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जान बचाने वाली ये औरतें

मिसाल-बेमिसाल

 

जान बचाने वाली ये औरतें

डॉ. असगर अली इंजीनियर

 

लाल रत्नाकर
पेंटिंगः डॉ. लाल रत्नाकर

हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को सामान्यतः कमजोर समझा जाता है. पुरूष मानते हैं कि महिलाओं को उनकी सुरक्षा की जरूरत है. हो सकता है, यह कुछ मामलों में सही भी हो परंतु ऐसे भी अगणित उदाहरण हैं जब “कमजोर" महिलाओं ने तब हिम्मत दिखाई, जब “बहादुर" पुरूष अपनी दुम दबाकर निकल भागे थे. शरीर से कमजोर महिलाओं ने यह सिद्ध किया कि नैतिक रूप से वे बहुत शक्तिशाली हैं. शारीरिक ताकत या हथियारों की ताकत ही असली ताकत नहीं होती. हमारे नैतिक मूल्य हमें ताकत देते हैं. जो नैतिकता की राह पर चल रहे हैं, उन्हें किसी से ड़रने की जरूरत नहीं है. उन्हें कोई नहीं हरा सकता.

यद्यपि यह मानना अनुचित होगा कि महिलाएं नैतिकता की दृष्टि से पुरूषों से श्रेष्ठ होतीं है परंतु यह निश्चित हैं कि आम तौर पर महिलाएं, पुरूषों की तुलना में अधिक नैतिक होतीं है. इसके कई कारण हैं. पुरूष, सत्ता और प्रभुता के, महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक आकांक्षी होते हैं और इसके लिए वे अनैतिक रास्ते अपनाने से गुरेज नहीं करते. महिलाओं की तुलना में पुरूष अधिक अपराध करते हैं और तुलनात्मक दृष्टि से महिलाओं का व्यवहार अधिक नैतिक होता है.

चंद अपवादों को छोड़कर, महिलाओं ने युद्ध नहीं लड़े. अधिकतर भयावह और बर्बादी फैलाने वाले युद्ध-जिनमें लाखों मासूम लोग मारे गए-पुरूषों ने ही शुरू किए थे. पिछली सदी में हुए दोनों विश्व युद्ध पुरूषों ने ही शुरू किए और लड़े. महिलाओं ने केवल कष्ट भोगे. महिलाएं मानव जीवन के प्रति पुरूषों से कहीं अधिक संवेदनशील होती हैं. महिलाएं ही जीवन का निर्माण करतीं हैं. वे मानव जीवन को अपने गर्भ में नौ महीनों तक पालती हैं और बच्चे के जन्म के बाद सालों तक उसकी देखभाल करतीं हैं- तब तक जब तक वह आत्मनिर्भर नहीं हो जाता.

दूसरी ओर पुरूष, सत्ता या संपत्ति की अपनी लालसा पूरी करने के लिए बम गिराकर या मिसाईल छोड़कर क्षणों में हजारों लोगों को मार ड़ालते हैं. हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराकर लाखों मासूमों को किसने मारा था? पुरूषों ने. पुरूषों के लिए सत्ता और अधिकार, मानव जीवन के प्रति संवेदनशीलता से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.

भारत में भी सांप्रदायिक दंगों के मामलों में केवल पुरूष ही दोषी होते हैं. मैं पिछले 40 सालों से भारत में सांप्रदायिक दंगों की जाँच और अध्ययन कर रहा हूं. मुझे एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिला जब किसी महिला ने दंगे का षड़यंत्र रचा हो या दंगे कराए हों. किसी हिन्दू या मुसलमान को मारना तो बहुत दूर की बात है. केवल गुजरात की माया कोडनानी ही इसकी एकमात्र अपवाद हैं. उस पर नरोदा पाटिया में निर्दोष मनुष्यों को मारने के लिए पुरूषों को उकसाने का आरोप है.

यद्यपि दंगों के दौरान किसी को मारने वाली एक भी महिला के बारे में मैंने नहीं सुना परंतु मैं ऐसी कई महिलाओं को जानता हूं, जिन्होनें निर्दोषों की जान बचाईं. ये महिलाएं शांतिप्रिय नागरिकों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं. इनमें से कुछ से मेरी मुलाकात दंगों की जाँच के दौरान हुई और कुछ के बारे में मुझे समाचारपत्रों से पता चला. इन्हीं में से कुछ का हमने “वूमेन फॉर सेक्युलरिज्म” की ओर से सम्मान भी किया. यह संगठन मैदानी स्तर पर महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करता है.

दंगों के दौरान महिलाओं द्वारा निर्दोर्षों की जान बचाने की पहली घटना से मेरा साबका अहमदाबाद के सन् 1969 के दंगों की जाँच के दौरान पड़ा था. मुझे अब उस महिला का नाम तो याद नहीं है परंतु मुझे यह याद है कि वो अहमदाबाद की जालिमसिंह नी चाल में रहती थी, जहाँ उसके पड़ोस में दो मुस्लिम परिवार रहते थे. एक हिंसक भीड़ ने चाल को घेर लिया और यह मांग की कि मुस्लिम परिवारों को उसे सौंप दिया जाये ताकि वे उन्हें मार कर उनके घर लूट सकें.

वो महिला, जो सब्जी बेचकर अपना जीवन चलाती थी, शोर सुनकर अपने कमरे से बाहर आई. उसके हाथ में हंसिया था, जिससे वह सब्जी काटती थी. वो सीढ़ियों से उतर कर नीचे आ गई और चाल के दरवाजे पर खड़े होकर उसने भीड़ से कहा कि यदि किसी में हिम्मत हो तो आगे बढ़े. उसने कहा कि जो भी आगे बढ़ेगा वो उसकी गर्दन हंसिए से उड़ा देगी और फिर वे लोग उसकी लाश के ऊपर से गुजर कर मुसलमानों का कत्ल कर सकते हैं. कोई आगे नहीं बढ़ा और भीड़ में शामिल 500 से ज्यादा लोग बिखर गए.

मैं इस महिला से मिला और उससे पूछा कि उसने मुसलमानों की जान बचाने के लिए अपनी जान क्यों खतरे में डाली. उसका जवाब था कि पहली बात तो यह है कि वो मुसलमान मेरे पड़ौसी थे और उनकी जान बचाना या उन्हें बचाते हुए अपनी जान दे देना, मेरा कर्तव्य था. दूसरे, वे राजस्थान के उसी गाँव के रहने वाले थे, जहाँ की मैं हूं. अगर वे लोग मारे जाते तो मैं गाँव वालों को क्या मुंह दिखाती? तीसरे, उनकी जान बचाना मेरा कर्तव्य इसलिए भी था क्योंकि वे निर्दोष थे और उनका दंगों से कोई लेना-देना नहीं था.

“चाल में पुरूष भी तो थे. वे भी तो अपनी पड़ौसियों की जान बचाने सामने आ सकते थे?“ मैंने उससे पूछा. “अगर उनमें साहस नहीं था तो मैं क्या करू?“, उसका उत्तर था. “मैंने अपने पड़ौसियों को बचाने के लिए वह सब किया जो मैं कर सकती थी“. वह सब्जी वाली, सैकड़ो पुरूषों के लिए प्रेरणास्त्रोत थी. जब ये औरत अपनी जान पर खेल रही थी तब वे अपने घरों में घुसे हुए थे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

S. Narayan Delhi

 
 यह बड़ा साधारण निष्कर्ष है कि पुरुषों ने पूरे समाज को खराब कर रखा है। दरअसल यह इंसानी फितरत का मामला है। यदि संसार में स्त्री और पुरुष हैं तो इनमें से ही कोई न कोई अच्छा या बुरा करेगा। हर समाज के पास कुछ गर्व करने लायक होता है तो कुछ अफसोस करने लायक। अहंकार न तो पुरुषों की बपौती है और न ही शालीनता औरतों की। बेहतर समाज बनाने में हम विवेक का इस्तेमाल करें, वहीं ठीक होगा।  
   
 

vidhu (aurat.vidhu@gmail.com) bhopal

 
 आपको और उस महिला को प्रणाम. 
   
 

RAJNISH PARIHAR (rajnishkumar.bikaner@gmail.com ) BIKANER[RAJ.]

 
 सही है आजकल सच में ऐसी कहानियों से हमें सबक लेना चाहिए...पर ये कभी भी अख़बारों की हेडलाइन नहीं बन पाती क्यूंकि वो तो बलात्कार की ख़बरों के लिए सुरक्षित है! महिला हमेशा ही कभी माँ,कभी नर्स, कभी धाय तो कभी बहिन बन कर पुरुषों को बचाती आई है! पर पुरुष तो उसे कभी सम्मान नहीं देना चाहता... 
   
 

pratibha (kpratibha.katiyar@gmail.com) lucknow

 
 निश्चित रूप से ये महिलाएं पूँजी हैं समाज की. इन्हें सम्हाल के रखना बहुत ज़रूरी है...बढ़िया
लेख...
 
   
 

vivek sanyal (vvksanyal@gmail.com) Mumbai

 
 लेखक को इस आलेख के लिए दिल औऱ दिमाग, दोनों से बधाई प्रेषित करता हूं. बिल्कुल अनछुआ विषय है.ऐसे लोगों के लिए आंख खोल देने वाला आलेख है, जो पुरुष प्रधान समाज के मुगालते में जी रहे हैं. 
   
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