जन की जाति गणना
मुद्दा
जन की जाति गणना
डॉ. असगर अली इंजीनियर
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद को आश्वस्त किया है कि वर्तमान में जारी
जनगणना में जाति को शामिल किया जाएगा. यादव नेताओं और पिछड़े वर्गों के अन्य नेताओं
द्वारा जोरदार ढंग से इस मांग को संसद में उठाने और इस मुद्दे पर तीखी बहस के बाद
प्रधानमंत्री ने यह आश्वासन दिया.
प्रश्न यह है कि भारत के नागरिकों की गिनती करते समय, उनकी जाति का पता लगाना क्या
आवश्यक है? जाति के अलावा, धर्म को भी जनगणना के फार्म में स्थान न देने से
अल्पसंख्यकों के मानस में कई तरह की आशंकाएं उत्पन्न हो गई हैं. राज्य सभा सदस्य और
मुस्लिम नेता मौलाना मदनी ने यह धमकी दी है कि अगर नागरिकों के धर्म को जनगणना में
स्थान नहीं दिया गया तो वे आंदोलन करेंगे.
ये दोनों ही मुद्दे अत्यंत विवादास्पद हैं. कुछ लोगों का मानना है कि धर्म और
जाति-दोनों को जनगणना की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए. ये दोनों देश
को बांटने वाले वर्गीकरण हैं और सभी नागरिकों को केवल भारतीय मानकर उनकी गिनती की
जानी चाहिए. केवल अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों की अलग से
गणना की जानी चाहिए क्योंकि उनके लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था है. ज्ञातव्य
है कि भारत में आखिरी बार जाति-आधारित जनगणना, ब्रिटिश राज में सन् 1931 में की गई
थी.
स्वतंत्र भारत के संविधान में जाति का उन्मूलन कर दिया गया और इसलिए बाद की
जनगणनाओं में जाति को कोई स्थान नहीं दिया गया. सन् 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह
द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के निर्णय के बाद, जनसंख्या के जातिगत
वर्गीकरण का प्रश्न फिर उठा. देश में पिछड़े वर्गों की जनसंख्या के बारे में गंभीर
मतभेद थे. मंडल आयोग 1931 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर, इस निष्कर्ष पर पहुंचा
कि पिछड़े वर्ग, देश की कुल आबादी का 52 प्रतिशत हैं. अपने एक निर्णय में, उच्चतम
न्यायालय ने कहा कि जाति-आधारित जनगणना के अभाव में, मंडल आयोग की 52 प्रतिशत के
आंकड़ें की सत्यता संदेह से परे नहीं है.
सच का सामना
सबसे पहले हम जातिगत जनगणना के औचित्य या अनौचित्य पर विचार करें. यह सही है कि
धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में जाति के लिए कोई स्थान नहीं है और भारत में जाति प्रथा
का उन्मूलन आवश्यक है. हमारे संविधान-निर्माताओं ने जाति को संविधान में कोई स्थान
न देकर बिल्कुल ठीक किया. परंतु यथार्थ क्या है? जमीनी हकीकत क्या है? यथार्थ यह है
कि हमारा समाज अनेक वर्गों और श्रेणियों में विभाजित है. हमारा देश कई संस्कृतियों
व धर्मों वाला देश है. इस यथार्थ से हमारा प्रतिदिन वास्ता पड़ता है. इस सामाजिक
विभाजन और ऊँच-नीच में जरा भी कमी नहीं आई है. उल्टे, इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई है.
अंतर्जातीय विवाहों का अंत हत्याओं में होता है और प्रेमी जोड़े अक्सर अपने
माता-पिता और परिजनों के हाथों मारे जाते हैं. आज भी दलित, गांव के कुएं से पानी
नहीं ले सकते. सरपंच बनने के लिए चुनाव लड़ने का “दुस्साहस“ करने वाले नीची जाति के
सदस्य को अपनी जान गंवानी पड़ती है. ऊँची जातियों के सदस्यों के लिए उनकी जाति पहचान
ही नहीं बल्कि शान का चिन्ह है. जैसे-जैसे नीची जातियों के सदस्यों की माली हालत और
खराब हो रही है, जैसे-जैसे देश में आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे ऊँची
जातियों का अहंकार और बढ़ रहा है.
हमारे देश में चुनाव भी जातिगत आधार पर लड़े जाते हैं. चुनावों में जाति और
साम्प्रदायिकता के कार्ड जम कर खेले जाते हैं. यहां तक कि टिकिट भी जाति के आधार पर
बांटे जाते हैं. कुछ समय पहले तक जो लोग अपनी उपजाति का नाम तक नहीं जानते थे, वे
भी अब अपनी उपजाति के आधार पर अपने समुदाय के लिए टिकिट मांगने लगे हैं. राजस्थान
के गुज्जरों का उदाहरण हम सबके सामने है. सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिए जाने की
मांग को लेकर गुज्जरों ने हिंसक आंदोलन चलाया, जिसमें चालीस से अधिक लोगों ने अपनी
जान गंवाई. राजस्थान में मीणाओं और गुज्जरों के बीच हिंसक झड़पें हुईं क्योंकि मीणा
जाति के लोगों को अपने अनुसूचित जनजाति के दर्जे के कारण अधिक सरकारी नौकरियां मिल
रही थीं.
