पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

मधुमेह की महामारी कीटनाशक के कारण?

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > कला > छत्तीसगढ़Print | Send to Friend | Share This 

पद्मश्री लौटाना चाहता है चरणदास

कलायन

 

पद्मश्री लौटाना चाहता है चरणदास

अतुल श्रीवास्तव राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ से


जिन्होंने हबीब तनवीर का ‘चरणदास चोर’ देखा हो या ‘आगरा बाज़ार’, उन्हें गोविंद राम निर्मलकर ज़रुर याद होंगे. ‘चरणदास चोर’ का चोर हो या ‘आगरा बाज़ार’ का ककड़ी बेचने वाला हो, ‘लाला शोहरत बेग’ का शोहरत बेग हो या ‘देख रहे हैं नैन’ का दीवान, गोविंद राम निर्मलकर से आप बात करें तो लगता है, जैसे कल की ही बात हो. लेकिन गरीबी और लकवा की मार झेलते हुए पिछले दो सालों से बिस्तर में पड़े हुये गोविंदराम निर्मलकर बात करते-करते अनमने से हो जाते हैं. कुछ यों जैसे सब कुछ व्यर्थ हो गया. वे गहरी पीड़ा और दुख के साथ कहते हैं-“मैं चाहता था कि नई पीढ़ी को अपनी नाचा कला सौंप कर चैन से मर सकूं लेकिन ऐसा नहीं हो सका.”

गोविंदराम निर्मलकर


गरीबी और बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया. पद्मश्री समेत सारे सम्मान बेमानी साबित हुये और आज हालत ये है कि अपनी दवाइयां खरीदने और गृहस्थी की गाड़ी चलाने के चक्कर में वे लाख रुपये के कर्जे में डूबे हुए हैं. गोविंद राम निर्मलकर कहते हैं- “मैं सरकार को पद्मश्री लौटाना चाहता हूं. जो पद्मश्री न मेरे काम आ सकी, न मेरी कला के. आखिर उस पद्मश्री का क्या फायदा ?”

वह 1950 का जमाना था, जब 1935 में जन्मे 15 साल के गोविंदराम निर्मलकर हबीब तनवीर के साथ पहली बार नाटक की दुनिया में उतरे. छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा के कलाकार गोविंदराम ने 1954 में पहली बार दिल्ली थियेटर के लिये आगरा बाज़ार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उसके बाद तो आने वाले 50 साल जैसे गोविंदराम और हबीब तनवीर का नया थियेटर एक दूसरे की पहचान बन गये.

मिर्जा शोहरत बेग, बहादुर कलारिन, मिट्टी की गाड़ी, पोंगा पंडित, शाजापुर की शांतिबाई, गांव के नाम ससुरार मोर नाव दमाद, सोन सरार, जिन लाहौर नई वेख्‍या वो जन्‍म्या ई नई, कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना, वेणीसंघारम....और जाने कितने नाटक. एडिनबरा में चरणदास चोर के मंचन को याद करते हुए गोविंदराम निर्मलकर की आंखें चमकने लग जाती हैं- “52 देशों के नाट्य दल थे वहां और चरणदास चोर को श्रेष्ठ नाटक का सम्मान मिला. उसके बाद तो हमने दुनिया भर में उसका मंचन किया.”

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव मोहरा से दुनिया के रंगमंच पर अपने अभिनय की छटा बिखेरने वाले गोविंदराम निर्मलकर जब अपने उम्र के आखरी पड़ाव में पहुंचे तो लगा कि अब अपनी जड़ों में ही रहकर कुछ किया जाये. लेकिन बीमारी ने इससे पहले उन्हें घेर लिया.

हबीब तनवीर और उनकी मंडली को करीब से जानने वालों को पता है कि हबीब तनवीर की टीम के आधार स्तंभ माने जाने वाले मदन निषाद से लेकर भुलवाराम यादव और फिदाबाई मरकाम तक के आखरी दिन कैसे गुजरे हैं. ऐसे में गोविंदराम निर्मलकर के साथ कुछ अलग होने की उम्मीद कम ही थी. लेकिन जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री के लिये चुना तो उम्मीद जगी कि देर से ही सही, कम से कम सरकार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना तो सही.

गोविंद राम अपनी पत्‍नी के साथ दिल्‍ली गये और पद्मश्री पाया. सम्मान लेकर अपने गृह जिले राजनांदगांव लौटे तो निर्मलकर के मन में कई अरमान थे. श्री निर्मलकर ने तब कहा‍ था कि वे लुप्‍त होती नाचा विधा को नई पीढी को सौंपकर वे दुनिया से विदा होना चाहते हैं लेकिन उनकी इस इच्‍छा पूर्ति में आड़े आ रहा था उनका स्‍वास्‍थ्‍य.

लगभग 75 साल के गोविंद राम लकवा से पीड़ित थे और चाहते थे कि सरकार ने जब उन्‍हें यह सम्मान दिया है तो उनकी बीमारी को ठीक करने में मदद भी करे ताकि जिस नाचा कला के लिए उन्‍हें यह सम्मान मिला है, वह समय के साथ खत्‍म न हो. पर ऐसा नहीं हुआ. उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिली. न अपने लिये न नाचा के लिये. सरकार की ओर से मिलने वाली 1500 की पेंशन ही उनके इलाज और घर चलाने के लिये आय का एकमात्र स्रोत है. और जरा हिसाब लगायें कि 1500 रुपये में आज के जमाने में क्या-क्या किया जा सकता है !

मैं चाहता था कि छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा को मैं नई पीढ़ी को सौंप दूं, लेकिन अब अफसोस के साथ मुझे इस दुनिया से जाना होगा.


श्री निर्मलकर का कहना है कि उन्‍होंने अपने स्‍वास्‍थ्‍य और आर्थिक दिक्‍कतों को लेकर राज्‍यपाल से लेकर मुख्‍यमंत्री और छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री तक के कई-कई चक्कर काटे. सबने आश्वासन दिया लेकिन हुआ कुछ नहीं.

निर्मलकर कहते हैं- “जब मैं इस विधा के लिए कुछ नहीं कर सकता और सरकार मेरे लिए कुछ नहीं कर सकती तो मैं इस पद्मश्री को रख कर क्या करुंगा. इस पद्मश्री के बाद कई लोगों ने मान लिया कि मुझे सरकार की ओर से सम्मान के साथ-साथ लाखों रुपये भी मिले होंगे. कोई यह मानने के लिये तैयार नहीं है कि कागज के इस सम्मान पत्र के अलावा मुझे सरकार से एक धेला तक नहीं मिला. मैं चाहता था कि छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा को मैं नई पीढ़ी को सौंप दूं, लेकिन अब अफसोस के साथ मुझे इस दुनिया से जाना होगा.”

जाहिर है, अभी सरकार और सांस्कृतिक संगठनों के पास इस तरह के किसी अफसोस के लिये समय नहीं है. और हां, गोविंदराम निर्मलकर के लिये भी नहीं.

 

25.06.2010, 11.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pallav Journo Delhi

 
 It is a sad news. More it is unfortunate that 'Naya Theatre' is doing nothing for its ex-artists because of whom, the group get a fame at world stage. It is obvious that government will not support the 'theatre of the people' but atleast 'Naya Theatre' must have to take some initiative. 
   
 

prehalad raghuwanshi (goluraghuwanshi@gmail.com) chhindwara mp

 
 गोविंद जी की हालत जानकर मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने सबसे पहले ये नाटक एफएम पर सुना था. लेकिन इतने बड़े कलाकार की ये हालत.. सरकार के लिये यह बहुत शर्मनाक है. 
   
 

kulishindian (kulishindin@gmail.com) Bikaner

 
 कलाकार सरस्वती पुत्र होते हैं उनका साथ लक्ष्मीपुत्रों अर्थात धनपतियो को करना चाहिए व समाज को भी देश के सभी रंगकर्मियों को व टिप्पणी करनेवालों को मिलकर व अपने अपने शहर के रंगकर्मियों की सहायता से उनके नामपर डिमांड ड्राफ्ट भेजकर उनकी सहायता कर सकते हैं. इस पंगु सरकार को कोस कर हम उनकी व अन्य कलाकारों की सहायता नही कर सकते. 
   
 

ASHOK KUMAR GUPTA () INDORE

 
 यदि सरकार कुछ नहीं करती है तो क्या,पूरे भारत में और कोई नहीं है जो ऐसे कलाकारों की मदद के लिए आगे आये. 
   
 

एम. अखलाक (analhaque2002@yahoo.co.in) ु

 
 सरकार को शर्म आनी चाहिए. हम ऐसे मुल्‍क में रहते हैं जहां कला और कलाकार तो है लेकिन मुकम्‍मल कला नीति नहीं. आइए मिलकर कलाकार नीति बनाने के लिए अपनी-अपनी सरकारों से मांग करें. बिहार से इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी है. संयोजक - गांव जवार. 
   
 

laxman naidu raipur chhattisgarh

 
 यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, की गोविन्द जी जैसे कलाकार पदमश्री मिलने के बाद भी तंगहाली के दौर से गुजर रहे है. देश के mp, mla, minister अपनी payment,facility बढ़ा रहे है और गोविन्दजी जैसे अनेक कलाकार भगवान भरोसे जिंदगी बिता रहे है. 
   
 

Anamika (Anamika7577@gmail.com) Faridabad

 
 बहुत दुख हुआ ऐसे नामी-गिरामी कलाकार की ये खस्ता हालत जानकर. अब मीडिया यहां शायद नहीं आयेगा. 
   
 

Dr.Chandrakumar Jain (chandrakumarjain@gmail.com) Rajnandgaon ( 36 Garh )

 
 कलाकार की कला की परख ही उसका जीवन है. कला को प्रदत्त प्रोत्साहन व सम्मान उत्प्रेरक का काम करता है.किन्तु उसकी कलाधर्मिता को बचाए रखने से बड़ा उत्तरदायित्व कुछ और नहीं.इसे मैं एक राष्ट्रीय कर्तव्य की तरह समझता हूँ. 
   
 

sunder lohia (lohiasunder2@gmail.com) Mandi ( H.P}.

 
 कला और संस्कृति के संरक्षण के नाम पर करोरों रुपये कला अकदमियों के नौकरशाहों की तन्खवाह के तौर पर खर्च करने वाली लोकतान्त्रिक सरकारों से पूछा जाना चाहिए की क्या उन्हें पदम् श्री जैसे सम्मान इस तरह मर जाने के लिए दिए जातें हैं? अकादमी पुरस्कारों के लिए सरकार और उसके अफसरों की चाटुकारिता का धंधा करने वाले लेखकों से भी पूछा जाये क्या वे पुरस्कार लेने के बाद इस तरह की दयनीय जिंदगी जीना चाहतें हैं? अगर नहीं तो पुरस्कारों के बदले कलाकारों के सम्मानजनक जीवन को सुरक्षित करने के लिए सरकार को मजबूर क्यों नहीं करते?

लेखक संगठनों को एक प्रस्ताव पास करके मांग करनी होगी की लेखकों का सम्मान जनता करती रहे लेकिन बेबस लेखकों को हर प्रकार की मदद सरकार का जिम्मा होना चाहिए. राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत कलाकार के जीवन के अंतिम वर्ष ऐसी हालत में गुजरें तो इस से बड़ी राष्ट्रीय शर्म और क्या हो सकती है? दरअसल कलाकारों की ऐसी हालत गरीब और आदिवासी कलाकारों में ज्यादा होती है क्योंकि उनके पास अपनी कला के अलावा और दूसरा धंधा नहीं होता. वे साहित्यकारों की तरह प्रोफेसर या पत्रकार नहीं होते. अंतिम सांसों तक उनकी कला ही उनके परिवार के रोटी पानी का साधन होती है. उनके लिए कोई पेंशन या फैलोशिप वगेरह तो होती नहीं. हो सकता है किसी के पास घर में ऐसी सनद को संभल कर रखने की जगह ही न हो. सम्मान के बगेर वे मांग कर भी गुज़ारा कर लेते हैं लेकिन राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद यदि भीख मंगनी पड़े तो शर्म सम्मान देने वाले को आनी चाहिए.
 
   
 

रंगनाथ सिंह (rangnathsingh@gmail.com) Delhi

 
 गोविंद जी यह हालत जानकर आश्चर्य हुआ। हबीब तनवीर जैसे बड़े नाटककार की टीम के सदस्यों की ये हालत है। फिर भी सामान्य रंगकर्मियों की बात करना बेकार होगा। उन्हें पदमश्री लौटाना ही चाहिए। संभव है,सरकार को शर्म आए !
 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in