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इस्लाम से नहीं, आतंक से लड़ना होगा

इस्लाम से नहीं, आतंक से लड़ना होगा...

 

 

ऐसे हुई लादेन से मुलाकात-5

सबसे पहले हमें साबित करना होगा कि ये लड़ाई आतंक के खिलाफ है ना कि दो सभ्यताओं के बीच टकराव है, यानि कि ये इस्लाम और पश्चिम के बीच में चल रहा युद्ध नहीं है, ये आतंक के खिलाफ एक युद्ध है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हामिद मीर

इस्लामाबाद से


सबसे पहले तालिबान के अफगानिस्तान में पतन के बाद, अमरीका लड़ाकू कबीलाई सरदारों और दवा तस्करों पर निर्भर रहा. इसी कारण से आज अफगानिस्तान अफीम का सबसे बड़ा निर्माता है. अफगानिस्तान में स्थिरीकरण से पहले इराक पर हमला करना अमरीका का सबसे महत्वपूर्ण परंतु गलत रणनीतिक अनुमान था. मुस्लिम दुनिया में ये अवधारणा है कि अमरीका ने इराक पर (अब नामौजूद) व्यापक विध्वंस के हथियारों के लिए नहीं बल्कि तेल के लिए हमला किया था.

इराक में प्रशासन और सेना को खत्म करने से स्थिति और बिगड़ी. संयुक्त राष्ट्र ने इराक में टेक्नोक्रेट्स की सरकार बनाने का प्रस्ताव दिया लेकिन पॉल ब्रेमर ने अहमद चेलाबी जैसे भ्रष्ट आदमी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित किया, वह व्यक्ति जो कि खुद ईरान का एजेंट है.

रणनीति बदले अमरीका

अमरीका को संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, कम से कम इराक में तो, बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. अगर संयुक्त राष्ट्र सेना दक्षिणी लेबनान को हिजबुल्ला के कब्जे में से निकाल सकती हैं, तो इराक में क्यों नहीं वो ऐसा कर सकतीं ?


ईरानियों ने अल कायदा को इराक में घुसने के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराया और इसी वजह से अल कायदा को वहां नए प्रशिक्षण शिविर स्थापित करने का मौका मिला.

9/11 के षडयंत्री सिद्धांत
कई मुसलमान आज भी ये नहीं मानते कि ओसामा बिन लादेन 9/11 के हमलों के लिए जिम्मेदार है. पश्चिम में थियेरी मेसन द्वारा लिखित “9/11 दी बिग लाई” जैसी कई पुस्तकें और कई फिल्में बनीं, जो कि 9/11 पर अमरीकी सरकार के संस्करण का खंडन करती हैं.

इन “षडयंत्री सिद्धातों” की मुस्लिम दुनिया में बहुत लोकप्रियता है. कई लोग बिना किसी हिचकिचाहट के बताते हैं कि 9/11 मुसलमानों के खिलाफ “यहूदी षड़यंत्र” था.

सत्तावादी शासनों के प्रति अमरीकी समर्थन
कई मुसलमान अमरीका को मध्य पूर्व में उसके सत्तावादी शासनों को समर्थन देने के कारण नापसंद करते हैं. प्रधानमंत्री बुश इराक और अफगानिस्तान को उनके दमनकारी शासनों से मुक्ति दिलाने पर गर्वित हैं, तो क्यों ना वो सउदी अरब, मिस्र और कतर को स्वाधीन कराते हैं ?

एकता का अभाव
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे सहयोगी देश एकता के सूत्र में बंधे नहीं है. स्पेन और फिलिपींस ने इराक से अपनी सेनाओं को वापस बुला लिया. दूसरी ओर, पाकिस्तानी और अफगानी सरकारें एक दूसरे पर दोहरी खेल खेलने का आरोप लगा रहे हैं. वे आज भी सीमा पर हो रहे अवैध आवाजाही को रोकने के तरीकों के बारे में एकमत नहीं हो पाए हैं.


आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी इन दोनों देशों के बीच कोई अंतराष्ट्रीय सीमा नहीं है. कोई भी व्यक्ति सीमा को बिना किसी कागज़ात के पार कर सकता है. अंततः इसका सबसे अधिक फायदा अल कायदा को होता है.

संभव हल क्या हैं
सबसे पहले हमें साबित करना होगा कि ये लड़ाई आतंक के खिलाफ है ना कि दो सभ्यताओं के बीच टकराव है, यानि कि ये इस्लाम और पश्चिम के बीच में चल रहा युद्ध नहीं है, ये आतंक के खिलाफ एक युद्ध है.

आस्ट्रेलिया के जॉन हावर्ड जैसे विश्व नेताओं को पोप बेनेडिक्ट 16 द्वारा दिये गए पैगंबर विरोधी विवादास्पद बयानों का समर्थन नहीं करना चाहिए. हमें एक सच्चे अंतर-विश्वास संवाद को बढ़ावा देना होगा.

दूसरा, हमें हमास और हिजबुल्ला जैसे लोकप्रिय आतंकवादी आंदोलनों को बातचीत में संलग्न करना चाहिए. ये दो संगठन आज भी लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं. संवाद होना बहुत जरूरी है. अगर आप बहुत सारी विफलताओं और मौतों के बाद वार्ता करना शुरु करते हैं तो आप एक अच्छा सौदा नहीं पा सकते हैं.

उत्तरी वजीरिस्तान के साथ यही हुआ. वहां पाकिस्तानी सेनाओं ने तालिबान के साथ एक समझौता किया, लेकिन तब जब दोनों तरफ से 650 से ज्यादा मौतें हो चुकी थीं. लेकिन अब तालिबानी लड़ाकुओं को समझौते में ज्यादा फायदा हो रहा है.


अमरीका को संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, कम से कम इराक में तो, बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. अगर संयुक्त राष्ट्र सेना दक्षिणी लेबनान को हिजबुल्ला के कब्जे में से निकाल सकती हैं, तो इराक में क्यों नहीं वो ऐसा कर सकतीं ? अमरीकी सेनाएं संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों में काम कर सकती हैं, जब संयुक्त राष्ट्र की सेनाएं इराक में लगा दी जाती हैं तब उनमें अफ्रीकी और एशियाई सैन्य टुकड़ियों की संख्या भी बढ़ानी चाहिए. इराक में सफलता मिलने से उसी तर्ज पर अंतराष्ट्रीय समुदाय अफगानिस्तान में भी शांति बहाल कर सकता है. मुझे मालूम है कि कई अमरीकी संयुक्त राष्ट्र के प्रति नकारात्मक सोच रखते हैं, लेकिन उनके पास संयुक्त राष्ट्र को मजबूत बनाने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है.

अफगानिस्तान में मौजूद नाटो सेनाओं (आई एस ए एफ) और पाकिस्तानी सेनाओं को अपने खुद के कबिलाई इलाकों में बेगुनाह नागरिकों की हत्या करने से बचना चाहिए. उनकी कबिलाई संस्कृति को समझने का प्रयास करना चाहिए, अगर आप उनमें से किसी एक को भी मारते हैं, तो वे आत्मघाती बनकर आपमें से कम से कम दस को मारकर अपना बदला लेंगे. अफगानिस्तान और पाकिस्तान में ज्य़ादाकर आत्मघाती हमलावर वे थे जो सुरक्षा बलों से बदला लेना चाहते थे. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच कोई अंतर्राष्ट्रीय सीमा नहीं है. हमें उत्तरी पश्चिम पाकिस्तान के साथ साथ दक्षिणी अफगानिस्तान पर भी सीमाएं चाहिए जिससे ईरानी हस्तक्षेप को रोका जा सके.

अमरीकी सरकार को मुस्लिम देशों में संयुक्त राज्य अमरीका की छवि सुधारने के लिए व्यापक जनचेतना अभियान शुरु करना चाहिए. दूसरी ओर, ज्यादा से ज्यादा इस्लामी विद्वानों को अमरीका बुलाना चाहिए जिससे मुसलमानों की छवि सुधारी जा सके.

और अंततः, अमरीका को दमनकारी मुस्लिम शासनों को समर्थन देना बंद करना चाहिए और हमारे तरफ के देशों में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करने के लिए पहल करनी चाहिए. हम स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस वाले लोकतंत्र चाहते हैं. स्वतंत्रता और लोकतंत्र अमरीका की वास्तविक ताकते हैं, हम ये ही अपने देशों में चाहते हैं. सच्चे लोकतंत्र को बढ़ावा देना ही आतंकवाद से लड़ने का सबसे बढ़िया तरीका है. अब अफगानिस्तान में एक जीवंत संसद मौजूद है, पर उसमें स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस का अभाव है. अन्याय, असुरक्षा और गरीबी के कारण आतंकवाद होता है. हमें अन्याय, अशिक्षा और गरीबी को भी हराना होगा जिससे हम आतंकवाद को हरा सकें.

अंत में मुझे ये कहना चाहिए कि अमरीका को मेक्सिको से लगी अपनी सीमा को सुरक्षित करना चाहिए. ये 2000 किलोमीटर लंबी सीमा ही अलकायदा के लिए अमरीका में घुसने का सबसे बड़ा रास्ता है. अल कायदा ने अमरीका के अंदर अपने हथियार और आत्मघाती लड़ाके इसी मैक्सिकन सीमा से पहुँचाए हैं, और हर यात्री को अपने हवाई अड्डों पर जूते उतार कर दिखाने को कहने का कोई फायदा तब तक नहीं है जब तक ये सीमा ठीक से सील नहीं कर दी जाती.

 

15.06.2008, 22.24 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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rk18@hotmail.com(raj kumar suman)

 
 read kuran, understand everything...what is islam and what is terror...and what is the interconnection between both or not...only read kuran... 
   
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