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मुक्ति की बाट जोहते कतकरी

मुद्दा

 

मुक्ति की बाट जोहते कतकरी

शिरीष खरे रायगढ़ और थाणे से लौटकर


हालांकि रायगढ़ के तुंजा कतकरी के पास अपनी संपत्ति के नाम पर शरीर पर लटके मटमैले कपड़ों के सिवाय बताने लायक कुछ भी नहीं है. इसके बावजूद चोरी के आरोप में पुलिस उसे दर्जनों बार गिरफ्तार कर चुकी है और आरोप साबित न हो पाने के चलते दर्जनों बार छोड़ भी चुकी है. हो सकता है, आप जब यह सब पढ़ रहे हों, उस समय पुलिस उसे एक बार फिर से गिरफ्तार करने की तैयारी कर रही हो. हो यह भी सकता है कि उसे एक बार फिर रिहा करने की तैयारी चल रही हो. यह सब कुछ तुंजा के साथ केवल इसलिये हो सकता है क्योंकि उसके नाम के साथ ‘कतकरी’ जुड़ा हुआ है.

katkari


तुंजा अपने नाम के साथ कतकरी जुड़े होने की सजा भुगतने वाले अकेले नहीं हैं. कुछ समय पुरानी एक खबर आपको याद है ? महाराष्ट्र के रायगढ़ में ही खेत के कुंए से पानी चुराने के आरोप में कतकरी जमात के चार लड़कों को आसपास के गांववालों ने पहले तो जमकर मारा-पीटा. उस पर भी जब मन न भरा तो उन्हें पेड़ों से बांधा और उनके गुप्तांगों को मिर्च-मसाले से भर दिया.

सूचना मिलने पर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची और गंभीर रूप से घायल उन चारों कतकरी लड़कों को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया. जहां उन्हें किसी तरह से मौत के मुंह से तो बचा लिया गया. मगर उनके घावों को भरे जाने का काम अब तक शुरू नहीं हुआ है.

दरअसल यहां सवरपदा, सिंधीबाड़ी, मुरमतबाड़ी, गोहे, मंदखिंद, अरधे, कुरकुलबाड़ी, कतकरबाड़ी जैसे गांव ऐसे हैं, जहां कतकरियों के माथे से अपराधी होने का कंलक अब तक नहीं धुला है.

यूं तो कतकरी महाराष्ट्र की एक शिकारी आदिम जनजाति कही जाती है लेकिन सच तो ये है कि सैकड़ों सालों से प्रणालीगत शोषण, नस्ली पूर्वाग्रह, घनघोर गरीबी के चलते अब खुद ही शिकार हो चुकी है. यह अपने लोकाचारों के चक्के पर अपनी पहचान की तलाश में घूमने वाली ऐसी जनजाति बन चुकी है, जो बदनामी के साथ-साथ अपनी पारंपरिक भूमि के लगातार छिनते जाने से अब गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंच चुकी है.

यूं तो ‘कतकरी’ दो मराठी शब्दों से मिलकर बना है, जिसका मतलब हैं ‘खैर नामक पेड़ से पेय पदार्थ बनाने वाले’. मगर समय के साथ आज इसका अर्थ बदल चुका है. अब चोर, डकैत, लुटेरे को ‘कतकरी’ मान लिया जाता है. मानो ‘कतकरी’ कोई जमात न हो, अपराध का एक पर्यायवाची शब्द हो.

इतिहास
गुमनामी के अंतिम छोर तक पहुंचीं ऐसी सैकड़ों जनजातियों की जड़ें, दरअसल 12 अक्टूबर, 1871 यानी किंगजेम्स स्टीफन के जमाने में बने ‘गुनहगार जनजाति अधिनियम’ से जुड़ी हुई हैं. गौरतलब है कि उस समय गुनहगार जनजातियों के तौर पर देश भर से जिन 150 से ज्यादा जनजातियों (ज्यादातर घुमंतू और अर्धघुमंतू) की पहचान की गई थी, उसमें से कतकरी भी एक थी. तब की सरकार ने ऐसी जनजातियों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने और ऐसे लोगों को गिरफ्तार किए जाने के लिए पुलिस को विशेष अधिकार दिए थे.

