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| इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | ||
atulmohan samdarshi (atulcreativeindia@gmail.com) lucknow | ||
| आज हमने 63 बरसों में अमीरों को टॉप पर पहुँचाया पर गरीब का छप्पर खिसकता गया है. | ||
sudeep thakur (sudeep.thakur@gmail.com) delhi | ||
| आलोक जी, वाकई भूख कालाहांडी की त्रासदी है. बोलांगीर भी आखिर कभी कालाहांडी का ही हिस्सा था. वहां भूख और बीमारी में फर्क करना बेहद मुश्किल है और यह विडंबना ही है कि सरकारी परिभाषाएं इस फर्क को पाटने में 60-62 सालों में भी नाकामयाब रही हैं. मैंने भी 1996 में कालाहांडी (कालाहांडी, बोलांगीर और नुआपाड़ा) में आए अकाल को नजदीक से देखा था. 50-60 गांवों में मैंने जो नजारा देखा था वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था. उन दिनों विनम्र किसान देवगौड़ा देश के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने केबीके के लिए एक बड़ी योजना का ऐलान किया था. मगर यह घोषणा भवानीपटनम की हवाई पट्टी से उनके हेलीकाप्टर के उड़ने के साथ ही धूल में उड़ गई थी. यदि कोई भूख और मौत पर शोध करना चाहे, जैसा कि कई पत्रकारों का शगल रहा है, तो उसे कालाहांडी जाना चाहिए. कुछ घटनाएं मुझे आज भी याद हैं और जिसे मैंने अपनी रपटों में दर्ज भी किया था. ऐसी ही एक घटना है 15 अगस्त 1996 की. चार दिन तक भूखे रहने के बाद कालाहांडी के लांजीगढ़ ब्लाक के किड़िंग गांव के श्रीबच्छा नामक व्यक्ति ने फांसी लगा ली थी. उसकी पत्नी दुतिका अपने दो बेटों खड़िया और दुश्मन के साथ भूख से संघर्ष कर रही थी. मध्याह्न भोजन योजना बच्चों को आज तक स्कूल से जोड़ नहीं पाई है लेकिन तब मैंने देखा था कि दुतिका अपने दो बच्चों को मध्याह्न भोजन के रूप में मिलने वाला भात खिला रही थी. गौर कीजिए कि उसके दो बच्चों के नाम स्कूल में दर्ज नहीं थे. गांव के मास्टर ने दया कर उनके लिए यह बंदोबस्त कर दिया था. भूख से होने वाली मौतों को लेकर सरकारी नजरिया अब भी नहीं बदला है. कालांहाडी जिला प्रशासन तब कई मौतों को सिर्फ इसलिए खारिज रह रहा था क्योंकि मरने वाले के पास मिले राशन कार्डों के पन्ने 2 रु. किलो मिलने वाले चावल की निकासी से भरे थे. इन उचित मूल्य की दुकानों का कैसा अनुचित इस्तेमाल दलाल, नेता और भ्रष्ट अधिकारी करते हैं यह कहने की जरूरत नहीं. कुछ को भूख से मरा इसिलए नहीं माना गया क्योंकि उनके घरों में पीतल के बर्तन थे या फिर उनके घर के आसपास पपीते का पेड़ था. क्या आप जानते हैं 1996 के दुर्भिक्ष में कालाहांडी, बोलांगीर और नुआपाड़ा, खरियार से पलायन करने वाले हजारों लोगों ने अपना सबकुछ बेच डाला था ताकि रायपुर से लेकर हैदराबाद तक के सफर का किराया निकाल सकें. ये सब पुरानी बातें हैं लेकिन बोलांगीर में हुई मौतें बता रही हैं कि हालात बहुत नहीं बदले हैं और सरकार और उसकी संस्थाएं गरीबी की रेखा के आंकड़ों को ऊपर-नीचे करने में लगी हुई है. | ||
kamal dixit (kmldixit@gmail.com) bhopal | ||
| विकास कार्यक्रमों का यह विरोधाभास बहुत समस्या पैदा कर रहा है और राजनीति के लोग अपनी पदाभिलाषा में उतने अंधे हैं कि उन्हें यह सब दिखाई नहीं होता. सरकारी तंत्र और खासकर बड़े अधिकारी जो पढ़ लिखकर तंत्र का हिस्सा बने है अब इसी खेल का हिस्सेदार हैं. आपने ठीक कहा है और ऐसी जगहें राजनीति के रस के स्थान हो गए हैं. | ||
Arvind pant (arvindpant000@gmail.com) joshimath [chamoli] uttrakhand | ||
| अफसोस, कल्याणकारी राज में होती भूख से मौतें. उदारीकरण के परिणमों ने अभी दस्तक भी नहीं दिए हैं, सिर्फ हवा है जो चुने का प्रयास कर रही है, और बता रही है गरीबों सावधान हो जाओ तुम्हारे लिए यहां कोई जगह नहीं. | ||
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