यह तो शांति की परिभाषा नहीं
बाईलाइन
यह तो शांति की परिभाषा नहीं
एमजे अकबर
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की निराशाजनक स्थिति बयां करने के लिए ज्यादा शब्दों
की जरूरत नहीं. ये दोनों मुल्क एक ऐसी सड़क के अलग-अलग छोरों पर चल रहे हैं, जो आगे
चलकर गर्त की शक्ल अख्तियार कर लेती है. दोनों एक-दूसरे को देख सकते हैं, लेकिन
मिलने की कोई सूरत नहीं. ट्रैफिक सिगनल तो भरोसे के लायक नहीं और मनोवैज्ञानिक या
भावनात्मक जेब्रा क्रॉसिंग भी नहीं हैं. बीते छह दशकों में यह संकरी सड़क ऐट-लेन
हाईवे बन चुकी है. यदि आप अमन-चैन के जज्बे से भरे हुए हैं, तो आप सबसे अच्छा यही
कर सकते हैं कि अफसरों के मार्फत शुभकामना संदेशों का लेनदेन करें. जहां तक सबसे
बुरी नौबत का सवाल है तो वह आतंकी हिंसा से जाहिर है ही.
लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह हैं कि जहरीले इतिहास में मिठास घोल देने के लिए कमर कसे हुए
हैं. हालात से भलीभांति वाकिफ होने के बावजूद वे भीड़भरे ट्रैफिक के ऊपर एक पुल बना
डालने की कोशिश कर रहे हैं. यह उन जापानी प्रोजेक्टों की तरह है, जिनमें किसी
सुरक्षित और गुप्त स्थान की दीवारों के पीछे स्कायस्क्रैपर होटल बनाया जाता है और
फिर सही वक्त आने पर उसे हवाई रास्ते से किसी खाली जगह पर प्लांट कर दिया जाता है.
लोग इस प्रोजेक्ट के पूरी तरह मुकम्मल होने तक उसके बारे में केवल धुंधला अनुमान ही
लगा पाते हैं. कोई पुल चाहे कितना ही काबिले-तारीफ हो, लेकिन उसकी जरूरत इससे
ज्यादा है. वह हवा में लटका हुआ हो सकता है, लेकिन उसकी नींव मजबूत चट्टानों के बीच
होनी चाहिए. यह सवाल 1947 जितना ही पुराना है कि आपके पैरों के नीचे जो जमीन है, वह
कितनी पुख्ता है? क्या वह अलग-अलग आदर्शो वाले राष्ट्रवादियों का सामना कर सकती है,
जो सेंध लगाने की फिराक में हैं?
पाकिस्तानी राष्ट्रवाद में अन्याय और अविश्वास का
अहसास इतना गहरा है कि इस्लामाबाद कश्मीर वादी के कुछ हिस्से से कम पर समझौता करेगा
नहीं और दिल्ली यह सौदा कभी कबूल करेगी नहीं. चूंकि अब इसमें कोई राज की बात नहीं
रह गई है, इसीलिए भारत की विदेश सचिव निरूपमा राव ने सार्वजनिक रूप से एक अंतरिम
व्यवस्था की रूपरेखाओं को रेखांकित कर दिया है. यह सीमा, व्यापार और परिवहन के
क्षेत्रों में नरम रुख अख्तियार करने के सिंह-मुशर्रफ फॉमरूले के इर्द-गिर्द चली एक
लंबी प्रक्रिया का अहम हिस्सा था.
यहां दो सवाल पैदा होते हैं. क्या कोई भी अनुबंध नहीं होने से अंतरिम अनुबंध ही
बेहतर है? और क्या यह किसी साझा मंजिल तक पहुंचने का एक मुकाम साबित होगा या दोनों
मुल्क सड़क के अलग-अलग छोरों पर ही बने रहेंगे? जब मुंबई पर हमला हुआ और लश्करे
तैयबा जैसे संगठनों को पाकिस्तान में लगातार संरक्षण दिया जाता रहा तो सॉफ्ट बॉर्डर
का विकल्प प्रासंगिक हो गया था.
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यदि एलओसी को
अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता मिल जाती है तो यह भारत के लिए जश्न का
मौका होगा. जाहिर है पाकिस्तान इस जश्न में शामिल नहीं होगा. |
अपनी इस्लामाबाद यात्रा के दौरान निरूपमा राव उनसे
पहले दिल्ली की यात्रा करने वाले पाकिस्तानी विदेश सचिव की तुलना में कहीं ज्यादा
सदाशय साबित हुईं. उन्होंने आतंकवाद को तो नाकाबिले बर्दाश्त बताया, लेकिन अपने
आशयों को सामान्य ही बनाए रखा. उन्होंने पाकिस्तान से यह मांग नहीं की कि वह उन
लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई करे, जो कश्मीर मसले का इस्तेमाल ‘छद्म युद्ध’ के लिए
एक बहाने के तौर पर करते हैं. जिस दिन गृह मंत्री पी चिदंबरम सार्क मीटिंग के लिए
इस्लामाबाद में थे, उसी दिन कश्मीर घाटी में मुस्तैद आतंकियों और सीमा पर फैले उनके
कर्ताधर्ताओं के बीच हो रही बातचीत के सूत्र आईबी के हाथ लगे. अगर एलओसी के
आधिकारिक रूप से ‘हार्ड’ होने पर ही ये हालात हैं, तो ‘सॉफ्ट’ होने पर क्या होगा.
दिल्ली की रणनीति शायद यह है कि विदेश मंत्रालय के बाएं हाथ को गृह मंत्रालय के
दाएं हाथ से जितना मुमकिन हो सके, उतना दूर रखो. लेकिन यह मर्ज का इलाज नहीं है.
शायद गलती बातचीत के स्तर पर नहीं, अपेक्षाओं के स्तर पर हो रही है. पड़ोसियों को
आपस में बतियाना चाहिए, यह तो कोई बौड़म भी बता देगा. लेकिन बातचीत मोहब्बत में
तब्दील हो, इसके लिए महज शब्दों का इस्तेमाल नाकाफी है.
दोनों मुल्कों के बीच अमन का माहौल तब तक नहीं बन सकेगा, जब तक कि लक्ष्यों में
बुनियादी बदलाव नहीं किया जाता. यहां बुनियादी चूक को समझना भी मुश्किल नहीं है. और
वह यह है कि सॉफ्ट और हार्ड बॉर्डर के बारे में बात करने से पहले ‘बॉर्डर’ पर तो
सहमति बना ली जाए. भारत अपना मन बना चुका है. यदि एलओसी को अंतरराष्ट्रीय सीमा की
मान्यता मिल जाती है तो यह भारत के लिए जश्न का मौका होगा. जाहिर है पाकिस्तान इस
जश्न में शामिल नहीं होगा. लेकिन जब तक इस सवाल का जवाब नहीं तलाश लिया जाता, तब तक
भारत और पाकिस्तान केवल इतना ही कर सकते हैं कि असहमतियों पर सहमत हों.
यह किसी भी नजरिए से शांति की परिभाषा नहीं होगी.
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लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.
28.06.2010,
10.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित