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कश्मीरीयत की वापसी

मुद्दा

 

कश्मीरीयत की वापसी

राम पुनियानी


पिछले दिनों महिलाओं और बच्चों सहित, हजारों कश्मीरी पंडित श्रीनगर से 20 किलोमीटर दूर तुलामुला में स्थित माता खीर भवानी के दर्शनों के लिए पहुंचे. वह ज्येष्ठ अष्टमी का पवित्र दिन था. इनमें से अधिकांश पंडितों ने करीब 20 साल बाद कश्मीर घाटी में दुबारा कदम रखा था. अलगाववादी अतिवादियों की गतिविधियों और उनसे निपटने की सरकार की गलत रणनीति के चलते पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा था.

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माता खीर भवानी का मंदिर रागन्या देवी को समर्पित है. उस दिन, वातावरण में श्रद्धा और आध्यात्मिकता घुली थी. बड़ी संख्या में स्थानीय मुसलमान, पंडितों का स्वागत करने के लिए वहाँ मौजूद थे. वे श्रद्धालुओं में खीर और शीतल पेय बाँट रहे थे. जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री और कई मंत्री भी वहाँ थे. वे भी पंडितों के उनकी जन्मभूमि से पुनर्मिलन के भावुक क्षणों के साक्षी बने.

स्थानीय मुसलमानों और मंत्रियों ने कहा कि सभी संबद्ध व्यक्तियों को पंडितों की घाटी में वापसी के लिए हर संभव प्रयत्न करने चाहिए क्योंकि पंडितों के बिना, कश्मीरियत अधूरी है. पंडित, कश्मीर की संस्कृति और वहाँ के दैनिक जनजीवन के अविभाज्य हिस्से हैं. पंडितों ने भी यह वायदा किया कि वे राजनेताओं व अतिवादियों द्वारा खड़ी की गई दीवारों को लाँघ कर अपनी मातृभूमि वापस आने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. पंडितों की घाटी में वापसी की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है, यद्यपि इसकी गति अभी बहुत धीमी है.

कश्मीर को भारत और पाकिस्तान, दोनों ही केवल जमीन के एक टुकड़े के रूप में देखते रहे हैं. एक ऐसी संपत्ति के रूप में जिस पर किसी भी हालत में अपना कब्जा बरकरार रखा जाना है. पाकिस्तान की कई सरकारों ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए ‘कश्मीर मुद्दे’ का जमकर इस्तेमाल किया. भारत की सरकारों ने कश्मीरी जनता की महत्वकांक्षांओं को हमेशा नजरअंदाज किया. इस सबके चलते कश्मीरियत- जो कश्मीर की आत्मा है-कहीं पीछे छूट गई. कश्मीर एक सांप्रदायिक समस्या बन गई. कश्मीर दो पड़ोसी देशों के बीच विवाद का मुद्दा बन गया.

कश्मीर की आत्मा है कश्मीरियत, जो विभिन्न धर्मो की शिक्षाओं के एक-दूसरे से घुल-मिल जाने से बनी है. इनमें शामिल हैं गौतम बुद्ध, वेदांत और इस्लाम की सूफी परंपरा की शिक्षाएं. कश्मीर में एक समय बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था. उच्च जातियों के सदस्यों को छोड़कर, लगभग हर कश्मीरी बौद्ध बन गया था. आठवीं सदी में बौद्ध धर्म पर ब्राम्हणवादी हिन्दू धर्म के हमले ने हालात बदल दिए. बाद में, बड़ी संख्या में सूफी संत कश्मीर पहुंचे और उन्होंने इस्लाम के अपने संस्करण को वहाँ फैलाना शुरू किया. इनमें से सबसे प्रसिद्ध थे शेख नूरूद्दीन नूरानी, जिन्हें आम लोग नुंद ऋषि के नाम से जानते हैं. वे ललद्यद के अनुयायी थे, जो स्वयं पहले के सूफी संतो से गहरे तक प्रभावित थीं. उनके छंदों में शैव धर्म की झलक मिलती है. आज भी, हिन्दू व मुसलमान-दोनों उन्हें अपना मानते हैं. महान भक्ति कवि कबीर की तरह, ललद्यद के बारे में भी कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनका शरीर फूलों के एक ढेर में बदल गया था. आधे फूल मुसलमानों ने दफना दिए और आधे हिन्दुओं ने चिता के हवाले कर दिए.

नुंद ऋषि ने ललद्यद की शान में बहुत कुछ लिखा. उन्होंने ललद्यद की साझा संस्कृति में अटूट आस्था की चर्चा की- उन मूल्यों की, जो हमें सिखाते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई फर्क नहीं है और यह भी कि अपनी आत्मा से साक्षात्कार ही हमें ईश्वर तक पहुंचा सकता है. स्वयं नुंद ऋषि का जोर भी आत्मा के शुद्धिकरण पर था. उन्होंने उन मौलवियों व ब्राम्हणों की कड़ी निंदा की, जो धर्म के नैतिक और आध्यात्मिक पक्ष की जगह, कर्मकांडों को महत्व देते हैं. नुंद ऋषि कश्मीर में एक शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन के प्रणेता बने और इस आंदोलन के प्रभाव में कई कश्मीरियों ने इस्लाम को अपना लिया.

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडितों के अलावा, कई कश्मीरी मुसलमानों को भी घाटी छोड़नी पड़ी है.


यह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पिछले तीन दशकों से खतरे में पड़ गई है. अल् कायदा जैसे तत्वों की कश्मीर में घुसपैठ के कारण कश्मीर की समस्या ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया. अफगानिस्तान में रूसी सेना से लड़ने के काम से फुर्सत पाते ही इन तत्वों ने कश्मीर घाटी की ओर रूख कर लिया. सन् 1990 के दशक में कश्मीरी अतिवाद का स्वरूप बदल गया. वह साम्प्रदायिक हो गया. कश्मीर के हालात बिगड़ने के पीछे एक कारण सन् 1980 के दशक में शेष भारत में हुए भयावह साम्प्रदायिक दंगे और बढ़ती साम्प्रदायिकता भी थे. इनने कश्मीर में लगी आतंकवाद की आग में घी का काम किया. कश्मीरी पंडितों और वहां के मुसलमान रहवासियों के बीच के सौहार्द को आतंकवादियों ने बैरभाव में बदल दिया.

कश्मीर की आम जनता आक्रोशित थी और उसमें अलगाव का भाव उत्पन्न हो गया था. इस स्थिति का लाभ अमरीकी साम्राज्यवादी लक्ष्यों की पूर्ति के लिए पाकिस्तान के मुल्ला-सेना गठजोड़ ने उठाया. कश्मीरी पंडित वहां के अतिवादियों के निशाने पर आ गए. तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की नीतियों ने स्थिति को और बिगाड़ा. जिस समय स्थानीय निवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल, पंडितों से मिलकर उनसे यह अनुरोध करने की तैयारी कर रहा था कि वे घाटी को छोड़कर न जाएं, उस समय जगमोहन, पंडितों को घाटी से बाहर ले जाने के लिए ट्रकों और बसों का सरकार की ओर से इंतजाम कर रहे थे. स्थानीय मुसलमान, पंडितों के कश्मीर छोड़कर जाने के खिलाफ थे परंतु जगमोहन के प्रोत्साहन के कारण पंडितों ने घाटी छोड़ दी. दो देशों के बीच की समस्या अब पूरी तरह साम्प्रदायिक रंग अख्तियार कर चुकी थी.

शरणार्थी शिविरों में रह रहे पंडितों को अमानवीय परिस्थितियों में अपना जीवनयापन करना पड़ रहा है. अधिकांश पंडित परिवारों ने बहुत दुःख भोगे हैं. हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पंडितों के अलावा, कई कश्मीरी मुसलमानों को भी घाटी छोड़नी पड़ी है. उन पर एक ओर आतंकवादी हमले हो रहे थे और दूसरी ओर भारतीय सेना उन पर अत्याचार कर रही थी. कश्मीर में भारतीय सेना का व्यवहार लगभग वैसा ही है, जैसा कि सेनाएं किसी इलाके पर कब्जा करने के बाद करती हैं. लंबे समय से सेना की मौजूदगी ने घाटी के सामान्य जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है.

भारत की साम्प्रदायिक ताकतें, कश्मीरी पंडितों के हाल पर तो मगरमच्छी आंसू बहाती रहीं परंतु उनके प्रचारतंत्र ने कश्मीर में हिंसा के शिकार हुए मुसलमानों की चर्चा कभी नहीं की. त्रासद यह है कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के सत्ता में रहने के छह वर्षों के दौरान भी पंडितों सहित कश्मीर में अतिवाद के पीड़ितों के लिए कुछ नहीं किया गया.

इस समय कश्मीर का वातावरण पहले से बहुत बेहतर है. यद्यपि अतिवादी अभी भी सक्रिय हैं और सेना अभी भी अत्याचार करने से बाज नहीं आ रही है तथापि प्रजातांत्रिकरण की प्रक्रिया ने स्थानीय नेतृत्व की एक नई, दूसरी पंक्ति को जन्म दिया है, जो कश्मीरियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को स्वर दे रही है. कुछ हद तक अमरीका की नीतियों में परिवर्तन ने भी कश्मीर में शांति की बहाली में योगदान दिया है.

खीर मंदिर में जुटी पंडितों और मुसलमानों की भीड़, कश्मीरियत के पुनर्जीवित होने की प्रक्रिया की शुरूआत कही जा सकती है. हमें उम्मीद है कि कश्मीरियत की यह भावना आने वाले दिनों में और मजबूत होगी और प्रजातांत्रिक रास्ते से चुनी हुई कश्मीर की सरकारें वहां के लोगों की समस्याएं सुलझाएंगी व उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करेंगी. हम यह उम्मीद भी करते हैं कि भारत-पाक रिश्ते सुधरेंगे क्योंकि यही कश्मीर घाटी में शांति की सबसे बड़ी गारंटी होगी.

 

29.06.2010, 09.16 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

मिहिरभोज (drmihirbhoj@gmail.comn) जयपुर

 
 एक कश्मीरियत भरा भरपूर आलेख.आपके विचार बहुत ही अच्छे हैं. बाकी कश्मीरी मुसलमानों की साम्प्रदायिक सौहार्द्र तो हम से छिपा नहीं जब अमरनाथ यात्रा से लौटे हुए फूटे सिर टूटी गाङियां जयपुर लौटी थी.आप जैसे बिके हुए लोग कब तक झूठ पर झूठ बोलते रहेंगे.हां कश्मीरीयों को धंधे की कमी तो है ही नहीं.आपके न्यूज चैनल रोज लिवाईस की जींस टीशर्ट पहने इन मासूम युवा लोगों को फौज पर पत्थर बाजी करते दिखाते हैं. दुनिया में यहीं सिर्फ सर फोङने पर पैसा पाते हैं लोग, ये नहीं बताया आपने. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 एक हिमालयी घुमंतू लेखक के रूप में मैं लगातार कश्मीर आता-जाता रहा हूँ. पुनियानी जी ने सही कहा है की बौद्ध लोगों पर ब्रह्मणों के हमलों से लेकर पंडितों पर आतंकवादियों के हमलों तक कश्मीर लहुलुहान रहा और पिछले सालों में वहाँ के आम मुसलामानों की जितनी जानें गयी हैं, उसे कोई देख नहीं रहा. कितने ही मुसलमान आज कश्मीरी पंडितों की तरह रोजी-रोटी के लिए कश्मीर से बाहर भटक रहे हैं, इसे मैंने खुद देखा है, अब बैर भुला कर ही बात बनेगी. 
   
 

जितेन्द्र गोस्वामी राजस्थान

 
 पुनियानीजी,एक अच्छे ज्ञानवर्धक, साम्प्रदायिक सदभावपूर्ण, निष्पक्ष विश्लेषणात्मक लेख के लिये हार्दिक साधुवाद। 
   
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 कश्मीरियत के इस पहलू से रुबरु करने के लिये आभार. 
   
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