दास्तां-ए-मानुष
दास्तां-ए-मानुष
वार्तालेख
पीयूष दईया
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सन् 1999 में रांउलेक गांव,
ज़िला: रूद्रप्रयाग में आए
भू-स्खलन से प्रभावित तीन महिलाओं व एक पुरूष के विवरण यहां उन्हीं की जुबानी में
हैं. तीनों महिलाएं अब अपने परिवार की मुखिया है. स्त्री-मुखिया.
कुछ दूसरे गांवों की महिलाओं से भी
वार्ता हुई थी. सभी जगह मानवीय दास्तां का करूणान्त समान तरह से दिल दहला देने वाले
बयानों व मंज़रों से भरा हुआ था.
यद्यपि इन्हीं जमीनी विवरणों में
अनेकानेक ऐसे बिन्दु छिपे हैं, जिन पर शायद अलग से एक विमर्शात्मक किताब लिखी जा
सकती है या कि लिखी जानी चाहिए लेकिन फिलहाल यह मेरा प्रतिपाद्य नहीं था इसलिए यह
पाठ किंचित् संशोधन के बाद लगभग जस-का-तस उसी रूप में रखा जा रहा है जिस रूप में यह
बोला गया था. मैं श्री रणवीर सिंह का आभारी हूं कि उन्होंने इन वार्ताओं को गढवाली
से हिन्दी में लाने के लिए मेरी मदद की और संयुक्त विकास कार्यक्रम,
देहरादून की जिला परियोजना
अधिकारी श्रीमती पुष्पलता व उत्तराखंड शासन का भी, जिनके निमित्त व सक्रिय सहयोग से
यह पाठ प्रकाश में आ सका. |
कमला देवी
मेरूं मन्दिर क्षीर सागर
पति मिस्त्री का काम करते थे पर इस
भू-स्खलन में उनकी मृत्यु हो गयी. स्वयं के पन्द्रह और तेरह बरस के दो लड़कों सहित
देवर की पत्नी तथा देवर के बच्चों की भी.
इस घटना के बाद केवल देवर व इनकी एक
विवाहित लड़की ही बची.
उस दिन सुबह पति ऊखीमठ गये हुए थे.
दिनभर तेज़ बारिश रही. पति शाम में करीब आठ-नौ बजे के आसपास लौटे. बच्चे मेरे साथ ही
थे. हम सभी डरे हुए थे क्योंकि इसी गांव के राउं मुहल्ले में दिन में कहीं थोड़ी
टूट-फूट भी हुई थी. हमारे यहां रात में करीब तीन बजे रग्वाडो आया.
बच्चे मेरे साथ थे. बड़े वाले ने मेरा
हाथ पकड़ रखा था और छोटावाला मेरी पीठ पर था. हम सभी किसी सुरक्षित स्थान पर भागने
की तैयारी में थे कि बड़े बच्चे ने कहा --''मां
,
मेरा हाथ छोड़. मैं पापा के साथ जाता
हूं.''
इतने में ऊपर से मेरू मंदिर क्षीर
सागर आ गया. (मेरू मन्दिर=मेरू पर्वत अर्थात् शिव का वास-स्थान. : क्षीर सागर=भगवान
विष्णु का निवास. मेरू-पर्वत. भावार्थ=जब शिव भगवान और विष्णु भगवान का आवास (क्षीर
सागर) ही उलट-पुलट गया तो ऐसे में मानव द्वारा निर्मित चीज की क्या बिसात) कोई कहीं
पड़ा तो कोई कहीं. मैं पता नहीं कहां पड़ी थी.
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कमला देवी |
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सच तो यह है कि अब तो
बस दिन निकालने हैं. इतनी ताकत भी नहीं बची है कि लोगों के साथ नौकरी करके खा-कमा
सकूं.
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तीन महीने तक अस्पताल में रही.
सात-आठ दिन बाद होश आया. पांव में फे्रक्चर था और घुटने में टांके लगे थे. पता नहीं
यह घुटना कहां पर फटा होगा. मैं बिस्तर पर ही रही. लोगों ने ही बताया कि उन्होंने
मुझे मलबे की दलदल से निकाल कर सुबह पांच बजे पहले तो राउंगढ के प्राथमिक स्वास्थ्य
केन्द्र पर ले गये और वहां से चारपाई पर डाल कर मनसूना लाये और वहां से यहां
श्रीकोट के अस्पताल.
इस असलियत का तो मुझे बहुत बाद में
पता चला कि मेरे पति सहित मेरा परिवार देवघर चला गया है. तब का वह दर्द आज तक भी
सीने/जिकुडा में नासूर बना हुआ है. सबसे खुशी की बात तो यही होती कि मैं भी उन सभी
के साथ ही खत्म हो जाती. अब अपने से तो कोई कैसे मर सकता है--स्वयं तो मरा नहीं जा
सकता. उस दिन मैं भी चली जाती तो मेरे बिना क्या पृथ्वी बंजर पड़ रही थी
?
सरकार से उस समय जो मुआवज़ा मिला उसका
एक भाग तो कुछ दिनों तक आटा-चावल में लगता चला गया और दूसरा बड़ा भाग वह कर्ज़ा
चुकाने में खर्च हो गया जो मेरे दिवंगत पति ने कभी सहकारी बैंक से उधार लिया था. इस
कर्ज़े के बारे में तब पता चला जब सरकार की ओर से बराबर नोटिस आने लगे--मुझे तो कुछ
समझ में आता नहीं था लेकिन स्थानीय स्तर पर गांववालों ने मुझे बताया तो पता चला.
यूं मुझे आज भी नहीं पता कि वह कर्ज़ा
मेरे पति ने क्यों लिया था लेकिन हमने वह कर्ज़ा चुका दिया.
नहीं ,
उन दिनों जिन कठिन
परिस्थितियों से मैं गुज़र रही थी उसे सरकार ने मद्देनज़र नहीं रखा और मेरे पति
द्वारा लिया हुआ यह कर्ज़ा माफ़ नहीं किया. न ही हमारे यहां के प्रधान या किसी और
जनप्रतिनिधि ने इसके लिए कोई कोशिश या किसी और तरह के कोई उपाय किये--सभी उदासीन
बने रहे.
फिर जो पैसा बचा उसमें से कुछ अपनी
लड़की को दे दिया जो ससुराल में है और कुछ रूपया स्वयं ही बैंक में जमा करवा दिया.
यूं दिन बीतते चले गये पर अब तो अपने
हाथ-पांव से मजदूरी करके ही घर चल रहा है--कभी किसी के साथ मजदूरी करके तो कभी किसी
के लिए कंक्रीट कूट के. सच तो यह है कि अब तो बस दिन निकालने हैं. इतनी ताकत भी
नहीं बची है कि लोगों के साथ नौकरी करके खा-कमा सकूं.
नहीं ,
अब तो किसी तरह की हसर-पसर
नहीं है--मन जवाब दे चुका है/बोल जाता है और इच्छाएं उचाट रहती हैं.
फिर एक वजह यह भी है कि आपदा के
दौरान मेरा पूरा शरीर ही टूट-फूट चुका था--पांव में तो फे्रक्चर रहा ही
, मन भी
टूट गया. शायद इसलिए भी अब लोगों के साथ काम करना मुश्किल होता जा रहा है--मेरे
जीवन ने जवाब-सा दे दिया है.
पिछले कई सालों से देवर के परिवार के
साथ ही रह रही हूं क्योंकि मेरे परिवार में केवल देवर ही बचे थे जिन्होंने बाद में
दूसरी शादी की--घर-बार चलाने के लिए ,
वंश बचाने के लिए.
उस समय के सपने आज भी होते हैं.
सपनों में वैसे ही रग्वोड़े दिखते हैं--पेड़-पौधे-पत्थर (ढूंगा-डल्ला) गिरते दिखाई
देते हैं और लोगों की चीख-पुकार सुनाई देती है. जब भी ऐसा होता है तो सारा शरील
उठो-पठो होने (शरीर उदास व अशान्त होने) लगता है और नींद आनी बंद हो जाती है
क्योंकि इन डरावने सपनों से भिऽऽऽऽऽऽ /अचानक ,
झटके से नींद खुल जाती है. तब वह
वापस नहीं आती और मैं रातभर जप-माला में जैसे बैठते हैं वैसे बैठी रहती हूं. इन
सपनों में कई बार तो बच्चों की करूण आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं--ऐ मां
, ऐ
पापा. तब नींद तो खुल जाती है लेकिन उसी नींद की छाया में मैं अन्दर-बाहर करती
चितिंत सोचती रहती हूं कि उन बच्चों को कहां देखा होगा
, कहां
सुना होगा ,
कहां जा रहे होंगे
, कहां
रो-चिल्ला रहे होंगे.
बस ,
इसी तरह न जाने कितने दिन
,
न जाने कितनी रातें बेचैनी में डूबी
रही है.
जब अपने मालक/गोसी (पति) व बच्चों के
खोने का पता चला तो मेरा पूरा वजूद ही इतना अजनबी-सा हो गया कि अपनी बची हुई
विवाहित लड़की तक पर ममता नहीं गयी. मेरे लिए सब खत्म हो गया था
, ऐसा
लगा.
मेरे लिए कोई संसार ही नहीं था. कोई
भी मेरा नहीं था ,
न किसी पर भी मेरा लाभ-लोभ आया.
दोनों जहान उजड़ गये थे.
फिर ज्यों ज्यों समय बीतता गया त्यों
त्यों यह ममता पुनरपि जगने लगी कि मां-बाप बोलने के लिए मेरी यह विवाहित लड़की ही
मेरी सब-कुछ है. बीच बीच में आती-जाती रहती है तो शरीर हलका बना रहता है.
उस समय अस्पताल से घर आने पर मेरी
बेटी के ससुरालवालों ने ,
उसके पति ने मुझे सम्भाले रखने का
पूरा प्रयास किया. (आवा-जावा-खावा सब में) उन्होंने कहा कि आप चाहे हमारे साथ रहे
या अपने घर जाये लेकिन जहां पर भी रहें ढंग से ,
खुश-से रहें.
हम आज भी उसी जगह पर रह रहे हैं जहां
कभी वह रग्वाडो आया था जिसने मेरी पूरी दुनिया नष्ट कर दी थी. बसग्याल /बारिश का
मौसम आते ही हम ऊपर जंगल में चले जाते हैं और वहीं रहते हैं
, छप्पर
बना कर. हाट-बाज़ार की दुकानों पर जो बरसाती मिलती है उसी से टैण्ट बनाते हैं और फिर
उस बरसाती के नीचे झलके-मलके/पेड़ों की टहनियां काट कर रखते हैं और यही हमारे छप्पर
के बतौर काम में आता है.
हम पूरे गांववाले अपनी अपनी
गाय-भैंसों/मवेशियों के साथ बारिश के पूरे मौसम में ऊपर जंगलों में ही रहते हैं.
जब जब बरखा आती है
, मैं
किसी अनहोनी की आशंका से डरी-सहमी रहने लगती हूं और ऐसे कांपने लगती हूं जैसे तेज़
हवा में पत्ता कांपता रहता है.
बारिश आती है जब
, बिजली
कड़कड़ाती है तो क्या करें--झोंपड़ी के भीतर ही बने रहते हैं
, बहुत
बुरे डर सताते लगते हैं. सोचते हैं कि फिर कभी अगर पहले जैसी हालित आ गयी तो क्या
होगा. जब जब बिजली चमकती है बच्चे भय से रोने लगते हैं या यूं खामोश-सहमे से दुबक
जाते हैं मानो सांप सूंघ गया हो.
भय हमें यूं दबोचे रखता है मानो हम
शेर के जबड़ों में हो-पर क्या करे.
जाना भी कहां है !
भू-स्खलन को आए अब तो आठ-नौ साल हो
गये लेकिन उसके बाद ऐसे कोई लोग नहीं आए जो हमें आपदा से बचाव के उपाय बताते.
नहीं ,
कोई नहीं आया न किसी ने कुछ
बताया.
उन दिनों के बाद से पहली बार हमने
आपको ही देखा है ,
और कोई नहीं आया.
हमें कुछ नहीं पता कि अगर दोबारा यह
रग्वाडो या कोई और आपदा आ गयी तो हमें क्या करना है/हमें क्या करना चाहिए.
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शेरी लाल
बसग्यालः
चक-चौकी
शेरी लाल कमला देवी के देवर हैं
उस रोज भयंकर बरखा हो रही थी. सबकी कोशिश रही कि बच सके पर
बच-बचाव हो न सका. भोर से पहले लगभग तीन-साढे तीन बजे ऊपर से भयंकर रग्वाडो आया और
सब अपने साथ ले गया. उसमें कोई कहीं दबा, कोई कहीं दबा. मैं भी दबा, भाभी भी दबी,
उनके बच्चे भी और मेरे बच्चे भी. सभी दबे. जब रग्वाडो आया तब यह होश नहीं बचा कि
कोई जिंदा भी बचा. मैं भागने की कोशिश में ही था कि रग्वाडो ने मुझे अपनी चपेट में
ले लिया. मैं अपनी एक नौ बरस की बिटिया और दूसरी जो सालभर की थी, को बचाना चाह रहा
था पर यह ईश्वर को मंजूर न था सो बचा न सका. सबकुछ क्षणों में घट गया. यह तक पता
नहीं चला कि मैं यहां अपने से बच गया हूं या कि गांववालों ने मुझे निकाला है. यह
होश नहीं रहा कि मैं कहा हूं.
उस दिन रात में न जाने क्यों किसी अनिष्ट की आशंका से दिल दहला दहला सा था, लगा था
कि कुछ होने वाला है इसलिए सो नहीं सके थे और बच्चों को गोदी में लेकर बाहर आ ही
रहे थे कि सब खत्म हो गया.
मुझे तो श्रीनगर में ही होश आया और तब पता चला कि मैं कहां आ गया हूं और पूरे गांव
में क्या हो गया है. जब लोग सन्त-खबर (कुशल-क्षेम/हालचाल) पूछने आए तब उनसे मालूम
हुआ कि मेरे बच्चों व पत्नी को रग्वाडो ने अपने में समा लिया है. जब पता चला कि
बीवी-बच्चे चले गये हैं तो अपना दर्द (टांग में फ्रेक्चर था, हाथ में भी और पूरा
शरीर चोटों से भरा हुआ व जख्मी था) कुछ महसूस नहीं हुआ, उनका ही दर्द सीने में घुसा
था.
सरकार द्वारा मेरे इलाज में कोई कमी नहीं थी. सरकार ने मेरा
इलाज ठीक-ठाक ही कराया. तीन महीने अस्पताल में रहने के बाद जब वापिस ऊखीमठ आए तो
वहां अपना एक कमरा लेकर एक-दो महीने रहा और फिर मनसूना में अपने रिश्तेदारों के
यहां रहे. वहां भी दो-तीन महीने रहा और ठीक होने के बाद रिश्तेदारों के
समझाने-बताने पर दूसरी शादी की. लगभग साल भर बाद. सभी रिश्तेदारों व गांववालों का
आग्रह था कि मुझे शादी कर लेनी चाहिए क्योंकि अभी तो उम्र है और मेरे बच्चे हो सकते
है सो वंश चलता रह सकेगा. मैंने उनकी बात मान कर शादी कर ली. आज मेरे दो लड़के और एक
लड़की है.
शादी के बाद मैंने वापस यहीं पर दुबारा से अपना घर बनाया : धीरे धीरे जीवन वापस
सांस लेने लगा और अपना जीवन यापन करने लगा.
पहली त्रासदी में गुजर गये अपने बच्चों की यादें आती हैं तो
भयंकर टीस उभरती है. यह सोचने लगता हूं कि आज वे होते तो कितने बड़े हो गये होते.
स्वयं यादें भी बहुत गहरी व बड़ी चोटें हैं पर क्या करें. भला आदमी के बस में क्या
है. सब समय की बात है. उस दर्द को चाह कर भी भुला तो नहीं सका हूं और अभी के इन
बच्चों में उन बच्चों की सूरतें दिखती है.
मुझे नया जीवन देने में मेरी इन दूसरी पत्नी की बहुत बड़ी भूमिका रही. इन्होंने मुझे
सम्बल व सहयोग दिया और पूरा परिवार ये ही सम्भाल रही है. जमीन-जायदाद भी फिर से खड़े
हो जाते पर क्या करें, वे तो रग्वाडो में यूं चले गये कि अब वह मेरे बस का नहीं
रहा. यह जो गृहस्थी-जंजाल है उसमें हम अपना जीवन समय व्यतीत कर रहे हैं.
