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नहर का पानी खा गया खेती

मुद्दा

नहर का पानी खा गया खेती

रेयाज उल हक रायबरेली से लौटकर


अपनी फूस की झोंपड़ी में गरमी से परेशान छोटेलाल बात की शुरुआत आसान हो गई खेती के जिक्र से करते हैं. वे कहते हैं, ‘पानी की अब कोई कमी नहीं रही. नहर से पानी मिल जाता है तो धान के लिए पानी की दिक्कत नहीं रहती.’

शारदा नहर


पास बैठे रामसरूप यादव मानो एक जरूरी बात जोड़ते हैं, ‘अब बाढ़ का खतरा कम हो गया है.’
राजरानी इलाके में खर-पतवार के खत्म होने का श्रेय नहर को देती हैं.

लेकिन छोटेलाल ने बात अभी खत्म नहीं की है. उनका सुर भी अब थोड़ा बदल रहा है, ‘गेहूं की फसल लेकिन अब खराब हो गई है. राशन से गेहूं न मिले तो गेहूं के दर्शन नहीं होते. जिनके पास कार्ड नहीं हैं उनकी दशा और खराब है.’

धीरे-धीरे उनकी आवाज में नाराजगी बढ़ रही है, ‘पहले अच्छी फसल होती थी. नहर ने खेती बरबाद कर दी. सीलन से नहर के पासवाली जमीनें खराब हो गई हैं. पहले धान, गेहूं, अरहर, साग-सब्जी हो जाती थी, अब जैसे-तैसे धान ही हो पाता है. गेहूं तो होता ही नहीं.’

आखिर में छोटेलाल सबसे मतलब की बात पर आते हैं, ‘जब से शारदा आई है मेरी 15-16 बिस्वा जमीन बेकार पड़ी है. याद ही नहीं उसमें कब फसल बोई गई थी.’

वे शारदा सहायक नहर की बात कर रहे हैं, जो रायबरेली जिले में अमावां प्रखंड के उनके गांव खुदायगंज के दक्षिण से होकर गुजरती है.

उत्तर प्रदेश के 16 जिलों से होकर गुजरने वाली शारदा सहायक नहर का उद्देश्य 150 प्रखंडों में 16.77 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करना था. मगर देश की प्रमुख नहरों में से एक यह नहर अपने लिए तय लक्ष्य के आधे से भी कम यानी 48 प्रतिशत को ही पूरा कर सकी है. 2000 में पूरी हुई 260 किमी लंबी इस नहर के हिस्से उपलब्धियों से अधिक नाकामियां ही दर्ज हैं. इसने खाद्यान्न उत्पादन से होनेवाली आय में 33 प्रतिशत और तिलहन के उत्पादन से आय में 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी भले दर्ज कराई है लेकिन दालों, सब्जियों और बागबानी से होनेवाली आय में क्रमशः 60, 6 और 15 प्रतिशत की गिरावट आई है.

एक ऐसे देश में, जहां लगभग 59 प्रतिशत आबादी की आजीविका का मुख्य साधन खेती है, सिंचाई की सुविधा सीधे-सीधे भूख, गरीबी, खाद्य सुरक्षा तथा देश और किसानों की खुशहाली से जुड़ी हुई है. लेकिन देश में खेती के काम में लाई जा रही कुल भूमि के लगभग 42 फीसदी हिस्से की ही सिंचाई हो पाती है. इसमें से भी सिंचाई की 60 प्रतिशत जरूरत भूमिगत जल से पूरी की जाती है और सिर्फ 28.2 प्रतिशत भूमि की नहरों से सिंचाई की जाती है.

देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश की भी बहुसंख्यक आबादी खेती पर निर्भर है. लेकिन उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग की वेबसाइट बताती है कि राज्य में में कुल बोई जा रही भूमि का महज 56.8 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित इलाके के तहत आता है. यहां सिंचाई की ऐसी स्थिति इसके बावजूद बनी हुई है कि राज्य में शारदा नहर, शारदा सहायक जैसी बड़ी सिंचाई परियोजनाएं दशकों से चल रही हैं.

शारदा सहायक नहर मूलतः शारदा नहर परियोजना से जुड़ी हुई है, जिसकी शुरुआत 1926 में हुई थी. शारदा नहर को मौजूदा उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित अपर शारदा बैराज से पानी मिलता है. इस नहर का लक्ष्य केंद्रीय और पूर्वी उत्तर प्रदेश के 15 जिलों को सिंचाई की सुविधा मुहैया कराना था, लेकिन यह केंद्रीय उत्तर प्रदेश के सिर्फ 10 जिलों को ही लाभ मिल पहुंचा सकी. चार दशकों के बाद पाया गया कि यह नहर अपने लक्ष्य के महज 19 प्रतिशत इलाके को ही सिंचित कर पाने में सक्षम थी. 1960 के दशक में हरित क्रांति के दौरान पानी की अधिक जरूरतोंवाली फसलों का चलन शुरू किया गया तो पहले से ही लक्ष्यों से काफी पीछे चल रही यह नहर नई मांग को पूरा कर पाने में नाकाम थी. और तब 1968 में शारदा सहायक नहर परियोजना पर काम शुरू हुआ.

लेकिन समस्या सुलझने के बजाय और उलझती गई. सहायक परियोजना भी सुस्त रफ्तार, आधी-अधूरी कामयाबी और नुकसानदेह नतीजों की मिसाल बन गई. इस पर 32 साल की लंबी अवधि और अनुमान से 20 गुना अधिक (1300 करोड़) रुपये खर्च हुए. हालांकि इसपर बनी छोटी नहरों और उपशाखाओं के 15000 किमी लंबे जाल के जरिए इलाहाबाद, रायबरेली, सुल्तानपुर, बाराबंकी, जौनपुर, प्रतापगढ़ में किसानों को तो पर्याप्त पानी मिल जाता है, पर अंबेडकर नगर, फैजाबाद, मऊ, सीतापुर और वाराणसी में किसानों को जरूरत का पांचवा हिस्सा भी दुश्वार है. बलिया, गाजीपुर और लखनऊ में होनेवाली कुल सिंचाई में शारदा सहायक का योगदान महज 20 फीसदी ही है.

लेकिन यह नुकसान भी उतना बड़ा नहीं लगेगा, अगर हम जमीन पर इससे हो रही सिंचाई के नुकसानदेह नतीजों पर गौर करें. अच्छी खेती के सपनों को दुस्वप्न में तब्दील करने में इस नहर ने चार लंबे दशक लिये हैं.

खुदायगंज के रामनारायण ने सपनों को दुस्वप्न बनते देखने में अपनी उमर गुजार दी है. जब वे केवल 8-9 साल के थे, तो यह नहर बननी शुरू हुई थी. तब उनके घरों में किन्हीं परीकथाओं की तरह नहर का जिक्र छिड़ता था. नहर में बीघा भर जमीन चली जाने के बाद भी ऐसी कहानियों में कमी नहीं आई. यह उम्मीद बनी रही कि पानी आने के बाद बाकी जमीन में इतनी उपज होगी कि इसकी भरपाई हो जाएगी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Kumar Anil New Delhi

 
 आपसे ऐसी ही रिपोर्टों की अपैक्षा रहती है. ये रिपोर्ट आँख खोल देने वाली है. शानदार. 
   
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