हालांकि 1949 को आयंगर की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिशों के बाद, 1952 को सरकारी दस्तावेज से अंग्रेजों का वह काला अध्याय हमेशा के लिए समाप्त किया गया और उसके स्थान पर 1959 को दूसरा अधिनियम लागू किया गया, जो केवल उन व्यक्तियों को संज्ञान में लेता है जो कि आदतन अपराधी है, न कि पूरी जाति, जनजाति या समुदाय को.

यहां से 'अपराधी' कही जाने वाली जमातों को 'विमुक्त' कहा जाने लगा. मगर हकीकत आज भी वैसी की वैसी ही है. आज भी कतकरी जैसी जनजातियों को अघोषित तौर पर अपराधिक जनजातियों की तरह ही प्रताड़ित किया जाता है.

यह सच है कि 1871 के कानून के तहत, एक-साथ और एक-बार में 150 से ज्यादा जनजातियों की एक बड़ी आबादी को अपराधी के रुप में परिभाषित किया गया था. मगर जब यह कानून अपनी जमीनी हकीकत में आया, तो इसके आगे का काम दो तरह की प्रवृतियों ने किया. पहला साम्राज्यवादी व्यस्था के सिद्धांतों पर चलने वाली हमारी पुलिसिया प्रवृतियों ने और दूसरा काम के आधार पर परिभाषित भारतीय समाज में अनादिकाल से चली आ रही जातिगत प्रवृतियों ने.

अंधेरा कायम है
अंगेजों का वह कानून तो आजादी के बाद निरस्त कर दिया गया था. मगर खास तौर से भेदभाव की संस्थागत संस्कृति के चलते कतकरी जनजाति को कभी भी सिर उठाने का मौका नहीं दिया गया.

दरअसल कतकरी जैसी जितनी भी जमातें आज अपराधी हैं, वह कभी शिकारी या योद्धा जमातें थीं. एक तरफ, अंग्रेजों ने स्थानीय स्तर से उनकी सत्ता को उनसे छीना था और उन्हें अपराधी ठहराया था तो दूसरी तरफ, भारतीय समाज में अंग्रेजों के करीब आने वाली और वर्चस्व रखने वाली जो जमातें थीं, वह आजादी के बाद भी सत्ता में अपना स्थान सुरक्षित रखने और अपराधी कही जाने वाली जमातों को हाशिए पर ढ़केलने के लिए, बारम्बार यही दोहराती रहीं कि यह तो बस अपराधी ही होती हैं. जबकि ऐसी जमातों के सामने अपराध करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं छोड़ा जाता रहा है. ऐसे में आप ही बतलाइए, क्या इस नजरिए के साथ अपराधीकरण की प्रक्रिया को समाप्त किया जा सकता है ?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

monu (monu28july@rediffmail.com) mumbai

 
 जो आप लिखते हैं, असली जीवन में उनका बहुत महत्व है. 
   
 

Prashant kumar dubey (prashantd1977@gmail.com) Bhopal

 
 Dear Shirish bhai, Very good story. Its an another face of our country. I hope u will continue your writing in the favor of Marginalized sections of the society. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 धन्यवाद, शिरीष जी.

खानाबदोश अगर चाहें तो चलते-चलते और गाते-गाते आवाज़ उठायें की धरती पर पहला हक़ उनका है. लेकिन अपनी खानाबदोशी न छोड़ें और जहां जाएँ, कुदरत को सुन्दर बनाने का काम करते हुए वहाँ से गुजरें. सरकार और समाज से उनकी पहली लड़ाई इस मांग के लिए हो कि हर कहीं ऐसी जगह मौजूद हो जहां खानाबदोश निर्भय होकर कुछ वक्त गुज़ार सकें और उन्हें चोर न कहलाना पड़े.

आने वाले वक्त में सिर्फ खानाबदोश ही बचेंगे और वही नयी दुनिया रचेंगे. एक जगह गड़े हुए बड़े लोग और उनकी नस्लें सबसे पहले नष्ट होंगी, क्योंकि वे नस्लें मुश्किलों में नए तरीके से जीना भूल जाती हैं और सिर्फ अपनी सुख-सुविधा में रहने की आदी हो जाती हैं.
 
