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रणेन्द्र की एक कविता

साहित्य

 

रणेन्द्र की एक कविता

 

अभी तो
शब्द सहेजने की कला

ranendra

अर्थ की चमक, ध्वनि का सौंदर्य
पंक्तियों में उनकी सही समुचित जगह
अष्टावक्र व्याकरण की दुरूह साधना
शास्त्रीय भाषा बरतने का शऊर
इस जीवन में तो कठिन

जीवन ही ठीक से जान लूँ अबकी बार

जीवन जिनके सबसे खालिस, सबसे सच्चे, पाक-साफ, अनछूए
श्रमजल में पल-पल नहा कर निखरते
अभी तो,
उनकी ही जगह
इन पंक्तियों में तलाशने को व्यग्र हूँ

अभी तो,
हत्यारे की हंसी से झरते हरसिंगार
की मादकता से मताए मीडिया के
आठों पहर शोर से गूँजता दिगंत
हमें सूई की नोंक भर अवकाश देना नहीं चाहता

अभी तो,
राजपथ की
एक-एक ईंच सौंदर्य सहेजने
और बरतने की अद्भुत दमक से
चौंधियायी हुई हैं हमारी आँखें

अभी तो,
राजधानी के लाल सूर्ख होंठों के लरजने भर से
असंख्य जीवन, पंक्तियों से दूर छिटके जा रहे हैं

अभी तो,
जंगलों, पहाड़ों और खेतों को
एक आभासी कुरूक्षेत्र बनाने की तैयारी जोर पकड़ रही है

अभी तो,
राजपरिवारों और सुख्यात क्षत्रिय कुलकों के नहीं
वही भूमिहीन, लघु-सीमान्त किसानों के बेटों को
अलग-अलग रंग की वर्दियाँ पहना कर
एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है
लहू जो बह रहा है
उससे बस चन्द जोड़े होंठ टहटह हो रहे हैं

अभी तो,
बस्तर की इन्द्रावती नदी पार कर गोदावरी की ओर बढ़ती
लम्बी सरल विरल काली रेखा है
जिसमें मुरिया, महरा, भतरा, गड़वा, कोंड, गोंड
और महाश्वेता की हजारों-हजार द्रौपदी संताल हैं

अभी तो,
जीवन सहेजने का हाहाकार है
बूढ़े सास-ससुर और चिरई-चुनमुन शिशुओं पर
फटे आँचल की छाँह है
जिसका एक टुकड़ा पति की छेद हुई छाती में
फँस कर छूट गया है

अभी तो,
तीन दिन-तीन रात अनवरत चलने से
तुम्बे से सूज गए पैरों की चीत्कार है
परसों दोपहर को निगले गए
मड़ुए की रोटी की रिक्तता है
फटी गमछी और मैली धोती के टुकड़े
बूढ़ों की फटी बिबाईयों के बहते खून रोकने में असमर्थ हैं
निढ़ाल होती देह है
किन्तु पिछुआती बारूदी गंध
गोदावरी पार ठेले जा रही है

अभी तो,
कविता से क्या-क्या उम्मीदें लगाये बैठा हूँ
वह गेहूँ की मोटी पुष्ट रोटी क्यों नही हो सकती
लथपथ तलवों के लिए मलहम
सूजे पैरों के लिए गर्म सरसों का तेल
और संजीवनी बूटी

अभी तो,
चाहता हूँ कविता द्रौपदी संताल की
घायल छातियों में लहू का सोता बन कर उतरे
और दूध की धार भी
ताकि नन्हें शिशु तो हुलस सकें

लेकिन सौंदर्य के साधक, कलावन्त, विलायतपलट
सहेजना और बरतना ज्यादा बेहतर जानते हैं
सुचिन्तित-सुव्यवस्थित है शास्त्रीयता की परम्परा
अबाध रही है इतिहास में उनकी आवाजाही

अभी तो,
हमारी मासूम कोशिश है
कुचैले शब्दों की ढ़ाल ले
इतिहास के आभिजात्य पन्नों में
बेधड़क दाखिल हो जाएँ
द्रौपदी संताल, सीके जानू, सत्यभामा सौंरा,
इरोम शर्मिला, दयामनी बारला और ..... और .....

गोरे पन्ने थोड़े सँवला जाएँ

अभी तो,
शब्दों को
रक्तरंजित पदचिन्हों पर थरथराते पैर रख
उँगली पकड़ चलने का अभ्यास करा रहा हूँ.

 

29.06.2010, 10.11 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

गरिमा (dreamsetter@gmail.com) जबलपुर

 
 आपकी कविता आत्मश्लाघा से ग्र्स्त हो गई है. शब्द सहेजती कविता जिंदगी सहेजने का दावा न करे तो ही बेहतर है. पात्रों के नाम उन्हें कालजयी नहीं बनाते. मोचीराम और आम आदमी इसके उदाहरण हैं. स्त्रीविमर्श, दलितविमर्श और वंचित पात्रों की लंबी परम्परा के बाद अब किन गोरे पन्नों को सांवला बनाना है. पर आपका कवि सशक्त है,पहली बार इतना सोचने नहीं देता. और बेहतर कविताओं की उम्मीद के साथ,बधाई।  
   
 

अभिषेक कुमार (abhishekwriter@gmail.com) नई दिल्ली

 
 पंक्तियों में शब्दों की जगह जिंदगियों के लिए स्थान खोज लेना बड़ा काम है। पर पहले और आखिरी अनुच्छेद में अन्तर्विरोध आ गया है। शायद यह कवित्व और व्यक्तित्व के बीच की दूरी है। हमारी कोशिश तो शब्दों को ही सहेजने की है, फ़िर जिन्दगियों को सहेजने की बात क्यों की जाए! कविता ईमानदार बनी है पर फ़िर कवि कविता के व्याकरण पर क्यों सवाल कर रहे हैं? कविता ने तो रंगभेद, जातिभेद या शोषण पर विरोधी व्याकरण नहीं रचा है! विलायतपलट समकालीनों की बात किए बगैर अगर कविता हो तो ईमानदारी असरदार हो जाती।  
   
 

GURU SARAN LAL (gurusaranlal@gmail.com) BILASPUR(C.G.)

 
 कविता अच्छी लगी. कवि कहता है कि अभी तो लिखने की समझ पैदा करनी है. जबकि कवि इतनी अच्छी कविता कहता है. अच्छा है. 
   
 

राहुल राजेश (rahulrajesh2006@gmail.com) अहमदाबाद

 
 बहुत दिनो बाद रणेंद्र जी की कविता पढ़ी. उन्हें बधाई. कविता थोड़ी लंबी हो गई है. इन्हें कुछ कविता खंडों में बांट कर प्रस्तुत करने से प्रभाव सांद्र होगा. साथ ही, कविता में ढेर सारे नामों, प्रांतों और संदर्भों के एक साथ उल्लेख कर देने से कविता में बोझिलता आ गई है. पर रणेंद्र जी ऐसा करने का लोभ-संवरण नहीं कर पाते. रणेंद्र जी की कविता 'युद्ध' आज भी उनकी सबसे अच्छी कविताओं मे से एक है और शायद रहेगी. 
   
 

मनोज शर्मा (smjmanoj.sharma@gmail.com) जम्मू

 
 बहुत कुछ एक कविता में ही बांधा गया है. बहुत बार ऐसा शिल्प कविता की ताकत बनता है और बहुत बार सीमा भी. मुक्तिबोध.मानबहादुर सिंह,लीलाधरजगूडी,विष्णु खरे हमारे पास सशक्त उदाहरण है. 
   
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