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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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हमारी चिंतना

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सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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यह सबके लिये चेतावनी है

 
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गिरिराज किराड़ू की पांच कवितायें

साहित्य

गिरिराज किराड़ू की पांच कवितायें


आह संगीत

बहुत धीमे से और सबको साफ़ नज़र आ रही घबराहट
के साथ उसने पढ़ना शुरू किया एक ट्रेन के
गुज़रने के बारे में खिड़की के सामने से एक लड़की के
देखने के बारे में उस खिड़की से एक ग्रे टी शर्ट के
उस लड़की को पहन लेने के बारे में एक पुरुष के
उस ग्रे टी शर्ट को एक दूसरे शहर में खरीदने के बारे में उस पुरुष के
हाथों से हुए चाकू के एक वार के बारे में उस चाकू के
एक तीसरे शहर में कई बार चलने के बारे में उस तीसरे शहर में
अपने होने के बारे में उस अपने होने की
निशानदेही के तौर पर हमारे होने के बारे में

हमारी तरफ और बढ़ी हुई घबराहट से देखते
हुए उसने पानी पिया और फिर से पढ़ना शुरू किया मैं तुम्हें
प्रेम कर सकता यदि मैं कोई और होता मुझे बहुत सारे
फेरबदल तब करने होते ट्रेन गुज़रने की बात गलत थी खिड़की में
तुम्हारे खड़े होने की बात की तरह चाकू
दूसरे तीसरे नहीं इसी शहर में चला था
मेरे हाथों से उस पूरे नज़ारे को बहुत धीमे से होता हुआ
देखा था मैंने तेज संगीत की तरह काटता हुआ
चाकू आह संगीत हरकहीं हरवक्त बजता हुआ बेमतलब उसे बयान
में होना होता बहुत सारे फेरबदल तब होने होते
तुम्हारे लिए कोई टी शर्ट खुद ही खरीदना होती तब शायद ग्रे ही....


एकांत

चाचा ने जब गोदो किया दुखी रहे थे बहुत दिनों तक कोर्ट मार्शल करते हुए बहुत उद्विग्न जब किया एवम् इन्द्रजित तो अपना नाम इन्द्रजित मोहन रख लिया और शायद तीन एकांत करते हुए ही उन्हें अपना तखल्लुस एकांत मिला था मदन मोहन किराड़ू की जगह इस तरह वे इन्द्रजित मोहन “एकांत” हो गए थे–
जब उन्होंने छोड़ा थियेटर बोले जब तक यह समाज तखल्लुसों की मज़ाक उड़ाना नहीं छोड़ेगा इसे थियेटर क्या कोई भी बदल नहीं पायेगा

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

manoj kumar jha (jhamamoj01@yahoomail.com) darbhanga

 
 वाह, सच में जिसे सुंदर कविता कहा जाए. निखोट aesthetic experience, conceptual में सब कुछ को विलायत कर देने का कोई रणबांकापन नहीं. पढ़ के लगा कि कविता कोई अलग सी शै है, ज्ञान विनिमय कि कोई तकनीक महीन, जैसा कि कुछ कवि समझते हैं कदाचित. आप को जब भी पढ़ता हूं प्रसन्न हूं गिरिबाबू. 
   
 

महेश वर्मा (maheshverma1@gmail.com) अंबिकापुर

 
 वाह, सुंदर कविताएँ, सही अर्थों में कविता को ऐसा ही कुछ होना चाहिए. गिरिराज किराडू की कविताएँ इस तरह भी आश्वस्त करती हैं कि नकली कविताओं की भीड़ में भी कहीं सच्ची कविता अपनी जगह बचाये हुए है. धन्यवाद अच्छी कविताएँ पढ़ाने के लिये. पोएटरी इंटरनेशनल की साइट पर गिरिराज की आवाज़ में उनकी कविताएँ सुनना भी एक अलग अनुभव है. सारी दुनिया रंगा से अलग भी उनकी कविताओं का एक प्रिंटेड संग्रह आना चाहिए. 
   
 

girirajk (rajkiradoo@gmail.com) www.pratilipi.in

 
 शुक्रिया मित्रों। रविन्द्रजी,आप कहां है? जिद कोई नहीं है, बस होने का कोई कमबख्त ढब है। 
   
 

Suhash Chakma , Guwahati

 
 आपकी कवितायें जादू करती हैं.  
   
 

ravindra vyas () indore

 
 ये कविताएं अपना अलग रास्ता अख्तियार करती हैं और मुक्तिबोध की इस बात को बेहतर ढंग से समझा जाना चाहिए कि अभिव्यक्ति के खतरे और जोखिमें कैसे उठाई जा सकती हैं या कैसी उठाई जाना चाहिए। गिरिराज नई राहों के अन्वेषी जान पड़ते हैं और वे इरादतन और शायद जिद की तरह यह करते दिखाई देते हैं। कहने दीजिए यह हुनर या कौशल का ही मामला नहीं है बल्कि दुनिया को एक और निगाह से देखने का जतन है ताकि देखना-दिखाना किसी और ढंग से भी संभव हो सके।  
   
 

Prabhat () SWM

 
 कौन क्षमा करेगा मुझे, जब क्षमा मांगना ही पराभव या पस्ती हो गया हो. 
   
 

मायावी बेरिवाल .रोहतक, हरियाणा

 
 गिरिराज किराड़ू सच में असाधारण रचते हैं. 'वो कई दूसरे जो मैं हुआ करते थे और यह एक मैं' के बाद आज उनकी कवितायें पढ़ते हुए लगता है कि वे अलग तरह का मुहावरे में अपने को व्यक्त करते हैं. कहीं-कहीं सहज होने की तरह और कहीं-कहीं चुनौति देने की तरह. लेकिन हर बार असाधारण. 
   
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