मुसलमानों को भूल क्यों जाते हैं
बहस
मुसलमानों को भूल क्यों जाते हैं
डॉ. असगर अली इंजीनियर
इस साल कांग्रेस अपना 125वां स्थापना दिवस मना रही है. भारत के सभी धर्मो के
नागरिकों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जरिए भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपना
योगदान दिया परंतु हमारे नेताओं की बहुसंख्यकवादी मानसिकता और स्कूली पाठ्यक्रम
तैयार करने वालों के संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में
अल्पसंख्यकों की भूमिका को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है.
भारत कभी उस अर्थ में राष्ट्र नहीं रहा, जिस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग पश्चिम में
किया जाता है. पश्चिमी राष्ट्रों का आधार है एक भाषा और एक संस्कृति. इसके विपरीत,
भारत कभी एक भाषा, धर्म या संस्कृति वाला देश नहीं रहा. धार्मिक, भाषायी, नस्लीय और
सांस्कृतिक विविधताएं हमेशा से भारत की विशेषता रही हैं. जब हमने ब्रिटिश राज की
अपरिमित शक्ति को चुनौती देने का निर्णय किया तभी हमारे नेताओं को यह अहसास हो गया
था कि देश के लोगों-विशेषकर हिन्दुओं और मुसलमानों- में एकता कितनी महत्वपूर्ण है.
स्वाधीनता संग्राम का एक नारा था, “दीन-धरम हमारा मज़हब, ये ईसाई (अर्थात अंग्रेज)
कहां से आए”.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का देश के मुसलमानों ने पूरे उत्साह से
स्वागत किया था. इस तथ्य को हमारे इतिहासविदों ने कभी पर्याप्त महत्व नहीं दिया.
हमारे इतिहासविद् हमेशा इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सर सैय्यद ने मुसलमानों को
यह सलाह दी थी कि वे कांग्रेस की सदस्यता न लें. तथ्य यह है कि यह मुस्लिम श्रेष्ठी
वर्ग के एक छोटे से हिस्से की राय थी. यह वह तबका था, जिसने 1857 के स्वाधीनता
संग्राम के बाद अंग्रेजों के हाथों बहुत अत्याचार सहे थे और जो अंग्रेजों की ओर
दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहता था. हिन्दुओं में भी ऐसे तत्व थे, विशेषकर जमींदारों,
राजाओं और महाराजाओं में.
इसके अलावा, सर सैय्यद का कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण शत्रुता का नहीं था. वे तो
केवल यह चाहते थे कि मुसलमान आधुनिक शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन पर ज्यादा ध्यान
दें. सर सैय्यद की भूमिका के बारे में बहुसंख्यक सांप्रदायिक तत्वों ने कई तरह के
भ्रम फैलाए हैं. इस सिलसिले में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि सर सैय्यद ने
हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए अथक प्रयास किए. उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों को
भारत रूपी दुल्हन की दो आँखें निरूपित किया था.
यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सर सैय्यद आम जनता के नेता नहीं थे. वे तो केवल
उत्तर भारत के मुस्लिम श्रेष्ठी वर्ग को सामाजिक व शैक्षिक सुधारों के लिए प्रेरित
करना चाहते थे. पूरा मुस्लिम श्रेष्ठी वर्ग भी सर सैय्यद के साथ नहीं था. इस वर्ग
के एक सदस्य, बम्बई हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बदरुद्दीन तैय्यबजी ने कांग्रेस के
बम्बई अधिवेशन के दौरान अपने 300 साथियों के साथ कांग्रेस की सदस्यता ली थी. वे बाद
में कांग्रेस के अध्यक्ष भी चुने गए.
आम मुसलमानों ने कांग्रेस की स्थापना का उत्साहपूर्वक स्वागत किया और कांग्रेस के
सभी आंदोलनों को अपना समर्थन दिया. कांग्रेस के निर्माण से लेकर भारत के स्वतंत्र
होने तक, मुसलमान कांग्रेस के साथ बने रहे. इस लेख में हम इसी विषय पर कुछ चर्चा
करना चाहेंगे. सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि किसी समुदाय के कुछ सदस्यों के
कामों या गतिविधियों से पूरे समुदाय के संबंध में कोई राय नहीं कायम करना चाहिए. हर
व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएं और अपना एजेंडा होता है.
कई लोगों को यह जानकर हैरत होगी कि मुसलमानों में कांग्रेस के सबसे उत्साही समर्थक
थे देवबंद के पुरातनपंथी उलेमा. यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि उलेमा ने सन्
1857 के स्वाधीनता संग्राम में भी भाग लिया था और उसमें अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी.
