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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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टूटते मेकेनिज़्म में हत्याओं का दौर

विचार

 

टूटते मेकेनिज़्म में हत्याओं का दौर

आवेश तिवारी, सोनभद्र, उत्तर-प्रदेश से


लालमाटी गाँव का सूरज बैगा अभी पिछले हफ्ते मुझे मिला था सीआरपीएफ के भर्ती कैम्प में. उत्तर-प्रदेश के घोर नक्सल प्रभावित सोनभद्र इलाके के एक सीमांत कृषक का ये बेटा अगर थोड़ा बहुत पढ़ा-लिखा नहीं होता तो शायद अपने ही और साथियों की तरह लाल सलाम का नारा बोल बीहड़ में कूद पड़ा होता.

बस्तर में नक्सली हमला


पढ़ाई और बुनियादी जरूरतों के लिए दिन-रात की शारीरिक मानसिक प्रताड़ना ने उसके लिए विकल्पों को चुनना आसान कर दिया और उसने हिन्दुस्तानी सेना का हिस्सा बनना कबूल कर लिया.

ये कहानी सिर्फ सूरज की नहीं, सीआरपीएफ और बीएसएफ समेत तमाम अर्धसैनिक बलों एवं भारतीय सेना के ज्यादातर जवानों की है.

दंतेवाडा में माओवादियों द्वारा 76 सीआरपीएफ के जवानों को मार दिए जाने की सूचना मुझे सीआरपीएफ के ही एक अधिकारी ने दी. छतीसगढ़ और बिहार की सीमा पर स्थित जिस इलाके में मै आज इस वक़्त हूँ, वहां महा भर्ती अभियान चल रहा है. रोजाना हजारों की संख्या में नए रंगरूट भर्ती के लिए यहाँ आ रहे हैं.

शहरी युवा सेना में या तो कमीशन रैंक पाना चाहते हैं या फिर उन्हें सेना पसंद नहीं. इससे अलग ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के युवाओं के लिए आज भी नौकरी का सबसे अच्छा और सुगम विकल्प सेना के रूप में मौजूद है. नक्सली हिंसा पर अपने होठों को सी कर कोन पकड़ा लेने वालों के लिए ये सच स्वीकार कर पाना बेहद कठिन होता है कि हत्याएं चाहे नक्सली की हो या फिर किसी जवान की, मरता आदिवासी ही है. चाहे नक्सली हिंसा के मूक समर्थक हों या फिर सत्ता के कारिंदे, सेना और अर्धसैनिक बल उन्हें एक मेकेनिकल टूल की तरह नजर आने लगते हैं, जिसका इस्तेमाल सरकार जब चाहे तब, जैसे चाहे वैसे कर सकती है.

पी. चिदम्बरम ने दंतेवाडा में हमले को बर्बर और सुरक्षा चूक बताया और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जा पहुंचे. नक्सली हमले के बाद की रणनीति तैयार कर रहे गलियारों से उड़ने वाली खबरों पर अगर यकीन किया जाये तो आने वाले समय में सुरक्षा बलों द्वारा समूचे दंतेवाडा में अब तक की सबसे बड़ी कार्यवाही को अंजाम दिया जा सकता है. निश्चित तौर पर हत्याओं का एक और दौर शुरू होगा, शहादत के मायने बदल जायेंगे, बर्बरता के प्रतीक बदल जायेंगे, लेकिन लाशें उन्ही की होंगी जिन्होंने मरने के लिए ही जन्म लिया है.

आने वाले दिनों में जवानों की इन अकाल मौतों के लिए माओवाद को तो कटघरे खड़ा ही किया जायेगा, गृहमंत्री पी चिदम्बरम और उनकी टीम द्वारा ऑपरेट किये जा रहे उस ऑपरेशन के औचित्य पर भी सवाल खड़े किये जायेंगे, जिसमे देश की सर्वाधिक उपेक्षित और निरीह आबादी को लोकतंत्र की तथाकथित स्थापना के नाम पर सामूहिक जनसंहार की आग में झोंक दिया गया है.

