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कैसे सुलझे कश्मीर

मुद्दा

 

कैसे सुलझे कश्मीर

डॉ. असगर अली इंजीनियर


कश्मीर में जारी विवाद का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है. हमारे सशस्त्र बल, विशेषकर सीआरपीएफ समस्या को बढ़ा ही रहे हैं. दुर्भाग्यवश, कश्मीर समस्या को आज भी केवल कानून और व्यवस्था की समस्या माना जा रहा है. आमजनों की महत्वाकांक्षाओं, उनके सपनों व उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. हमारे सशस्त्र बल लगातार मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं. उन्हें सिर्फ लोगों को मारना आता है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो समस्या को सुलझाना तो दूर, हम कश्मीर को एक विशाल कब्रिस्तान बना देंगे. वहाँ लगभग रोजाना नौजवान प्रदर्शनकारी मर रहे हैं परंतु रोजाना उनका स्थान नए प्रदर्शनकारी ले रहे हैं. मौत का डर भी इन युवाओं को नहीं रोक पा रहा है.

Kashmir


ऐसा नहीं है कि कश्मीर के लोग भारत-विरोधी हैं या वे पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं. अभी हाल में, ब्रिटेन के एक थिंक टैंक द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण से यह नतीजा सामने आया है कि पाकिस्तानी बनने की इच्छा मात्र 4 प्रतिशत कश्मीरियों की है. परंतु उनकी समस्याएं व महत्वाकाक्षांए हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इसकी जगह उन्हें गोलियाँ मिल रही हैं.

अभी हाल में हुई सर्वदलीय बैठक में यह तय किया गया कि अब से विरोध प्रदर्शनों पर जान लेने वाली गोलियों के बजाय ‘पैपर गन’ इस्तेमाल की जायेगी. इन बंदूकों से निकलने वाली गोली जानलेवा नहीं होती परंतु जिसे वह लगती है, उसे ऐसा भान होता है मानो उस पर असली गोली चलाई गई हो.

क्या यह निर्णय लेने में देरी नहीं की गई? क्या कारण है कि यह निर्णय, घाटी में 15 युवाओं की मौत और सरकार के विरूद्ध आक्रोश भड़कने के बाद लिया गया. कश्मीर में आक्रोश-जनित हिंसा ने सीआरपीएफ को भी भारी नुकसान पहुंचाया है. लगभग 270 जवान पिछले एक माह में ही घायल हुए हैं और पिछले एक वर्ष में घायल जवानों की संख्या 1900 से अधिक है. क्या यही निर्णय पहले नहीं लिया जा सकता था ताकि युवाओं की जान न जाती और जवान सुरक्षित रहते? क्या ‘पैपर गन’ का अविष्कार सर्वदलीय बैठक के ठीक पहले हुआ था? क्या हम उपयुक्त तकनीक का इस्तेमाल तभी करेंगे जब हमारे कुछ नागरिक अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे? अगर यही निर्णय पहले ले लिया जाता तो न सिर्फ कई जानें बचतीं वरन् घाटी में संकट की स्थिति भी निर्मित नहीं होती.

मैं जून 2010 में ‘शांति व विवादों के निपटारे’ विषय पर आयोजित कार्यशाला के सिलसिले में कश्मीर घाटी में था. वहाँ मैंने समाज के सभी वर्गो के सदस्यों से यह जानने की चेष्टा की कि वे कश्मीर समस्या के हल के बारे में क्या सोचते हैं. इन लोगों में बुद्धिजीवी व सामाजिक कार्यकर्ता तो शामिल थे ही, बाजारों में खरीदारी करने निकले सामान्यजन भी शामिल थे. इन सभी के जवाबों में जो बात समान थी, वह यह थी कि उमर अब्दुल्ला एक असफल मुख्यमंत्री साबित हुए हैं और आमजन मुफ्ती मोहम्मद सईद के जबरदस्त प्रशंसक हैं.

