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उसका चेहरा-कहानी रामकुमार तिवारी

कहानी

उसका चेहरा

 

रामकुमार तिवारी


हवा इतनी ठंडी और तेज़ थी कि विपरीत दिशा में चलना सुख की तरह था. दिनेश की इच्छा पान खाने की हुई. पान की गुमटी के पास बलदेव खड़ा था. दिनेश ने बलदेव को देखते ही कहा-"मुझे ज़मीन मिल गई".

बलदेव की आँखें आश्चर्य-मिश्रित औपचारिकता में फैलीं और फिर आगे सुनने के लिए स्थिर हो गईं. इसी बीच, बगल में चाय की गुमटी के पास खड़ा आदमी गिरते-गिरते अचंभे की तरह दिनेश के सामने खड़ा हो गया.


"कहाँ है? कहाँ है?" उसने कुछ इस तरह पूछा जैसे वह ज़मीन पर नहीं, हवा में लटका हो.

"बसंत बिहार में है. बाज़ार बमुश्किल आधा किलोमीटर होगा. मैं बहुत दिनों से ज़मीन के लिए भटक रहा था."

दिनेश का कहा सुनकर वह बिना कुछ बोले चुपचाप चला गया. उसकी चाल में एक अव्यक्त दृढ़ता थी. वह नीली बध्धियों वाली हवाई चप्पल पहने था और उसका पैजामा सामान्य से कुछ ऊँचा था. पैजामा कम कपड़े की वजह से कुछ ऊँचा सिला होगा, जो पहली ही धुलाई में सिकुड़कर कुछ और ऊँचा हो गया होगा. धुलने से पैजामे का कद ऊँचा हो गया था लेकिन आदमी की स्थिति कुछ गिर-सी गई थी जिसे उसकी मनःस्थिति ने संभाल लिया था. वह अस्वाभाविक नहीं लग रहा था. चलते-चलते वह अपने पहनावा दिखने और होने से बहुत दूर निकल गया था.

दिनेश ने उस दिशा की सड़क को देखा जिसमें वह ओझल हो गया था.

आज दिनेश को शहर की भीड़ से उकताहट नहीं हो रही थी. उसने चलते-चलते पान की पीक छोड़ी, जो सरकारी अस्पताल की टूटी दीवार के उस पार तक गई. उसे अपने फेफड़ों में अधिक हवा का होना अनुभव हुआ. वह लंबे-लंबे कदम बढ़ाता घर की ओर चल दिया.

घर में बैठक की खिड़की खुली थी और पर्दा हवा में उड़ रहा था. सामने की दीवार पर कैलेंडर टंगा था जिसमें एक सुंदर मकान की तस्वीर थी. हवा में कैलेंडर के साथ-साथ मकान भी उड़ रहा था. दिनेश को तस्वीर का मकान किसी शिशु की तरह दिखा, जिसे कोई हवा में उछाल-उछाल कर खिला रहा हो.

दिनेश को रात में पेशाब के लिए बाहर जाना पड़ता है. बिस्तर का चादर ठीक करते-करते वह सोचने लगा, मकान में अपने बेडरूम से अटैच बाथरूम बनवाऊँगा, पेशाब के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा.

कपड़े चेंज करने के लिए वह पैजामा खोजने लगा. जैसे ही उसने पैजामा पहना तो उसे लगा पैजामा कुछ ऊँचा है और वह अजीब-सा दिख रहा है. उसने नाड़ा खोलकर पैजामे को नीचे खिसकाकर फिर से बांधा और संतुष्ट हो गया.

सड़क के किनारे फुटपाथ पर पेड़ों की पौध बेचने वाला बैठा था. दिनेश को वही चाय की गुमटी वाला आदमी पौधों के पास खड़ा दिखा.

दिनेश ने उसके पास जाकर कहा, "कैसे हो?"

"ठीक हूँ"

"क्या पौधे ले रहे हो?"

"नहीं! देख रहा हूँ. लेकर क्या करूँगा...कहाँ लगाऊँगा?"

"क्यों तुम्हारी ज़मीन नहीं है?"

"नहीं, मेरी कोई ज़मीन नहीं है और न ही मेरे पिता की कोई ज़मीन थी. मुझे आश्चर्य होता है कि बिना ज़मीन के हम कैसे पैदा हो गए?"

वह एक स्वस्थ नीम के पौधे को हाथों में लिए था जिनमें से एक सुंदर पेड़ का आकार आने वाले समय में फैल रहा था. उसने पौधे को देखते हुए कहा, "यह कितना सुंदर है."

दिनेश ने उसका मन रखने के लिए कहा, "इसे ले लो, जहाँ रहते हो वहीं किसी खाली जगह में लगा देना."

उसने दिनेश की आँखो में देखते हुए कहा, "इससे क्या होगा? क्या यह जिंदा रहेगा? जिसकी अपनी ज़मीन नहीं होती वह किसी तरह भी नहीं बचता. बस बचा हुआ-सा दिखता है. पेड़ों की अपनी ज़मीन होनी चाहिए, वे अकाल मौत मर रहे हैं. जहाँ आज तुम खड़े हो, 12 वर्ष पहले यहाँ घना जंगल था. शाम के बाद आने में डर लगता था लेकिन यह ज़मीन उन पेड़ों की नहीं थी, सो वे नहीं रहे."

उसकी बातें सुनकर दिनेश को विश्वास नहीं हुआ. यह सब जो उसने अभी-अभी सुना है, उसे वही चाय की गुमटी वाले आदमी ने ही बोला है. वह विस्मय से इसे देखता रह गया और फिर कुछ देर बाद महज बात को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उसने कहा, "आज न जाने कितने आदमियों के पास रहने के लिए एक कमरे की जगह नहीं है, पेड़ों के लिए ज़मीन की चिंता कौन करेगा?"

"चिंता तो करनी पड़ेगी. पेड़ों की अपनी ज़मीन नहीं होगी तो लोगों को बिना पेड़ों के रहना पड़ेगा और यह आत्महत्या ही होगी." दिनेश को उसकी बात समझ में नहीं आई.

उसने दिनेश की आँखों में देखते हुए फिर कहा, "क्या तुम्हे पता है कि यह पेड़ जिसके नीचे हम खड़े हैं, क्यों ज़िंदा है? क्योंकि यह आदमी के आदेश से खड़ा है. जो स्वतंत्र होगा, उसे कभी भी मारा जा सकता है. तुमने गर्मी के दिनों में प्याऊ में पानी पिलाते किसी बूढ़े, बच्चे या स्त्री को देखा होगा. यह पेड़ वैसा ही है, इसलिए ज़िंदा है. एक दिन तुम देखना यह सड़क चौड़ी होगी और यह पेड़ नहीं रहेगा."

"सड़क का चौड़ा होना ज़रूरी है. आए दिन एक्सीडेंट होते रहते हैं. अपने ही शहर में औसतन चार-पाँच आदमी रोज़ मरते हैं."

"ठीक है लेकिन इसके लिए पेड़ ज़िम्मेदार नहीं. लोग अपनी मौत ही मर रहे हैं."
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ranjeet(ranjeetkumarnayak@gmail.com)

 
 is lekha ko padha kar achha lagaa. 
   
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