   
 

Vishal Mankere (vishal.mankere@icicilombard.com) Mumbai

 
 Dear Shirish, Every time your article is touching my heart but whatever you are writing, who is going to ensure that implementation is going on. I think, it is only a article which is showing sympathy & human being. 
   
 

घुघूती बासूती (ghughutibasuti@gmail.com) मुम्बई

 
 इस समस्या को सामने लाने का काम सराहनीय है.
 
   
 

शहरोज़ (shahroz_wr@yahoo.com) दिल्ली

 
 गहरे अँधेरे में रहते ऐसे ढेरों लोग हैं जहां विकास जैसे सरकारी दिए तक नहीं पहुँच पाते. इनके नाम क्या पते तक नहीं मालूम. और इनका पता करने की जो कोशिश करते हैं शिरीष जैसे पत्रकार होते हैं. वरन भैया अब सत्ता की गाओ.. मस्त रहो !! 
   
 

Abha Desai Mumbai

 
 इस तरह की जमातों में होने वाले बदलावों का जवाब मराठवाडा में हुए कई दलित आन्दोलन से मिल सकता है. वहां बंजारा जमातों पर अगर सवर्ण या पुलिस परेशान करती है तो उनके खिलाफ केस लगाया जाता है. धरना प्रदर्शन किया जाता है. दूसरा उन्हें जमीन के अधिकार और शिक्षा से जोड़ा गया है. बाद के हालात उन्होंने खुद बदले हैं. यह उनमें आये स्थायी बदलावों के उदाहरण हैं. इससे काफी कुछ सीखा और समझा जा सकता है. 
   
 

sadhana pune

 
 I have been working for sometime with Katkaris,in Pune district. One can not imagine how community so exploited has lost sense of future.I have met many people who could not think of any person unable to think of future. But it is severity of injustice they met with, that has gone on for generations of Katkari  
   
 

पशुपति शर्मा (pashupati15@rediffmail.com) दि्ल्ली

 
 शिरीष, तुमने अंधेरों में गुम होती एक जनजाति पर थोड़े में पूरा प्रकाश डाला है। अच्छा लगा। केतकरी जैसी जनजातियों के साथ नाइंसाफी का दौर अंग्रेजों के समय से शुरू हुआ और आज भी बदस्तूर जारी है। हमारी सरकारों को, प्रशासनिक अधिकारियों और हमको थोड़ी शर्म आनी चाहिए... लेकिन क्या करें शर्म है कि आती नहीं। 
   
 

Prabha Majoomdar Mumbai

 
 दरअसल ऐसी जमातों को लेकर पूर्वाग्रह की स्थिति इसलिए भी ज्यदा मजबूत है की बाकी समुदायों को लगता है कि अगर यह जागरूक हो गये और जान गए कि हमारी गुलामी की दास्ताँ के पीछे बाकी समुदाय दोषी है की वह मुख्यधारा के समाज के बहुत कुछ छीन लेंगे. अपना हक़ पाने की हरसंभव कोशिश करेंगे. मुख्यधारा के समाज का यह डर दूर किये बगैर भी इन्हें प्रशसनिक व्यवस्थाओं से नहीं जोड़ा जा सकता है. प्रभा मजूमदार. 
   
 

सदानंद गुप्ते (sadanand48@gmail.com) मुंबई

 
 बहुत ज्ञानवर्धक और सुन्दर प्रस्तुति. बहुत दिनों के बाद एक अच्छी स्टोरी पढ़ी. उम्मीद है कि हाशिए से भी बाहर के लोगों पर आपका लेखन जारी रहेगा. सदानंद  
   
 

ajay prakash delhi

 
 अच्छी रिपोर्ट है. हमने आपके माध्यम से ही इस जनजाति के बारे में जाना. शुक्रिया.
 
   
 

Akhilesh Upadhyaya (sahaj.socialngo@gmail.com) Katni M.P.

 
 बेहद ही मार्मिक चित्रण किया है.  
   
 

sadanjha (sadanjha@gmail.com)

 
 समाज के हाशिये की जिंदगी पर आपकी पकड़ अच्छी लगती है. इस बेहाल जिंदगी के बारे में मुख्यधारा को लगातार ताकीद करते रहने की ज़रूरत है.  
   
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