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मेरे न रहने पर- कविता- शहरोज़

कविता

मेरे न रहने पर

 

शहरोज़

 

मेरे न रहने पर
खिड़की पर चाँद अटक जायेगा
कमरे में रौशनी छिटका करेगी
कुछ न कुछ चमक रहा होगा
मेज़ पर बिखरे पन्ने
फर्श पर खिलौने

 

टिफिन तैयार कर स्त्री पति को सौंपेगी
समय पर खा लेने की ताकीद के साथ


हर पुरुष की पत्नी और प्रेमिका
विश्व की सबसे सुन्दर कृति होगी
देह बिना प्रेम अपूर्ण माना जायेगा
स्त्री बस देह हो जाया करेंगी

कामकाजी स्त्रियों को उसी तरह घूरा करेंगे लोग
हलकी मुस्कान के बूते भीड़ भरी बस में भी
उन्हें जगह ज़रुर मिल जाया करेगी

घरों में अखबार तब भी आया करेगा
हाँ, वो आल इन कलर हो सकता है
अपना हिंदुस्तान तब भी
धूसर मटमैला और बदरंग रहेगा
स्याह को सफ़ेद करने की तरकीबें बताई जाएँगी
चंद ज़िन्दगी आल इन कलर होगी
मेरे न रहने पर

चेहरे की लकीरें हाल बता रहीं होंगी
कोई किसी को तक रहा होगा
कोई सड़क की तरफ़
जल्दबाजी की ज़िद ठाने अपने नंबर की बस के
इंतज़ार में खड़े लोग दुःख और सुख लपेटे होंगे


खिड़की वाली सीट पर बैठा होगा अधेड़
शायद सुंदर -आकर्षक लड़की उसके पास बैठे या स्वस्थ महिला ही
तब शादीशुदा औरतें ज्यादा आकर्षित करती हैं
खिड़की से झांकता हुआ पार्क या बस स्टाप पर गुटुरगूं करते युगल को
देख कबाब बन धुंआ उगलता जाएगा
उसका विश्वास लबरेज़ होगा की सारी स्त्रियों को
सिर्फ़ वही तृप्त कर सकता है

क्रांतिकारी संगठन से जुड़ा कवि
सरकारी महकमे में आ टिकेगा
तीन घंटे के अनुबंध पर सहायक से आठ घंटे की चाकरी
करना उसका धेये नहीं, विवशता होगी
अधिकाँश समय अपनी कवितायें उससे टाइप कराएगा जो
अन्याय, अत्याचार, शोषण के विरुद्ध होंगी
सेठाश्रयी अखबार की पचास हज़ार की नोकरी से हटा दिए
जाने का संताप उसे पल -पल सालता रहेगा

बस भाड़े से बचा मासिक साढ़े पाँच हज़ार सही
सहायक की अदद ज़रूरत होगी
पहली बार उसे पत्नी का जेवर बंधक रखना पड़ेगा
सारे क़र्ज़ अदा करने के बाद वो खुश खुश
घर लोटेगा बाज़ार से मछली लेकर

स्थितियों की सडांध
तेल में तैरने , उफनने , पकने के बावजूद
समुद्री मछली की सडांध से पराजित हो जाया करेगी
भर पेट भोजन कर पत्नी से लिपट वो खर्राटे लेने लगेगा

अचानक सरकारी अफसरों और धनाड्यों की रचनाएँ महान हो जाएँगी
साहित्य में सब कुछ पहली बार होने लगेगा
बुलंद पिंजड़े में बंद सुंदर और भरी -पूरी
लगती सेठों की पत्नियाँ बाहर निकलते ही
नए सीमोनवाद का जयघोष करने लगेंगी
हॉउस जर्नल में क्रांति का बिगुल फूँक दूसरे लोग
दम लेने के लिए राजधानियां आने की जुगत भिड़ाएंगे
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

anwar suhail(anwarsuhail_09@yahoo.co.in)

 
 shahroz ek bindaas kavi hain. unki kavita raviwar me padhkar achcha laga
achchi kavita ke liye unhe badhaai
 
   
 

syed atir hameedi(hamidi.here@gmail.com)

 
 bahut dinon ke bad ek achchi nazm padhna ho paya.putulji aapka shukria . 
   
 

GOPAL K.(gopalkdas@indiatimes.com)

 
 ACHHI LAGI..
MAI BHI APNI KAVITA AUR GAZAL POST KARNA CHAHTA HU.. KYA KARU?
 
   

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