हमारे समाज में जातिगत ऊँच-नीच और विभाजन लंबे समय तक बना रहने वाला है. हम
शुतुरमुर्गों की तरह, अपने सिर ऐसे गैर-यथार्थवादी आदर्शों की रेत में छुपा सकते
हैं, जिन आदर्शों की हम दिन-रात अवहेलना करते हैं, परंतु इससे कोई फायदा नहीं होगा.
हमारी संस्कृति ही जाति की संस्कृति है और इसे हमारी सामूहिक सोच, सामाजिक
प्रतिष्ठा के हमारे मानदंड और सबसे बढ़कर, हमारी राजनीति और मजबूत बना रही है. हमारे
संविधान द्वारा जाति व्यवस्था को खारिज कर दिए जाने के बावजूद, पिछले साठ सालों में
हमारी सरकारों ने एक भी ऐसा ठोस कदम नहीं उठाया जिससे जाति प्रथा खत्म होना तो दूर,
जरा सी कमजोर भी हुई हो. मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्णय, यद्यपि
तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में उचित और अपरिहार्य था, तथापि इससे हमारे समाज
पर जाति प्रथा की पकड़ और मजबूत हुई है.
मुद्दा आरक्षण का
इन सभी तथ्यों के मद्देनजर, जनगणना में जाति को शामिल न करना, सामाजिक-राजनैतिक
यथार्थ से मुंह मोड़ना होगा. इससे हम देश में पिछड़े वर्गों की ठीक-ठीक संख्या भी पता
लग सकेंगे यद्यपि यह काम आसान नहीं होगा, क्योंकि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में एक
ही जाति की अलग-अलग सामाजिक स्थिति है. परंतु पिछड़े वर्गों की गिनती तो हमें करनी
ही चाहिए.
अगर, जैसा कि दावा किया जा रहा है, पिछड़े वर्गों का आबादी में हिस्सा 52 प्रतिशत से
अधिक है तो आरक्षण पर वर्तमान में लागू 50 प्रतिशत की उच्चतम सीमा पर पुनर्विचार
करना होगा. यह सीमा उच्चतम न्यायलय ने लगाई है परंतु इसके बाद भी कई दक्षिणी
राज्यों में आरक्षण 69 प्रतिशत तक पहुंच गया है. जातिगत जनगणना न करना, न केवल
सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा वरन् इससे समस्याएं बढ़ेंगी ही.
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हमारी राजनैतिक संस्कृति हमारे सामाजिक विरोधाभासों को बढ़ा रही है. हम समानता पर
आधारित समाज की रचना करना चाहते हैं परंतु जाति प्रथा इसके आड़े आ रही है. विडंबना
यह है कि समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए भी हमें जाति व्यवस्था के
अस्तित्व को स्वीकार करना होगा क्योंकि तभी हम पिछड़ी जातियों को अगड़ों के समकक्ष ला
सकेंगे. और इसके लिए पिछड़ों की जनसंख्या पता लगना जरूरी है.
इस तरह, हम एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में फंस गए हैं. समानता पर आधारित समाज
तभी बन सकता है, जब जाति प्रथा समाप्त हो. समस्या यह है कि जब तक हमें विभिन्न
जातियों की जनसंख्या पता नहीं लगती तब तक हम पिछड़ी जातियों के साथ न्याय नहीं कर
सकते, उन्हें आरक्षण आदि के जरिए आगे बढ़ने में मदद नहीं कर सकते. अगर हमें अपने
समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता को कम करना है और पिछड़ी जातियों की
महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना है तो उनके लिए विषेश नीतियां बनाना, विशेष प्रावधान
करना अतिआवश्यक है. इसके अलावा हमारे सामने कोई रास्ता नहीं है. जाति-आधारित
संस्कृति लंबे समय तक हमारे समाज में बनी रहेगी. यद्यपि जाति प्रथा समाज में
असमानता का कारक है तथापि उसकी मदद के बगैर हम समानता नहीं ला सकते.
धर्म की गिनती
जाति की तरह, जनगणना प्रपत्र में धर्म के लिए कॉलम रखने का मुद्दा भी अत्यंत
विवादास्पद बन गया है. इसकी मांग अल्पसंख्यकों-विशेषकर मुसलमानों द्वारा की जा रही
है. वर्तमान में हमारे देश में धर्म-आधारित आरक्षण की व्यवस्था नहीं है और ना ही
संविधान में इसके लिए कोई प्रावधान हैं. संविधान में केवल सिक्खों और नव-बौद्धों को
अपवादस्वरूप, धर्म के आधार पर आरक्षण देने की व्यवस्था है. ये दोनों धर्म, हिन्दू
धर्म से उपजे हैं.
इस सिलसिले में यह महत्वपूर्ण है कि जस्टिस सच्चर समिति की रिपोर्ट आने के बाद आई
जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग की रपट में अल्पसंख्यकों-विशेषकर मुसलमानों-के लिए 10
प्रतिशत आरक्षण किए जाने की सिफारिश शामिल है. कुछ राजनैतिक नेता, मिश्र आयोग की
रपट लागू किए जाने मांग कर रहे हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अति संवेदनशील
मुद्दा है. केन्द्र की सरकार, मिश्र आयोग की रपट लागू करने में हिचकिचा रही है.
यहां तक कि सरकार इस रपट को संसद के पटल पर रखने के मूड में भी नहीं दिखती.
हमारे देश में धर्म-आधारित आरक्षण की व्यवस्था न होने के परिपेक्ष्य में, धर्म को
जनगणना का भाग बनाने की कोई आवश्यकता नजर नहीं आती. परंतु यह भी सच है कि
अल्पसंख्यकों में बढ़ती जागरूकता के साथ ही, देर-सबेर, धर्म-आधारित आरक्षण दिए जाने
की मांग जोर पकड़ेगी और तब अल्पसंख्यकों की ठीक-ठीक जनसंख्या जानने की आवश्यकता उसी
तरह महसूस होगी, जैसी कि पिछड़े वर्गों के मामले में अभी महसूस हो रही है.
बहुसांस्कृतिक व बहुधार्मिक समाजों में अनेक विरोधाभास उभर रहे हैं. यह पश्चिमी
देशों में भी हो रहा है, जहां का समाज बहुसांस्कृतिक व बहुधार्मिक स्वरूप अख्तियार
करता जा रहा है. पश्चिमी प्रजातंत्र, मूलतः व्यक्ति के अधिकारों पर केन्द्रित है.
यह ऐसे समाज में बहुत कारगर रहता है, जो एकसार हैं, जिसमें विविधताएं न के बराबर
हैं परंतु बहुसांस्कृतिक समाज में यही अनेक विरोधाभासों की जननी बन जाता है.
भारतीय समाज हमेशा से विभाजित और विविधतापूर्ण रहा है और इसकी बहुत बड़ी कीमत हमने
विभाजन के रूप में चुकाई. दोनों समुदायों में सत्ता के बंटवारे के मुद्दे पर कोई
समझौता नहीं हो पाया. स्वतंत्रता के बाद से भारतीय समाज में नए विरोधाभास सामने आ
रहे हैं, जो विभाजन के दौर में धर्म के प्रमुख मुद्दा बन जाने के कारण दब गए थे.
केवल दलितों के मामले में इन विरोधाभासों को आरक्षण की व्यवस्था के जरिए सुलझाया जा
सका है.
मुश्किल चुनौतियां
पश्चिमी समाज में भी नई-नई राजनैतिक और सामाजिक समस्याएं उभर रही हैं और राजनैतिक
तनाव व विरोधाभासों से मुक्ति पाना मुश्किल होता जा रहा है. कारण यह है कि पश्चिमी
समाज भी पूर्व उपनिवेशों के नागरिकों के बड़ी संख्या में वहां बसने के कारण
बहुसांस्कृतिक बनते जा रहे हैं. पश्चिमी प्रजातंत्र में मताधिकार एक व्यक्तिगत
अधिकार है परंतु बहुसांस्कृतिक समाजों में यह व्यक्तिगत के साथ-साथ सामुदायिक
अधिकार भी बन जाता है.
जैसे-जैसे व्यक्ति अपनी धार्मिक या जातिगत पहचान के प्रति जागरूक होता जाता है, वह
अपने मत का प्रयोग करने के पहले अपने समुदाय के हितों, अपने समुदाय के प्रति किए जा
रहे न्याय-अन्याय आदि पर विचार करने लगता है. दूसरे शब्दों में, वह अपने मत का
इस्तेमाल व्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए करने लगता है. प्रजातंत्र, समानता के
मूल्यों पर आधारित है और जातिगत असमानताएं उस पर जो दबाव बनाती हैं, वह कभी-कभी
विस्फोटक रूप ले लेता है.
हमें यह मानना होगा कि अपनी चकित कर देने वाली विविधताओं से जनित विरोधाभासों से
भारत ने काफी सफलतापूर्वक मुकाबला किया है. इस संदर्भ में भारत का रिकार्ड अन्य कई
देशों से बेहतर है और कई देश इस मामले में भारत को आदर्श मानते हैं. इसका यह अर्थ
नहीं है कि भारत में शासन संबंधी गंभीर समस्याएं नहीं हैं. चुनौतियां कठिन हैं और
उनका मुकाबला धर्म व जाति के यथार्थ को स्वीकार करके ही किया जा सकता है.
ये पहचानें, विरोधाभासी भूमिकाएं निभाती रहेंगी और ये भूमिकाएं प्रतिगामी व
प्रगतिशील दोनों होंगी. हमारे समाज में परस्पर संघर्ष और प्रतियोगिता लंबे समय तक
जारी रहेगी. हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश हमें विरासत में मिला है और यह हमारे
सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवहार को प्रभावित करता रहेगा.
20.05.2010,
22.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित