बिल गेट्स की कैसी सेवा
मुद्दा
बिल गेट्स की कैसी सेवा
रघु ठाकुर
बिल गेट्स का नाम कुछ वर्षों पहले दुनिया ने तब जाना जब उन्हें दुनिया में सर्वाधिक धनी पूंजीवाला व्यक्ति घोषित किया गया था तथा विशेषत: विकासशील देशों की दुनिया या रंगीन दुनिया के सत्ताधीशों से लेकर पूंजीपतियों तक के लिए वे चुंबकीय आकर्षण का केंद्र थे.
उनके विश्व के सबसे धनी व्यक्ति होने के प्रचार के बाद जब वे भारत की राजधानी
दिल्ली आये थे तब उनसे मिलने के लिए देश के पूंजीपति व सत्ताधीश राज्यों के
मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री पंक्तिबद्ध खड़े थे. प्रधानमंत्री उनके साथ नाश्ते या
खाने की टेबिल पर बैठने की मनुहार कर रहे थे.
अब उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट के प्रबंधन की दैनिक जवाबदारियों से मुक्ति पा ली है तथा
‘बिल मोरिंडा गेट्स फाउंडेशन’ के माध्यम से वे दुनिया से एड्स के बीमार की जीवन
रक्षा के लिए कार्यरत हैं, ऐसी घोषणा उनके द्वारा प्रसारित हुई है. माइक्रोसॉफ्ट के
दैनिंदन प्रबंध कार्यों से मुक्त होने के बाद उन्होंने जो पहल शुरू की है, उनमें से
एक ‘रेड’ नामक संस्था का निर्माण है, जो मूलत: दुनिया के उद्योगपतियों की संस्था
है, जो उसकी घोषणा के मुताबिक दुनिया के गरीबों को एड्स, मलेरिया जैसी घातक
बीमारियों से बचाने के लिए चिंतित है.
उन्होंने दूसरी पहल सृजनात्मक पूंजीवाद यानी क्रिएटिव केपेटिलिज्म के विचार के
प्रसार के लिए भी की है. दरअसल यह क्रिऐटिव केपेटिलिज्म क्या है? इस पर विचार जरूरी
है. श्री बिल गेट्स व उनके पूर्ववर्ती पूंजीवादी विचारकों का कहना है कि पूंजीवाद
को अपनी पूंजी का एक हिस्सा गरीब दुनिया को गरीबी व बीमारी से मुक्त कराने के लिए
खर्च करना चाहिए. यह पूंजीवाद का क्रिऐटिव पहलू होगा.
पूंजीवाद अपनी जीवन रक्षा के लिए ऐसे तर्क पहले भी करता रहा है. जब विश्व व्यापार
संगठन के माध्यम से दुनिया में पूंजीवादी शक्तियां प्रभावशील हुई तो उन्होंने बड़े
जोर से यह प्रचार किया कि इसका लाभ तो अंतत: नीचे वालों को ही पहुंचेगा. इसे
उन्होंने ट्रिकिल इकानामी यानी रिसन अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी. जिस प्रकार ऊपर की
तह पर पानी जमा होने के बाद धीरे-धीरे रिसकर नीचे उसकी कुछ बूंदे टपकती है, इसी
प्रकार नई अर्थ नीति के पूंजीवाद में ऊपर भले ही काफी पानी जमा हो परंतु उसकी कुछ
बूंदे रिसते-रिसते टपक कर नीचे की ओर गरीब जनता तक पहुंच कर उसे कृतार्थ करेगी.
अब इन बूंदों से गरीब आबादी का गला कितना सूखेगा यह बात उनके लिये महत्वपूर्ण नहीं
थी. उनके वैतनिक विचारकों ने सारी दुनिया में ट्रिकिल इकानामी का हल्ला पीटा.
यद्यपि अब उसका प्रचार कुछ फीका पड़ गया है क्योंकि गरीब दुनिया ने इस रिसन
अर्थव्यवस्था की असलियत जान ली है.
श्री बिल गेट्स के सृजनात्मक पूंजीवादी के पीछे के रहस्य को भी दुनिया को समझना
जरूरी है. इसके लिए जो कष्ट वे उठाने के लिए पूंजीवाद को बता रहे हैं, वे उन्हीं के
अनुसार निम्नानुसार है-
1. सृजनात्मक पूंजीवाद से उनका अर्थ ऐसे पूंजीवाद से है जो अपने मुनाफे की कुछ राशि
बीमारी-गरीबी उन्मूलन के ऊपर खर्च करे तथा उससे अपना बाजार भी पैदा करे. इसे वे
कहते है गरीबी हटाते हुए मुनाफा.
2. वे चाहते हैं कि विकासशील देशों की सरकारें पूंजीवाद के विकास के लिए बेहतर
कायदे-कानून बनाये जिससे बाजार का विकास हो तथा ज्यादा से ज्यादा लोगों को विकास का
लाभ मिल सके. जाहिर है, वे मानते हैं कि बाजार के विकास से ही विकास का लाभ जनता को
मिल सकता है.
3. वे कंपनियों के शोध कार्यों के खर्चे की पूर्ति सरकारों से चाहते हैं तथा
उन्होंने अमरीका का उदाहरण देते हुए कहा कि अमरीकी कानून के अनुसार कोई दवाई कंपनी
किसी उपेक्षित बीमारी यथा मलेरिया की दवा की शोध करता है तो उस कंपनी को उस दवा पर
फुड एवं ड्रग्स कारपोरेशन द्वारा वरीयता दी जायेगी. यहां यह बताना भी जरूरी है कि
बिल गेट्स के इस कथन के बाद भारत में भी फुड एंव ड्रग अथारिटी को सक्रिय किया गया
है तथा दिल्ली में करोड़ों रुपये खर्च कर उसका एक विशालकाय भवन तैयार किया गया है.
4. सी.के. प्रहलाद की पुस्तक ‘दी फारचून ऐट पिरामिड’ को उद्धृत करते हुए वे कहते
हैं कि दुनिया भर में ऐसे बाजार हैं, जो व्यवसायियों से छूट गये. दुनिया के अध्ययन
का निष्कर्ष है कि दुनिया की सबसे गरीब 2/3 आबादी के पास पांच ट्रिलियन डालर याने
पांच खरब डालर यानी 500 अरब डालर की कुल क्रय क्षमता है. उनकी शिकायत है कि
व्यवसायी इन बाजारों को खोज नहीं पाते तथा उनकी जरूरतों को समझ नहीं पाते है.
वे अपनी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट का उदाहरण देते हुए बताते है कि माइक्रोसॉफ्ट वंचित
लोगों तक तकनीक पहुंचाने के लिए जनकल्याण का प्रयोग करता रहा. उसने तीन अरब डालर के
साफ्टवेयर दान में दिए. इसी प्रकार वोडाफोन ने तकनीक को जनसुलभ व सस्ता बनाकर अपना
फैलाव कीन्या में किया, जहां पहले केवल 4 लाख सेलफोन थे, अब उसका बाज़ार 1 करोड़ से
ज्यादा का है.
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5. बिल गेट्स का दर्शन है कि मानव शक्ति की दो बड़ी ताकतें है- स्वहित व दूसरों की
परवाह. पूंजीवाद स्वहित को टिकाऊ और मददगार ढंग से पूरा करता है. लेकिन सिर्फ
उन्हीं के लिए जो कीमत अदा करे. वे चाहते हैं कि एड्स, गरीबी और अशिक्षा जैसी
समस्याओं पर दुनिया स्थायी तरक्की कर सकती है, जब सरकारें व गैर मुनाफा वाले संगठन
अधिकाधिक मदद करे.
उनकी राय में सुधार तभी स्थायी होगा, जब हम बाजार को इस लड़ाई में शामिल करे. जो
गरीबों को उनकी जरूरतों के अनुरूप नई चीजें इजाद कर सके.
श्री बिल गेट्स के उपरोक्त सृजनात्मक पूंजीवाद के दर्शन के जो स्पष्ट निहितार्थ हैं
जिन्हें स्पष्ट या अस्पष्ट तौर पर उन्होंने स्वीकार किया है कि-
1. बाजार अपने विकास की नई-नई संभावनाओं को तलाशता रहे तथा जो लोग गरीब हैं, उन्हें
भी बाजार के प्रभामंडल में लाये ताकि गरीब को भी निचोड़ा जा सके. फटी कथरी को भी
छोडऩा नहीं है. बल्कि जितना निचुड़ सकती हो उतना निचोडऩा है. वे तकनीक की विपुलता व
मध्यम वर्ग की संप्रकृतता से परेशान है. मध्य वर्ग तो लगभग पूरा लूटा जा चुका है,
उसके घर नई तकनीक के उपभोग साधनों से भर चुके है और वहां बाजार के लिये स्थानाभाव
है, इसलिये अब झोपडिय़ां उनके निशाने पर हैं.
माइक्रोसॉफ्ट अब स्कूलों के लिए सामूहिक कम्प्यूटर तैयार कर रहा है ताकि जो ग्रामीण
अंचल के छात्र अपना कम्प्यूटर नहीं ले सकते, उनके स्कूलों में सामूहिक कम्प्यूटर
रहेंगे. कुल मिलाकर इस प्रकिया में भारत जैसे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में उनके 50
लाख से एक करोड़ तक के कम्प्यूटर तक तो बिक ही सकते है, भले ही कुछ दिनों में
विद्युत व मरम्मत के तथा उपयोगकर्ताओं के अभाव में वे कबाडख़ाने में तब्दील हो
जायें. परंतु माइक्रोसॉफ्ट को आसानी से 1 हजार करोड़ का मुनाफा हो सकेगा. यही है
उनका सृजनात्मक पूंजीवाद यानि जो पूंजीवाद को सतत् बाजार और मुनाफे का सृजन करें.
2. वे सरकारों की इस प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका चाहते है यानि पूंजीवादी
उत्पादनों को खरीदने में सरकारें मुख्य खिलाड़ी बने. यह उन्हीं का दर्शन है कि आज
भारत जैसे गरीब व विकासशील देश में सर्वशिक्षा अभियान तथा अन्य शिक्षा के
प्रचार-प्रसार व तकनीकी शिक्षा के प्रयोग शुरू हुए है. जिनमें सरकारें राजकोष से धन
देती है. गैर सरकारी संगठन वितरक की भूमिका अदा करते है तथा बिल गेट्स सृजनात्मक
पूंजीवाद अरबों डालर का मुनाफा कमाता है और अपने लिए बाजार तैयार करता है.
3. दुनिया के लिए गेट ने तीन क्षेत्रों को फिलहाल प्राथमिकता पर रखा है- (।) गरीबी
(।।)शिक्षा और (।।।) चिकित्सा.
आज दुनिया की एड्स की दवाई बनाने वाली कंपनियां भारत के सत्ता नियंत्रकों को
प्रतिवर्ष स्वयं सेवी संगठनों की मदद के नाम पर कई हजार करोड़ रूपया देती है, जो
भारत के हजारों स्वयं सेवी संगठनों में बंटता है तथा लाखों तनखैया स्वयंसेवियों की
उदरपूर्ति करता है. इसके बदले में सत्ता नियंत्रक इन एड्स की दवाई बनाने वाली
कंपनियों की दवाओं की सरकारी खरीद कराते है. चारों के हिस्से में अपनी-अपनी भूमिका
के अनुसार कुछ न कुछ कम या ज्यादा पहुंच जाता है.
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अमरीका जैसे देशों के खाद्यान्न का निर्यात फलेगा-फूलेगा तथा स्थायित्व
लेगा और गरीब जो मजदूरी से कमायेगा, वह तकनीक के उपयोग सेल फोन, वीडिया
शूटिंग आदि पर खर्च करेगा. |
(1) सत्ता नियंत्रकों को फंडिंग के लिए लाचार तनखैया स्वयंसेवकों की लंबी फौज मिल
जाती है, जो उनके अनुकूल होती है तथा जो राजनीति को सिरे से नकार कर परिवर्तन के
लोकतांत्रिक व संसदीय रास्तों को बंद करती है.
(2) लाखों स्वयंसेवी नाम के कार्यकर्ताओं को वैकल्पिक रोजगार प्राप्त हो जाता है,
साथ ही जनता की मदद करने वाले के रूप में दयावंत छवि भी.
(3) सत्ताधीशों को दवा कंपनियों से निर्धारित कमीशन प्राप्त हो जाता है. चिकित्सकों
को इन कंपनियों के द्वारा विदेशों में सैर-सपाटे के मुफ्त पैकेज मिल जाते है.
(4) स्वयंसेवी संगठनों के प्रमुख व्यक्तियों को दुनिया के नामी-गिरामी पुरस्कारों
से नवाजा जाता है तथा बदले में अच्छी खासी रकम मिल जाती है.
(5) दुनिया के दवा उद्योग को नया बाजार व हजारों लाखों, करोड़ों का मुनाफा मिल जाता
है. यह बिल गेट्स के 2008 के उपरोक्त दर्शन के बाद जान लेना चाहिए कि गरीबी उन्मूलन
के नाम पर विकासशील दुनिया में चलाई जा रही योजनायें अंतत: पूंजीवाद को बाजार देने
व मदद करने के काम आयेगी. गरीब व्यक्तियों को सरकारें भूख से बचाने के नाम पर मुफ्त
अनाज बांटेगी. चुनाव के जीतने की कसौटी भी ऐसी योजनाएं होगी. अमरीका जैसे देशों के
खाद्यान्न का निर्यात फलेगा-फूलेगा तथा स्थायित्व लेगा और गरीब जो मजदूरी से
कमायेगा, वह तकनीक के उपयोग सेल फोन, वीडिया शूटिंग आदि पर खर्च करेगा. इतना ही
नहीं देश की राष्ट्रीय आय का बड़ा हिस्सा इन उत्पादक व स्थायी राष्ट्रीय विकलांगता
के ऊपर खर्च होगा. इससे देश के स्थायी विकास का धनाभाव रहेगा. उसकी पूर्ति के नाम
पर या तो विदेशी कर्ज बढ़ेगा या फिर स्थायी दीर्घकालिक पिछड़ापन.
यही है बिल गेट्स का सृजनात्मक पूंजीवाद, जो उपरोक्त सभी को- सत्ता की भ्रष्ट
राजनीति को चंदा के भ्रष्ट पैसे के कुल जल-कण, सत्ता के दलालों, पूंजीपतियों के लिए
मुनाफा की गंगा, सभी के लिए कुछ न कुछ सृजन कर रहा है और इतना ही नहीं दुनिया के
अविकसित देशों की जनता के लिए सृजित कर रहा है- गुमनाम मौत.
धूमिल की चंद पंक्तियां याद आ रही हैं-
बातों में तुम हमको सबको प्यार करोगे/ लेकिन स्वास्थ्य का सौदा व्यापार करोगे/
चीजें बनाकर पुर्जे बनकर आ जाओगे/ भारत के सूने हाटों में छा जाओगे/ धोखे के धंधे
में कूड़ा करकट दे जाओगे.
21.07.2010, 20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित