भूखी जनता भाड़ में जाये
मुद्दा
भूखी जनता भाड़ में जाये
देविंदर शर्मा
इससे अधिक निराशाजनक कुछ नहीं हो सकता कि स्वतंत्रता के 63 साल के बाद भी सोनिया गांधी नीत राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने देश की भूखी जनता का पेट भरने से हाथ खड़े कर दिए हैं. इसका सीधा सा फरमान है-भूखे को भूखे ही रहना होगा.
एक ऐसे देश में जहां विश्व की सबसे अधिक आबादी भुखमरी का शिकार है और जहां कुल
बच्चों की आधी संख्या कुपोषित है, मैं सोनिया गांधी से उम्मीद कर रहा था कि वह भूख
को इतिहास बनाने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम की घोषणा करेंगी. किंतु जैसा कि अखबारों
में छपी खबरों को पढ़कर लगता है कि एनएसी की अनुशंसाएं करोड़ों भूखों और कुपोषित
लोगों के जीवन में उल्लेखनीय बदलाव नहीं ला पाएंगी. सोनिया गांधी ने शायद प्रयास तो
किया किंतु एनएसी टीम ने उनके उत्साह पर पानी फेर दिया.
देश के सर्वाधिक गरीब 2000 विकास खंडों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों
के लिए प्रतिमाह 35 किलोग्राम खाद्यान्न तीन रुपये किलोग्राम की दर से उपलब्ध कराने
और गरीबी रेखा के ऊपर रहने वाले परिवारों के लिए 25 किलोग्राम खाद्यान्न मुहैया
कराने को सकल खाद्यान्न अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान करना समझदारी भरा कदम
नहीं है.
मैं कभी भी सकल खाद्य अधिकार का पक्षधर नहीं रहा हूं. मध्य वर्ग खुद का पेट भरने
में सक्षम है. अगर वह चमचमाती कारें और महंगी उपभोक्ता वस्तुएं खरीद सकता है तो फिर
खाद्यान्न जरूरतें पूरी क्यों नहीं कर सकता. चुनौती तो भूखे का पेट भरने की है.
आईसीएमआर के मापदंड़ों के अनुसार, प्रत्येक शारीरिक रूप से सक्षम वयस्क के लिए
प्रतिमाह कम से कम 14 किलोग्राम खाद्यान्न जरूरी होता है. अगर एक परिवार में औसतन
पांच व्यक्ति मान लिए जाएं तो प्रतिमाह 70 किलोग्राम खाद्यान्न की जरूरत पड़ेगी.
केवल 35 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराकर हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि भूखे
हमेशा के लिए भुखमरी से उबर न पाएं. वैसे भी, इतना तो उन्हें पहले भी मिल ही रहा
था.
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उद्देश्य मात्र इतना है कि जितना खाद्यान्न
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से पहले से ही दिया जा रहा था, उसे वैधानिक
दर्जा दिया जा सके. अधिक खाद्यान्न आवंटन करने के विरोध में यह दलील दी गई कि देश
में औसतन पांच करोड़ टन खाद्यान्न की सरकारी खरीद होती है. अगर प्रति परिवार 35
किलोग्राम से अधिक का वादा किया जाता है तो सरकार इस अधिकार की पूर्ति में विफल हो
जाएगी. मेरे हिसाब से यह महज क्षमायाचना ही है. यह ठीक है कि भारत में वर्षों से
खाद्यान्न उत्पादन स्थिर है किंतु इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि यहां उचित भंडारण के
अभाव में खाद्यान्न का बड़ा भाग सड़ जाता है. इसके अलावा, यह भी सही है कि अगर
किसानों को आकर्षक मूल्य दिया जाए तो वे उत्पादन दोगुना कर सकते हैं.
इस संदर्भ में चीन का उदाहरण उल्लेखनीय है. इसकी आबादी भारत से करीब 20 करोड़ अधिक
है. भारत में कुल 23 करोड़ टन खाद्यान्न की तुलना में चीन में करीब 50 करोड़ टन का
उत्पादन होता है. दोगुने खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद चीन घरेलू आवश्यकता की पूर्ति
के लिए भारी मात्रा में खाद्यान्न का आयात करता है. भारत के विपरीत जो अपने
देशवासियों के भूखे रहने पर भी खाद्यान्न का निर्यात करता है, चीन खाद्यान्न और
कृषि उपजों का विश्व का प्रमुख आयातक देश बन गया है.
भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता प्रतिदिन 500 ग्राम से भी कम है. दूसरी
तरफ, चीन में यह आंकड़ा तीन किलोग्राम से भी अधिक है. यह आश्चर्यजनक है कि भारत भूखी
जनता के बल पर उच्च संवृद्धि हासिल करना चाहता है, जबकि चीन एक स्वस्थ और मजबूत
राष्ट्र का निर्माण कर रहा है. वह जानता है कि जनता का पेट भरे रहना राजनीतिक
आवश्यकता ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक सुदृढ़ता के लिए भी जरूरी है. इसके अलावा,
कृषि एवं खाद्य सुरक्षा विद्रोह से बचाव की पहली शर्त है. इसलिए दीर्घकालीन खाद्य
सुरक्षा हासिल करने के लिए कृषि के कायाकल्प की आवश्यकता है.
मैंने सोनिया गांधी से यह भी अपेक्षा की थी कि वह योजना आयोग और खाद्य एवं कृषि
मंत्रालय की सलाह पर ध्यान नहीं देंगी और देश से भुखमरी मिटाने की कारगर योजना पेश
करेंगी, जिसमें टिकाऊ कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित देने के उपाय भी शामिल हों. यह
प्रणाली पर्यावरण संकट में योगदान नहीं देती. इसके अलावा कृषि अर्थव्यवस्था को
लाभकारी बनाने की भी अपेक्षा की जा रही थी. इसके तहत व्यापार और विकास नीतियों के
पुनर्निर्धारण और सब्सिडी पर आधारित सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों के आयात के दरवाजे
बंद करने जैसे उपाय जरूरी हैं. यही नहीं, कॉर्पोरेट कृषि को बढ़ावा देने के बजाय
छोटी जोतों को लाभकारी व पर्यावरण के अनुकूल बनाने के प्रयास होने चाहिए थे.
किसी भी सफल खाद्य सुरक्षा पहल की कुंजी क्षेत्रीय उत्पादन और क्षेत्रीय सरकारी
खरीद पर टिकी होती है. प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत उचित
नीतियां और योजनाएं बनाई जानी चाहिए थीं, जो खाद्य एवं कृषि मंत्रालय के अधिकार में
कटौती करने के साथ-साथ वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी
मंत्रालय का दायरा विस्तृत करतीं. इसके लिए समग्र आर्थिक नीति बदलाव की आवश्यकता है
ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कृषि भूमि पर उद्योग धंधे नहीं लगाए जाएंगे तथा
जीएम फसलों के माध्यम से किसानों को बर्बाद नहीं जाएगा. यह देखते हुए कि उत्पादन
बढ़ाना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के दायरे में नहीं आता, इस संबंध में जिक्र
मात्र से कोई लाभ नहीं होगा.
अगर अधिनियम का उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर नए खाद्य आयुक्त और राज्य स्तर पर राज्य
आयुक्तों के पदों का गठन मात्र है तो देश के भूखे लोगों का पेट भरने के मूल
उद्देश्य का लोप हो जाएगा.
यद्यपि एनएफएसए ने सामाजिक वंचित की नई श्रेणी ईजाद की है, किंतु यह सुनिश्चित नहीं
किया है कि इसे क्रियान्वित कैसे किया जाएगा. इसके विपरीत, इसमें अनियमितताओं और
भ्रष्टाचार की काफी गुंजाइश छोड़ दी गई है. खाद्य सुरक्षा का बेहतर विकल्प यह था कि
गरीबी से नीचे रहने वालों की संख्या 55 फीसदी कर दी जाती ताकि इस रेखा के किनारे पर
रहने वाले लोग भी इसके दायरे में आ जाते. यह हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विकास
कार्यक्रम के बहुआयामी ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल के आकलनों के अनुरूप भी
होता.
देश के आठ राज्य-बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर
प्रदेश और पश्चिम बंगाल सर्वाधिक गरीब 26 अफ्रीकी देशों से भी अधिक गरीब हैं. 88
देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का स्थान 66वां है. भुखमरी और गरीबी की
रैंकिंग में भारत के अफ्रीकी राष्ट्रों से भी नीचे रहने को न्यायोचित नहीं ठहराया
जा सकता. अधिकांश अफ्रीकी राष्ट्रों में अशांति है और वहां अस्थिर सरकार हैं. अगर
उन अफ्रीकी राष्टों में भारत जैसी स्थिर सरकार होती, तो निश्चित रूप से भारत गरीबी
और भुखमरी सूचकांक की तली में होता. मैं नहीं जानता कि हम भारतवासी कब तक भुखमरी और
कुपोषण को लेकर उदासीन बने रहेंगे.
23.07.2010,
02.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित