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एक दिनः रामकुमार तिवारी

हानी

एक दिन

रामकुमार तिवारी

 

गगन सड़क के बायीं ओर सही-सही जा रहा था. सही दिशा से आई एक कार ने उसे कुचल दिया. एकाएक कार की स्टेयरिंग फेल हो गई थी. ड्राईवर क्या करता? दोष कार का भी नहीं था, कार स्वयं चलकर तो किसी को नहीं कुचलती. चारों ओर सहानुभूति-सी जग गई. लोग कहने लगे- गगन सही दिशा से आकर, सही दिशा से आती कार से टकरा गया. उसके साथ तो यही होना था, सो हो गया.

रामकुमार तिवारी


गगन ऐसा ही था. वह किसी से भी टकरा जाता. कभी-कभी तो संदेह होता कि वह अंधा हो गया था. उसकी आंखों की रोशनी इतनी कम हो गई थी कि उसे सही नहीं दिखता था. वैसे उसकी आंखे थीं बहुत सुंदर. एकदम काली-सफेद स्वच्छ आंखें, जिनमें तैरती हल्की तरलता को देख कर दुनिया सुंदर और अपनी लगती है. ऐसी सुंदर आंखें क्या टकराने के लिए बनी थीं?

एक बार वह इतने बड़े मंच से टकरा गया था कि लोगों को विश्वास नहीं हुआ था. इतने बड़े मंच से तो अंधा भी नहीं टकराता लेकिन गगन टकरा गया था. जोर की आवाज हुई थी. वह धरती पर चारों खाने चित्त गिरा था. समूचा आकाश उसकी आंखों में घूम गया था. एक बड़ा गूमड़ सिर में निकल आया था. लोग खूब हंसे थे, परिचित भी अपनी हंसी नहीं छिपा पाये थे. गगन को अपने टकरा जाने का कोई दुख नहीं हुआ था और न ही लोगों के हंसने का. वह एकदम सपाट भाव-शून्य उठा था और सीधा चला गया था.

गगन की स्थिति से घर वाले चिंतित रहते थे और परेशान हो गये थे. अभी कुछ ही दिन हुए थे कि वह बाजार में घूमते-घूमते कांच के बने एक सुन्दर शो-रूम से टकरा गया. सजी संवरी चीजें गड्ड-मड्ड होकर गिरीं, चारों ओर कांच के टुकड़े फैल गये.

दुकानदार ने उसका कॉलर पकड़कर दुकान के अन्दर खींच लिया और उसे तब तक बैठाये रखा, जब तक उसके घरवालों ने आकर नुकसान के सारे पैसे नहीं भर दिये. उस दिन मां ने उसे बहुत समझाया था- “ बेटा! देखकर क्यों नहीं चलते, तुम्हारी गलती की कीमत घर वालों को चुकानी पड़ती है. सभी बहुत परेशान हैं.”

जब भी कोई गगन को समझाता तो वह सुनते-सुनते इस तरह अनुपस्थित हो जाता कि समझाने वाले का विश्वास बीच में ही टूट जाता और वह स्वयं रूककर सोचने लगता- गगन नहीं समझेगा. उसे समझाना, समय नष्ट करना है.

गगन स्वभाव से ही सनकी था. जब वह पन्द्रह वर्ष का था, नदी में बाढ़ आई थी. हर कोई नदी से दूर भाग रहा था. चारों ओर बाढ़ ही बाढ़ थी. तब वह बस्ती छोड़कर नदी की ओर दौड़ गया और नदी में कूदकर नदी की धार से टकरा गया. कुछ दूर तक तो वह बीच में दिखा लेकिन फिर उसका कोई पता नहीं चला. गगन के नदी में डूब जाने की खबर चारों ओर फैल गयी. प्रशासन और घर वालों ने उसे बहुत खोजा लेकिन उसका पता नहीं चला. पांच दिन बाद जब घर के सदस्य अपने-अपने हिस्से का रोना रो चुके तब वह न जाने कहां-कहां बहते, किनारे लगते, बचते, चलते घर पहुंच गया था.

इसी तरह एक दिन बहुत दिनों की बदली के बाद सूरज निकला था. धूप सबको अच्छी लग रही थी. गगन को खिली धूप में पैदल चलना अच्छा लग रहा था. आगे सड़क बंद थी. सड़क पर प्रहरी था. शायद कोई महत्वपूर्ण सभा सड़क पर हो रही थी. गगन चलते-चलते प्रहरी से टकरा गया. प्रहरी ने पहले तो उसे डांटा फिर समझाया, जिसका उसके ऊपर कोई असर नहीं हुआ. थोड़ी देर बाद वह फिर प्रहरी से टकरा गया. इस बार प्रहरी को जोर से गुस्सा आया. उसने उसकी गर्दन पकड़कर घुमाकर फेंका तो वह सड़क किनारे हलवाई की दुकान में शीरे से भरी कड़ाही में गिरा. मिठाई से भरी तश्तरियां उसके ऊपर गिरीं. हलवाई ने पीछे से उसकी शर्ट पकड़कर उसे उठाया और दो-तीन भरपूर लातें उसकी पसलियों में जड़ दी. बहुत देर तक उसकी सांस फंसी रही और जब लौटी तो वह चुपचाप उठकर चल दिया.

उसके शरीर से शक्कर का शीरा निचुड़ रहा था. कपड़ों में जगह-जगह मिठाई के टुकड़े चिपके हुए थे. देखते-देखते उसके चारों ओर बाजार की सारी मक्खियां भिनभिनाने लगीं और वह चलता फिरता मक्खियों का छत्ता हो गया. उसके दोनों हाथ हवा में लटके से झूल रहे थे और उन पर मक्खियां बैठी थीं. उसकी स्थिति देखकर लोगों का हंसना बंद हो गया था. बच्चों का जुलूस बिना किसी हो-हल्ला के चुपचाप उसके पीछे-पीछे चल रहा था. जब यह खबर घर वालों को पता चली तो वे उसकी चिंता में दौड़े-दौड़े आये और उसे घर ले गये.

गगन का बाहर जाना बंद हो गया था, वह घर में चुपचाप बैठा रहता था, जो उसके हित में था. बहुत दिनों बाद वह एक दिन ड्राइंगरूम में रखे चीनी मिट्टी के गमले से टकरा गया. फर्श पर गिर कर गमले के टुकड़े-टुकड़े हो गये और उसमें रखे प्लास्टिक के फूल चारों ओर बिखर गये. गमला टूटने का सबसे ज्यादा दुख गगन के बड़े भाई को हुआ था. वह उनके मित्र की भेंट थी, जिसे वे काठमांडू से नेपाल प्रवास की याद के रूप में लाये थे. लेकिन गगन के लिए इसका कोई अर्थ नहीं था.

उस दिन टीले पर बैठे-बैठे उसे रात हो गई थी. एक-एक करके शहर की बत्तियां एक साथ जल गई थीं और वह शहर की रोशनी से टकराकर रात भर बेसुध टीले पर पड़ा रहा था.


कुछ दिन ठीक से गुजरते और जैसे ही घर के लोगों को कुछ आस बंधती, वह किसी न किसी से टकरा जाता. गगन के पास बैठकर मां ने चाय पी. चाय पीकर वह खाली कपों को रखने अंदर गई ही थीं कि उन्हें टकराकर गिरने की आवाज आई. उन्होंने आकर देखा, सोफे का हत्था टूट गया है. फर्श पर गिरने से टीवी जगह-जगह से टूट गया. गगन के सिर में जोर की चोट आई थी. खून भी निकला लेकिन किसी को दिखा नहीं.

गगन ने हद पार कर दी थी. घर की कोई चीज सुरक्षित नहीं थी. गगन जहां भी रहता था, वहां घर का कोई दूसरा सदस्य जरूर रहता था. वह गगन और चीजों के बीच में खड़ा हो जाता और चीजों को बचा लेता.

अंत में तंग आकर घर के सभी लोगों ने मिल-बैठकर विचार किया कि अब गगन का घर में रहना ठीक नहीं है. वह आखिर कब तक घर में बंद रहेगा. उसका भी जीवन है. सभी ने एक साथ उसे बाहर जाने के लिए कह दिया.

बहुत दिनों बाद गगन बाहर निकला. बाहर बदल गया था. गगन की समझ में नहीं आ रहा था कि कहां जाएं ? गगन शहर से बाहर टीले की ओर चल दिया, जहां वह पहले भी एक रात पड़ा रहा था. उस दिन टीले पर बैठे-बैठे उसे रात हो गई थी. एक-एक करके शहर की बत्तियां एक साथ जल गई थीं और वह शहर की रोशनी से टकराकर रात भर बेसुध टीले पर पड़ा रहा था.

चलते-चलते गगन टीले के ऊपर बने मकान से टकरा गया. मकान मालिक बाहर ही खड़ा था. मकान मालिक के पास आकर गगन खड़ा हो गया. चारों ओर मकान ही मकान थे. गगन बहुत देर तक खड़ा रहा.

गगन के पास से एक आदमी गुजरा तो वह उस आदमी के पीछे-पीछे चलने लगा. चलते-चलते वह आदमी पहुंच गया था, उसे वहीं तक जाना था. पीछे-पीछे आता गगन उसी आदमी से टकरा गया. वह आदमी गिरते-गिरते बचा. उसने गुस्से से चिल्लाकर कहा- “ दिखता नहीं ? अंधा कहीं का….”

उसका कहा गगन को सुनाई नहीं दिया. उसने रूके हुए आदमी को एक नजर देखा और चल दिया. वह लगातार चलता रहा. शाम हो गई थी. चलते-चलते वह अपने बचने से टकरा गया. रात भर शहर की बत्तियां जलती रहीं. कहीं से किसी के टकराने की कोई आवाज नहीं आई.

05.04.2010, 22.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

durgesh pandey (dp9817@gmail.com) sonebhdra

 
 Its beautiful thinking for blind persons so I am very impressed. 
   
 

sudeep thakur (sudeep.thakur@gmail.com) delhi

 
 इस समतल दुनिया में बिना टकराए चलना वाकई मुश्किल होता जा रहा है. राम कुमार जी की कहानी हमारे समय की विसंगतियों के साथ ही समाज में बढ़ते टकराव को भी व्यक्त कर रही है. हम सब अंततः रोज बचने के उपक्रम में ही जुटे हुए हैं.  
   
 

Balli Singh , Amritsar, Punjab

 
 कहानी पढ़ कर घंटों बेचैन रहा. लेखक ने जिस तरीके से अपनी चिंता व्यक्त की है, वह हम सबकी साझा चिंता है. अफसोस यही है कि हम सब केवल टकराने की घटना को देख रहे हैं, उसके बचने के टकराने को नहीं. 
   
 

Kumar Sudesh जोधपुर, राजस्थान

 
 रामकुमार जी ने बहुत सुंदर कहानी लिखी है. कविता की तरह की कहानी, जो हमारे समय की त्रासदी को ठीक-ठीक व्यक्त करती है. 
   
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