मुफ्ती के बारे में यह माना जा रहा है कि वे एक परिपक्व नेता हैं जो केन्द्र सरकार से खुलकर संवाद कर सकते हैं और कश्मीर समस्या का संतोषप्रद हल निकाल सकते हैं. जनमत यह है कि उमर अब्दुल्ला, राज्य की परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने में असफल सिद्ध हुए हैं और वे केन्द्र सरकार से खुलकर संवाद करने में हिचकिचाते हैं. यह मान्यता उन सभी लोगों की थी, जिनसे मैंने चर्चा की. इस चर्चा से यह तथ्य भी उभर कर आया कि अलगाववादी तत्व उतने शक्तिशाली नहीं हैं, जितना उन्हें माना या समझा जाता है. आमजन तो कश्मीर की बर्बादी से चिंतित व परेशान हैं.

कश्मीर का युवा वर्ग, रोजगार व राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार चाहता है. जिन भी युवाओं से मैंने चर्चा की, वे सब घाटी में रोजगार व आर्थिक प्रगति के अवसरों के अभाव से परेशान दिखे. उनका कहना था कि उच्च शिक्षित युवाओं को भी घाटी में काम नहीं मिलता. वे या तो बेरोजगार रहते हैं या उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिलती. इससे उत्पन्न गुस्से व कुंठा का लाभ अलगाववादी उठाते है. दुर्भाग्यवश न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकार इस ओर ध्यान दे रही है और दोनों सरकारें केवल अलगाववादियों पर दोषारोपण करती रहती हैं.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में उग्रवाद की शुरूआत सन् 1988 के चुनावों के बाद हुई.


कश्मीर समस्या का एक संवैधानिक पहलू भी है. हमारे संविधान ने कश्मीर को स्वायतत्ता प्रदान की है और इस संवैधानिक प्रावधान को नेहरू-अब्दुल्ला समझौते ने भी वैद्यता प्रदान की. पंरतु दक्षिणपंथी राजनैतिक शक्तियों के दवाब के चलते, कश्मीर को पूर्ण स्वायतत्ता देने के वायदे को पूरा नहीं किया गया. कश्मीर में 1980 व 1990 के दशक में चले उग्रवादी आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंम्हाराव ने फारूक अब्दुल्ला को यह आश्ववासन दिया था कि कश्मीर को स्वायत्ता दी जायेगी. फारूक अब्दुल्ला ने तब मुझे स्वयं बताया था कि जब उन्होंने प्रधानमंत्री से जानना चाहा कि कश्मीर को कितनी स्वायत्ता प्रदान की जायेगी तो प्रधानमंत्री का जवाब था कि स्वायत्ता की “कोई सीमा नहीं होगी”. ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं.

असल में जो हुआ वह यह था कि नरसिंम्हाराव के बाद भाजपा सरकार सत्ता में आ गई . कश्मीर को स्वायत्ता देना तो दूर की बात रही, भाजपा सरकार तो संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने पर आमादा थी.

इसके अतिरिक्त, स्वतंत्रता के बाद कश्मीर में हुए किसी भी चुनाव की निष्पक्षता व स्वतंत्रता पर वहाँ की जनता को भरोसा नहीं हुआ. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में उग्रवाद की शुरूआत सन् 1988 के चुनावों के बाद हुई. इस चुनाव में भारी गड़बडियाँ हुईं और कश्मीर के एक स्कूल शिक्षक सलाहुद्दीन को पराजित घोषित किया गया जबकि कश्मीर की आम जनता यह मानती थी कि वे विजयी हुए थे. सलाहुद्दीन अब पाक-अधिकृत कश्मीर में रहता है और हिजबुल मुजाहिदीन का प्रमुख है.

