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अतुल्य भारत में अतुल्य भूख की कहानी

मुद्दा

अतुल्य भारत में अतुल्य भूख की कहानी

आलोक तोमर, दिल्ली से

उड़ीसा के बोलांगीर संसदीय क्षेत्र से युवा सांसद कालीकेश नारायण सिंह देव स्टूडियो में साथ में थे. मुद्दा बोलांगीर में भूख से होने वाली मौतों का था. बोलांगीर में मौत अतिथि नहीं हैं और दस्तक दे कर नहीं आती. अनाज से और खास तौर पर निर्यात होने वाले चावल से भारतीय खाद्य निगम के गोदाम भरे पड़े हैं. बाजारों में महंगी से महंगी शराबे मिलती हैं. छतों पर डिश एंटिना लगे हुए हैं. होटलों में शाही पनीर और मुर्गे की टांग मिलती है. फिर भी बोलांगीर में भूख है.

कालाहांडी अकाल


बोलांगीर पश्चिमी उड़ीसा के कुख्यात कालाहांडी-बोलांगीर-कोरापुट नाम की केबीके के तौर पर मशहूर उस पट्टी का एक हरा भरा जिला है, जहां से इथियोपिया के बाद सबसे ज्यादा मौत की खबरे आती हैं. वह भी भूख से मौत की खबरें. बोलांगीर में कुछ पत्रकार गए थे और उन्होंने सिर्फ चार ब्लॉक में पचास मौतों और तीन सौ बच्चों के अनाथ हो जाने की हृदय विदारक खबर दी थी.

दिलचस्प बात यह है कि पूरे कालाहांडी इलाके में छोटे बड़े राजघराने हैं और इन्हीं में से सांसद चुने जाते रहे हैं. पिछली बार भाजपा के सबसे ज्यादा राजसी सांसद यही से चुने गए थे और इस बार उन्हीं परिवारों से बीजू जनता दल के सांसद चुने गए हैं. कालिकेश नारायण सिंह भी उन्हीं में से एक हैं. दून और सेंट स्टीफंस में पढ़े हैं और उनके परदादा 1971 तक उड़ीसा के मुख्यमंत्री थे. पिता जी उड़ीसा में मंत्री रहे है. इसीलिए अचरज हुआ कि यह पढ़ा लिखा युवा सांसद भी सरकारी भाषा बोल रहा है और कह रहा है कि लोग तो मरते ही रहते हैं और ये मौतें पचास नहीं हैं और यह भी है कि ये लोग मलेरिया से मरे है.

अतुल्य भारत में अतुल्य भूख से होने वाली मौतों पर इस तरह की आपराधिक सादगी भी अतुल्य ही कही जाएगी. कालाहांडी का सच दूसरा है.

हालांकि खबरें तो पूरे देश से सूखे और अकाल की आ रही है लेकिन इन खबरों में कालाहांडी का नाम नहीं है. कालाहांडी भूख और अकाल से होने वाली मौतों का एक ऐसा मुहावरा बन गया है कि वहां भूख और अकाल अब खबर नहीं बनते.

वैसे भारत में अकाल और आपदाओं के उपकारधर्मी पर्यटन का, कालाहांडी एक तीर्थ भी हैं. रायपुर हवाई अड्डे पर अब तो बहुत उड़ाने उतरने लगी है और यह पश्चिमी उड़ीसा के केबीके यानी कालाहांडी-बोलांगिर -कोरापुट इलाके के सबसे करीब का हवाई अड्डा है और यहां आम तौर पर देश, विदेश से चंदा ले कर चलने वाले और अकाल मिटाने का दावा करने वाले तमाम सामाजिक संगठन हैं, जिन्हें बोलचाल की भाषा में एनजीओ कहा जाता है.

इस सूखे के मौसम में भी कालाहांडी हरा-भरा है. धान के खेतों में पानी भरा है. फसल पिछली बार भी अच्छी हुई थी और इस बार भी अच्छी होने की उम्मीद है. सबसे ज्यादा इस इलाके में धान ही होता है और वह भी इस स्तर का कि आम तौर पर निर्यात किया जाता है. ये धान उगाने वाले किसान भूखे रहते हैं या अपने ही खेतों पर मजदूरी करते है.

इस पूरे इलाके में सूदखोरी का धंधा इतनी निर्लज्जता से चलता है कि बड़े से बड़ा बेशर्म शर्मा जाए. एक रुपए पर अस्सी पैसा ब्याज यानी ब्याज का प्रतिशत 80 फीसदी और वह भी प्रति माह. डागोस और जेनेवा में भारतीय निर्यात और विकास दर की घोषणा करने वाले हमारे सत्ता के सूत्रधार जानते हैं कि 13 प्रतिशत से ज्यादा ब्याज लेना अपराध है लेकिन पश्चिमी उड़ीसा के ज्यादातर जिलों में यह अपराध सामाजिक और सामुदायिक आधार पर चलता रहता है और किसी को ऐतराज नहीं होता.

