गिरिराज किराड़ू की पांच कवितायें
साहित्य
गिरिराज किराड़ू की पांच कवितायें
आह संगीत
बहुत धीमे से और सबको साफ़ नज़र आ रही घबराहट
के साथ उसने पढ़ना शुरू किया एक ट्रेन के
गुज़रने के बारे में खिड़की के सामने से एक लड़की के
देखने के बारे में उस खिड़की से एक ग्रे टी शर्ट के
उस लड़की को पहन लेने के बारे में एक पुरुष के
उस ग्रे टी शर्ट को एक दूसरे शहर में खरीदने के बारे में उस पुरुष के
हाथों से हुए चाकू के एक वार के बारे में उस चाकू के
एक तीसरे शहर में कई बार चलने के बारे में उस तीसरे शहर में
अपने होने के बारे में उस अपने होने की
निशानदेही के तौर पर हमारे होने के बारे में
हमारी तरफ और बढ़ी हुई घबराहट से देखते
हुए उसने पानी पिया और फिर से पढ़ना शुरू किया मैं तुम्हें
प्रेम कर सकता यदि मैं कोई और होता मुझे बहुत सारे
फेरबदल तब करने होते ट्रेन गुज़रने की बात गलत थी खिड़की में
तुम्हारे खड़े होने की बात की तरह चाकू
दूसरे तीसरे नहीं इसी शहर में चला था
मेरे हाथों से उस पूरे नज़ारे को बहुत धीमे से होता हुआ
देखा था मैंने तेज संगीत की तरह काटता हुआ
चाकू आह संगीत हरकहीं हरवक्त बजता हुआ बेमतलब उसे बयान
में होना होता बहुत सारे फेरबदल तब होने होते
तुम्हारे लिए कोई टी शर्ट खुद ही खरीदना होती तब शायद ग्रे ही....
एकांत
चाचा ने जब गोदो किया दुखी रहे थे बहुत दिनों तक कोर्ट मार्शल करते हुए बहुत
उद्विग्न जब किया एवम् इन्द्रजित तो अपना नाम इन्द्रजित मोहन रख लिया और शायद तीन
एकांत करते हुए ही उन्हें अपना तखल्लुस एकांत मिला था मदन मोहन किराड़ू की जगह इस
तरह वे इन्द्रजित मोहन “एकांत” हो गए थे–
जब उन्होंने छोड़ा थियेटर बोले जब तक यह समाज तखल्लुसों की मज़ाक उड़ाना नहीं छोड़ेगा
इसे थियेटर क्या कोई भी बदल नहीं पायेगा
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क्षमा
कौन क्षमा करेगा मुझे जब क्षमा मांगना ही पराभव या पस्ती हो गया हो मैं यह लिख रहा
हूँ और आसमान मज़ाक उड़ा रहा है मेरा देखो लिख रहा है मूर्ख बस क्षमा मिल जाए सबसे
अग्नि कहने से मुँह नहीं जलता क्षमा लिखने से क्षमा नहीं मिलती मूर्ख
शीर्षक
जैसे नाम किसी शरणार्थी का
टांग दिया गया हो मेरी कथा के द्वार पर शीर्षक की तरह
वे आते हैं मेरे पास अपने सुख को कपड़ों के सबसे अन्दरूनी अस्तर मे
अछूता रखकर
मेरे दुख भूख या बिस्तर कम्बल के बारे में पूछते हुए
लौटते हुए वे नामपट्टिका को हिलाते हैं
जैसे मन्दिर से निकलते हुए घण्टी को
मैं उनके चेहरे नहीं पहचानता
(हालाँकि जानता हूँ चेहरे से कोई पहचाना नहीं जा सकता)
मेरी आँखें सिर्फ पीछे देखती हैं
वे इस तरह अन्धी हैं कि भविष्य काजल की एक गोल बिंदी है
सामने की दीवार में धंसे पत्थर फोड़ निकले किसी देव के सिर पर लगी
जिसने ढक लिया है उनके चेहरे को जैसे शामियाना ढक लेता है उत्सव को
और आसमान को भी
इसी तरह होगा
इसी तरह होगा से शुरू या खत्म होने वाले
दस वाक्य हम इतने हुनर से लिख सकते थे कि हमने तय पाया
हमारे साथ कुछ नहीं या सब कुछ इसी तरह होगा
हमने अक्सर एक दूसरे पर हर शै पत्थर की तरह
फेंकी थी और ऊपर आकाश में जो कोई बैठे रहते थे
उनको हवा में लटका देख कर हम हर शै फूल की तरह
उनकी तस्वीर के चौखटे के कदमों में रख देते थे
मृतकों का ऐसा आदर हमारे खून में था
इसी तरह होगा से शुरू या खत्म होने वाले हमार वाक्य
हमें इतने मन से याद थे कि उन्हें भविष्यदृष्टाओं की तरह
दोहरा कर खुद पर खूब प्रसन्न होते रहेत थे
एक दूसरे के पैरों की आदत करवाने के लिए हम एक दूसरे को जूते चुराने देते थे
और यह देखकर हमारे जूते हमें ऐसे देखते थे मानो पूछ रहे हों
आखिर कब तक होता रहेगा यही सब
जूतों का ऐसा निरादर हमारे खून में था
04.04.2010, 14.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित