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हुसैन: अभिव्यक्ति और नागरिकता का संकट

बहस

हुसैन: अभिव्यक्ति और नागरिकता का संकट

कनक तिवारी

शीर्ष कलाकार मकबूल फिदा हुसैन अपने जीवन के अंतिम वर्षों में फिर विवाद और सुर्खियों के घेरे में हैं. उन्हें कतर जैसे छोटे से देश ने नागरिकता देने का प्रस्ताव दिया है. संविधान के अनुसार यदि हुसैन वह नागरिकता कुबूल करते हैं तो वे भारत के नागरिक नहीं रह जाएंगे.


हुसैन पिछले कुछ वर्षों से उग्र हिन्दुत्व के हमलों से परेशान होकर विदेशों में ही रह रहे हैं लेकिन अपनी कला साधना से विरत नहीं हैं. यह भी कहा जा रहा है कि नागरिकता का यह शिगूफा इसलिए विवादग्रस्त हो जाएगा क्योंकि समझा तो यही जाएगा कि हुसैन उन पर हुए पिछले हमलों को देखते हुए भारत में अपनी जान को जोखिम में नहीं डाल सकते. यह भी चखचख बाजार में है कि भारत सरकार को चाहिए कि वह ऐलान करे कि वह हुसैन की रक्षा करेगी और उन्हें घबराने की ज़रूरत नहीं है.

हुसैन और देश के सामने फिलहाल शाहरुख खान का ताज़ा मामला है. उसे देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि भारत सरकार या राज्यों की सरकारें पूरी तौर पर हुसैन को संभावित हमलों से बचा ही लेंगी. यदि माहौल में तनाव भी रहा तो एक 95 वर्षीय वृद्ध व्यक्ति पर हमला ही तो होगा. लेकिन इसके बावजूद यह हुसैन को भी सोचना होगा कि कतर की नागरिकता स्वीकार कर लेने से क्या वे गैर भारतीय बनना पसंद करेंगे. कट्टर हिंदुत्व या इस्लाम से अभिव्यक्तिकार सरकारों की मदद से सुरक्षित कहां हैं. सलमान रशदी, तस्लीमा नसरीन, असगर अली इंजीनियर वगैरह भी पूरी तौर पर हमलों से कहां मुक्त रह पाए.

हुसैन की कुछ ताज़ा पेंटिंग्स विवाद का कारण बनी हैं. कलात्मकता और अभिव्यक्ति के मानदंडों के बावजूद कला का यदि देश के जीवन से कोई संबंध है तो उस पर प्रयोजनीय बहस की जानी चाहिए. लोकतंत्र शासन का वह तरीका है जहां खोपड़ियां गिनी जाती हैं तोड़ी नहीं. दरअसल ताज़ा झंझटों के भी पहले से हुसैन के चित्र विवाद का कारण रहे हैं. उस पर एक नज़र डालना ज़रूरी होगा.

सबसे बुनियादी और बहुचर्चित मामला मकबूल फ़िदा हुसैन का है, जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लगातार हमारी व्यापक चिंता और सरोकार का केन्द्र रहा है. हुसैन को लेकर एक विवाद तब हुआ, जब भोपाल से प्रकाशित 'विचार मीमांसा' नाम की पत्रिका ने उनके द्वारा बनाई गई कलाकृतियों के कुछ चित्र ओम नागपाल के लेख 'यह चित्रकार है या कसाई' शीर्षक से छापे. महाराष्ट्र के तत्कालीन शिव सेनाई संस्कृति मंत्री प्रमोद नवलकर ने वह लेख पढ़ कर मुम्बई के पुलिस कमिश्नर को जो लिखित शिकायत भेजी, उसे पुलिस ने आनन-फानन में भारतीय दण्ड विधान की धारा 153(क) और 295(क) के अंतर्गत पंजीबद्ध कर लिया. ऐसे अपराध विभिन्न धार्मिक समूहों में जान बूझकर धार्मिक उन्माद भड़काने के लिए वर्णित हैं.

इस घटना को लेकर हुसैन के समर्थन में देश भर में बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर बनकर खड़े हुए. हुसैन के विरुद्ध आरोप यह था कि उन्होंने सीता और शिव-पार्वती सहित अन्य हिन्दू देवी-देवताओं को लगभग नग्न अथवा अर्द्धनग्न चित्रित किया, जो धर्म और हिन्दुत्व की भावना के प्रतिकूल है. तर्क यह भी था कि एक मुसलमान को हिन्दू देवी देवताओं के चित्रण की इज़ाजत नहीं मिलनी चाहिए. भाजपा के विचारक और उपाध्यक्ष केआर मल्कानी यहां तक पूछते हैं कि हुसैन ने आज तक वास्तविक अर्थों में एक भी कलाकृति बनाई है?

हुसैन को विद्या की देवी सरस्वती के जिस कथित नग्न रेखांकन के लिए प्रताड़ित किया गया, वह उन्होंने उद्योगपति ओपी ज़िन्दल के लिए 1976 में किया था.


