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लड़कियों की मंडी

छत्तीसगढ़

 

लड़कियों की मंडी

राजेश अग्रवाल

कुनकुरी, छत्तीसगढ़ से

 

 

जशपुर जिले का लुड़ेग बीते कुछ दशकों में टमाटर की खूब फसल के कारण प्रसिध्द था. मिट्टी और मौसम अनुकूल होने के कारण यहां के आदिवासियों ने इसे खूब उगाया. कई बार तो ऐसी नौबत आई कि टमाटर खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था, क्योंकि बाजार तक लेकर जाने में परिवहन का खर्च भी निकल नहीं पाता था. यहां कई बार मांग हुई कि टमाटर पर आधारित उद्योग लगा दिये जाएं जिससे आदिवासी किसानों का जीवन स्तर ऊपर उठ जाएगा. लेकिन इस पिछड़े इलाके के लिए कुछ नहीं सोचा गया.

सरगुजा की ललिता

ललिता के अनुसार उसे हर महीने अच्छी पगार मिलती है लेकिन गांव की दूसरी लड़कियों की किस्मत ललिता जैसी नहीं है.


पिछले कुछ वर्षों से जशपुर और सरगुजा जिले में एक नई तरह की फसल तैयार हो रही है. उसे बाजार भी खूब मिल रहा है. ये फसल हैं इस इलाके के निर्धन आदिवासी उरांव परिवारों की नाबालिग लड़कियां और बाजार बने हुए हैं दिल्ली गोवा जैसे देश के महानगर. इस फसल को खाद-बीज दे रहे हैं उनके अपने निकट सम्बन्धी और बिचौलिये का काम कर रही हैं, दिल्ली में काम कर रही 200 से ज्यादा प्लेसमेन्ट एजेंसियां.
 
लड़कियां टमाटर तो होती नहीं. उनकी धमनियों में रक्त का संचार होता है. मन है, जो पंख लगाकर आकाश में उड़ना चाहता हैं. ह्रदय है जिसमें सुख-दुख मान,अपमान, स्वाभिवान कष्ट और प्रसन्नता महसूस कर सकती हैं. पर सरगुजा और जशपुर इलाके के गांवों में 3 दिन भटकने के बाद महसूस हुआ कि इन सब भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार केवल उनको है, जिनके पेट भरे हों.

इनकी आंखों में आंसू भी आते हैं तो रोककर रखना होगा, बाप को बेटी से बिछुड़ने और बेटी को घर की याद आने पर भी दोनों विवश हैं. पुलिस व प्रशासन की मदद नहीं मिलने की आशंका से अभिभावकों के पैरों में बेड़ियां लग गई हैं और बेटियां तो पता नहीं कहां नजरबंद हैं या घुटन भरी कोठियों में बीमार पड़ गई या मार डाली गई.

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए ऐसी लड़कियों की संख्या सैकड़ों में है, जो एक बार निर्जन जंगल में बनी अपनी झोपड़ी से महानगरों की भूल-भुलैया में अपना भविष्य संवारने का सपना लिए निकल पड़ी और फिर उनका कुछ पता नहीं चला.

सीतापुर ब्लाक के बेलगांव की ललिता एक्का पिछले सात साल से दिल्ली के एक मीडिया हाऊस में झाड़ू पोछे का काम कर रही है. 6वीं तक पढ़ी 19 साल की ललिता से जब हम मिले तो वह संकोच झिझक उसकी आंखों व हाव-भाव व पहनावे में नहीं थे, जो अक्सर इस गांव की लड़कियों में दिखाई देती है.

सपनों के सौदागर
उसने चहककर अंग्रेजी पुट में बताया कि वह पिछले सात सालों से दिल्ली में है और उसे कोई तकलीफ नहीं है. उसकी तनख्वाह बढ़कर अब 4500 रूपये हो गई है, हर माह एक निश्चित तारीख को चेक से इसका भुगतान हो जाता है. साल में एक बार अपने माता-पिता से मिलने के लिए आती हैं, और सबको कुछ न कुछ उपहार व नगदी दे जाती है. बीच-बीच में वह मनीआर्डर भी करती रहती है. जब उससे प्रस्ताव किया गया कि हमें भी दिल्ली में एक घरेलू नौकरानी की जरूरत है, उसने झट से अपना मोबाइल नम्बर दे दिया और कहा कि वह इसका प्रबंध दिल्ली पहुंचते ही कर देगी.

लेकिन हर लड़की का भाग्य ललिता की तरह नहीं है. इसकी तरह कई 'कामयाब' लड़कियों के किस्से गांव में हाथ बांधे बैठी लड़कियों के मन में कुलाचे मारने के लिये काफी है. ललिता तो इस बात से इंकार करती है कि वह किसी प्लेसमेन्ट एजेंसी के लिए काम करती है और लड़कियों को बहला-फुसला कर ले जाने के धंधे में शामिल है पर ज्यादातर दलाली का काम इसी तरह की लड़कियां और स्थानीय युवक कर रहे हैं.

