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सूचना का प्रकाश

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सूचना का प्रकाश

संदीप कुमार, गिरिडीह (झारखंड) से

29 साल के प्रकाश चंद्र चंदन के पास फुर्सत नहीं है. एक मोबाइल में अभी बात ही कर रहे होते हैं कि दूसरा घनघनाने लगता है. उनकी मेज पर तमाम फाइलें रखी हुई हैं, कागजातों का ढेर पड़ा हुआ है. कागजों और फाइलों में उलझे हुए प्रकाश कहते हैं- “मेरी तो ज़िंदगी बदल गई है.”

प्रकाश चंद्र चंदन


प्रकाश चंद्र चंदन झारखंड के गिरिडीह जिले के एक छोटे-से गांव औंरा के हैं. उनका गांव प्रखंड मुख्यालय बगोदर से कोई 10 किलोमीटर दूर है और जिला मुख्यालय गिरिडीह से करीब 60 किलोमीटर. लेकिन प्रकाश के नाम का प्रकाश अब सिर्फ औंरा गांव की सीमा तक ही नहीं फैला हुआ है बल्कि इसका दायरा बगोदर से लेकर गिरिडीह और राजधानी रांची तक फैल गया है. कल का आम ‘प्रकाश’ आज खास इसलिए हो गया है क्योंकि उन्होंने सूचनाधिकार कानून से आम आदमी की आवाज को व्यवस्था की बहरी कानों तक मुकम्मल तरीके से पहुंचाया और कई मामलों में बड़ी से बड़ी जीत भी दर्ज की.

भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ प्रकाश चंद्र चंदन हमेशा आवाज उठाने की सोचा करते थे लेकिन अपने शर्मीले स्वभाव के चलते वो अधिकारियों के सामने खुलकर बोल नहीं पाते थे. लेकिन साल 2005 में जब सूचना का अधिकार कानून पास हुआ तो प्रकाश को एक आस जगी. उन्होंने सूचना अधिकार से जुड़ी कुछ किताबों का अध्ययन किया और अखबारों में आने वाली रिपोर्ट को पढ़ा. और तब प्रकाश ने फैसला लिया कि आरटीआई के हथियार से ही सरकारी मनमानी के खिलाफ बेहतर ढंग से आवाज उठानी चाहिए. ये कहानी तीन साल पहले शुरू होती है.

शुरुवात घर से
आरटीआई कानून के इस्तेमाल की शुरुआत प्रकाश ने पहले-पहल अपने व्यक्तिगत मामले से ही की.

साल 1988 में उनके पारिवारिक मकान में गांव का सरकारी हेल्थ सेंटर खुला था. लेकिन साल 2007 तक स्वास्थ्य विभाग की तरफ से किराये के रूप में एक फूटी कौड़ी तक उनके परिजनों को नहीं मिली. सूचनाधिकार कानून के तहत जब किराया नहीं देने की वजह पूछी गई तो स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और बगैर देर किए ब्याज समेत 19 साल का किराया चेक के मार्फत उन्हें भेज दिया गया. आरटीआई के मार्फत प्रकाश की कोशिशों की ये पहली जीत थी. और इसने प्रकाश का इतना हौसला और साहस दिया कि उन्होंने समाज के हित में आरटीआई का अलख जगाने का फैसला कर लिया.

एक समय था जब प्रकाश के गांव और उसके आसपास के इलाकों में शिक्षा गारंटी योजना के तहत चलने वाले ईजीएस सेंटर दोपहर के एक बजे ही बंद हो जाते थे. शिक्षा विभाग से जब प्रकाश ने आरटीआई के मार्फत ईजीएस सेंटर की समय-सारिणी मांगी तो जवाब आने से पहले ही संबंधित ईजीएस सेंटर दस बजे सुबह से शाम के चार बजे तक चलने लगे.

इतना ही नहीं, मध्य विद्यालय औंरा में ग्राम शिक्षा समिति ने श्याम सुंदर कुमार और छत्रधारी महतो को सामुदायिक शिक्षक (पारा टीचर) के तौर पर चुना. लेकिन शिक्षा विभाग ने इन दोनों युवाओं का नाम हटाकर दो अन्य लोगों को शामिल कर लिया. इस मसले पर जब आरटीआई के तहत शिक्षा विभाग से जानकारी मांगी गई तो सूचना देने के पहले ही श्याम सुंदर और छत्रधारी को पारा टीचर के तौर पर संबंधित स्कूल में बहाल कर दिया गया. आज भी दोनों युवक उस स्कूल में पढ़ा रहे हैं.