उनके आलोचक कुछ बुनियादी बातें जान बूझकर भूल जाते हैं. भारतीय अथवा हिन्दू स्थापत्य और चित्रकला के इतिहास में देवी देवताओं को नग्न अथवा अर्द्धनग्न रूप में चित्रित करने की परम्परा रही है. अजंता, कोणार्क, दिलवाड़ा और खजुराहो की कलाएं विकृति के उदाहरण नहीं हैं. कर्नाटक में हेलेबिड में होयसला कालखंड की बारहवीं सदी की विश्व प्रसिद्ध सरस्वती प्रतिमा एक और उदाहरण है. कुषाण काल की लज्जागौरी नामक प्रजनन की देवी को उनके सर्वांगों में चित्रित किया गया है. तीसरी सदी की यह प्रतिमा नगराल (कर्नाटक) में आज भी सुरक्षित है. इस तरह के उदाहरण देश भर में मिलेंगे.

असल में देवी देवताओं को वस्त्राभूषणों में चित्रित करने की अंतिम और पृथक परम्परा उन्नीसवीं सदी में राजा रवि वर्मा ने इंग्लैंड के विक्टोरिया काल की नैतिकता के मुहावरों से प्रभावित होकर डाली. भारतीय देवियां औपनिवेशिक पोशाकों में लकदक दिखाई देने लगीं जो कि पारम्परिक भारतीय मूर्तिकला से अलगाव का रास्ता था. कलात्मक सौन्दर्यबोध से सम्बद्ध नग्नता से परहेज़ करना भारतीय दृष्टिकोण नहीं रहा है. वह सीधे सीधे पश्चिम से आयातित विचार है. अब यह उनके हाथों में है जो भारतीय तालिबान बने हुए हैं. उन्हें अपनी संस्कृति की वैसी ही समझ है.

मशहूर चित्रकार अर्पिता सिंह, मनजीत बावा और जोगेन्द्र चौधरी ने दुर्गा, कृष्ण और गणेश के ऐसे तमाम चित्र बनाए हैं, जिनमें नए और साहसिक कलात्मक प्रयोग किए गए हैं. लेकिन वे मुसलमान नहीं हैं. बंगाल में नक्काशी करने वाले हिन्दू-मुसलमान कलाकारों ने सत्यनारायण और मसनद अली पीर को एक देह एक आत्मा बताते हुए सत्यपीर के नाम से मूर्तियां बनाई हैं. वे उसी श्रद्धा का परिणाम हैं जो हरिहर और अर्द्धनारीश्वर की छवियों में दिखाई पड़ती है. यह अलग लेकिन सिक्के के दूसरे पहलू की बात है कि मुस्लिम कठमुल्ले ऐसे नक्काशीकारों और कलाकारों को मस्जिदों से हकाल रहे हैं कयोंकि वे हिन्दू देवताओं को चित्रित करते हैं.

हुसैन को विद्या की देवी सरस्वती के जिस कथित नग्न रेखांकन के लिए प्रताड़ित किया गया, वह उन्होंने उद्योगपति ओपी ज़िन्दल के लिए 1976 में किया था. यह भी एक विचित्र संयोग है कि अपने अपूर्ण सरस्वती रेखांकन को बाद में हुसैन ने उन्हें खुद ही कपड़े पहना भी दिए थे , वह भी विवाद के कई वर्ष पहले. भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के पूर्व अध्यक्ष, प्रख्यात कला समीक्षक एससेआाँर दो टूक कहते हैं कि ''कोई मुझे बताकि देश में सरस्वती की एक भी पारम्परिक प्रतिमा अपने धड़ में कपड़ों से लदी-फंदी हो.''

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

aniruddha pande rewa

 
 सिगरेट और बीयर के कैन के साथ दिखाई गई ईसा मसीह की तस्वीर वाली पुस्तकों को मेघालय सरकार जप्त कर लिया तो ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक कहा गए थे. हुसैन साब क्यों नहीं कहते की पाश्चात्य समाज में मदिरापान व सिगरेट पीने की परंपरा है इसलिए ये चित्र जायज है. सीधी साधी बात है की अगर आपके किसी कार्य से किसी को दुःख पहुचता हो तो वह कार्य जान के नहीं करना चाहिए .

जब हुसैन साब को मालूम है की सीता व हनुमान को हिन्दू समाज माँ व बेटे के रूप में मानता है तो ऐसा चित्र बनाने की क्या आवश्यकता थी जिसमे नग्न हनुमान की पूछ को नग्न सीता आलिंगन कर रही है. हम एक सभ्य समाज में रह रहे है जिसमे किसी की धार्मिक भावनाए आहत करने का किसी को अधिकार नहीं है. मै मानता हू की मेघालय सरकार ने जो किया बिलकुल सही किया और हुसैन ने जो किया बिलकुल गलत किया
 
   
 

pragya (pandepragya30@yahoo.co.in ) lucknow

 
 खुद को धर्मनिरपेक्ष साहित करने के लिए अपना स्वाभिमान ताक पर रख देना यह नीति तो सर्वनाश कर देगी ऐसा लगता है. सच कहने में जोखिम लगता हो तो ना कहिए लेकिन कम से कम सच स्वीकारिए तो. हिंदु उदार होता है लेकिन मानहीन होना कहां की समझदारी है. 
   
 

एन. नन्दा मुम्बई

 
 कनक तिवारी जी आप स्वयं वकील हैं इस लिये पहला प्रश्न कि क्या आपको, कलावादियों को और बुद्धिजीवियों (?) को भारत के कानून पर भरोसा नहीं है? जो मैटर सब-ज्यूडिस है उस पर फैसला हो भी जाने दीजिये।

आईये अभिव्यक्ति की आजादी की बात करें। मरियम के कुआरेपन को ले कर हाल में अभिव्यक्ति की होली जलाई गयी है। यही वह भारत देश है जहाँ सभी नें कान में उंगली डाल ली क्योंकि....आप जानते हैं। एक बेचारे समाचार पत्र नें मोहम्मद साहब का कार्टून छापा था। उसकी अभिव्यक्ति की पुंगी जब बजायी जा रही थी तब कहाँ भांग खा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सो रही थी? कनक जी भारत में बुद्धिजीवि विलुप्त हो चुकी प्रजाति है और हुसैन के समर्थन से पहले तसलीमा के वीजा पर जिगर चौडा कर के बात कीजिये तो आपके कलेजे को मान लिया जाये। सलमान रश्दी मत बनाईये इस मनोरोगी हुसैन को।

अब उसकी पेंटिंग और नग्नता की आपकी परिभाषा पर विचार करें। भारत में मुस्लिम रचनाकार और कलाकार हमेशा से ही सम्माननीय रहे हैं। रसखान नें जिस रस और सम्मान के साथ राधा कृष्ण की लीला को शब्द दिये हैं वह भी जग जाहिर है। बात कला और काला के बीच के फर्क की है। आप यह न कहें कि हुसैन हिन्दु नहीं थे इस लिये आलोचना हो रही है, भारत भवन में हाल में कुछ इस तरह की प्रदर्शनियों पर विरोध हुआ है जिसके चित्रकार हिन्दु ही थे। असल में आप जान बूझ कर इस मुद्दे का मुसलमानीकरण कर रहे है जब कि यह मानसिकता का मुद्दा है।

माँ सरस्वती की हजारो प्रतिमायें कलात्मक तथा अल्प-वस्त्रों में हैं। हमारे अतीत से ले कर वर्तमान तक इस तरह की मूर्तिया व चित्र विद्यमान रहे हैं विरोध नग्न अभिव्यक्ति का नहीं है और इसका भी नहीं कि माँ सरस्वती ही क्यों।

कुछ बातें उसकी अभिव्यक्ति पर। चलिये माँ दुर्गा को नग्न बनाना हुसैन की अभिव्यक्ति है लेकिन शेर के साथ लैंगिक जुडाव के साथ दर्शाना क्या उसकी धृष्टता नहीं है? माँ सीता अशोक वाट्का में नहा रही होती तो समझता कि वह उन्हे नग्न बना कर अभिव्यक्ति की चरमावस्था पर पहुचना चाहता है लेकिन रावण की जंघा पर नग्न? ऐसी तो राम कथा भी नहीं है? ऐसा तो वैदिक काल से आज तक किसी मूर्ति में नहीं किसी चित्र में नहीं किसी के दिल दिमाग में भी नहीं।

हुसैन का समर्थन करो लेकिन पहले तसलीमा के पक्ष में दिखो। पहले सलमान रश्दी के लिये लडो। मणिपुर में हुए हंगामे के विरोध में दिखाई पडो।

हुसैन को किसी नें निकाला नहीं है, उसका कतर की नागरिकता ग्रहण करना उसका निजी फैसला है। उसमें भारत में न्याय का सामना करने की हिम्मत नहीं थी इस लिये भाग गया या उसे कतर के महल में कोई माधुरी दीक्षित नजर आ गयी होगी।
 
   
 

Sanjana Kaul . Jammu

 
 M.F. Hussain is one of the most charismatic artists in India who has redefined art to a great extent. Art cant be and shouldn't be guided by any thumb rules. This very idea gains a divine dimension amidst the paintings of M.F. Hussain. His paintings therefore remains as the emphatic understanding of the human situation. The early evolution of his painterly language was overtaken by adventurous forays into installations and performance art. His experimentation with new forms of art are both unexpected and pioneering. 
   
 

Kumar Krishnan , Kolhapur

 
 It is a shame for Indian democracy. Since the man is 95 what is the point of coming back to India when the government cannot ensure his safety. It is an irony that being born in India he cannot die in the country. 
   

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