कालाहांडी की ओर सबसे पहले ध्यान दिया था इंदिरा गांधी ने. वे 1980 में कालाहांडी के दौरे पर गई थीं और केबीके विकास बोर्ड की घोषणा कर के आई थीं. इस कोष में सारा पैसा केंद्र सरकार को देना तय हुआ था. मगर सरकारी माल आ रहा है और उसका बंटवारा होना है तो स्थानीय विधायकों और सांसदों में बोर्ड का सदस्य बनने की होड़ मच गई और वोट बैंक की राजनीति में बोर्ड बन ही नहीं पाया. भारतीय जनतंत्र को भूख तंत्र भी कहा जा सकता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

atulmohan samdarshi (atulcreativeindia@gmail.com) lucknow

 
 आज हमने 63 बरसों में अमीरों को टॉप पर पहुँचाया पर गरीब का छप्पर खिसकता गया है.  
   
 

sudeep thakur (sudeep.thakur@gmail.com) delhi

 
 आलोक जी,

वाकई भूख कालाहांडी की त्रासदी है. बोलांगीर भी आखिर कभी कालाहांडी का ही हिस्सा था. वहां भूख और बीमारी में फर्क करना बेहद मुश्किल है और यह विडंबना ही है कि सरकारी परिभाषाएं इस फर्क को पाटने में 60-62 सालों में भी नाकामयाब रही हैं. मैंने भी 1996 में कालाहांडी (कालाहांडी, बोलांगीर और नुआपाड़ा) में आए अकाल को नजदीक से देखा था. 50-60 गांवों में मैंने जो नजारा देखा था वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. उन दिनों विनम्र किसान देवगौड़ा देश के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने केबीके के लिए एक बड़ी योजना का ऐलान किया था. मगर यह घोषणा भवानीपटनम की हवाई पट्टी से उनके हेलीकाप्टर के उड़ने के साथ ही धूल में उड़ गई थी. यदि कोई भूख और मौत पर शोध करना चाहे, जैसा कि कई पत्रकारों का शगल रहा है, तो उसे कालाहांडी जाना चाहिए.

कुछ घटनाएं मुझे आज भी याद हैं और जिसे मैंने अपनी रपटों में दर्ज भी किया था. ऐसी ही एक घटना है 15 अगस्त 1996 की. चार दिन तक भूखे रहने के बाद कालाहांडी के लांजीगढ़ ब्लाक के किड़िंग गांव के श्रीबच्छा नामक व्यक्ति ने फांसी लगा ली थी. उसकी पत्नी दुतिका अपने दो बेटों खड़िया और दुश्मन के साथ भूख से संघर्ष कर रही थी. मध्याह्न भोजन योजना बच्चों को आज तक स्कूल से जोड़ नहीं पाई है लेकिन तब मैंने देखा था कि दुतिका अपने दो बच्चों को मध्याह्न भोजन के रूप में मिलने वाला भात खिला रही थी. गौर कीजिए कि उसके दो बच्चों के नाम स्कूल में दर्ज नहीं थे. गांव के मास्टर ने दया कर उनके लिए यह बंदोबस्त कर दिया था.

भूख से होने वाली मौतों को लेकर सरकारी नजरिया अब भी नहीं बदला है. कालांहाडी जिला प्रशासन तब कई मौतों को सिर्फ इसलिए खारिज रह रहा था क्योंकि मरने वाले के पास मिले राशन कार्डों के पन्ने 2 रु. किलो मिलने वाले चावल की निकासी से भरे थे. इन उचित मूल्य की दुकानों का कैसा अनुचित इस्तेमाल दलाल, नेता और भ्रष्ट अधिकारी करते हैं यह कहने की जरूरत नहीं. कुछ को भूख से मरा इसिलए नहीं माना गया क्योंकि उनके घरों में पीतल के बर्तन थे या फिर उनके घर के आसपास पपीते का पेड़ था.

क्या आप जानते हैं 1996 के दुर्भिक्ष में कालाहांडी, बोलांगीर और नुआपाड़ा, खरियार से पलायन करने वाले हजारों लोगों ने अपना सबकुछ बेच डाला था ताकि रायपुर से लेकर हैदराबाद तक के सफर का किराया निकाल सकें. ये सब पुरानी बातें हैं लेकिन बोलांगीर में हुई मौतें बता रही हैं कि हालात बहुत नहीं बदले हैं और सरकार और उसकी संस्थाएं गरीबी की रेखा के आंकड़ों को ऊपर-नीचे करने में लगी हुई है.
 
   
 

kamal dixit (kmldixit@gmail.com) bhopal

 
 विकास कार्यक्रमों का यह विरोधाभास बहुत समस्या पैदा कर रहा है और राजनीति के लोग अपनी पदाभिलाषा में उतने अंधे हैं कि उन्हें यह सब दिखाई नहीं होता. सरकारी तंत्र और खासकर बड़े अधिकारी जो पढ़ लिखकर तंत्र का हिस्सा बने है अब इसी खेल का हिस्सेदार हैं. आपने ठीक कहा है और ऐसी जगहें राजनीति के रस के स्थान हो गए हैं. 
   
 

Arvind pant (arvindpant000@gmail.com) joshimath [chamoli] uttrakhand

 
 अफसोस, कल्याणकारी राज में होती भूख से मौतें. उदारीकरण के परिणमों ने अभी दस्तक भी नहीं दिए हैं,
सिर्फ हवा है जो चुने का प्रयास कर रही है, और बता रही है गरीबों सावधान हो जाओ तुम्हारे लिए यहां कोई जगह नहीं.
 
   
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