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बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

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कमाठीपुरा की गलियों से

मुद्दा

कमाठीपुरा की गलियों से

शिरीष खरे, मुंबई से

 

यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.

सेक्स वर्कर


अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?

यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.

आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.

कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.

बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.

कतरा-कतरा ज़िंदगी
मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.

इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.

यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.

आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.

आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.

हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...

पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

raghvendra singh (sudhainfosis.auster@gmail.com) gorakhpur

 
 हेल्लो फ्रेंड, बहुत ही दर्द भरी है. मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि हमारे भारत में ऐसा सब कुछ चल रहा है. मैं इस टॉपिक की बहुत ही इज्ज़त करता हूं. लास्ट की लाइन मेरे दिल को छू गयी. 
   
 

fatan (gclalwani_adv@yahoo.com)

 
 दर्द का समंदर उंडेल दिया आपने 12-16 की उम्र्र की बचियों के साथ वो सब वहशियाना हरकत के अलावा क्या कहा जा सकता है. बस सुन्न कर कान पर हाँथ धर लीजिए के इंसान नाम का जानवर भी इस दुनिया में सबसे खतरनाक जीव है, चाहे कत्ल हो या इज्ज़त आबरू सब में उससे ज्यादा बेदर्दी कोई नहीं. 
   
 

kavita indore

 
 बहुत संवेदनशील मार्मिक रिपोर्ट. शिरीष, मुझे नहीं लगता कि इस विषय पर इससे ज्यादा अच्छे से कोई रिपोर्ट लिखी जा सकती है. बिना भावुक हुये, बिना कोई तर्क कुतर्क दिये, बिना किसी बात को सही या गलत ठहराते हुये जिस तरीके से पूरा परिदृश्य खिंचा है, वाकई आप तारीफ के हकदार हैं. सच में, रिपोर्ट की अंतिम पंक्तियां मन को छू गईं. 
   
 

rakesh malviya (rakeshjournalist@gmail.com) bhopal

 
 बेहद खुबसूरत अभिव्यक्ति.  
   
 

पशुपति शर्मा (pashupati15@rediffmail.com) दिल्ली

 
 शिरीष की इस लेखनी का क्या कहना? वाकई कुछ पलों के लिए खामोश और सुन्न कर देने वाली अभिव्यक्ति है। सवाल न उठाने की कला के साथ भी तमाम सवाल छोड़ गया शिरीष। कमाठीपुरा की गलियों से एक बेहतरीन रिपोर्ट। 
   
 

Beena (beenapandey927@gmail.com) Lucknow

 
 कितना दर्द छिपा होता है किसी कि मुस्कान के पीछे, कोई इस लेख को पढ़ने के बाद आसानी से महसूस कर सकता है. वाकई बेजोड़ अभिव्यक्ति है. साथ ही समाज के मुँह पर करारा तमाचा भी. 
   
 

naina (naina.kalse@gmail.com) mumbai

 
 दिल को छुआ और रेडलाईट एरिया का आँखो देखा दृश्य खींचा पाया.  
   
 

sanjay rokade (sktheindianama@gmail.com) indore

 
 खरे भाई का ये सच भारतीय समाज के मुँह पर एक तमाचा है. यूं ही कोई अपना शरीर नहीं बेचता है. शरीर बेचना वाली महिलाओं की सच्चाई को जाने बिना उनके उत्थान में उठाया गया हर कदम बेइमान साबित होगा. इस दर्द को क्या नाम दूं समझ नहीं आता. 
   
 

वशिष्‍ठ याज्ञवल्‍क्‍य (yagnyawalky@gmail.com) अंबिकापूर छत्‍तीसगढ

 
 बहूत कम ऐसा होता है जबकि शब्‍द मूक हो जाएं. मैं पेशे से पत्रकार हूं, शब्‍दों से खेलना ही मूझे वरिष्‍ठों ने सिखाया है लेकिन इस आलेख को पढने के बाद मेरे पास अभिव्‍यक्‍ित के लिए शब्‍द नहीं है. आपके लेख की सबसे अंतिम पंक्‍ित सबसे मारक मर्मस्‍पर्शी और कभी नहीं भूलने वाली है  
   
 

Vishal Mankere (vishal.mankere@icicilombard.com) Mumbai

 
 Due to corruption which is happening from down level to up levels families are suffering from money problem & to fill it, family members like Girls are selling their body. I really appreciate Mr Shirish Khare for this article. 
   
 

एम. अखलाक (analhaque2002@yahoo.co.in) म

 
 मित्र, तुम्‍हारी रपट पढ़कर मैंने दोबारा कमाठीपुरा देख लिया। कमाठीपुरा को कुछ साल पहले मैं भी देखने गया था। लेकिन ऐसा लिख नहीं सका, इसका मुझे अफसोस रहेगा। वाकई तुमने सलीके से दर्द उकेरा है। रपट का अंतिम पैरा दिल को टच कर गया।  
   
 

pushyamitra (pushymitr@gmail.com) bhagalpur

 
 जबरदस्त जानदार.  
   
 

रंगनाथ सिंह नई दिल्ली

 
 अतिसंवदेनशील रिपोर्ट।  
   
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