मनोज शर्मा की कवितायें
साहित्य
मनोज शर्मा की कवितायें
चलो बताऊं
जिसने नहीं देखा कभी
कोई सपना
उसे रातें तंग करती हैं
पता नहीं जिसे खुशबू का
उसकी नाक तक नहीं पहुंचता कभी
झोंका हवा का
जिसे याद नहीं रहता,चंदा
वह रोता-चिल्लाता है
गलियारों में बिखर जाता है
इस बीच, मुझे
अपनी सांसें सुनायी देने लगती हैं
एक साथ दिखायी पड़ते हैं मुझे
पहाड़, सूरज, और दरख्त
फिर सारी गड़बड़ियां हिचकियां खाती हैं
पर्त-दर-पर्त सूखती जाती हैं
तभी, मैं छ्त पर जाता हूं
और नाचते मोर-मोरनी के आगे
बाजरे की थैली खोल आता हूं.
सब बात
सुख भी नकली
दु:ख भी नकली
नकली अपनों की चीख
किसको ढो लें
किसको बोलें
किसे कहें सब ठीक
उठता-पड़ता
पल हर गिरता
बोले, आ तो पास
सारी खुशियां
सारे सपने
रहेंगे कब तक खास
क्यूं अंतर बढ़ता जाए है
क्यूं धुंधलाए सांच
किस पाले में
कौन खड़ा है
बढ़ता जाए नाच
अब तो चेतो भाई लोगो
सोचो ज़रा संग-साथ
गड़बड़ झटको
जुआ उतारो
कह डालो,सब बात.
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तारीख- 2010
बहुत कुछ के बीच
निजी भी है बहुत
और इस निजता के अंदर ही
अपना कहने को
बचा नहीं है कुछ भी
एक निवाला तक नहीं
सूख रहा है कंठ
एक घूंट तो दे दो भाई
बज रहा है पेट
मारो गोली स्वाद को
कुछ तो दो
थोड़ी सी चीनी
चुटकी भर नमक
बस चोंच जित्ती दाल
कुछ तो दो
कि मैं भी अपने सपने
सुन-सुना पाऊं
क्या बोले हो भाई
ये प्रेम-ब्रेम क्या होता है
और लहराता पानी
और लहराते पहाड़
और लहराता संगीत
पगलाने से पहले
मां! बोलती थी
कि उसके पास
हरेक मौके के खास गीत हैं
मां तो अब रही नहीं
जैसे कि समय
इत्ते सारे में
इस तारीख में
भूखे पेट भाई
किसे दोहराऊं
पूछूं किसे आज
किसके पास जाऊं
21.06.2010,
00.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित