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लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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हिमालय में खुलता एक मोर्चा

मुद्दा

 

हिमालय में खुलता एक मोर्चा

अभिषेक श्रीवास्तव किन्नौर, हिमाचल प्रदेश से लौटकर


पिछले दिनों हिमाचल के रोहतांग से लेह तक एक सुरंग के उद्घाटन की खबर को मीडिया में काफी जगह मिली थी. ऐसा इसलिए भी क्योंकि इसका उद्घाटन करने यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी खुद गई थीं. राज्य के मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने इस सुरंग को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण करार देते हुए चीन पर आरोप लगाया था कि वह सीमा पर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा संबंधी निर्माण कार्य करवा रहा है, जिससे पर्यावरण और सीमा सुरक्षा को कई दिक्कतें पैदा हो सकती हैं.

किन्नौर में जेपी के खिलाफ रैली


यह बात अपने आप में अंतर्विरोधी है, क्योंकि जिस मौके पर यह बात कही गई, वह खुद एक बुनियादी ढांचा परियोजना के उद्घाटन का अवसर था. इसे भी भारत-चीन सीमांत इलाके में ही बनाया जा रहा है. क्या यह बात हम पर भी लागू नहीं होती? विकास से जुड़ी किसी भी सीमांत परियोजना के ऐसे अंतर्विरोध एक बड़ी बहस को जन्म देते हैं. आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि चीन या कोई अन्य देश अगर सीमा पर निर्माण कार्य करे, तो वह देश की सुरक्षा और पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक हो जाए. जबकि यही काम अगर हम करें तो इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बता कर इसका जश्न मनाया जाए?

रणनीति और सुरक्षा के नाम पर चलाई जाने वाली ऐसी निर्माण परियोजनाओं ने देश के सुदूर सीमांत इलाकों को कैसे बरबाद किया है, इसका एक दृश्य हाल ही में देखने को मिला. हिमाचल के किन्नौर जिले का सीमांत गांव रकछम कहने को तो सैलानियों के लिहाज से काफी अपरिचित और टटका है, लेकिन यहां पहुंचने की राह में ही मन खट्टा हो जाता है.

किन्नर कैलाश की बर्फीली चोटियों से घिरे हुए इस गांव में कुल करीब आठ सौ की आबादी होगी. यहां से तिब्बत की सीमा बहुत करीब है और हिंदुस्तान के आखिरी गांव छितकुल की दूरी गाड़ी से महज आधे घंटे की है. यहां पहुंचने की राह में हालांकि ऐसा लगता है कि आप हिंदुस्तान में नहीं, बल्कि निजी कंपनियों के किसी उपनिवेश से गुजर रहे हों. सांगला घाटी से होकर बहने वाली नदी बास्पा को करीब पचास किलोमीटर पहले ही जयप्रकाश एसोसिएट नामक कुख्यात बांध निर्माता कंपनी ने सुरंग में बांध दिया है. रास्ते में धूल-धक्कड़ इतनी कि सांस लेना मुश्किल है. यहां बास्पा-2 पनबिजली परियोजना का काम चल रहा है.

कभी रकछम गांव में 20-25 फुट बर्फ गिरा करती थी. यहां के लोग बताते हैं कि यहां के लोगों ने कभी बारिश नहीं देखी थी क्योंकि यहां सीधे बर्फबारी ही होती है.

यहां के पूर्व ग्राम प्रधन यशवंत सिंह नेगी कहते हैं, ‘‘अब तो यहां चार फुट बर्फ ही गिरती है. बारिश भी होती है. बास्पा-2 परियोजना से तो यह हाल हुआ है, जबकि इस परियोजना का दूसरा चरण बनने पर तो इलाका तबाह ही हो जाएगा.’’

किन्नौर के मानचित्र पर यदि इन परियोजनाओं को काले बिंदुओं से दर्शाया जाए, तो समूचा नक्शा काला हो जाता है. सवाल उठता है कि इन परियोजनाओं से आखिर कौन सी रणनीतिक सुरक्षा हम यहां के जनजातीय समाज को देने जा रहे हैं?


किन्नौर जिला दरअसल ग्रेट हिमालयन डेजर्ट यानी शीत मरूस्थलीय क्षेत्र है. यहां बर्फबारी और बादल फटने के कारण सतलुज नदी में भयंकर बाढ़ आती है, क्योंकि सतलुज के जल संग्रहण क्षेत्र का नब्बे फीसदी हिस्सा शीत मरूस्थलीय क्षेत्र में स्थित है. 2000 और 2005 की बाढ़ अब भी यहां के लोगों को याद है. इसके अलावा यह क्षेत्र भूकंपीय मानचित्र के जोन-4 में स्थित है और सीमांत होने के कारण सुरक्षा और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है. इसके बावजूद सरकार ने यहां जिन जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी है, वे बेहद खतरनाक हैं.

किन्नौर जिले में एक के बाद एक लगातार कई निर्माणाधीन और प्रस्तावित जल विद्युत परियेाजनाओं ने यहां के वजूद पर ही सवाल खड़ा कर दिया है. सतलुज जल संग्रहण क्षेत्र में नाथपा झाकड़ी (1500 मेगावाट), संजय परियोजना (120 मेगावाट), बास्पा-2 (300 मेगावाट) तथा रूकती (1.5 मेगावाट) परियोजनाएं पहले से ही क्रियान्वित हैं और करच्छम-वांगतू (1000 मेगावाट), काशंग-1 (66 मेगावाट) और शौरंग (100 मेगावाट) परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. इनके अलावा चांगो-यंगथंग (140 मेगावाट), यंगथंग-खाब (261 मेगावाट), खाब-श्यासो (1020 मेगावाट), जंगी-ठोपन (480 मेगावाट), ठोपन-पोवारी (480 मेगावाट), शौंगठोंग-करच्छम (402 मेगावाट), टिडोंग-1 (100 मेगावाट) तथा टिडोंग-2 (60 मेगावाट) परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है. इसके अतिरिक्त श्यासो-स्पीलो (500 मेगावाट), काशंग-2 (48 मेगावाट), काशंग-3 (130 मेगावाट), बास्पा-1 (128 मेगावाट) तथा रोपा (60 मेगावाट) परियोजनाएं प्रस्तावित हैं.

स्थिति यह है कि यहां के मानचित्र पर यदि इन परियोजनाओं को काले बिंदुओं से दर्शाया जाए, तो समूचा नक्शा काला हो जाता है. सवाल उठता है कि इन परियोजनाओं से आखिर कौन सी रणनीतिक सुरक्षा हम यहां के जनजातीय समाज को देने जा रहे हैं?

इसके ठीक उलट इन परियोजनाओं के निर्माण से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा ही पैदा हो रहा है. ऐसी कोई भी परियोजनाओं युद्धकाल में दुश्मन के लिए सॉफ्ट टार्गेट का काम करती है. गौरतलब है कि चीन के साथ इन परियोजनाओं के मद्देनजर भारत ने कोई जल संधि नहीं की है. चीन पहले ही सतलुज नदी पर अनेक बांध बना चुका है और सतलुज के पानी को पूर्वी तिब्बत की ओर मोड़ने की योजना बना रहा है. ऐसे में रक्षा व गृह मंत्रालय की मंजूरी के बगैर इस इलाके को बड़े पैमाने पर निजी कंपनियों की चरागाह बनाए जाने का फैसला सामरिक दृष्टि से कई सवाल खड़े करता है.

ऐसी घटनाएं आए दिन आज समूचे हिमाचल में आम हो चुकी हैं. सरकारी प्रश्रय के चलते निजी कंपनियों द्वारा इन सुदूर इलाकों में नियम-कानून के उल्लंघन के मामले भी देखने में आ रहे हैं. किन्नौर के हिम लोक जागृति मंच के कागजात बताते हैं यहां खनन और मॉक डंपिंग का काम धड़ल्ले से अनियमित व अवैज्ञानिक ढंग से जारी है.

आज से पांच साल पहले ही राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन व परिवीक्षा समिति ने जेपी कंपनी को निर्देश दिए थे कि वह वर्ष 2000 में आई बाढ़ के अधिकतम स्तर के भीतर किसी तरह की मॉक डंपिंग न करे और न ही कोई निर्माण कार्य किया जाए. इस निर्देश की धज्जियां उड़ाते हुए सरकारी व सेना की जमीन पर कंपनी अब भी मॉक डंपिंग किए जा रही है. इससे खतरा पैदा हो गया कि कभी भी यदि इस इलाके में बाढ़ आई, तो इस मलबे के बहने से गांव के गांव बह जाएंगे. ऐसी त्रासदी हिमाचल के सोलन में दो साल पहले देखने में आई है जिसके लिए जेपी कंपनी ही जिम्मेदार थी. इसके अलावा जेपी कंपनी ने ही बाल्टरंग नामक गांव में बीचोबीच पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करते हुए एक क्रेशर प्लांट भी लगा लिया है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

arvindpant (arvindpant000@gmail.com) joshimathuttrakhand

 
 हिमालय को सुरंगो ने खोखला और बिजली के तारों ने घेर कर बांध दिया है. नदियां शायद अब चित्रों में ही दिखाई दें. पहाड़ो में कमोबेश यह स्थिति निकट आने वाली है. संपूर्ण हिमालय के इस रूप परिवर्तन के लिए कौन जिम्मेदार है ? यह तय है कि सरकार के साथ हम सब भी हैं जो सिर्फ चुप्पी साधे है, पता नहीं क्यों? 
   
 

maansi (manasmystica@gmail.com) Spiti

 
 यदि हिमालय नहीं बचा तो मनुष्य का बनाया कुछ भी नहीं बचेगा. लेकिन मनुष्य नहीं मानेगा. चलिए, यही सही. गहराई से सोचिये कि जब मनुष्य नहीं रहेगा तो क्या हिमालय या कोई भी स्थान पहले से बहुत प्यारा नहीं हो जाएगा? मनुष्य द्वारा मार दी गयी जीव-जंतुओं की सारी लुप्त प्रजातियाँ भी लौट आएँगी. मनुष्य नहीं बचना चाहता तो न सही, वास्तविक जीवन तो बच जाएगा. मनुष्य के मिटाने से संभावनाएं समाप्त नहीं होतीं. मूर्खता की हदें पार करने वालों की मौत आ गयी है. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 धन्यवाद अभिषेक. विकास के नाम पर खोदे जा रहे किन्नौर में मेरी ज़िन्दगी के सबसे ज्यादा वर्ष बीते हैं. 20 साल. वहाँ के अटल जातिवाद के विरोध से लेकर प्रकृति के क्रूर दोहन तक के खिलाफ ! सुन्दरलाल बहुगुणा के साथ भी कल्प में लोगों को चेताया था. आज भी जाता हूँ. मनाली के पास की रोहतांग सुरंग के शिलान्यास पर भी अपने कवि दोस्त अजेय के साथ मिल कर लिखित में विरोध जताया. लेकिन सत्यानाशी विकास के नाम पर सब बड़े लोग मिले हुए हैं. हर पार्टी की जेब में पैसा जाता है. स्थानीय लोग भी तब जागते हैं, जब उनके देवी-देवताओं का हुकम नहीं माना जाता या उनके अपने गले तक पानी आ जाता है.

मनाली में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के एसकेआई विलेज के खिलाफ भी लोग तब उठे जब उनके देवता के फरमान की अनदेखी हुयी. लेकिन जातिवाद के खिलाफ हिमाचल का कोई भी देवी-देवता आवाज़ नहीं उठा सकता. क्यों? देवताओं की घाटी है!

शर्म से कहना पड़ता है कि जब प्रसिद्ध पर्यावरण प्रेमी, दिवंगत, किंकरी देवी को उनके गाँव में मेरे हाथों सम्मानित कराया गया, तब भोजन के समय गाँव का कोई भी व्यक्ति उनके साथ नहीं बैठा. उस दिन पता चला कि वे दलित हैं और उन्हें इन्साफ दिलाने के लिए न जिंदा देवता खड़ा होता है, न ज़िंदा देवियाँ. इसी अपमान को सहते वे मर गयीं, मगर यहाँ के मीडिया ने किसी को उसकी हालत का पता नहीं लगने दिया. मेरी आवाज़ को भी आगे नहीं जाने दिया.

किन्नौर के लोगों को मीडिया से भी पूछना चाहिए कि चाहे किन्नौर के लोग कालिदास और राहुल सांकृत्यायन द्वारा बताये गए किन्नर न भी हों, मगर इस पौराणिक नाम को उन से छीन कर मीडिया ने हिजड़ों को क्यों दे दिया?

किन्नौर के लोग जातिवाद में बुरी तरह जकड़े हुए हैं. अगर इस पर उन्हें या किसी भी जातिवादी को हिजड़ा कह दिया जाए तो? जहां तक प्रकृति के विनाश की बात है, यह किन्नौर का नहीं, हर न्यायप्रिय मनुष्य के अस्त्तित्व का मामला है. उठो, भाई, मौत सामने है.
 
   
 

सत्येंद्र कुमार बरेली, उत्तर प्रदेश

 
 परिस्थितियां बहुत गंभीर हैं। चीन जो कर रहा है उसका परिणाम देर सबेर उसे भुगतना है। हमें पहाड़ के भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही कोई कदम उठाना चाहिए। यह आलेख आँख खोलने वाला है। लेखक को बधाई लेकिन दुख है कि शासन- प्रशासन में बैठे अंधे और बहरे लोगों को यह सब दिखाई और सुनाई नहीं दे रहा है। विनाश काले विपरीत बुद्धि वाली स्थिति है। आखिर क्या होगा ? 
   
 

gangveer singh (gang_sr@rediffmail.com) chanigarh

 
 मुझे लगता है कि भारत में नए सरमायदारों ने सरकार को एक कठपुतली बना रखा है जो अपने उल्टे सीधे काम को सरकारी कवच और कर, विकास के नाम पर आम आदमी को मूर्ख बना रहे हैं.  
   
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