इनकी नजर अपने ही रिश्तेदारों की 8 से 16 साल के बीच की लड़कियों पर होती है. उन्हें झांसा दिया जाता है कि दिल्ली में अच्छा खाना व कपड़ा मुफ्त मिलेगा साथ ही आकर्षक तनख्वाह भी. वहां बड़े-बड़े बंगले हैं, चौड़ी सड़कों पर सरपट दौड़ती एसी गाड़ियां हैं, जिनमें मेमसाहब के साथ मार्केट जाने का मौका मिलेगा. लेकिन वहां जाने के बाद धकेल दी जाती हैं, प्लेसमेंट एजेंसियों के दफ्तरों में, जो किसी काल-कोठरी से कम नहीं. लड़के-लड़कियों को तंग कमरों में रखा जाता है, वहां इन लड़कियों के साथ क्या-क्या होता है, अनुमान लगाना कठिन नहीं है. यह सिलसिला साहबों के बंगलों में भी खत्म नहीं होता.

जशपुर जिले के दुलदुला थाना के अंतर्गत आने वाले चटकपुर गांव की शशिकांता किण्डो को जुलाई 2006 में गांव की ही अनिता और विमला अच्छी नौकरी दिलाने का आश्वासन देकर ले गये थे. वहां पहुंचने के बाद चिराग, दिल्ली के एक प्लेसमेंट एजेंट राजू अगाथा ने हिमांशु बख्शी के यहां नौकरी दिलाई. वहां मालकिन नमिता ने कुछ दिनों तक तो ठीक रखा पर बाद में उसे घर से निकलने भी नहीं दिया जाता था. जब भी शशिकांता गांव वापस लौटने की जिद करती थी, उसे जल्द ही छोड़ देने का भरोसा दिलाया जाता था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Surendra Mishra Nagpur

 
 छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी इस तरह की घटनाएं बहुत सामने आ रही हैं. आज हमें इस बात को लेकर सोचना पड़ेगा कि आखिर हमारा समाज कहां जा रहा है. 
   
 

pawan gupta (g.pawan80@rocketmail.com) pathalgaow

 
 यह सौ प्रतिशत सच्ची खबर है. मैं पत्थलगांव में ही रहता हूं. 
   
 

mahipal delhi

 
 achi khabar thi mujhe sun ke bahut acha laga 
   
 

Himanshu Sinha (patrakarhimanshu@gmail.com)

 
 बहुत सुंदर रिपोर्ट है लेकिन अगर इसमें आंकड़े भी होते तो अच्छा होता. अब तक छत्तीसगढ़ से या सरगुजा या जशपुर से कितनी लड़कियां गायब हुई हैं, इनका आंकड़ा होता तो शायद उचित होता. 
   
 

उमेश सोनी (uk.soni@rediffmail.com)

 
 आपको याद होगा की प्रदेश की विधानसभा में मनोनीत एग्लो विधायक ने सरगुजा जशपुर में जारी मानव तस्करी के सम्बन्ध मे प्रश्न उठाया था. उनका कहना था कि स्थानीय पुलिस इस मामले को गम्भीरता से नही लेती. पुलिस लडकियों की तस्करी को किसी भी सूरत में अपराध नही मानती और इसके खिलाफ अपराध पंजीबद्ध नही किया जाता है. उनका कहना था की पुलिस कप्तान भी इस मामले में गम्भीर नही होते. इस प्रश्न पर प्रदेश के गृहमंत्री और आदिवासी विधायक रामविचार नेताम का जवाब मनोनीत विधायक को संतुष्ट नही कर सका. अब आप कल्पना करें कि इन आदिवासी बालाओ की तस्करी से लोगों का कितना क्या सरोकार है. आदिवासी बालाओ के शोषण के लिये जिम्मेवार कौन? यह यक्ष प्रश्न आपके सामने है.  
   
 

उमेश सोनी (uk.soni@rediffmail.com)

 
 आपको याद होगा की प्रदेश की विधानसभा में मनोनीत एग्लो विधायक ने सरगुजा जशपुर में जारी मानव तस्करी के सम्बन्ध मे प्रश्न उठाया था. उनका कहना था कि स्थानीय पुलिस इस मामले को गम्भीरता से नही लेती. पुलिस लडकियों की तस्करी को किसी भी सूरत में अपराध नही मानती और इसके खिलाफ अपराध पंजीबद्ध नही किया जाता है. उनका कहना था की पुलिस कप्तान भी इस मामले में गम्भीर नही होते. इस प्रश्न पर प्रदेश के गृहमंत्री और आदिवासी विधायक रामविचार नेताम का जवाब मनोनीत विधायक को संतुष्ट नही कर सका. अब आप कल्पना करें कि इन आदिवासी बालाओ की तस्करी से लोगों का कितना क्या सरोकार है. आदिवासी बालाओ के शोषण के लिये जिम्मेवार कौन? यह यक्ष प्रश्न आपके सामने है. 
   
 

Himanshu Sinha (patrakarhimanshu@gmail.com)

 
 बहुत सुंदर रिपोर्ट है लेकिन अगर इसमें आंकड़े भी होते तो अच्छा होता. अब तक छत्तीसगढ़ से या सरगुजा या जशपुर से कितनी लड़कियां गायब हुई हैं, इनका आंकड़ा होता तो शायद उचित होता 
   

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