लाल्टू की दस कविताएं
साहित्य
लाल्टू की दस कविताएं
छुट्टी का दिन
गर्म दाल चावल खाने की
प्रबल इच्छा उँगलियों से चलकर होंठों से होती हुई शरीर के सभी तंत्रों में फैलती
है.
यह उसकी मौत का दिन है.
एक साधारण दिन जब खिड़की से कहीं बाल्टी में पानी भरे जाने की आवाज आ रही है.
सड़क पर गाडियों की तादाद और दिनों से कम है कि याद आ जाए यह छुट्टी का दिन है.
हर सुबह रेत बनता प्राण
हर सुबह उठते ही जब सोचता हूँ कि कपड़ा ठीक से पहन लूँ कि बाई चांस कोई
खिड़की से देख न ले,
अखबार धड़ाम से आ जताता है कि कहीं कोई फिर चीखा है कोई गरजा है
कि मनुष्य जंगली जानवर है
अब पूछते हो शाम होते ही मैं कहीं छिपा क्यों होता हूँ
जो देखता हूँ मस्तिष्क के किन दरवाजों में जा बसता है
जो सोचता हूँ वह रुक जाता है किसी और दरवाजे पर
यूँ मकसद बनता है चमकीले दृश्यों का
बार बार यही देख रहा धरती के कोनों से आई चीखों में
इसी बीच सुनता हूँ पक्षियों का कलरव
हाइवे पर दौड़ती गाड़ियों की साँ साँ
समय का शून्य भरता है इस तरह
बदलता है कुछ एक पल और दूसरे पल के दरमियान
चलता रहता हूँ एक जगह पर थमा हुआ
अंजान लोगों को दुःख बाँटता हुआ
मैं कैसे किसी को रोक लूँ
कि वह दुःखों की चादर न ओढ़ ले
मैं स्वयं दुःखों का सागर हूँ
उत्ताल तरंगों में दुःखों के छींटें बिखेरता हूँ
अंतहीन तटों में कण कण बरसता है दुःख
रेत बनता प्राण
बार बार मुझसे गीला होता हुआ.
वह औरत रोक रही है उसे
खिड़की खोलता हूँ
देखता है मोर गर्दन टेढ़ी कर
चीखता जोर से
मोदी को फाँसी दो
हम हिसाब लगाते हैं
नहीं हिटलर मोदी से भी बुरा था
हम जेबें टटोलते हैं
मोदी की वजह से मालोमाल होते हैं
यह तो वही जानता है
जो मोदी के खेल में खो गया है
कि एक मोदी की कीमत कितनी भयानक है
कि एक ऐसा हिसाब है यह
जो कभी पूरी तरह हल नहीं होता
खुली खिड़की के पार मोर
कहीं दूर चला गया है
कहीं दूर जहाँ एक औरत
आज तक ढूँढ रही है
बहुत पहले खो गया पति का चेहरा
सुनो वह औरत रोक रही है उसे
जो मोदी के साथ खेलने निकला है.
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हर क्षण
हर क्षण एक संवाद मेरे लिए इंतज़ार करता है
हर क्षण एक सपना जीता है एक सपना मरता है
हर क्षण एक क्षण की हत्या करता हूँ
हर क्षण एक हत्यारे पर कविता लिखता हूँ
हर क्षण जानता हूँ
प्यार की तरह नफरत भी है इंसान की फितरत
हर क्षण यूँ एक साधारण क्षण बनता हूँ.
जंग किसी के लिए वांछनीय नहीं होती
जंग किसी के लिए वांछनीय नहीं होती
जंग में मरते हैं अनगिनत सपने
जंग में मरते हैं हाथी घोड़ा पालकी
जंग छिड़ती है तो आस्मान काला हो जाता है
हैं झूठ जो कथाएँ सुनीं तलवार और ढाल की
ओ जंगखोरो, तुम कितना मुनाफा चाहते हो
गया जमाना कि जादू चला जाए तुम्हारा बयान
लोग डरते हैं पर जानते हैं सारा सच
इसलिए करते हैं विरोध बार बार
लाचार सुन अंतरात्मा की तड़प
इसलिए ऐ आस्मानी चित्त वालो
बैठ जाओ, मरना तुन्हें भी है एक दिन
मत मरवाओ इतने लोगों को
बढ़ाओ न मुनाफा तुम लाशें गिन गिन।
लौट कर लिखनी थी कविता जो
यह जो जंग छिड़ी है छत्तीसगढ़ काश्मीर या पाकिस्तान में
इस जंग में कौन सा ईश्वर लड़ रहा किस ईश्वर के खिलाफ
एक ईश्वर जो चेहरा नहीं दिखाता
एक ईश्वर जो कपड़े नहीं उतारता
एक ईश्वर जिसके बारे में दावा किया गया है कि
वह हुसैन से नाखुश घूम रहा है
चलो शामिल हों पुरजोर ईश्वरवादी बहसों में
और मूँद लें आँखें इस आँकड़ें से कि
तैंतीस करोड़ धन चार या पाँच ईश्वरों वाले इस मुल्क में
इससे भी ज्यादा तादाद में लोग हैं भुखमरी के शिकार
दो सौ की दारू की बोतल खरीद घर वापस चलते डाँटें
रिक्शा वाले को कि वह दो रुपए ज्यादा क्यों माँगता है
नाराज़ हों कि साले मूड बिगाड़ देते हैं और गड़बड़ा देते हैं
लौट कर लिखनी थी कविता जो पोलैंड या स्वीडेन के कवियों के तर्ज़ पर।
लंबी कविता
जीवन।
छोटी कविता
जीवन।
मुक्तछंद कविता
जीवन।
छंदबद्ध कविता
जीवन।
17.05.2010, 00.55 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित