पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

माफ़ी की वह माँग तो भाव-विभोर करने वाली थी

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > समाजPrint | Send to Friend | Share This 

इन बंजारों की धरती कहां है

मुद्दा

इन बंजारों की धरती कहां है

शिरीष खरे मुंबई से

 

एक बार बीड़ जिले के पाथरड़ी तहसील में कहीं चोरी हुई. कई महीने बीते, मगर चोर का अतापता न चला. आष्टी तहसील से थोड़ी दूरी पर चीखली गाँव हैं. इसी गाँव के पास घूमते-फ़िरते रहवसिया नाम का पारधी परिवार आ ठहरा. बस फिर क्या था, पुलिस ने उसे ही इतनी दूर की वारदात में अंदर डाल दिया. जहाँ रहवसिया दो महीनों तक जेल में रहा, वहीं गाँव में ऊँची जाति वाले उसके परिवार को आकर धमकाते और बोलते कि ज़ल्द से ज़ल्द यहाँ की ज़गह ख़ाली कर दो. जब वह जेल से छूटकर अपने ठिकाने पर आया तो ऊंची ज़ाति वालों ने उसे रस्सियों से बांध दिया. उससे कहा गया कि तुम लोग चोर और गांव के लिए अपशगुन होते हो.

तिरुमाली


एक बार राजन गांव में वास्तुक काले की पत्नी विमल ख़ेत में काम कर रही थी. पास के थाने के इंस्पेक्टर ने आकर बताया कि उसने सोने की पट्टी चुराई है. थाने चलना पड़ेगा. विमल के विरोध करने पर इंस्पेक्टर बोला- यह औरत कुछ तेज मालूम देती है और सोने की पट्टी हो न हो उसकी साड़ी के पल्लू में है. आज के दुःशासन बने इंस्पेक्टर ने दोपद्री का पल्लू खींच डाला.

एक बार धिरणी के पारधी नौज़वान गोकुल को चोरी के शक में धर दबोचा गया. गोकुल समझ नहीं पाया कि आखिर उसे क्यों पकड़ा गया था. वह जिस सुबह छूटा, उसी शाम फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. इसे पारधी आदमी की मानसिक स्थिति के तौर पर देखा जा सकता है.

पारधी यानी गुनहगार
कभी पारधी यानी पारध का अर्थ शिकार करने वाला था. मगर अब पारधी का मतलब गुनहगार हो गया है. पारधी एक ज़माने में राजा के यहां शिकार के जानकार के तौर पर जाने जानी वाली ज़मात थी. लेकिन देखते ही देखते इसे इतिहास, मिट्टी, मिथकों, क़ायदे क़ानूनों और अख़बारों में एक ‘गुनहगार’ ज़मात में बदल दिया गया.

दरअसल, अंग्रेज जब यहाँ से गए तो बहुत कुछ छोड़कर गए और पारधियों से जुड़ा यह लेबल भी उन्हीं में से एक है. इतिहास के ज़ानकार बताते हैं कि पारधियों ने तो बाहरियों को सबसे पहली और सबसे कड़ी, सबसे बड़ी चुनौतियाँ दी थीं. मराठवाड़ा के राजा पहले निज़ाम से हारे और उसके बाद अंग्रेजों से हारे थे. मगर उन राजाओं के लिए लड़ने वाले पारधियों ने कभी हार नहीं मानी थी. क्रांतिगाथा की पंक्तियाँ बताती हैं कि यह जंगलों में इधर-उधर हो गए और इन्होंने एक नहीं, कई-कई छापामार लड़ाईयाँ लड़ीं और जीतीं थीं. इसलिए मराठवाड़ा के जनमानस में अब भी कहीं-कहीं पारधियों की वीरता से जुड़े कुछ-कुछ क़िस्से बिखरे पड़े हैं.

अंग्रेज जब पारधियों की छापामार लड़ाइयों से हैरान-परेशान हो गए तो उन्होंने ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम’ के तहत पारधियों को भी ‘गुनहगार’ ज़मात की सूची में डाल दिया. अंग्रेज गये और देश में आज़ादी आई मगर आज़ादी के बाद भी कानून खास कर पुलिस का नज़रिया नहीं बदला.

नाकाम सरकार
1924 में अंग्रेज हुकूमत द्वारा कथित तौर से ऐसे गुनहगारों के लिए देशभर में 52 बसाहट बनी थीं. सबसे बड़ी गुनहगार बसाहट शोलापुर में थी. मगर 1949 में यानी आज़ाद हिन्दुस्तान में सबसे पहले बालसाहेब खेर ने शोलापुर सेंटलमेंट का तार तोड़ा. 1952 में बाबासाहेब अंबेडकर ने गुनहगार बताने वाले अंग्रेजों के कानून को रद्द किया. 1960 में खुद जवाहरलाल नेहरू शोलापुर आए और गुनहगार घोषित ज़मातों से जुड़े मिथकों को तोड़ने के मद्देनज़र काफ़ी-कुछ साफ़-साफ़ किया.

मगर उसके बावजूद पारधी से जुड़े मिथकों को तोड़ने के के नज़रिए से राज्य सरकार अब तक नाकाम ही रही है, और आज भी मराठवाड़ा के किसी गाँव में ज्यों ही कोई चोरी होती है, पुलिस वाले सबसे पहले पारधियों की ख़ोज शुरु कर देते हैं. पारधियों को हिरासत में लेने वाली पुलिस इतने गैरकानूनी तरीके अपनाती है कि जो पुलिस को खुद अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर दे लेकिन आखिर पुलिस के आगे किसकी चले?

आम धारणा यही है कि पारधी तो बस 'चोर' ही होते हैं. अगर थोड़ी देर के लिए ऐसा मान भी लिया जाए तो भी क्या उन्हें चोरी के दलदल से निकालना व्यवस्था का काम नहीं होना चाहिए. इस काम में जनता के साथ-साथ पुलिस का ख़ास रोल हो सकता है. मगर यह दोनों तो पारधियों को 'चोर' से ऊपर देखना भी नहीं चाहते. यही नज़रिया अपराधीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है, जो किसी भी सरल और ईमानदार आदमी को चोर' चोर' कहकर अपराधी ठहरा, बना सकता है. यह नज़रिया साफ़ किए बगैर अपराध के वर्चस्व का ख़ात्मा करना मुश्किल होगा.

इतिहास बस पन्नों में
हम थोड़ा सा फिर इतिहास में झाँके और सोचे कि अगर पारधी रखवाली के काम के नहीं होते तो राजा उन्हें अपना सुरक्षा सलाहकार क्यों बनाते ? जैसे राजा कहता कि मुझे शेर पर सव़ार होना है तो पारधी शेर को पकड़ते और उसे पालतू बनाते. एक तो शेर को ज़िंदा पकड़ना ही बहुत मुश्किल, ऊपर से उसे पालतू बनाना तो और भी मुश्किल था. मगर वक़्त का तकाज़ा देखिए, आज के पारधी शासन की दहशत से परेशान हैं. यह जंगल की तरफ़ आती गाड़ियों को देखकर भागते हैं. इन्हें लगता है कि आसपास कोई वारदात हुई होगी जो पुलिस पकड़ने आ रही है.

कथाओं से भरे इस विशाल देश में भले ही पारधी ज़मात का इतिहास गौरवगाथा का रहा हो, मगर फ़िलहाल तो उनकी पीड़ाओं का ऐसा ग्रन्थ लिखा जा सकता है जिसकी जवाबदारी कोई नहीं लेना चाहता और जिसमें संकट को हरने की खोज भी भविष्य में दूर-दूर तक कुछ नहीं दिखलाई देती है.

सबसे बुरा तो पारधी बच्चों का स्कूल से बाहर रहना है, जिसके चलते अगली पीढ़ी का आने वाला कल भी काले अंधियारे में डूबा हुआ लगता है. ऐसे में इन बच्चों को यह सपना दे पाना कैसे संभव है कि देखो- पुलिस और लोग तुम्हारे पीछे नहीं पड़े हैं, वह तो तुम्हारे साथ खड़े हैं, और यह देखो- वह तुमसे हाथ मिलाना चाहते हैं ?
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Beena (beenapandey927@gmail.com) Lucknow

 
 बिलकुल सत्य और एक बार फिर कानून और नागरिकता का दंभ भरने वालों पर ज़ोरदार तमाचा. अपने ही देश और लोकतंत्र कहे जाने वाले लोक के तंत्र पर जो सवाल आपने दागा है शिरिषजी, वो किसी भी व्यक्ति को पारधियों के लिए कुछ अच्छा सोचने पर विवश करने के लिए सराहनीय प्रयास है. काबिलेतारीफ रचना है. इस कोशिश के लिए आपको बधाई! 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Manali

 
 जिन जगहों को कुछ नहीं चाहिये, उन्हें उन लोगों की दुनिया से हमेशा बच कर रहना चाहिये, जिन्हें सब कुछ चाहिये.
खानाबदोशी बहुत कीमती चीज़ है. उसे उन लोगों से दूर रहने दें, जो अपने बच्चों को बड़ा आदमी बनाने में लगे हैं. हम बंजारों की बात मत पूछो जी...! -एक बंजारा
 
   
 

vishal mankere (vishal.mankere@icicilombard.com) Mumbai

 
 Dear Shirish, Thanks to show the new image of Police officers in front of us. 
   
 

sunder lohia (lohiasunder2 @gmail.com) Mandi ( H.P}.

 
 लगता है हिंदुस्तान की इस आबादी को जनगणना में शामिल नहीं किया जाता इसलिए जाति आधारित जनगणना होनी ही चाहिए. एक यह हिंदुस्तान है जो अभी तक आजाद ही नहीं हुआ क्योंकि इसे अपने देश की धरती पर बसने का हक नहीं मिला है. दूसरी तरफ पुलिस अभी भी विदेशी साकार की पुलिसों की तरह काम करती है, तो सबसे बड़ा सवाल है की आज़ादी किसे मिली है? यही सवाल इस बात का जवाब भी है कि हिंदुस्तान में कोई सामाजिक राजनितिक बदलाव क्यों नहीं हो पा रहा. 
   
 

पशुपति शर्मा (pashupati15@rediffmail.com) दिल्ली

 
 शिरीष ने एक बार फिर अपनी फितरत के मुताबिक उन लोगों की बात की है, जो हाशिए पर हैं। इन जनजातियों से जुड़े सवाल उठाकर शिरीष ने सरकार, प्रशासन और आम लोगों के सामने कुछ सवाल छोड़े हैं, यदि उनका उत्तर हासिल करने की कोशिश की गई तो शायद मिल कर साथ चलने के सपने पूरे हों। उन आंखों में भी कल का सपना जगे जो अब तक खुद की तलाश में ही जुटे हैं। ये वाकई बड़ी दुखद स्थिति है कि कानूनी दावपेंच के बीच एक शख्स को ये साबित करना पड़े कि वो जिंदा है और इसी देश का बाशिंदा है। 
   
 

kavita indore

 
 भारत की घुमंतू जाति-जनजातियों के हालत को दर्पण दिखाती है ये रिपोर्ट. सच है आज़ादी के 63 साल बाद भी अगर ये बुनियादी सुविधाओं से महरूम है हो हमें अपने कानून, शासन प्रशासन के कुप्रबंधन पर चिंतन करना होगा, और आम आदमी की मानसिकता इन लोगो के प्रति बदल कर इन्हें मुख्या धरा में शामिल करना होगा. अच्छी रिपोर्ट,बधाई. 
   
 

pratibha (kpratibha.katiyar@gmail.com) lucknow

 
 ओह, बड़ा अजीब लगा पढ़ कर.... पारधियों के बारे में जानकारी मिली. ऐसी और भी कई जातियों-जनजातियों के साथ भी यह सब हो रहा है. अच्छी रिपोर्ट है. अगली कड़ी का इंतजार... 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in