इन उलेमा ने 1857 की क्रांति में बड़ी-बड़ी कुर्बानियाँ दीं और उनमें से सैकड़ो को
कालापानी की सजा देकर अंडमान भेज दिया गया. कई को इटली के दक्षिण में स्थित माल्टा
नामक द्वीप में निर्वासित कर दिया गया. मैंने माल्टा के कब्रिस्तान में सैकड़ो उलेमा
की कब्रें देखीं हैं. इन्हें अपने महबूब वतन की मिट्टी में दफन होना भी नसीब नहीं
हुआ. जिन उलेमा को निर्वासित किया गया था, उनमें से कई तो बहुत जाने-माने उलेमा थे.
ऐसे ही एक उलेमा थे मौलाना फज़ल काहिराबादी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
के बाद दारूल उलूम देवबंद के संस्थापक मौलाना कासिम अहमद नानोटवी- जो स्वयं एक
जाने-माने आलिम थे- ने एक फतवा जारी कर मुसलमानों को कांग्रेस की सदस्यता लेने और
अंग्रेजों को देश से निकाल बाहर करने के लिए कहा. न केवल यह, उन्होंने इस तरह के एक
सौ फतवों को इकट्ठा कर उनका संकलन प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था “नुसरत अल-अहरार”
यानी स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए. ये उलेमा, आम मुसलमानों के नेता थे और
देश से अंग्रेजों की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिए प्रतिबद्ध थे.
एक अन्य जाने-माने आलिम मौलान महमूद उल हसन ने हिन्दुओं और मुसलमानों द्वारा
अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह करने का संदेश पूरे देश में फैलाने की एक योजना- जिसे
“रेशमी रूमाल षड़यंत्र” कहा जाता है; में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. मौलाना
महमूदउल हसन के अलावा अन्य कई उलेमा और आम मुसलमानों ने इस षड़यंत्र में भाग लिया
था.
मौलाना हसरत मोहानी एक प्रतिष्ठित उर्दू कवि व बुद्धिजीवी थे. इसके साथ-साथ वे एक
महान क्रांतिकारी भी थे, जिन्होंने स्वाधीनता की लड़ाई में हिस्सा लिया और बहुत कष्ट
भोगे. वे बाल गंगाधर तिलक और तिलक के प्रसिद्ध नारे “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध
अधिकार है” के घोर प्रशंसक थे. वे तिलक को “तिलक महाराज” के नाम से पुकारते थे. एक
मौलाना होते हुए भी वे सन् 1925 में स्थापित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक
सदस्यों में से एक थे.
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मौलाना कई बार जेल गए और उन्हें कड़ी सजाएं दी गईं. इनमें शामिल थी रोज 40 किलो अनाज
पीसने की सजा. परंतु मौलाना ने कभी हार नहीं मानीं. गाँधीजी तक देश के दूरगामी
हितों की खातिर कुछ समय के लिए “होम रूल” के लिए राजी हो गए थे परंतु मौलाना इस
मामले में किसी प्रकार के समझौते के हामी नहीं थे.
जब कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में “होम रूल” प्रस्ताव पेश किया गया, उस समय
मौलाना को एक मुशायरे की तैयारी के बहाने, अधिवेशन स्थल से दूर रखा गया क्योंकि यह
तय था कि वे प्रस्ताव का कड़ा विरोध करेंगे. यह थी मौलाना की भारत की संपूर्ण
स्वातंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता.
खिलाफत आंदोलन के संबंध में भी अनेक भ्रांतियां हैं. खिलाफत आंदोलन, महात्मा गाँधी
की अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति का हिस्सा था. इसके जरिए गाँधीजी ने सफलतापूर्वक
लाखों आम मुसलमानों को स्वतंत्रता आंदोलन से जो़ड़ा. दुर्भाग्यवश, हमारे देश का
बुद्धिजीवी वर्ग इस आंदोलन को सही दृष्टिकोण से नहीं देखता. परंतु इस तथ्य को कोई
नहीं नकार सकता कि इस आंदोलन के कारण ही बड़ी संख्या में मुसलमान स्वाधीनता आंदोलन
का हिस्सा बने. यह अलग बात हैं कि कमाल अता तुर्क के नेतृत्व में हुई क्रांति के
कारण यह आंदोलन समाप्त हो गया.
अली बंधु-मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली-इसी आंदोलन की उपज थे. अली बंधुओं ने
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. उनकी माँ भी
स्वतंत्रता संघर्ष के प्रति उतनी ही प्रतिबद्ध थीं. जब उनकी माँ को इस अफवाह की
जानकारी मिली कि अली बंधु माफी मांग कर जेल से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं (यह
कोरी अफवाह ही थी) तो एक पर्दानशीन महिला होने के बावजूद उन्होंने एक सार्वजनिक मंच
से घोषणा की कि अगर उनके पुत्रों ने ऐसा कुछ किया तो “मैं उनका दूध मुआफ नहीं
करूगीं”.
मौलाना मोहम्मद अली के उनकी जीवन के अंतकाल में गाँधीजी से गंभीर मतभेद हो गए थे
परंतु अपनी मृत्यु से पहले, उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की कि उन्हें येरूशेलम में
दफनाया जाये क्योंकि वे गुलाम भारत में नहीं दफन होना चाहते थे.
खिलाफत आंदोलन के दौरान कुछ मुसलमानों ने ब्रिटिश भारत को दारूल हर्ब यानी युद्ध का
घर घोषित कर दिया और देश छोड़कर अफगानिस्तान पलायन करना शुरू कर दिया ताकि वहां
निर्वासित सरकार स्थापित कर, अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष का संचालन किया जा सके.
इस पलायन के मुख्य प्रेरणास्त्रोत थे मौलाना उबेदुल्ला सिंधी. उन्होंने अफगानिस्तान
में स्वतंत्र भारत की अंतरिम निर्वासित सरकार बनाई. इस सरकार के राष्ट्रपति थे राजा
महेन्द्र प्रताप और मौलाना उबेदुल्ला इस सरकार के प्रधानमंत्री थे.
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खान अब्दुल गफ्फार खान ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठकों
में विभाजन का तब भी विरोध किया जब नेहरू और सरदार पटेल तक ने इसे अपरिहार्य मान कर
स्वीकार कर लिया था. |
दुर्भाग्यवश अफगानिस्तान के बादशाह ने ब्रिटिश सरकार के दबाव में आकर वहां पहुंचे
मुसलमानों को अपने देश से निकाल दिया. इस कार्यवाही में हजारों मुसलमान मारे गए.
ऐसी थी मुसलमानों की आजादी के प्रति दीवानगी.
स्वाधीनता आंदोलन के एक अन्य चमकीले सितारे थे मौलाना हुसैन अहमद मदानी. उन्होंने
देश के विभाजन का जमकर विरोध किया. वे महान कवि और चिंतक इकबाल तक से भिड़ गये और
राष्ट्रीयता के मुद्दे पर इकबाल के विचारों को चुनौती दी. उन्होंने एक किताब भी
लिखी जिसका शीर्षक था “मुत्तहिदा कौमीयत और इस्लाम” अर्थात सांझा राष्ट्रवाद और
इस्लाम. उन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत को भी चुनौती दी और कुरान और हदीश
से लिए गए उद्धरणों से यह साबित किया कि द्विराष्ट्र सिद्धान्त को इस्लाम की मंजूरी
नहीं है. उनकी इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है. यह अनुवाद जमीयते उलेमा
ए हिंद ने करवाया है और अब इस पुस्तक का लाभ उर्दू न जानने वाले भी उठा सकते है.
मौलाना हुसैन अहमद को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा. मुस्लिम लीग के कार्यकताओं ने
कई स्थानों पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें जूतों की मालाएं पहनाईं.
स्वतंत्रता आंदोलन में मौलाना आजाद और सरहदी गाँधी खान अब्दुल गफ्फार खान के
स्वर्णिम योगदान को कौन भुला सकता है. दोनों अपनी अंतिम सांस तक भारत की आजादी के
दीवाने बने रहे. खान अब्दुल गफ्फार खान एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने देश के
विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठकों में
विभाजन का तब भी विरोध किया जब नेहरू और सरदार पटेल तक ने इसे अपरिहार्य मान कर
स्वीकार कर लिया था. मौलाना आजाद ने विभाजन का विरोध करते हुए जो लेख लिखा था, इस
विषय पर उससे बेहतर शायद ही कुछ लिखा गया होगा.
इन मुस्लिम नेताओं को स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसके
वे लायक थे. हमारे कई शिक्षाविदों, इतिहासकारों, पाठ्यपुस्तक लेखकों और सबसे बढ़कर
राजनीतिज्ञों की सांप्रदायिक सोच के कारण इन मुस्लिम नेताओं की स्वाधीनता आंदोलन
में महती भूमिका को या तो भुला दिया गया है या उसे बहुत ही कम स्थान दिया गया है.
जब मैं मदुरई के गाँधी संग्रहालय में गया-जो कि देश के सर्वश्रेष्ठ गाँधी
संग्रहालयों में से एक मानी जाती है- तो मुझे यह देख कर बहुत दुःख हुआ कि वहां
सरहदी गाँधी की स्वाधीनता संग्राम में भूमिका के नाम पर उनकी कुल एक तस्वीर थी.
मैंने संग्रहालय के संचालक का ध्यान इस गंभीर कमी की ओर आकर्षित किया और उन्होंने
वायदा किया कि वे इस कमी को दूर करेंगे.
आज एक आम हिन्दू सोचता है कि मुसलमानों ने इस देश के दो टुकड़े करवाये और उन्हें
संदेह की दृष्टि से देखता है. कांग्रेस ने इस भ्रान्ति को दूर करने के लिए कुछ नहीं
किया. मैं कांग्रेस के नेतृत्व से अनुरोध करता हूं कि कम से कम अपनी 125वीं
वर्षगांठ पर तो वो मुसलमानों की स्वाधीनता संग्राम में भागीदारी को जनता के सामने
लाए. इससे देश की एकता मजबूत होगी.
31.03.2010, 15.00
(GMT+05:30) पर प्रकाशित