उद्धव ठाकरे बचायेंगे राष्ट्रीय एकता
मुद्दा
उद्धव ठाकरे बचायेंगे राष्ट्रीय एकता
राम पुनियानी
शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे अब राष्ट्र की एकता को बचाने का काम करेंगे. उन्हें राष्ट्रीय एकता मंच का सदस्य बनाया गया है. देश को बांटने वाले मुद्दों और प्रवृत्तियों से कैसे मुकाबला किया जाए, इस विषय पर
चर्चा का सर्वोच्च मंच राष्ट्रीय एकता समिति है. बांटने वाले मुद्दे भाषा, क्षेत्र
और धर्म से संबंधित हो सकते हैं या किसी और विषय से.
पिछले दिनों सुश्री शबनम हाशमी ने समिति की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. शबनम हाशमी
देश की अग्रणी सांप्रदायिकता-विरोधी कार्यकर्ता हैं और ‘अनहद’ यानी एक्ट नाउ फॉर
हार्मोनी एण्ड डेमोक्रेसी की सचिव भी हैं. यह संस्था पिछले कई वर्षों से विघटनकारी
राजनीति के खिलाफ जमकर संघर्ष कर रही है. अनहद समय-समय पर धर्मनिरपेक्षता और
बहुलतावाद के मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों और राजनैतिक
प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन भी करती रही है.
हाशमी ने राष्ट्रीय एकता समिति की सदस्यता से इस्तीफा, शिवसेना के कार्यकारी
अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को इसका सदस्य मनोनीत किए जाने के विरोधस्वरूप दिया. ठाकरे का
मनोनयन, क्षेत्रीय पार्टियों के प्रमुखों की श्रेणी के अन्तर्गत किया गया.
हाशमी ने कहा, “मुझे यह जानकर बहुत धक्का लगा कि श्री उद्धव ठाकरे को राष्ट्रीय
एकता समिति का सदस्य बनाया गया है. श्री ठाकरे का पूरा राजनैतिक जीवन, घृणा फैलाने
वाली और विघटनकारी राजनीति पर आधारित रहा है. उन्हें राष्ट्रीय एकता समिति में
शामिल किया जाना एक अत्यंत विरोधाभासी कदम है. श्री ठाकरे की साम्प्रदायिक राजनीति,
उन बहुवादी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के विपरीत है, जिनका पोषण करने के उद्धेश्य से
राष्ट्रीय एकता समिति का गठन किया गया है. पहले से ही कई अत्यंत साम्प्रदायिक नेता,
मुख्यमंत्री की अपनी हैसियत के चलते, समिति के सदस्य हैं. अब श्री ठाकरे के आने के
बाद समिति की गरिमा और उसकी विश्वसनीयता हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी.”
इस मामले के कई पहलू हैं. राष्ट्रीय एकता समिति का गठन, पण्डित नेहरू ने सन् 1961
में जबलपुर में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद किया था. पण्डित नेहरू, जो उन दिनों
देश के प्रधानमंत्री थे, जबलपुर की वहशियाना हिंसा से अत्यंत विचलित हो गए थे.
उन्हें इससे गहरा धक्का पहुंचा था. इसके ही बाद उन्होंने साम्प्रदायिकता, जातिवाद
और क्षेत्रवाद की बीमारियों से लड़ने के लिए राष्ट्रीय एकता समिति का गठन करने का
निर्णय लिया.
वे राष्ट्रीय एकता समिति को एक ऐसा व्यापक मंच बनाना चाहते थे, जिसमें सभी राजनैतिक
दलों का प्रतिनिधित्व हो. इसमें केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और सामाजिक
कार्यकर्ताओं की नियुक्ति का भी प्रावधान रखा गया.
राष्ट्रीय एकता समिति, अब तक केवल एक या दो मौकों पर चर्चा में रही है. पहली बार तब
जब उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह-जो उस समय भाजपा में हुआ करते
थे-ने समिति को यह आश्वासन दिया कि बाबरी मस्जिद की हर कीमत पर रक्षा की जायेगी.
बाद में, कल्याण सिंह ने इस तथ्य को छुपाने की कोशिश तक नहीं की कि मस्जिद के ढहाए
जाने में उनके योगदान पर वे गर्व महसूस करते हैं.
भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के केन्द्र में छःह वर्षीय शासनकाल के दौरान
राष्ट्रीय एकता समिति का गठन तक नहीं किया गया. संदेश साफ था. हम हिन्दू राष्ट्र
वालों का राष्ट्रीय एकता से क्या लेना-देना.
वैसे भी राष्ट्रीय एकता समिति की भूमिका केवल सलाह देने तक सीमित है. यूपीए के
पिछले कार्यकाल में इसकी बैठक मात्र दो बार हुई थी. यूपीए 2 को सत्ता में आए एक
वर्ष बीत चुका है परंतु समिति की आज तक एक भी बैठक आयोजित नहीं की गई है. परंतु इन
सब कमियों के बावजूद, राष्ट्रीय एकता समिति साम्प्रदायिकता के शिकार लोगों की आवाज
को देश तक पहुंचाने का एक प्रभावशाली माध्यम और मंच है.
सभी राज्यों के मुख्यमंत्री समिति के पदेन सदस्य होते हैं. अतः गुजरात कत्लेआम के
कर्ताधर्ता नरेन्द्र मोदी भी इसके सदस्य हैं. यूपीए एक के कार्यकाल के दौरान आयोजित
समिति की पहली बैठक में केवल मोदी मीडिया में जगह पाने में सफल रहे थे. उन्होंने यह
दावा किया था कि गुजरात में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं.
हाशमी के इस्तीफे से यह प्रश्न उठता है कि इस तरह की संस्थाओं में किन व्यक्तियों
को सदस्य बनाया जाना चाहिए? यह पूछा जा सकता है कि मोदी जैसे लोग इस समिति में क्या
कर रहे हैं? और अब उद्धव ठाकरे के सदस्य बनने के बाद तो यह प्रश्न और महत्वपूर्ण बन
गया है.
हम सबको ज्ञात है कि श्रीकृष्ण आयोग ने शिवसेना को मुंबई दंगों में सक्रिय रूप से
भाग लेने का दोषी ठहराया है. यही कारण है कि शिवसेना ने सत्ता में आते ही इस आयोग
को भंग कर दिया और बाद में उसकी रपट इस आधार पर जारी नहीं की कि इससे मुंबई के घाव
फिर हरे हो जाएंगे. पिछले कुछ महीनों से शिवसेना जमकर भाषा और क्षेत्रवाद की
राजनीति कर रही है. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से मुकाबला करने के लिए शिवसेना,
मराठियों और गैर-मराठियों के बीच संदेह और घृणा की दीवार खड़ी करने के नए-नए तरीके
अपना रही है. इसमें कोई संदेह नहीं कि उद्धव ठाकरे के रूप में राष्ट्रीय एकता समिति
की साम्प्रदायिक टीम को एक और सदस्य मिल गया है.
यह सही है कि कुछ राजनैतिक विचारधाराओं की नींव ही साम्प्रदायिकता पर रखी होती है
और ऐसी विचारधाराओं से प्रेरित दलों से यह उम्मीद करना ही व्यर्थ होगा कि वे
विघटनकारी राजनीति नहीं करेंगे. यहां भी कई दुविधाएं हैं. सवाल यह है कि चूंकि मोदी
और ठाकरे, संवैधानिक प्रजातांत्रिक प्रक्रिया के हिस्से हैं अतः उन्हें अलग-थलग
कैसे किया जा सकता है? दूसरी बात यह है कि राष्ट्रीय एकता समिति जैसा फोरम त्यागकर
हम, विघटनकारी तत्वों से लोहा लेने का वह थोड़ा-बहुत अवसर भी खो रहे हैं, जो हमें इस
समिति के माध्यम से प्राप्त हो सकता है.
प्रश्न यह है कि हम संवाद का रास्ता चुनें या बहिष्कार का. सुश्री हाशमी ने अपना
विरोध दर्ज किया है. इसमें कुछ भी गलत नहीं है. परंतु आज आवश्यकता इस बात की है कि
अगर हमें प्रजातांत्रिक विचारों का प्रसार करने का जरा सा भी मौका मिलता है तो हम
उसे न गवाएं. भारत में प्रजातंत्र पहले से ही इतने खतरों से घिरा हुआ है कि उसकी
रक्षा के लिए हर उपाय, हर साधन, हर मंच व हर अवसर का उपयोग करने की आवश्यकता है.
सुश्री हाशमी का निर्णय सत्ताधारियों को यह चेतावनी देता है कि वे ठाकरे जैसे लोगों
को राष्ट्रीय एकता समिति जैसे मंचों में केवल उतना ही स्थान दें, जितना नितांत
आवश्यक हो. इस समिति को और क्रियाशील व सक्रिय किए जाने की आवश्यकता है, ताकि वह
विघटनकारी राजनीति के पीड़ितों की आवाज को बल दे सके और साम्प्रदायिकता से लड़ने के
लिए सभी जरूरी कदम उठाने का जरिया बन सके.
15.06.2010, 15.50 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित