख से मारना उनकी दो तरफा रणनीति
हैं. हमें यह अहसास होना चाहिये, कि भारत- जिसके 84 करोड़ लोग 20 रु. रोज पर जिन्दा
हैं और भुखमरी की कगार पर हैं, उन्हें एक छोटा सा धक्का भूख की मौत के मुंह में
ढकेल देगा. इसलिये प्रधानमंत्री से मैं अपील करुंगा कि वे भारत को इथोपिया न
बनायें.
28.01.2010, 06.10
(GMT+05:30) पर प्रकाशित