दंतेवाडा की घटना के बाद इलेक्ट्रानिक चैनलों की ख़बरों में कल का सवेरा साफ़ नजर आने लगा है. चूँकि ये तय है कि अब जो कार्यवाही होगी, उसमे बड़े पैमाने पर निर्दोष मारे जायेंगे, ऐसे में ऐसी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करना पी. चिदम्बरम एंड कम्पनी के लिए बेहद जरुरी था. जो खबर मिल रही है, उसके अनुसार संभव है कि पूरे बस्तर को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सेना के हवाले कर दिया जाए.

घटना के तत्काल बाद उत्तर प्रदेश छत्तीसगढ़ सीमा पर तैनात सीआरपीएफ के कुछ जवानों से हमारी बातचीत हुई. उनके अंदर जिस तरह का गुस्सा नजर आ रहा है, वो निस्संदेह बस्तर पर भारी पड़ने जा रहा है. छत्तीसगढ़ में रहने वाले मेरे एक पत्रकार मित्र बताते हैं कि अर्धसैनिक बलों के ज्यादातर जवान दो-तीन साल इस इलाके में गुजारने के बावजूद यहाँ की बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से परिचित नहीं हो पाए हैं, जिसका खामियाजा उन्हें बार-बार भुगतना पड़ता है. लेकिन एक जो महत्वपूर्ण चीज मैंने पायी, वो ये थी कि उनके लिए आदिवासियों और नक्सलियों में अंतर करने का सिर्फ एक तरीका है, वो है हथियार.

पुलिस के विपरीत सीआरपीएफ की गोलियों का निशाना वही बनते हैं, जिनके पास हथियार होते है. किसी निहत्थे को सीआरपीएफ ने निशाना बनाया हो, ऐसे मामले कम ही सामने आते हैं. उन्हें आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन और मेडल का भी लालच नहीं होता. लेकिन ताज़ा घटना के बाद तय है कि दंतेवाडा के जंगलों में सुरक्षा बलों का दूसरा चेहरा देखने को मिलेगा.

ये कम आश्चर्यजनक नहीं है कि दंतेवाडा की घटना के बाद किसी ने भी ये नहीं कहा कि जैसे-तैसे बातचीत का माहौल तैयार कर अघोषित युद्ध की-सी परिस्थितियां ख़त्म की जानी चाहिए.


ये चेहरा हमने उत्तर प्रदेश में उस वक़्त भी देखा था, जब नक्सलियों ने नौगढ़ के हिनौत में पीएसी के ट्रक को उड़ाकर डेढ़ दर्जन जवानों को मार डाला था. उस घटना के बाद वहां के आदिवासियों को जो दंश दिए गए, वो आज भी जहर बनकर उनकी शिराओं के रक्तसंचार को अव्यवस्थित कर रहे हैं. अगर ऐसा कुछ घटता है तो यह भी तय है कि बदले की कार्यवाही से हिंसा की इस निरंतरता को ख़त्म करना नितांत असंभव होगा. जब घटना के तत्काल बाद गृहमंत्री कहते हैं कि कोई न कोई बड़ी भूल हुई होगी, तो क्या पता कि कल को कोई दूसरी भूल न हो. दूसरी घटना का मतलब भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ही होगी और ये क्रम निरंतर चलता रहेगा.

दंतेवाडा या उस जैसे किसी भी हमले को सरकार की निगाहों से देखने के अपने तर्क हैं. लेकिन वो बहुसंख्यक लोग जो ऐसी घटनाओं के बाद प्रतिघात को अनिवार्य मानते हैं, अक्सर उस वक़्त चुप्पी साधे रहते हैं, जब ऐसी घटनाओं की परिस्थितियां तैयार होती हैं, उन्हें सरकार की निगाहों से देखना ही लोकतांत्रिक नजर आता है.

ये कम आश्चर्यजनक नहीं है कि दंतेवाडा की घटना के बाद किसी ने भी ये नहीं कहा कि जैसे-तैसे बातचीत का माहौल तैयार कर अघोषित युद्ध की-सी परिस्थितियां ख़त्म की जानी चाहिए. ये बात कही जाएगी लेकिन तब, जब कल से हत्याओं का दूसरा दौर शुरू हो जायेगा. मानवाधिकार के नाम पर शोर भी बरपने लगेगा. ऐसे में अरुंधती राय से लेकर माओवाद के तमाम पैरोकारों की तात्कालिक चुप्पी के मतलब की भी हर कीमत पर व्याख्या की जानी चाहिए.

इस वक़्त जब मै ये टिप्पणी लिख रहा हूँ, आउटलुक का वो अंक मेरे सामने हैं, जिसमे अरुंधती का माओवादियों के साथ साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है. शुरुआत में ही एक तस्वीर है, जिसमें आउटलुक के ऊपर एक स्टेनगन रखी हुई है. हम इस तस्वीर का मतलब जानते हैं और ये भी जानते हैं कि अगले अंक में पत्रिका में दंतेवाडा की इस घटना के संबंध में छपी खबर के तेवर क्या होंगे.

हम भूल जाते हैं, चाहे वो सेना का जवान हो या फिर जंगलों में दर-दर भटकता कोई कॉमरेड, दोनों में कोई अंतर नहीं होता. आदिवासी आदिवासी होता है, आदमी आदमी होता है, जीवन जीवन होता है, ये सच सामने रखकर बात करने की आदत में ही समाधान छुपा है. अगर हम ऐसा नहीं करते तो सरकार के गलत-सही निर्णयों पर भी इमानदार विरोध नहीं दर्ज करा पाएंगे और हत्याओं का ये दौर जारी रहेगा.

07.04.2010, 11.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanat jagdalpur

 
 स्थाई हल है -
१. विरल आबादी को सघन बनाया जाये . १०-१२ घरों वाले छोटे गांवों को हटा कर बड़े और मुख्य मार्गो पर स्थित बड़े गाँवो में बसाया जाये, जिससे सरकारी सुविधाए आसानी से उपलब्ध करायी जा सके बड़े गाँवो में बड़े डाक्टर व्यापारी स्कूल आदि स्वमेव ही आ जाते हैं.
सुरक्षा भी आसान होगी नक्सली भी आसानी से ज्यादा आबादी में घुसने से डरेंगे. छोटे गाँवो के हट जाने से नक्सली नेटवर्क ख़त्म हो जायेगा; जोकि मजबूरी और डर के कारण बनता है.
 
   
 

sanat jagdalpur

 
 बड़े शहरों में अंग्रजी स्कूलो में पढ़कर ए सी की हवा में जिन्हें लू लग जाती है ऐसे लोग उन गरीबो का सोचने लगे हैं जो नंगे बदन रहते है, जमीं में सोते जिनका रहना उतना ही जरूरी है जितना हवा पानी का. जिस संस्कृति का कचूमर निकल कर जिनके पेट तोंद में बदल गए हैं, वैसे लोग इन आदिवासियों की संस्कृति की रक्षा की बात कर रहे हैं.कोई भी आज इन फौजी जवानो की मौत का और आदिवासियों की ख़राब स्थिति का स्थाई हल नहीं खोजता है  
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 आवेश तिवारी जी मेरी टिप्पणी भाषाई निर्लज्जता इस लिये कि यह आपकी सोच को "सूट" नहीं करता? या इस लिये कि आप का सच ही केवल सच है बाकी सब का आप लाल सलाम कर दीजिये?

नव-उपनिवेशवाद ही नही और भी लाल-सोच नें इससे भी बडे बडे शब्दों का अंबार लगा दिया है लेकिन इससे "आतंकवादी" के "आतंकवादी" होने का सच कायम रहता है। कविताओं और उद्धरणों की दुहाई मत दीजिये एक आपके लिये भी -

तुम्हारे जो हितैषी बन, तुम्हारी पीठ पर खंजर चलाते हैं
आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर था, लहू से बेगुनाहों के लाल लाल है
झंडा उठाने वाले जलीलों, तुम्हारी दलीलें भी बाकमाल हैं
तुम्हारे इन पटाखों से कोई सिस्टम बदलता है
घने बादल के पीछे से, नहीं सूरज निकलता है
अरे बिल से निकल आओ, अपनी बातों को अक्स दो
हमें फिर जीनें दो, जाओ, हमें बक्श दो...
 
   
 

awesh t (awesh29@gmail.com) vns

 
 राजीव जी जिस लहजे में आपने अपनी बात कही है उसे हम भाषाई निर्लज्जता कहते हैं ,कलम के पौरुष की स्वीकार्यता के लिए हमें आपके प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है. दूसरों को देशद्रोही करके आप खुद को जबरिया देशभक्त बताने का काम ना करें. ये भ्रम नहीं यथार्थ है कि हर आदिवासी माओवादी नहीं है तो मौजूदा व्यस्था के विर्रुद्ध अवश्य खड़ा है, इसकी एक बड़ी वजह आप जैसे लोग हैं, जो नवउपनिवेशवाद को समूचे देश में स्थापित करने का समर्थन अपने निजी स्वार्थों के लिए करते हैं.धूमिल की कविता की दो पंक्तियाँ हैं

-लोहे का स्वाद लोहे से मत पूछो ,उस घोड़े से पूछो जिसके मुँह में लगाम है
 
   
 

neha () bangalore

 
 raeev ji , i never seen development on the scale of urban or rural area but the development should like this way that every human being should get advantage , our india is shining but 77% people are still starving, then remaining 27% people should be the basis of india shining ? this can be basis of happyness of indian government but not of any single commonman of india.

if we really want to develop those area we have to take initiative of talking to those not to destruct them , we have to overcame their fear, if government always showing such kind of intentions they will never come out of their actual fear and always ignite in the flame of revenge and it will not provide any solution to problem.naxalite can take in belief tribes but our government cant do this ,why? you will not give your home on rent until you believe to get regular rent. and i always say that these naxalites are not the people of any other world , these are also our people and most of them are from tribes.and became rebellious due to exploitation of their rights ,at that time when their rights are exploited who had made the voice against their exploitation?
 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 नेहा जी आभार कि आपने सार्थक संवाद स्थापित किया।

विस्थापन का दर्द अनंत है और उसकी कोई भरपायी नहीं हो सकती। किंतु क्या आप बनने वाली परियोजनायें और नहीं बनने वाली परियोजनाओं में कोई सम्बंध देखती हैं? स्टील प्लांट बस्तर के पथरीले/बंजर मावली भाटा में नहीं लगा लेकिन वही प्लांट विशाखापट्टनम में लग गया (क्या वहाँ विस्थापन नही हुआ?, क्या विकास शहरों का ही स्वाभाविक अधिकार है?)। भारत में अनेकों बाँध निरंतर बन रहे हैं और आपको जान कर आश्चर्य होगा कि इन्द्रावती और उसकी सहायक नदियों में लगभग तीन हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता है (जो पूरे छतीसगढ को विद्युत आत्मनिर्भर बना सकता है) लेकिन एक भी परियोजना नें कभी मूर्त रूप नहीं लिया (हर विरोध बाहर से हुआ कभी भी भीतर से विरोध की आवाजे नहीं उठीं)। बस्तर एसा क्षेत्र है जहाँ यूरेनियम से ले कर कोरंडम तक सब कुछ उपलब्ध है। दु:खद है कि इन संसाधनों की स्मग्लिंग तो निरंतर हो रही है लेकिन इनके दोहन की अधिकतम संभावनाओं पर ताले लगे हैं। विवेचना कीजिये कि फिर बेरोजगारी क्यों न हो? फिर पिछडापन क्यों न रहे? विकास विरोधी यह विचार ले कर सामने नहीं आते कि आदिवासी भागीदारी के साथ विकास हो बल्कि "ब्ळाईंड तालाबंदी" ही अब तक उनकी माँग रही है। मै जगदलपुर के आदिवासी छात्रावास में रह कर स्नातक हुआ हूँ; एक तरह का फ्रस्टेशन हमेशा आदिम छात्रों में रहा। आदिम जिन संघर्षों से पढ कर आगे आते हैं उन्हे जीवन यापन के अवसर चाहिये; अब उन्हे बस्तर के आगे रायपुर भी नौकरी देने से रहा और उनकी अपनी जमीन के अवसरों पर केवल मायूसी ही है। आप जिस डिप्राईवमेंट की बात कर रही हैं वह एक तरफा दृष्टिकोण है।

हमारी व्यवस्था में अनेकों खामियाँ हैं लेकिन फिर भी हम उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जो बिना बंदूख के इमरजेंसी के बाद इन्दिरा जी को सत्ता से बे-दखल कर देती है। हमारे पास चीन से बेहतर मानवाधिकार हैं और हम रूस से अधिक संगठित है; यह भी सच्चाई है कि बस्तर में नक्सली गतिविधियों में निर्लिप्त ज्यादातर आन्ध्रप्रदेश तथा पडोसी राज्यों के हैं। जिन आदिमों को अपने खीसे में ठुसे नोट की कीमत का भी पता नही उनसे आप मार्क्स और माओ के समझ होने की उम्मीद करती है? नहीं वे नक्सलियों के साथ दिखते हैं चूंकि उनकी कनपट्टी पर बंदूख है। खुद कानू सान्याल जो नक्सली धारा के संस्थापक थे यह मानने लगे थे कि वर्तमान के नक्सली क्रांतिकारी नहीं आतंकवादी हैं। नेहा जी बस्तर में जितने स्कूल उडाये गये हैं और आदिवासी बच्चों को शिक्षा से महरूम किया गया है उनमें से ज्यादातर के कारण माओवादी ही हैं। और एक सवाल आपसे भी कि इन माओवादियों के कारण जो आदिवासियों की संस्कृति और उनके स्वाभाविक अधिकारों का हनन हो रहा है, उसकी खिलाफत कौन करेगा?
 
   
 

sunderlal lohia (lohiasunder2@gmail.com) Mandi ( H.P}.

 
 Violence never wins.It only escalates.It provokes the adversary to resort to higher degree of violence.Therefore Maoists are not going to lose and security forces are not going to win. If our HM is sincere to protect the precious human lives he has to re-draft his line of action.

The only possible line seems to be development with social justice.The present situation is an outcome of linear development brushing aside those who were the natural inheritors of the natural resources.The biggest offensive on Maoism would be to ensure inclusive development in the so far left out areas which is now called "red corridor".
 
   
 

neha () bangalore

 
 rajiv ji , you are not seems to be agree the fact that there are many adverse circumstances behind the naxalites which resulting them into so. i dont think that anyone whose is living a peaceful,liberal and respective life has an ambition to be a decoit or naxalite. by only paying respect to those jawans no one will become the true indian and actual supporter of the tribes.government has lots of policies and want to implement those policies on the cost of common people life , both the jawans and the naxalites are ultimately human . if government actualy want to genuine development there then first step should be fullfilment of their(tribes )fundamental needs . on the cost of exploitation of tribes no industry should be flourish there . if flourish then people like you will call it development and such areas will became great britain.government want to displace those tribes from their natural habitat but where to reestabilish them and how will full their stomach ? harsood -dam displacers are facing problems till now , what is goverment doing ? too much applaud government has collected on testing atom bomb in pokhran but has government everseen the people who are living neerer to pokhran ? what is their condition ? the average age rate is 55 and every 5 th chid is handicapt .what had government did for them?i want a development there for actual development of tribes but not the only profit of industrialist and governement leader theirself. this will not make my tribes happy.  
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 कुमार प्रशांत जी, क्षेत्र के पास अपना नेतृत्व है लेकिन दिल्ली और उसके बाहर से प्रोपोगेंडा करने वालों को उनकी स्वीकार्यता नहीं है। जब इंदीरा जी चुनाव हार गयी थी तब भी बस्तर में मानकू राम सोढी "पंजा छाप" बुलन्द करते रहे।

बस्तर संभाग को तीन जिलों में देखिये और इस सच्चाई को समझिये कि केवल जगदलपुर ही बस्तर नहीं है। बस्तर संभाग केरल राज्य से भी बडा है। महेन्द्र कर्मा का नाम आपने सुना होगा जो सलवा जुडुम आन्दोलन के अग्रणी भी कहे जाते हैं लेकिन उनके खिलाफ प्रोपागेंडा कर के उन्हे "दिल्ली से देश दर्शियों" नें राक्षस बना दिया। बस्तर में अनेकों प्रभावी और सशक्त आदिवासी नेता हैं लेकिन कडवी सच्चाई यह है कि उनकी आवाजें बाहरी लाउडस्पीकरों के कारण बाहर नहीं आती।

सवाल मैं भी उठा सकता हूँ कि हमें महेन्द्र कर्मा, बली राम कश्यप या कुंञाम से अधिक आपको अरुन्धतियों और हिमांशुओं पर भरोसा क्यों होता है? क्या इस लिये कि ये मीडिया के चेहरे हैं यकीन मानें, ये सच की आवाजे नहीं है।

प्रशांत जी मैं आपकी आपत्ति के दूसरे हिस्से से पूर्णत: सहमत हूँ कि हमारी व्यवस्था भी कटघरे में है और सरकार को और ईमानदार होना होगा।
 
   
 

Kumar Prashant , Noida, UP

 
 राजीव जी, बस्तर में आदिवासियों के लिये सलवा जुड़ूम चलाने और नक्सलियों के खिलाफ केवल वही लोग हैं, जो ठेकेदारी कर रहे हैं. सारे ठेकेदार सलवा जुड़ूम के नेता है, उत्तर प्रदेश से आये हुए, बिहार से आये हुये और रींवा से आये हुये.

