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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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हमारी चिंतना

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सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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अपने अरण्य में ‘युद्धबंदी’

एक रिपोर्टर की डायरी

अपने अरण्य में ‘युद्धबंदी’

अक्षय


रायपुर के पंडरी स्थित बस अड्डे से चौबीसों घंटे जगदलपुर और बस्तर के दूसरे हिस्सों के लिए निजी बसें रवाना होती हैं और अमूमन वे भरी होती हैं. रायपुर से दंतेवाड़ा तक का करीब 400 किमी लंबा सफर वाकई बेहद रोमांचक हैं. घने जंगल और पहाड़ियां. कोई एक-डेढ़ दशक पहले तक भी यह सफर रुमानी किस्म का हुआ करता था.

बस्तर


रात 11 बजे के आसपास चलने वाली बसें छह घंटे में जगदलपुर पहुंच जाती थीं और उसके बाद कोई दो-तीन घंटे में दंतेवाड़ा. सीधे बस न मिले तो जगदलपुर से दूसरी बस लेकर दंतेवाड़ा, बचेली और किरंदुल के लिए रवाना हो सकते थे.

रायपुर से चलने वाली ये बसें रात एक बजे के आसपास माकड़ी के ढाबे में रुका करती थीं और उसके बाद शुरू होता था असली सफर. माकड़ी के बाद अक्सर अधिकांश यात्री नींद में डूबने लगते थे और ड्राइवर के कैबिन में लगे टेप रिकार्डर पर 70 के दशक के मुकेश और किशोर कुमार के गाने बजने लगते थे. इन गानों के साथ बस भी लय में आ जाती और जंगलों और पहाड़ियों से गुजरते हुए बाकी का सफर कैसे पूरा होता था, पता नहीं चलता था.

यह बस्तर आज अपनी खूबसूरती के कारण नहीं बल्कि दंतेवाड़ा में हुए माओवादी हमले के लए सुर्खियों में है. उसकी खूबसूरत वादियों में अब शायद मुकेश और किशोर के गीत नहीं बजते. अब तो नगरनार, चितंलनार, लोहांडीगुड़ा, गीदम और सुकमा के जंगली रास्तों से वनों से लौटते हुए आदिवासियों के मांदर की थाप भी नहीं सुनाई देती.

उन रास्तों में अब बंदूकें गरज रही हैं और आदिवासी अपने जंगल में ही बेगाने हो गए हैं. वे एक ऐसे “युद्ध” के “बंदी” बन गए हैं जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह उनके हक के लिए लड़ा जा रहा है.

रायपुर से ये निजी बसें आज भी बस्तर के लिए रवाना होती हैं. निजी कंपनियों की बसें इसलिए क्योंकि मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ में घाटे के बोझ तले दबे राज्य परिवहन निगम को बंद कर दिया गया. लिहाजा पूरे छत्तीसगढ़ में सड़क परिवहन निजी आपरेटरों के हाथ में है और सड़क मार्ग ही क्यों बस्तर में विकास की जिस धारा को जोड़ने की बात की जा रही है. दरअसल वह भी निजी रास्तों से होकर गुजरनी है.

यह वह रास्ता है, जहां से होकर टाटा और एस्सार जैसे निजी क्षेत्र के दिग्गज बस्तर में अपने इस्पात संयंत्र लगाने जा रहे हैं. यह वह रास्ता है जिससे होकर इस्पात पुरुष लक्ष्मी मित्तल ने भी बैलाडीला की सबसे उम्दा खदान को खरीदने की कोशिश की थी और वह कोशिश अब भी जारी है. यह वह रास्ता है, जहां से होकर मावलीभाठा के आदिवासियों को बेदखल कर निजी क्षेत्र का एक बड़ा इस्पात संयंत्र बनाने की कोशिश नाकाम कर दी गई थी.

हैरत नहीं होनी चाहिए कि रायपुर बल्कि कई बार सीधे जगदलपुर तक हवाई रास्ते से आने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी भी इस युद्ध को जायज ठहरा रहे हैं.


वहां एक दूसरा रास्ता भी है. तकरीबन तीन दशक पहले जिससे होकर क्रांति का रुमानी सपना लिए नक्सलियों ने यहां पनाह ली थी. मगर उनके सपनों में जो बस्तर था, वह सदियों से यहां रह रहे आदिवासियों के सपने से बिल्कुल अलग था.

आदिवासी तो जंगल में ही रह रहे थे. जंगल उनका घर था, जंगल उनका जीवन था. वे तबसे यहां रह रहे हैं जब कानून ने उनके लिए कोई भौगोलिक सीमा तय नहीं की थी. नक्सलियों ने उन्हें बताया कि ये सीमाएं तय करने वाले तुम्हारे दुश्मन हैं. वे लोग जो तुम्हारी वनोपज औने-पौने दाम में ले जाते हैं, वह तुम्हारे वर्ग शत्रु हैं. हालांकि आदिवासियों के शब्दकोष के लिए ये सारे शब्द नए थे. मगर धीरे-धीरे ये शब्द जंगल के शब्दकोष में इस तरह मिल गए कि बाहरी दुनिया आदिवासियों को ही नक्सली समझने लगी.

मगर कानूनों और ठेकेदारियों और लूट के खिलाफ आदिवासियों का भरोसा जीतने वाले नक्सलियों ने एक दिन अपना कानून बना डाला. अपनी सरकार बना डाली. अपनी ठेकेदारी शुरू कर दी. और एक दिन अपनी भौगोलिक सीमा भी तय कर दी.

इस तरह जंगल में दो कानून बन गए. दो-दो भौगोलिक सीमाएं बन गईं. और बीच में आदिवासी. अब न जल उनका रहा न जमीन और न जंगल. बस्तर के मौजूदा हालात को इस नजरिए से देखने की जरूरत है.

दंतेवाड़ा में छह अप्रैल को सीआरपीएफ पर हुए माओवादी हमले ने यदि पुलिस वाले और उनके परिजनों के बाद किसी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है तो वे आदिवासी ही हैं. मुश्किल यह है कि करीब पांच साल पहले शुरू किए गए सलवा जुड़ूम से भी आदिवासियों को ही सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है.

आदिवासी आज दो तरह के अतिवादी विचारों के निशाने पर हैं. दोनों ओर बंदूकें हैं. दोनों युद्ध को आमादा हैं. और हैरत नहीं होनी चाहिए कि रायपुर बल्कि कई बार सीधे जगदलपुर तक हवाई रास्ते से आने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी भी इस युद्ध को जायज ठहरा रहे हैं. फर्क बस इतना है कि इनमें से कुछ सरकार के साथ हैं तो कुछ माओवादियों के. कोई भी आदिवासियों के साथ नहीं है.

माओवादियों के ताजा हमले के बाद यह युद्धोमांद बढ़ गया है. दिल्ली में टीवी चैनलों के स्टुडियो में बैठकर बहस करने वाले नहीं जानते कि यह युद्ध कौन किसके खिलाफ लड़ेगा. सीधी सैन्य कार्रवाई की वकालत करने वालों को पता नहीं है कि युद्ध अपने लोगों से नहीं लड़ा जाता. इसमें अपने ही मारे जाते हैं. वे सीआरपीएफ के जवान भी हो सकते हैं और आदिवासी भी.

फिलहाल बस्तर जाना स्थगित क्योंकि वहां के रास्तों में महुआ और तेंदू के बजाए बारूद की गंध उड़ रही है.

12.04.2010, 08.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vinod dongre (vinodharibhoomi@gmail.com) raipur

 
 अक्षय जी, कल और आज के बस्तर की तुलना काफी अच्छा लगी. आपके इस लेख पर अजित शर्मा जी और सनत जी ने भी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं. उनकी प्रतिक्रियाओं में प्रश्न भी निहित हैं. अपेक्षा है कि आपके अगले लेख में उन प्रश्नों का उत्तर शामिल होगा. शुभकामनाएं. 
   
 

PRAVIN PATEL (tribalwelfare@gmail.com) BILASPUR

 
 I congratulate Akshay for his expressing his frank opinion and candid views through this article.

Those who can not digest free and fair opinion and biased with the imaginary thoughts of Development through industrialization, need to look back to see how disastrous it has proved for the tribals!

To be with tribals, best thing is to leave them alone on their own, they know much better, what is good and what is bad for them. They do not need Maoists nor they need security forces who are behind their blood. Brokers should keep away from tribals habitats and stop preaching what is good and what is bad.
 
   
 

ajeet sharma () raipur

 
 अक्षय जी, बस्तर को केवल बस्तर में रहकर समझा जा सकता है. आज वहां के हालात कैसे हैं, आगे क्या होगा आदिवासी बंधुओं को ? उनका भविष्य अंधकार में लग रहा है, आगे कुँआ है पीछे गहरी खाई है. आखिर वे जाएं तो जाएं किस ओर ? नक्सल समस्या का स्थाई समाधान जब तक नहीं निकलता जंगल में ये बेचारे खून के घूट पीकर ही जीवित रहेंगे, यही इनकी नियती है और मजबूरी भी.

आप सिर्फ लिख सकते हैं, मैं सिर्फ पढ़ सकता हूं लेकिन अनुभव तो जंगल का आदिवासी ही करता है, ऐसे में मन बहलाने से क्या लाभ ? छत्तीसगढ़ को रिज़ल्ट चाहिए रिज़ल्ट, बस और कुछ नहीं. अगर वह नहीं दे सकते तो, तो ऐसे लेखन का कोई मतलब भी नहीं जनाब.
 
   
 

sanat (sanmatijdp@gmail.com) jagdalpur

 
 आप अपना ये प्रवचन दे कर क्या जताना चाह रहे हैं ? समस्या को बढ़ा चढ़ा कर तोड़ मरोड़कर और अपना जहर मिलकर आप प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं ? सच्चे हिमायती हैं तो उपाय बताइए.आदिवासियों के साथ होने के लिए कैसा सबूत पेश करना होगा जरा हमें भी समझाइए ? अगर सरकार कारखानों की बात करती है तो उसे उस कंपनी का दलाल कहते है माना की सरकार दलाली भी कर रही है तो भी कम से कम आज की जरूरत विकास ही है. एक ही शहर में एक ही राज्य में एक ही देश में एक संस्कृति की रक्षा के नाम पर नंगा रखना और खुद के लिए महल बनवाना ! ये कहा का न्याय है. 
   
 

bhawani shankar (bhsh77@gmail.com)

 
 ये जो तीसरी तस्वीर है, ये कोई नहीं खिंचता क्योंकि यह इन दोनों राज्यों से अलग और सच्ची है. इससे कुछ लोग इस तरह की तस्वीर खिंचने की कोशिश करेंगे, उम्मीद है. 
   
 

Avinash , New Delhi

 
 एक सच्चा विश्लेषण आपने किया है. आपकी आंखों से कल और आज के बस्तर को देख गया. 
   
 

Sanjeev Kumar , Narayanpur, Bastar

 
 अक्षय भाई, आपने रुला दिया. जास बस्तर में हम लोग पले-बढ़े, अब वो बस्तर नहीं बचा. इसे राजनीतिज्ञों ने खत्म कर दिया. 
   
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