सन् 2004 में पहली बार कश्मीर में साफ-सुथरे चुनाव हुए. इस दौर में मेरी कश्मीर यात्रा के दौरान मुझसे कई लोगों ने कहा कि अगर आगे भी निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव होते रहे तो वहाँ के हालात बदलेगें और कश्मीर एक बार फिर भारत से भावनात्मक स्तर पर जुड़ जायेगा. इन चुनावों के बाद मैंने कश्मीरियों में एक नए आत्मविश्वास की झलक देखी. सन् 2009 के चुनाव भी काफी हद तक निष्पक्ष व स्वतंत्र थे परंतु दुर्भाग्यवश, उमर अब्दुल्ला हालात पर काबू पाने में नाकामयाब साबित हुए हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Laddakh

 
 असगर साहब, मैं हर साल कश्मीर जाता हूँ. वहाँ हूबहू मुझ जैसे पहाड़ी लोग हैं, इसलिए डर नहीं लगता. मैंने भी लोगों से यही बातें सुनी हैं. लेकिन जब अचानक सही कदम उठाने की बात आती है, पूरे भारत में कुछ नौजवान और उनके बुज़ुर्गवार बजरंग दल जैसे चेहरे लेकर सामने आ जाते हैं और अधिकांश अमनपसंद कश्मीरी या हिन्दुस्तानी देखते रह जाते हैं. सीमा पार से भड़काने वालों और उनकी बातों में आ जाने वालों से सावधान रहना और गहराई से ध्यान देना आज बेहद ज़रूरी है. जहां तक बात हिंसा और बेरोज़गारी की है, सारा मुल्क और सारी दुनिया उससे दो-चार हो रही है. बहुत से लोग हैं, जो मारने और मरने के अलावा और कुछ समझते ही नहीं. क्या हम मिल कर उन्हें नाकाम बना सकते हैं? बात-बात पर उबलने वाला खून एक जैसा होता है, चाहे किसी भी मजहब का हो. इसका इलाज इस लिहाज के बगैर करना पड़ेगा कि वह हिन्दू है या मुसलमान. किसी ज़माने में पंडितों ने उन लोगों का सफाया कर दिया था, जो जात-पात की नीचताओं से बचने के लिए बौद्ध बन गए. बचे रह गए लोगों को सुफियाना इस्लाम की शरण में जाना बेहतर लगा. एक दिन आया कि वो खुद कट्टर होकर दूसरों के दुश्मन हो गए, जबकि उन्हें याद रहना चाहिए कि हर संगठित धर्म जहालत की तरफ ले जाता है. जब तक संगठित धर्म हैं, उनके भरोसे जीने वालों को आपस में लड़ना-मरना ही पड़ेगा, क्योंकि वे हर वक्त अपनी-अपनी भीड़ में शामिल होकर ही इन्साफ के लिए चिल्लाते हैं. ऐसे ही बने रहना है तो ऐसे ही चलेगा. समझ से वास्ता रखने वाला शख्स हर कहीं अकेला है. वही बचेगा भी, क्योंकि वह मूर्खों के बीच नहीं रहता और जहन्नुम बना दिए गए इलाके में ज़न्नत के लौटने का संगठित इंतज़ार नहीं करता. गिरोहबंद लोग आपस में लड़-लड़ कर हमेशा से अपनी-अपनी दलीलें लेकर मरते आये हैं. क्या किया जाए? जिन्हें मौत के डर के बगैर सच में जीना है, अब उन्हीं से संवाद हो. बहुत कम मिलेंगे, मगर गिने-चुने लोग ही चलाते आये हैं असली दुनिया. भीड़ को तो देर-अबेर बेमौत मरना ही पसंद है. 
   
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 कभी किसी समस्या का हल सेना से नहीं निकल सका है. राजनीतिक पहल ही कश्मीरियत को बनाये रख सकेगी. फर्जी हत्याओं से ही सारा मामला खराब होता है. सीआरपीएफ के कारनामे दंतेवाड़ा में सब देख रहे हैं. खुद सीआरपीएफ के डीजी कह रहे हैं कि गैरकानूनी हत्याओं से बात और बिगड़ रही है.

बस्तर, कश्मीर हो या पूर्वी भारत सेनाओ ने अलगाव ही बढ़ाया है. अगर आम कश्मीरी आपके कामों से संतुष्ट हो जायेगा तो अलगाववादी खुद ही अलग-थलग पड़ जायेंगे. हमारी सरकार तब ही कुछ सार्थक करती है जब अमेरिका दबाब डालता है.
 
   
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