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भुखमरी बढ़ाने की सरकारी तैयारी

मुद्दा

भुखमरी बढ़ाने की सरकारी तैयारी

सचिन कुमार जैन, भोपाल से

 

क्या आप यह मानने के लिये तैयार हैं कि जनता की चुनी हुई कोई सरकार अपनी ही जनता को भूख और शोषण का शिकार बनाने के लिये कोई मसौदा तैयार कर सकती है ? अगर नहीं तो कांग्रेस सरकार के मंत्रियों के सशक्त समूह द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून का जो मसौदा मंत्रिमंडल को विचार और आगे की कार्यवाही के लिए भेजा गया है, उसका एक बार अवलोकन कर लें. इस मसौदे को पढ़ते हुए साफ समझा जा सकता है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून का मसौदा अगर इसी रुप में स्वीकार कर लिया गया तो आने वाले दिनों में देश में भुखमरी, कुपोषण और असमानता अपने चरम स्तर पर पहुँचती नज़र आएगी.

भुखमरी


मौजूदा मसौदा कहता है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून का लाभ केवल उन गरीब परिवारों को मिलेगा, जिन्हें केंद्र सरकार गरीब मानेगी. लेकिन गरीबी की पहचान और संख्या का आकलन कितना मुश्किल और विसंगतिपूर्ण है, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है. इसके अलावा भारत सरकार साढ़े छह करोड़ परिवारों को गरीब मानती है, जबकि राज्य सरकारें, जो कि हर घर का सर्वे करती हैं और सीधे योजनाओं का क्रियान्वयन करती हैं, उनके मुताबिक 11 करोड़ परिवार ऐसी स्थिति में हैं, जो सबसे वंचित हैं.

आज भी गरीबों की संख्या के इस अंतर को पाटने में सरकार ने कोई रूचि नहीं दिखाई है. प्रस्तावित कानून का मसौदा भी यह कहता है कि इस कानून में राज्य सरकारों द्वारा पहचाने गए गरीबों की इस केन्द्रीय क़ानून में कोई जगह नहीं होगी. यानी साढ़े चार करोड़ परिवारों को खाद्य सुरक्षा का कानूनी हक़ नहीं मिलेगा.

गरीबी, भुखमरी और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के जानकार अर्जुन सेनगुप्ता के मुताबिक 77 करोड़ लोग 20 रूपए प्रतिदिन पर गुजारा करते हैं. उत्सा पटनायक के अनुसार 84 करोड़ लोगों को पर्याप्त पोषण युक्त भोजन नहीं मिलता है. मतलब साफ़ है कि जब 75 से 80 फीसदी जनसंख्या भूख के साथ जी रही ह़ो तब इस क़ानून को बीपीएल जैसी काल्पनिक अवधारणा तक सीमित रखने के क्या मतलब हैं.

ताज़ा मसौदे को पढ़ कर साफ समझा जा सकता है कि सरकार की मंशा पोषण और खाद्य सुरक्षा के संबंधों को तोड़ने की दिखती है. वास्तव में न्यूनतम खाद्य अधिकार देने का मतलब है खाद्य असुरक्षा की स्थिति का निर्माण और उसे बनाए रखना. यदि वे लोग, जो कि बीपीएल की सूची के बाहर हैं, परन्तु अपने अस्तित्व के लिए सस्ता राशन चाहते हैं, उन्हें इस व्यवस्था से अनाज पाने का अधिकार होना चाहिए. भोजन का लोकव्यापी अधिकार ही भारत में सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मसौदा एक परिवार के लिए केवल 25 किलो अनाज के अधिकार का प्रावधान करता है, जबकि एक परिवार को कम से कम 56 किलो अनाज, 5 किलो दाल और 4 लीटर खाद्य तेल की जरूरत होती है. भारत में वसा और प्रोटीन की कमी के कारण कुपोषण बहुत बढ़ा है, परन्तु क़ानून में इतनी कम मात्र रख कर हम कुपोषण को कम नहीं कर पायेंगे, यह बाज़ार समर्थक कांग्रेसी सरकार को समझना होगा.

मंत्रियों का समूह यह साफ़ तौर पर मानता है कि खाद्य सुरक्षा की परिभाषा केवल गेहूं और चावल तक ही सीमित रहेगी और इसे किसी भी रूप में प्रस्तावित क़ानून के तहत पोषण सुरक्षा से नहीं जोड़ कर देखा जाएगा. वे यह भी तय कर चुके हैं कि इसके अंतर्गत होने वाले उल्लंघन और अधिकारों के हनन की निगरानी और निराकरण के लिए अलग से प्राधिकरण या आयोग या विशेष अदालतें नहीं बनाई जायेंगी. इसका मतलब यह है कि अधिकारों के हनन की स्थिति में लोगों को वर्तमान न्याय व्यवस्था की शरण में जाना होगा, जहां पहले से ही 3 करोड़, 11 लाख से भी अधिक मुकदमे अपनी सुनवाई और फैसले की प्रतीक्षा में हैं.

मसौदे के अनुसार देश के सभी राज्यों में गरीबी के स्तर को तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास ही रहेगा, राज्य सरकारें केवल परिवारों की पहचान करके सूची बनाने का ही काम करेंगी, उस संख्या को बढ़ा नहीं सकेंगी. इसका मतलब साफ है कि अधिकारों का दायरा भारत के योजना आयोग द्वारा तय की गई गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों के लिए सीमित करके क़ानून की सोच को समग्र तौर पर अनुपयोगी बना दिया गया है.

केंद्र सरकार का यह मसौदा किसी भी स्तर पर राज्य सरकारों को अपनी जरूरत के मुताबिक निर्णय लेने, अधिकारों का विस्तार करने और बेहतर सुरक्षा की कोशिश करने की स्वतंत्रता नहीं देता है. इससे राज्य सरकारों पर अपनी और से संसाधन लगाने का दबाव बढेगा. आज की स्थिति में देखें तो पता चलता है कि छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार को सभी हितग्राहियों को केवल अनाज देने के लिए 1800 करोड़ रूपए अपने राज्य के बजट में से देने पड़ रहे हैं. यदि केंद्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई तो राज्य सरकारों पर यह भार और बढेगा. आश्चर्य है कि देश के स्तर पर राज्य सरकारें और विपक्षी दल इस मसले का कोई विश्लेषण कर ही नहीं रहे हैं. उनका यह मौन कई लोगों की भूख़ से मौत का कारण बनेगा. शायद यह भी कहा जा सकता है कि सारे राजनीतिक दल भोजन के अधिकार के मामले में बाज़ार के साथ और लोगों के खिलाफ हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

एम अखलाक (analhaque2002@yahoo.co.in) मुजफ्फरपुर (बिहार)

 
 सचिन भाई, जिंदाबाद। वाकई आपकी रिपोर्ट इस कथित लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था की पोल खोल रही है। मुझे नहीं लगता अब कुछ भी शेष बचा है जिसे लोग अपना कह सकें। सत्‍ता के केन्‍द्र में रहने वाली दोनों पार्टियां बिक चुकी हैं। जिस अवाम के बारे में हमारी चिंताएं हैं वह किसी न किसी कारण इन्‍हीं दोनों पार्टिंयों के साथ है। ऐसे में व्‍यवस्‍था परिवर्तन की लड़ाई कैसे शुरू की जाये। इस सवाल का जवाब भी खोजना होगा। 
   
 

भोला प्रसाद भगत (bholabhagat@hotmail.com) मुंगेर(बिहार)

 
 आपने केन्द्रीय सरकार की गरीबजन एवं भारतीय प्रजातंत्र बिरोधी नीतियों तथा कार्यों का अपने इस लेख में उजागर कर जन मानस को जागृत करने का जो कार्य किया है,वह काबिल-ऐ-तारीफ है।

वर्तमान संम्पूर्ण तंत्र को सुनियोजित ढंग से भारत की आम जनता के आर्थिक,राजनीतिक,न्यायिक, सामाजिक,शैक्षणिक हर दृष्टि से शोषण का तंत्र बना दिया गया है।

अतः अब जरूरी है देश के निष्ठावान नागरिक संगठित होकर इन नर पिशाचों को शक्तिहीन कर भारत के सार्वजनिक उत्थान के क्रान्ति यज्ञ में अपनी आहूति दे। बाबा रामदेव जी एवं अन्य संतों के मार्ग दर्शन में हम देश को शोषण मुक्त कर सकते हैं,ऐसा हमारा विश्वास है।
 
   
 

sachin kumar jain (sachinwrites@gmail.com) Bhopal

 
 The main problem with the Public Distribution System in rooted in the targetting concept. If we have 75 to 80% food insecure population and we are only providing subsidiesed food to only 30% population, then corruption will be there for sure. The only option of solving this problem is to make PDS a universal program and cover all parts of the society. Please dont calculate money, it will contribute 4% in the GDP, IF YOU COULD FEED THEM.
Sachin
 
   
 

Himanshu (Patrakarhimanshu@gmail.com) , Noida

 
 According to wadhwa report there is lot of pilferage at every level and no foolproof central monitoring system is there. Other deficiencies of this system are:

1. Multiple ration cards being issued under a single name
2. Faulty system of issue and record keeping
3. Pilferage - PDS foodgrains find way to market and all the lot don’t reach the eligible/needy person
4. No bio-matric identification for the users
5. No central monitoring system to track the carriage trucks
6. The delivery mechanism has no RFID (Radio Frequency Identification Device)

Sachin ji, Plz also write something over these issues.
 
   
 

Suresh Kumar Mohapatra , Koraput

 
 वाधवा आयोग की रिपोर्ट कहती है कि भारत के पचास करोड़ लोग गरीबों में गिने जाएंगे और सन 2010-11 में गरीबी से जूझने के लिए भारत सरकार ने जो एक लाख 18 हजार 535 करोड़ रुपए का बजट रखा है उसमें 82 हजार एक सौ करोड़ रुपए और जोड़ने पड़ेंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान और झारखंड में सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त है। बिहार में तीन चार महीने में एक बार राशन मिलता है। गुजरात में राशन की दुकान पाने के लिए अफसरों को घूस देनी पड़ती है । उड़ीसा में अनाज के एजेंटो को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त हैं। कर्नाटक में अफसर, डीलर और नेता मिले हुए हैं। उत्तराखंड में राशन तय भाव से ज्यादा दाम पर मिलता है।  
   
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