भूस्खलन के बाद जितने कठिन समय से गुजरते हुए मैं दुबारा से अपने जीवन की पटरी पर
आया हूं तो इसके पीछे सभी लोगों की मदद का हाथ है. हरिजन और सवर्ण दोनों ने ही मदद
की. किसी तरह की जाति-पांति का भेद इसमें नहीं था. उस वक्त तो सभी ने सहयोग किया
था- खाने-पीने, पूछना-जांचना, सभी में.
सरकार ने रग्वाडो में हुए हमारे नुकसान का जो भी मुआवजा दिया है उसके बारे में हमें
यह तो पता नहीं कि वह पर्याप्त मिला है कि नहीं लेकिन हमें सरकार से कोई शिकायत
नहीं है. फिर इन मुआवजों के लिए हमने ज्यादा दौड़भाग भी नहीं की और करनी भी क्या थी
क्योंकि सरकार ने भी भला कितनी जगह देखना था, इतने इतने लोग तो प्रभावित थे. हमने
जो पाया ठीक ही पाया. (अर्थात् स्वयं सरकार भी तो- जितना उसके बस में था-उतना
प्रयास कर रही थी. और उसे बहुत सारे लोगों को देखना-सम्भालना था सो हमें भी सरकार
का ध्यान रखते हुए उसे अधिक परेशान नहीं करना चाहिए था. यूं शेरसिंह जी के इस वाक्य
से और भी कई मानवीय अर्थ निकलते हैं और उनका यह भाव अद्भुत है.)
हमें जो मिला उसी से हमने फिर से अपने मकान बनाए हैं; उसी से व्यवस्था कायम की है
और एक-दो गाय-बछिया भी रखी है. इन्हीं सबसे हमने फिर से अपनी ज़िंदगी चलानी शुरू की
है.
हमें यह नहीं मालूम कि रग्वाडो में हमारे जो पशु भी मर गये थे, उनका मुआवजा हमें
मिला या नहीं लेकिन सरकार से हमें रूपया ज़रूर मिला था. अब कौन सा रूपया किस के लिए
मिला यह हमें नहीं पता और न हमने पूछा. रूपया मिला, बस.
जब खेतीबाडी दुबारा बनाई तो उसके लिए कुछ मजदूर रखे तो कुछ गांव वालों ने मदद करी.
जिससे जितना हो सकता था उसने उतना किया. अब उस तरह से देखें तो पहले जितनी ज़मीन तो
रही नहीं क्योंकि इतने बड़े बड़े खड्डे पड़े हैं कि उन्हें ठीक करके दुबारा से उन्हें
खेत में बदल सके, यह हमारे बस का नहीं. वहां उस ज़मीन पर अब पहले जैसे खेत हम नहीं
बना सकते. अब जाना भी कहां है, जो होगा यहीं होगा. फिर जाने का सोचें भी तो कैसे और
कहां जाएं, हमारे पास साधन भी तो नहीं है.
लगभग जून के आखिर में हम वहां ऊपर ''चक-चौकी'' नामक एक स्थान है, जहां हम
सभी-भू-स्खलन आने के बाद से-बारिश के पूरे मौसम में रहने के लिए चले जाते हैं और
अक्टूबर के महीने में वापिस लौटते हैं. अब वहां भला हमारे पास करने को क्या
होगा-घास काटते हैं , गाय चुगाते हैं. रोजी-रोटी का तो मालिक भगवान ! उधार आटा-चावल
लाते हैं या कहीं मजदूरी बची हैं तो उससे मांगते हैं. बस, वही ऊपर ले जाते हैं और
खाते हैं और घास-फूस की बनाई झोंपड़ी में रहते हैं.
वहां जंगलों में ऊपर जंगली जानवरों से डर तो लगता है लेकिन क्योंकि पूरा
गांव-का-गांव रहता है सो चल जाता है-डोम/हरिजन हो चाहे बिठ/सवर्ण हो, सभी ऊपर रहते
हैं.
बीच बीच में नीचे गांव में आते भी हैं तो चाय-चीनी-राशन लेने या गांव में घरों को
देखने. यह सब करना-लेना ही होता है तो क्या करें-मरते क्या न करे-आना ही पड़ता है.
जारी...
11.06.2008, 19.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित