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असलियत

कहानी

असलियत

राहुल राजेश

यह कहानी शत प्रतिशत सच्ची घटना पर आधारित है. इस कहानी के केंद्र में एक लड़की है. एक ऐसी लड़की जो एक गंभीर हृदय रोग से जूझ रही है. और इस कहानी के मुख्य पात्र हैं सदाशिव. सदाशिव चेतन.

rahul-rajesh


सदाशिव चेतन असल में सदाशिव चेतन नहीं हैं. मेरे कहने का मतलब यह कि सदाशिव चेतन असल में सदाशिव चेतन नहीं, सदाशिव पांडेय हैं. और आपके सहज अनुमान के उलट वे कहीं और के नहीं, अपने इधर के ही हैं. वे जीविकोपार्जन के लिए नौकरी करते हैं, लेकिन सुखोपार्जन के लिए लेखन का कार्य करते हैं.

आम परंपराओं का निष्ठापूर्वक निर्वाह न करते हुए, जहां एक तरफ मिस्टर पांडेय चाकरी में एड़ी चोटी एक कर अपनी ड्यूटी निभाने की कोशिश करते हैं और इस भ्रष्ट तंत्र में बेईमान बनने के बेहद आम तरीकों से भरसक बचते हुए जी जान लगाकर ईमानदार बने रहने की कोशश करते हैं, वहीं दूसरी ओर मि. चेतन अपने बचे-खुचे वक्त में लेखकीय कर्म करके इस देश के एक सजग सचेत मनुष्य होने का दायित्व निभाते हैं. चेतन भी बंद कमरे में टेबुल पर झुककर कभी चाय कभी कॉफी की चुस्कियां लेते हुए बौद्धिक कीमियागिरी करके खुद को औरों से ज्यादा सजग सचेत और सम्मानित-गौरवान्वित हुआ पाते हैं.

ऐसे ही किसी एक दिन मि. चेतन अपने कमरे में चाय की चुस्कियां लेते हुए देश का सर्वाधिक बिकने वाला अखबार पढ़ रहे थे. पढ़ रहे थे यानी पलट रहे थे. यूँ ही पन्ना पलटते हुए उनकी पैनी नजर कई सारे विज्ञापनों की ढेर में सिलवर रैपर की तरह चमक रहे एक छोटे-से विज्ञापन पर अटक गई. विज्ञापन के आधे हिस्से में एक लड़की की तस्वीर छपी थी और ऊपर लिखा था अंग्रेजी के बड़े और बोल्ड अक्षरों में- ‘ अपील’.

चूंकि यह एक अपील थी और साथ में एक जवान लड़की की तस्वीर थी, चेतन की रूचि सहज ही उस विज्ञापन में बढ़ी. पहली ही पंक्ति थी- ‘ आई एम अ सेवेंटिन इयर्ज ओल्ड, फ्रॉम अ वेरी पुअर् फैमिली.’ पहली ही पंक्ति के पहले छह शब्दों पर चेतन अटक गए-‘ सेवेंटिन इयर्ज ओल्ड.’ इस पहली पंक्ति के पूर्वार्द्ध को पढ़कर चेतन का कवित्त ठीक ऐसे जाग गया जैसे किसी सत्रह वर्षीय बाला के उपरार्द्ध को देखकर किसी पुरूष का पुरूषार्थ. उन्होंने तुरंत मदद करने की ठानी. “इस बार तनख्वाह मिलते ही कम-से-कम हजार-पांच सौ जरूर भेज दूँगा. हम जैसे लोग हेल्प नहीं करेंगे तो कौन करेगा? “ उन्होंने सोचा.

इस अतिरिक्त उत्साह के पीछे चेतन के एक पुराने पछतावे की परछाईं साफ झलक रही थी. यहां उसका हवाला देना गलत नहीं होगा. हुआ यों कि एक दिन श्रीमान् चेतन सोकर उठे तो उन्हें जो पहली खबर दिखी, वो थी- ‘एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म.’ मन तो पहले ग्लानि से भर उठा. लेकिन फिर भी उस खबर पर आगे सरसरी नजर डाली. अरे ये क्या! यह घटना तो उनके पैतृक शहर श्रीरामपुर की है! उनका मुंह कुनैन की कड़वाहट से भर गया. मुंह में मितली न आई हो लेकिन जी बुरी तरह मितलाने लगा.

... तो श्रीरामपुर की माटी में भी इतने रावण कि एक मासूम बच्ची के साथ पाँच-पांच भेड़ियों ने खिलवाड़ किया और अपनी करतूत छिपाने के लिए लड़की का गला रेतकर माटी में दफना दिया. छिः छिः ... वह तो संजोग कहिए कि अठारह घंटे बाद भी उसकी धुकधुकी बची हुई थी. और यह भी एक संजोग था कि उस लड़की को बेहतर इलाज के लिए चेतन के मौजूदा शहर रवाना कर दिया गया था.

खबर पूरी पढ़ते ही उन्होंने यथासंभव मदद करने की ठानी. “ हाँ हाँ, अपने ही गांव-जवार के लोगों की मदद नहीं करेंगे तो किसकी करेंगे? नहीं होगा तो ऑफिस से भी दो-चार स्टाफ से चंदा उगा लेंगे. दो पैसा ज्यादा मदद हो जाएगी.” मि. चेतन खुद से ही बुदबुदाए.

खैर, चेतन ने इसी पछतावे के दवाब में अगली पंक्ति और तेजी से पढ़ी-”सफरिंग फ्रॉम कॉम्प्लेक्स कॉनजेनिटल हार्ट डिजिज विद डबल चैम्बर्ड आर.वी. एंड आट्य्रिल सेप्टल डिफेक्ट एंड हैव टू अन्डरगो ओपन हार्ट सर्जरी एट द अर्लिएस्ट.” उन्होंने हड़बड़ाकर और आगे पढ़ा– “द कॉस्ट ऑफ ऑपरेशन इज रूपीज 3 लैख 30 थाउजैंड.”

“बाप रे बाप, इतना खर्चा!” चेतन पलभर के लिए सुन्न हो गए. “ना... ना... जरूर हेल्प करना चाहिए. हर हाल में हेल्प करना चाहिए.” उन्होंने अनजाने में ही जोर से कह डाला. “अरे हाँ, कहाँ? और कैसे भेजना है?” आगे लिखा था- “ डीडी/चेक/एमओ/कैश फेवरिंग श्रीरामानुजम हॉस्पिटल, चेन्नई” उन्होंने तय किया– “बस तनख्वाह मिल जाए. पक्का एमओ कर दूँगा.”

मि. चेतन मध्यवित्त वाले आदमी थे. फिर भी एक चैरिटी का काम करने जा रहे थे. वे चाहते तो इस कार्य और दायित्व से स्वयं को मुक्त रख सकते थे. वह यह भी सोच सकते थे कि बड़े बड़े लोग तुरंत मदद को आगे आएँगे, जैसा कि उस बलात्कृत लड़की के मामले में हुआ. और इस तरह वह खुद को तसल्ली दे सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वह अपने निर्णय से गौरवान्वित थे. थोड़ा पुलकित और रोमांचित भी. कि तभी आखिर में उनकी नजर विज्ञापन की आखिरी पंक्ति पर पड़ी-”आई रिक्वेस्ट काईंड- हार्टेड डोनर्स टू सेव मी.” नीचे लिखा था –के. हामिद.

चेतन के दिलो दिमाग में जैसे किसी ने भक्क से सुई चुभो दी... वह एकाएक समझ नहीं पाए कि आखिर उनका उत्साह एकबारगी ठंढा क्यों पड़ गया? लाख मशक्कत के बाद भी चेतन अपने भीतर कहीं गुम हो गए उस ‘ऑरिजिनल स्पिरिट’ को नहीं ढूंढ़ पाए...

दरअसल, अचानक अनजाने ही उनके दिलोदिमाग में कुछ घटित हो गया था. चेतन अपने भीतर के पांडेय को बार-बार समझा रहे थे-

“देखो भाई, मैं एक हिन्दू जरूर हूँ पर एक लेखक भी हूँ.”

“लेकिन लेखक होने से पहले तू एक हिन्दू है.”

“नहीं, मैं हिन्दू नहीं, एक सेकुलर हूँ.”

“तो फिर ‘हामिद’ नाम पढ़ते ही चौंक क्यूँ गए?”

“वो...वो... यूँ ही... बस यूँ ही...”

“नहीं, यूँ ही नहीं, हिन्दू हो इसलिए .”

“नहीं, मैं सेकुलर हूँ .”

“तो फिर चौंके ही क्यूँ भाई ?” पांडेय अड़ा हुआ था.

“..........................................................”

“बोलो बोलो, चुप क्यों हो?”

“अरे बोला न... बस यूँ ही.”

“बस यूँ ही नहीं, हिन्दू हो, सिर्फ इसलिए.” पांडेय मुस्कुरा रहा था.

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“सिर्फ यह कि तुम सेकुलर नहीं हो.”

“तो क्या मैं संघी हूँ? बजरंगी हूँ? शिव-सैनिक हूँ?”

चेतन लगभग बिफर ही पड़े थे.

“मैं यह सब कुछ नहीं कह रहा. बस ये कह रहा हूँ कि तुम सेकुलर नहीं हो.”

“हूँ ...”

“नहीं हो...”

“बोला न...हूँ हूँ हूँ . इस बार चेतन एकदम चीख उठे थे.

“तो भाई, सिर्फ इतना तो बता दो, अगर सेकुलर हो तो ‘हामिद’ नाम पढ़ते ही चौंक क्यूँ गए?”

“.......................................................”

चेतन कोई जवाब नहीं दे पाए. उनमें और बहस करने की ताकत नहीं बची थी. उन्होंने चुपचाप अखबार उठाया और एक कोने में पटक दिया.

 

29.07.2010, 02.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ashok gupta (ashok267@gmail.com) Delhi

 
 प्रिय भाई, कहानी यथार्थपरक तो मानी जा सकती है लेकिन इसकी रचनात्मकता कहाँ ठहरती है. यह कहानी यथास्थिति का बयां भर है और ज़रूरत इसी अंतरिक्ष को पार करनें की है. पार कर लिया तो कहानी वर्ना आईने की तरह कांच का टुकड़ा, इसे सोचें. अशोक गुप्ता 09871187875. 
   
 

sachin jain noida

 
 बहुत अच्छा लिखा है. मैंने भी इस मुद्दे पर अपने ब्लाग पर लिखा है. कभी फुर्सत मिले तो जरुर पढ़ें. 
   
 

अजय कुमार सिंह, फैजाबाद

 
 आपने बहुत अच्छी कहानी लिखी है. हमारे समय के सच को आपने बहुत गंभीरता से पकड़ा है. हमारे जैसे फैजाबाद और अयोध्या में रहने वालों को ऐसी स्थितियों से कई-कई अवसर पर दो-चार होना पड़ता है. 
   
 

Himanshu, (patrakarhimanshu@gmail.com) Noida

 
 आपने एक ऐसे द्वंद्व को सामने उभारा है, जो आम तौर पर हमारी कहानियों में नहीं मिलता. हम सब के भीतर ऐसे ही पात्र हैं. समूह में तो हम सब एक दूसरा आदमी होते हैं लेकिन अपने एकांत में हमारा छद्म सामने आ ही जाता है. यह ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता की हकीकत है. हम बहुत समय तक आवरण में नहीं रह सकते. हमारा छद्म एक न एक समय बाद सामने आ ही जाता है. 
   
 

arun roy (arunroy1974@gmail.com) ghaziabad

 
 हम सब सदाशिव पाण्डेय और चेतन हैं. अपनी चेतना वहां जाकर शुन्य हो जाती है जहाँ अपना 'पाण्डेय' आ जाता है. बहुत बढ़िया कहानी है. पाण्डेय जी को आपने मनोवैज्ञानिक स्तर पर ट्रीट किया है. सत्रह वर्षीया लड़की का जिक्र आते ही जैसे उनकी बांछे खिलती है, अच्छा बन पड़ा है. शायद सभी प्रगतिशील लोगों के साथ ऐसा होता होगा. बहुत दिनों बाद आपकी रचना मिली सो मन ताजा हो गया. अरुण.  
   
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