शिक्षा पर जोर
दरअसल, प्रकाश का ज्यादा जोर शिक्षा विभाग में फैले खामियों और भ्रष्टाचार को सामने लाने पर है. हाल ही में उन्होंने इसी स्कूल में हरिजन छात्र-छात्राओं छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति के घपले को पकड़ा. एक तो यहां के 51 बच्चों को निर्धारित छात्रवृत्ति राशि से कम ही दिया गया और उनसे ज्यादा रकम की प्राप्ति पर दस्तखत करवा लिया गया. प्रकाश को पता चला तो उन्होंने जांच की मांग की. इसका नतीजा ये हुआ कि सभी बच्चों को बकाया राशि तुरंत लौटा दी गई. विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने समाज के सामने माफी मांगी. और अब इस प्रधानाध्यापक के खिलाफ विभागीय जांच भी बिठा दी गई है.

हजारीबाग से बीए करने के बाद इन दिनों प्रकाश इग्नू से एमए भी कर रहे हैं. सूचना पाने की लड़ाई में प्रकाश इस कदर लगे हुए हैं कि लोग-बाग उन्हें सूचना का सिपाही तक कहने लगे हैं.

प्रकाश बताते हैं कि एक जमाना था जब सरकारी अधिकारियों के सामने खड़ा होने में भी उन्हें डर लगता था लेकिन आज आलम ये है कि वो सूचना पाने की जिद में अधिकारियों से लड़-भिड़ जाते हैं.

ताजा मामला बगोदर के प्रखंड विकास पदाधिकारी का है. प्रकाश को पता चला कि प्रखंड में नरेगा मामले में 32 लाख के घोटाले का मामला सामने आया है. बगैर काम किए 32 लाख रुपए कागजों में ही खर्च कर दिए गए. ये मामला दरअसल विभाग के ही एक जूनियर अधिकारी ने उठाया था. लेकिन बाद में मामले में लीपापोती कर दी गई.

लड़ाई जारी है
राजनीतिक तौर पर भी ये बहस का मुद्दा नहीं बन पाया क्योंकि इस गड़बड़झाले में कई राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल थे. प्रकाश ने पूरे मामले के बारे में आरटीआई से सूचना मांगी. नतीजा चौंकाने वाले रहा. बीडीओ का ट्रांसफर कर दिया गया. जांच बिठाई गई. और जांच रिपोर्ट में ये साफ-साफ कहा गया कि बीडीओ, इंजीनियर और नरेगा से जुड़े तमाम लोगों ने अनियमितता की है. इस मामले को प्रकाश ने यहीं नहीं छोड़ दिया.

प्रकाश को आरटीआई के लिये सम्मान


अब वो इस कोशिश में लगे हैं कि संबंधित भ्रष्ट अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज हो और उनसे 32 लाख रुपए की वसूली करके सरकारी खजाने में रखा जाए. इस बाबत प्रकाश स्थानीय विधायक से भी मिले और विधायक ने इस मामले को विधानसभा में उठाने का भरोसा भी दिलाया.

लेकिन सूचना पाने की ये लड़ाई इतनी आसान भी नहीं थी. प्रकाश कहते हैं कि कई सरकारी कर्मचारी तो खुद सूचनाधिकार कानून की बारीकियां नहीं जानते थे. उन्हें सरकारी गजट दिखाना पड़ता था. और कई बार ये कर्मचारी प्रकाश से पूछते कि सूचना पाकर करोगे क्या? लेकिन प्रकाश मानने वाले भी नहीं थे. सूचना नहीं मिलती तो वो अपीलीय अधिकारी के पास भी जाते. और वहां भी निराशा हाथ लगती तो राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाते. सूचना पाने की जिद में उन्होंने जिले के कई वरीय अधिकारियों को रांची में सूचना आयोग तक घसीटा.

सवाल दर सवाल
आरटीआई का इस्तेमाल प्रकाश ने केवल सरकारी अधिकारियों से सूचना मांगने के लिए ही नहीं की बल्कि इसके मार्फत उन्होंने जनप्रतिनिधियों के कामकाज पर भी नजर रखनी शुरू की. प्रकाश अपने गांव के पिछड़ेपन से भी बेहद निराश थे. उन्होंने बगोदर के बीडीओ से पूछा कि विधायक फंड से उनके गांव को विकास की कितनी योजनाएं मिली हैं. पता चला कि औंरा गांव में पिछले तीन वित्तीय वर्षों में एमएलए फंड से विकास के पांच काम मिले लेकिन अफसोस की बात ये थी इनमें से तीन अभी तक अधूरे पड़े हुए हैं. ये जानकारी जब अखबारों में छपी तो स्थानीय विधायक बिनोद सिंह ने भी मामले को गंभीरता से लिया और खुद प्रकाश से बात कर इस पर ध्यान देने की बात कही. इतना ही नहीं, उन्होंने विधानसभा से ये जानकारी भी मांगी कि उनके स्थानीय विधायक ने विधानसभा में कौन-कौन से स्थानीय मुद्दे उठाए.

आरटीआई के प्रति अलग जगाते प्रकाश के प्रयासों को दुनिया ने भी समझा. पिछले ही साल उन्हें झारखंड आरटीआई सिटीजन अवॉर्ड से नवाजा गया. इतना ही नहीं, वो नेशनल आरटीआई अवॉर्ड की दौड़ में शामिल थे. उनके काम की सराहना करते हुए आरटीआई अवॉर्ड कमेटी ने उन्हें ‘सर्टिफिकेट ऑफ ऐप्रिसिएशन’ से भी नवाजा.

प्रकाश कहते हैं- "ऐसे पुरस्कार से हौसला बढ़ता है लेकिन सूचना पाने के इस कानून को और लचीला बनाया जाना चाहिए ताकि कागजों के पुलिंदों के बीच सूचना दम ना तोड़ दे."

प्रकाश अब गांव-गांव में आरटीआई के प्रति जागरुकता फैलाने का काम कर रहे हैं और लोगों को समाज की समस्याएं सुलझाने के लिए सूचनाधिकार कानून का इस्तेमाल करने की सीख दे रहे हैं. हर वक्त उनका फोन घनघनाता रहता है और वे लोगों के बीच सूचना का प्रकाश फैलाते रहते हैं.

 

01.03.2010, 02.35 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

parikshit sharma (86gret@gmail.com) delhi

 
 प्रकाश आपका प्रयास कई मायनों में काबिले तारीफ है . ये हमें उर्जान्वित भी करता और जागरूक भी . मै आपकी कहानी को मध्य प्रदेश के गाँव तक पहुँचाने की कोशिश करूँगा और आर टी आई के प्रति लोगों को जागरूक भी करूँगा . 
   
 

PremRam tripathi (prt9999@gmail.com) Bhopal

 
 ऐसे प्रयास को प्रेम का प्रेम भरा नमन.
समाज रोशनी की नई अलख जगाने के लिये आपका प्रयास वाकई काबिल-ऐ-तारीफ़ है. कृपया इसे लगातार आगे ले जायें. इसे मेरी गुजारिश समझें.
 
   
 

karuna delhi

 
 प्रकाश जी अपने नाम की तरह प्रकाश फैला रहे है और आप भी उनकी रोशनी को दूर-दूर तक पहुँचाने में अहम भूमिका अदा कर रहे है जिसके लिए आप दोनों को हार्दिक शुभकामनाएँ.  
   
 

rksethi (rksethiftb@gmail.com) haryana

 
 बहुत ही बढ़िया. जो आप कर रहे हैं, वो गजब है. 
   
 

Shashi (shashi.imc09@gmail.com) Delhi

 
 प्रकाश जैसे जुझारू और जीवट लोगों की जरूरत आज सबसे ज्यादा पत्रकारिता को है जहाँ जज्बा बहुत कम दिखता है. खैर, सूचना के इस सिपाही को मेरा सलाम और ऐसी जानकारी लोगों तक लाने के लिए आपको भी बधाई. 
   
 

akash (akashmanjit@gmail.com) munirka

 
 ऐसे प्रयास ये बताने के लिए काफी है कि ऊंचे ओहदे पर बैठे भ्रष्ट अधिकारी को आरटीआई के जरिय ही ठीक किया जा सकता है। प्रकाश चंद्र ने जो आवाज उठायी है उसे जरुर सहयोग मिलेगा। मैं उम्मीद करुंगा कि ऐसी खबरें को मुख्यधारा की मीडिया में भी जगह मिले और ये तभी हो सकता है जब आप जैसे जागरुक पत्रकार लगातार इसकी आवाज बुलंद करे..... 
   

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