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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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बायोस्कोप आया रे

मुद्दा

 

बाइस्कोप आया रे

पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर, भुवनेश्वर, ओडिशा से

 


" मुर्गे की लड़ाई के लिए बाप ने बेटी की साइकिल बेच दी. "

यह किसी अख़बार की कोई महत्वपूर्ण खबर नहीं है बल्कि एक पेपर के टुकड़े में छपी एक स्कूली छात्रा की सूचना है जो ओडिशा के केंदुझार जिले के सिलिदा गाँव में लगे सुझाव बक्से में जमा मिली है.

ओडिशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों के साप्ताहिक बाज़ारों में मुर्गा लड़ाने का चलन है. जहाँ लोग अपना मुर्गा लेकर आते हैं और लड़ाई में हिस्सा लेते हैं और देखने वाले भी किसी एक मुर्गे पर अपना दांव लगाते हैं. इस तरह से यह एक प्रकार का जुआ है, जिसमें लोग सैंकड़ों रुपये हारते-जीतते हैं.

school kids in kandhamal

इन इलाकों में मुर्गा लड़ाई के खेल के प्रति इतनी दीवानगी है कि ऐसे ही किसी एक मुकाबले में दांव लगाने के लिए पिता ने अपनी बेटी की उस साइकिल को भी बेच दिया जिस से वह पढ़ने के लिए गाँव से काफी दूर स्थित अपने स्कूल जाती थी.

अगर आप सुझाव बक्से की इस सूचना का विश्लेषण करते हैं, तो आप इस ग्रामीण बालिका की विवशता का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

''`सेव द चिल्ड्रेन" संस्था की सहायता से मूलभूत सुविधाओं से वंचित बच्चों के लिए काम करनेवाली स्वयंसेवी संस्था ''पिकॉक" की ओर से गांव में एक सुझाव बक्सा लगाया गया है. यह सुझाव बक्से इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि अब छात्र और छात्राओं के अलावा गाँव के लोग भी इस सुझाव बक्से में गाँव की समस्याओं के बारे में अपनी राय देते हैं, इस तरह से यह सुझाव बक्सा बच्चों से लेकर बड़ों तक सब के लिए आवाज़ बक्सा बन गया है.

उस बक्से में पाई गईं कुछ और मासूम परन्तु शोचनीय ग्रामीण परिस्थिति पर प्रकाश डालती सूचनाएं और शिकायतें इस प्रकार हैं.

" मध्यान्ह भोजन में शिक्षक ने मुझे आधा अंडा दिया इसीलिए मैंने नहीं खाया. "

"लड़कियों की तरह लड़कों को भी स्कूल ड्रेस मिलने चाहिए" (गौरतलब है कि राज्य में सिर्फ आदिवासी लड़कियों को स्कूल ड्रेस दिया जाता है)

"हमारे स्कूल में खिलौने नहीं हैं खेलने के लिए, हमें एक फुटबाल दिया जाता तो अच्छा होता"

"स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद अगर कोई बच्चा गेट के पास गिर जाता है तो उसे उठाने की जिम्मेदारी शिक्षक की है या नहीं? अगर है तो वह अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाते?"

"हमारे स्कूल में कम शिक्षक हैं, और शिक्षक दिए जाने चाहिए."

"स्कूल में अच्छी पढ़ाई नहीं हो रही है इसलिए बच्चे उस क्लास की पढाई में पीछे हैं."

"जो छात्र स्कूल के नियम नहीं मानते हैं उन्हें दंड दिया जाना चाहिए."

"हमारी सातवीं कक्षा को छोड़ सभी कक्षाओं में फोटो टंगे हैं, हमारी कक्षा में भी टांगने चाहिए."

इस तरह के सुझाव और शिकायतें सिर्फ केंदुझार जिले तक सीमित नहीं है. कंधमाल जिले के कलिंगा पंचायत के डूबरिपारी यु पी स्कूल में मिले सुझाव और शिकायत भी कुछ इस प्रकार हैं.

"हमारे स्कूल के छत की टीन ख़राब हो गया है और बारिश के दिनों में उस से पानी टपक रहा है, उसे बदला जाए."

"हमारे स्कूल में ट्यूबवेल नहीं है और हमारा पैखाना ख़राब हो चुका है"

"हमारे स्कूल में दिया जा रहा मध्याहन्न भोजन ठीक नहीं है. जो दाल दी जाती हैं वह बहुत ख़राब रहती है. भोजन के साथ सब्जी भी दी जानी चाहिए."

"हमें भोजन में कम चावल दिए जा रहे हैं"

"गणित के बदले हमें साहित्य पढाई जानी चाहिए"

"कुछ बच्चे हमारे पेन और पेंसिलें चुरा लेते हैं."

"हमें खेलने के लिए एक मैदान चाहिए."

कंधमाल जिले में सुविधाओं और अधिकारों से वंचित इन बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था ''आईना'' के अधिकारी दिलीप का कहना है कि "इन सुझावों पर गाँव की स्कूल कमेटी में चर्चा की जाती है और उन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास भी किया जाता है."

कंधमाल, केंदुझार, कोरापुट और सोनपुर जैसे पिछड़े जिलों में अब भी ऐसे कई इलाके हैं जहाँ जंगलों पहाड़ों के बीच गाँव बसे हैं और यातायात के साधन नहीं हैं. जहाँ स्कूल तो हैं पर, शिक्षक या तो आते नहीं और आते भी हैं तो नियमित नहीं.

सुझाव पेटियां अब बच्चों और ग्रामीणों के लिए आवाज़ बुलंद करने का एक माध्यम बन गई हैं.  ये सुझाव बक्से समस्याओं को जमा तो कर रहें हैं, पर उन्हें कितना सुलझा पा रहे हैं, ये कहना मुश्किल होगा.

ऐसा ही एक गाँव हैं कंधमाल जिले के रतिंगिया पंचायत में डोडापड़ा. वहाँ के बच्चों का कहना है की उनके स्कूल के शिक्षक दिन में ११ बजे आते हैं और एक बजे वापस चले जाते हैं. बच्चों को काफी समय इंतजार करना पड़ता है, स्कूल में पढाई भी ठीक से नहीं हो रही है.

कुछ ऐसी ही स्थिति सोनपुर जिले के जम्खोल गाँव की भी है. जहां के बच्चों का कहना है कि उनके स्कूल में ५ कक्षाओं के लिए एक कमरा और एक ही शिक्षक हैं. शिक्षक नियमित नहीं आते, और आते भी हैं तो शराब पीकर के आते हैं और ठीक से पढ़ाते नहीं हैं. इन बातों से बच्चों के साथ-साथ माँ बाप भी परेशांन हैं पर मजबूरी है की वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं. सोनपुर में काम कर रहे, '' रेयर'' संस्था के राहुल कहना है की स्थिति पहले से बेहतर है पर हालात कई जगह जस के तस हैं.

कोरापुट जिले के खगदारा गाँव में स्कूल तो 1971 से हैं पर शिक्षक आते नहीं थे, यहाँ तक की 26 जनवरी को इस स्कूल में झंडा भी नहीं फहराया जाता है. इस साल यह बात मीडिया में जाने के बाद एक शिक्षक को निलंबित कर दिया गया, और उसके बदले जो आ रहे हैं उनका कहना है कि वे हफ्ते में सिर्फ 3 दिन ही आयेंगे, ऐसा गाँव स्कूल कमिटी ने कहा है .

यह सुझाव पेटी अब बच्चों और ग्रामीणों के लिए आवाज बुलंद करने का एक माध्यम बन गई है. जिनसे मिलने वाले सुझाव एवं समस्याओं को मिल बैठकर ग्रामीणों द्वारा सुलझाने की कोशिश की जाती है. गाँवों में लगे ये सुझाव बक्से समस्याओं को जमा तो कर रहें हैं, पर उन्हें कितना सुलझा पा रहे हैं, ये कहना मुश्किल होगा. पर उन समस्याओं को जिनकी कल्पना भी शहरी दिमाग नहीं कर सकता है, कम से कम उन्हें सामने तो ला रहे हैं.

11.05.2010, 21.01 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

रणवीर चाहल रायपुर

 
 भारत के आदिवासी बहुल इलाकों में शिक्षा और समाज के हालात बयान करती, बहुत ही अच्छी रिपोर्ट. सुझाव बक्सों जैसे बायोस्कोप हमें न सिर्फ ग्रामीण समाज का आईना दिखा रहे हैं बल्कि स्थिति में सुधार लाने के लिए बहस का मौका भी दे रहे हैं. लेखक का अच्छा प्रयास. 
   
 

रंगनाथ सिंह (rangnathsingh@gmail) नई दिल्ली

 
 रविवार बधाई का पात्र है ऐसी रिपोर्टें लगाने के लिए। शानदार। 
   
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