आप इतनी बड़ी-बड़ी बात करते हैं, आपको इस बात के लिये दुख नहीं होता कि जिस बस्तर की बहुसंख्य आबादी आदिवासियों की है, वहां के मुख्यलायल जगदलपुर में दोनों ही बड़ी राजनीतिक पार्टियों को नेतृत्व के लिये, एमएलए प्रत्याशी के लिये मारवाड़ी और जैन ही मिले ? आपको दुख नहीं होता कि 60 साल में हमारी सरकार उन आदिवासियों को नेतृत्व भी नहीं दिला सकी ?

राजीव भाई, नक्सली गलत कर रहे हैं, इससे किसी को इंकार नहीं है लेकिन हमारी सरकारों ने क्या किया ? अगर हमें नक्सलियों को गलत साबित करना है तो सरकार को और ईमानदार होना पड़ेगा.
 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 नेहा जी "तर्क के अभाव" में गालियाँ ही निकलती हैं और मुझे "सहर्ष" स्वीकार्य हैं।

किस नेचुरल हेबिटाट की बात कर रही हैं आप? आदिवासी और उनके स्वाभाविक जीवन शैली का दुश्मन स्वयं नक्सली आतंकवाद ही है, दूसरी बात बैंगलोर में फैशनेबल जीवन जीने और माओ पर फंतासी भरे लैक्चर देने से आपको गुरेज नहीं लेकिन हमारे अबूझमाड को नंगा देखना आपको भाता है? आदिवासी नंगा क्यों रहे? उसे आगे बढने का अधिकार क्यों नहीं? उसे आप की तरह जीवन जीने की सुविधा और सम्मान क्यों न हासिल हो? लेकिन आप जैसे लोग और नक्सली समर्थक ऐसा होने नहीं देंगे।

किस देश में उसके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं होता। बस्तर में बचेली/किरंदुल को जानने वाले आपको एन.एम.डी.सी से पहले और उसके बाद के सामाजिक आर्थिक स्तर के बाते में बतायेंगे। आदिवासी आगे बढे आपको क्यों मंजूर होगा आपको तो सैनिकों की लाशो पर निर्मम नक्सली स्वीकार्य हैं? जितनी विकास परियोजनायें बस्तर में जान बूझ कर बंद करायी गयी हैं उनमें आप जैसे हवा बनाने वालों का हाथ है और जब परियोजनायें बंद हो जाती है तो आप लोग चिल्लाते हैं कि इलाके में विकास नहीं है इस लिये नक्सलवाद है हद है दोयम दर्जे की दोतरफागिरी की। आप हमारे बोधघाट पर ताला लगवा दें, मावली भाटा को विशाखापट्टनम में लगवा दें, सारे निवेश को बस्तर की सीमा से बाहर करवा दें फिर चिल्लाईये "पिछडे-पिछडॆ"। हाँ नेहा जी हम, हमारी जमीन और हमारे आदिवासी पिछडे हैं लेकिन इसके जिम्मेदार वो लोग भी हैं जिन्हे हमारी मिट्टी मानव संग्रहालय ही ठीक लगती है।

और नेहा जी यह भी समझ लीजिये कि फूलन अगर बीहड में नहीं होती तो कब का गिरफ्तार हो गयी होती. वीरप्पन अगर जंगल में नहीं छिपता तो कब का मारा गया होता और नक्सली जंगल से निकल आयें तो कहीं के नहीं रहेंगे। जंगल आतंकियों की स्वाभाविक पहानगार है और यही बस्तर का दुर्भाग्य है।
 
   
 

neha () bangalore

 
 The true solution of this problem lies only in eradication of domestic termites such as rajeev ranjan prasad .such kind of persons are existing in government and the result is before all .first of all no one want to live such kind of life that has to live in jangle under the arms ,ofcourse this is not living like in great britain ,every one want peaceful life ,foolan devi had no ambition to be a dacoit but its was the circumstances.be liberal and moral dont be selfish .i dont know what kind of development ,government want to gift the tribes after seizing their natural habitat and employment.  
   
 

prashant (viratviplav@gmail.com) dehradun

 
 some politicians think every movement can be solved by guns,but you can never win by guns .its ideology above gun which decided your stand.ADIVASIS are victim of this so called democracy and need justice. 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 माओ नें यह "केटेगोरिकली" कहा था कि बुद्धीजीवी वह बेवकूफ है जिसे सबसे सशक्त हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इस वाक्य के विश्लेषण में कुछ नहीं कहूंगा।

सोनभद्र से बस्तर "द ग्रेट् ब्रिटेन" नजर आता होगा? आन्ध्रप्रदेश और बंगाल से घुस आये आतंकवादी क्रांतिकारी दिखायी पडते हैं (?) और उन्हे "आदिवासी" का लेबल पहना कर देश भर की सहानुभूति बटोरने को कलम पूरी सुविधाभोगिता के साथ चलायी जा सकती है (?)

दो बाते हैं- पहली कि न तो हर नक्सली आदिवासी है और न हर आदिवासी नक्सली। दूसरी- सौ बार झूठ बोल कर उसे सच का जामा तो पहनाया जा सकता है लेकिन यह कडवा झूठ अंतत: समाज का नासूर बन कर रहता है।

आपके लेख में नक्सलवाद समर्थन की बदबू आ रही है। 76 वीर सिपाहियों की शहादत पर भी आपके नपुंसक कलम की बेहयायी इस तरह उजागर होती है तो पत्रकारिता पर से ही विश्वास उठ जाता है। पहली बात कि यह भ्रम देश और समाज में मत फैलाईये कि माओवादी बस्तर जैसे क्षेत्र में इस लिये हैं चूंकि यहाँ विकास नहीं है। सच्चाई है कि वीरप्पन और फूलनदेवी जैसे लुटेरे/डाकू/आतंकवादी/तालिबानी जंगल और बीहड ही पसंद करते रहे और यही कारण है कि बस्तर जैसे घने जंगल नक्सली चूहों के लिये बिल का काम कर रहे हैं। कायरों की तरह छुपे रहो और घात लगा कर बैठे रहो फिर अचानक हमला कर लो, यही इन कायरों की रणनीति है और वसूली इनके जीवन यापन का जरिया। जंगल इन्हे बचाता है और विकास की कोशिश में सरकार जिस भी इंडस्ट्री/संस्थान/उद्योग को लगाने की कोशिश करती है वह इन लोगों की उगाही का जरिया बन जाते हैं। बंदूख जिसकी कनपट्टी पर रख दो वह फर्राटे से फ्रेंच भी बोल सकता है यही कारण है कि जंगल के भीतर डर का माहौल है और जंगल के बाहर अनेकों "देशद्रोही" किस्म के लेखक पत्रकार और बुद्धीजीवी इन आतंकवादियों के पक्ष में माहौल बनाने का काम करते हैं।

हाँ अरुंधति राय की बात तो मत ही कीजिये ऐसे लोग दीमक है और इस देश को खोखला करने में खुले आम अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

बातचीत का माहौल बने लेकिन पहले इन आतंकवादियों की बंदूखे धराशायी करनी जरूरी हैं। कातिलों को अदालत भी फाँसी देता है तो फिर नक्सलवादियों से सहानुभूति किस लिये।

सैनिक और माओवादी दोनों के बीच अंतर करना सीखिये और इस भ्रम/झूठ को फैलाना बंद कर दीजिये कि हर आदिवासी माओवादी है। सिपाहियों को विनम्र श्रद्धांजलि।
 
   
 

राम मुरारी (ram_murari@yahoo.co.in) दिल्ली

 
 मैं इस लेख पर और कोई प्रतिक्रिया न देकर इसी के अंतिम लाइनों को दुहराना चाहता हूं-'हम भूल जाते हैं, चाहे वो सेना का जवान हो या फिर जंगलों में दर-दर भटकता कोई कॉमरेड, दोनों में कोई अंतर नहीं होता. आदिवासी आदिवासी होता है, आदमी आदमी होता है, जीवन जीवन होता है, ये सच सामने रखकर बात करने की आदत में ही समाधान छुपा है. अगर हम ऐसा नहीं करते तो सरकार के गलत-सही निर्णयों पर भी इमानदार विरोध नहीं दर्ज करा पाएंगे और हत्याओं का ये दौर जारी रहेगा.'.... बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाला आलेख है...
 
   
 

arvindpant (arvindpant000@gmail.com) joshimath uttrakhand

 
 दंतेवाड़ा की घटना में मानवता की हत्या हुई है. दुनिया की कोई भी विचारधारा, वाद, सिद्धांत इस तरह की कुकृत्यों का समर्थन नहीं करेगा चाहे वह सेना, पुलिस, अर्धसैनिक बलों की मानवाधिकार विरोधी कार्यवाही हो या इन संगठनों का कुकृत्य हो. क्यों इस प्रकार की स्थितियां उतपन्न हुई हैं, ये जानकर हल निकालने की आवश्यकता है, न कि सिर्फ कहां चूक हुई है.

गृहमंत्री जी, यह केवल कानून व्यवस्था का ही प्रश्न नहीं है बल्कि हमारे संपूर्ण तंत्र में व्याप्त भयंकर बीमारी को बतला रहा है.
 
   
 

mihir goswami (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c. g

 
 बेबाकी एक शब्द भर नहीं है छोटी छोटी मुस्कानों के बीच कभी आप तलाशें तो वहां मिलेगी एक कविता. जब essay पढ़ा था कवि पर गुस्सा आया था पर कल की दुर्घटना के बाद गुस्सा नहीं है. कवि ने सच उज़ागर कर ठीक किया.
मैं कभी नहीं भूलूंगा ये बात कि सच सामने रख कर बात करने की आदत में ही समाधान छुपा है.
 
   
 

vanshika (vanshika@gmail.com) delhi

 
 Chidambaram is in cg on Tv. He is saying, paramilitary forces would be sent, air force could be used. This operation will continue. Whereas MP - Ramesh Bais is saying ab aar paar ki ladai hogi...

Nobody said.....we will talk over the table. Come talk to us. If u r not coming let us to come. In this land of Gandhi, do we need a Gandhi again? Do we need a munna bhai? Or do we need someone in forces in blood relations from these spokesperson's families????

Violence should be stopped at any cost but the equation of bomb for bomb has always failed. It’s very easy to issue bold statements in media. So maintain your dignities Sir.
 
   
 

jenny shabnam new delhi

 
 आवेश जी, दंतेवाड़ा की घटना से पूरा देश स्तब्ध है. देश किसे दिया जाए ये समझते हुए भी हम सभी खामोश हैं. सवाल सिर्फ उनके जीवन और उनकी ज़रूरत का है. जब तक इनकी बुनियादी ज़रूरत पूरी नहीं होंगी, ऐसी विचलित करने वाली घटनाएं होती रहेंगी. बहुत सही लिखा है आपने..

ये कम आश्चर्यजनक नहीं है कि दंतेवाडा की घटना के बाद किसी ने भी ये नहीं कहा कि जैसे-तैसे बातचीत का माहौल तैयार कर अघोषित युद्ध की-सी परिस्थितियां ख़त्म की जानी चाहिए. ये बात कही जाएगी लेकिन तब, जब कल से हत्याओं का दूसरा दौर शुरू हो जायेगा. मानवाधिकार के नाम पर शोर भी बरपने लगेगा.

तथ्यपूर्ण तार्किक आलेख लिखा है आपने.
 
   
 

rahul tripathi rajasthan

 
 खबर में एक गहराई है और विश्लेषण भी. यह लेख इस बात की ओर इशारा करता है कि समस्या में ही समाधान छुपा हुआ है ज़रूरत है तो बस उसे दिल से समझने की. 
   
 

chandrika (chandrika.media@gmail.com) wardha

 
 अच्छा विश्लेषण है. ग्रीन हंट में मारे गए आदिवासियों और माओवादियों के द्वारा मारे गए जवान में कोई फर्क नहीं है सिवाय इसके की अगर आदिवासियों को विस्थापित करने में सरकार कामयाब हुई तो एस्सार और टाटा का फायदा ज़रूर होगा और शायद यही हमारी सरकार है जो लाखों आदिवासियों को इनके लिए विस्थापित कर रही है और इससे वे लड़ रहे हैं जिसमें जवान दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं.  
   
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