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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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पीपीपी से सावधान

बहस

पीपीपी से सावधान

योगेश दीवान

भूमंडीलकरण-उदारीकरण के इस काल में अचानक एनजीओ या सिविल सोसाइटी समूहों की बाढ़ आना और वह भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, परिवहन और भोजन के मुद्दों पर थोड़ा शक पैदा करता है. खासकर, डब्ल्यूएसएफ की उस पूरी प्रक्रिया के बाद जो कहता था- “एक और दुनिया संभव है.”

WSF


इस असंभव को संभव बनाया है पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के उस मॉडल ने, जो न सीधा निजीकरण है न पूंजीवाद और न ही साम्राज्यवाद. जिसका चेहरा जनता के प्रति हिमायती दिखता है और जो दावा करता है, जनता की खुशहाली का. इसका वाहक है एनजीओ, जो पब्लिक रुपी ‘पी’ के चेहरे के साथ हमारे आसपास दिखता है. और पूंजी की ताकतों का चहेता भी है. जो कई ‘पी’ यानी पैसा, पुरस्कार, पद और प्रतिष्ठा को पाने के लिये कुछ भी करने को तैयार है. बड़ा ही अजायबघर में रखने लायक है ये एनजीओ. जो तथाकथित् सभ्य, सुसंस्कृत, सोफिस्टिकेटेड भाषा जानता है, जो जनता को मूर्ख और पैसा देनेवालों को साध सकता है, जो सार्वजनिक ढांचों को लतियाने और निजी की हिमायत करना जानता है, जो जनता के संघर्ष पर पानी डालने और समाज में गैर-राजनीतिकरण की प्रक्रिया चलाने में माहिर होता है, जो एक तरह से पूंजीवादी/साम्राज्यवाद को मजबूत करने वाला दलाल होता है. जो असल में समाजवाद की भाषा बोलकर उसका ही दुश्मन होता है.

बहुत हल्ला था ब्राजील से निकले डब्ल्यूएसएफ यानी वर्ल्ड सोशल फोरम का, जिसमें दुनिया के लाखों एनजीओ, सीवीओस अथवा सिविल सोसाइटी समूह की प्रमुख भूमिका थी. और जो ‘एक और दुनिया संभव है ’ का नारा देते हुए छा गये थे.

इस नारे और काम के लिये विश्वबैंक, फोर्ड फाउन्डेशन से लेकर हर छोटी-बड़ी कंपनियों और फंडिंग एजेंसियों ने अपनी तिजोरियां खोल दी थीं. ऐसा कहा जा रहा था कि ब्राजील में राष्ट्रपति लूला जी इसी प्रक्रिया से निकलकर आये थे. पर दुखद है कि आज इन्ही लूला जी के विकास का प्रमुख मॉडल यही पीपीपी है. इस मॉडल से जनता का कितना विकास हुआ, ये तो समय बतायेगा, पर कई सारी रिर्पोंटें स्पष्ट करती हैं कि वहां के एनजीओ की समृद्धि, सम्पत्ति और व्यस्तता अचानक दिन-दूनी रफ्तार से बढ़ गई हैं. इसी ताकत के बल पर लूला वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम की बैठक में शामिल होते हैं. जिसके खिलाफ और जनता के हक में डब्ल्यूएसएफ खड़ा हुआ था.

अब हमारी व्यवस्था भी ऐसे प्रयोग की ओर बढ़ चुकी है. हालांकि पुराना इतिहास पलटने पर पता चलता है कि यूरोप के निजीकरण का प्रारंभिक पग, जहां पर ऐसे ही पीपीपी मॉडल को एनजीओ (उस समय शायद समाजसेवी कहलाते थे) ने हाथों-हाथ लिया था, और बाद का निजी पूंजीवादी/साम्राज्यवादी दृश्य हम आज तक देख और भुगत रहे हैं.

निम्न मध्यम वर्ग/मध्यम वर्ग में निजीकरण की मानसिकता के निर्माण अथवा सरकारी सार्वजनिक ढांचों के खिलाफ खड़ा करने में भी यही एनजीओ रुपी ‘पी’ बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे हैं. यही सत्ता का खेल है? इसलिए भले ही छोटे, पर व्यवस्था के हिस्से हैं एनजीओ और यही उनकी राजनीति है.

कुछ समय से हमारी आगे बढ़ती व्यवस्था में भी बड़े ही सुनियोजित और सजग तरीके से सामाजिक भागीदारी और विकेन्द्रीकरण की बात प्रारंभ हुई है. वो भी उन क्षेत्रों में, जो जनता से सीधे जुड़े हैं. संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी में जन-भागीदारी समिति, पालक-शिक्षक संघ (पीटीए) जैसे कमजोर ढांचे अथवा विकेन्द्रीकरण के तहत पंचायती राज या ग्रामसभा को हर मुद्दे पर भागीदार बनाना और मजबूत करने की नारेबाजी. इस तरह की तथाकथित सामाजिक भागीदारी और सत्ता के विकेन्द्रीकरण में हमारा एनजीओ वर्ग बड़े ही गुणगान और श्रद्धाभक्ति के साथ लगा हुआ है. पीपीपी ऐसी ही भागीदारी की आगे की सीढ़ी है.

क्या ये एनजीओ इतने नादान हैं कि निजीकरण, भूमंडलीकरण के इस दौर में अपनी जिम्मेदारी से दूर भागती सरकार की बदमाशी को नहीं समझ पाते?


ये आयातित शब्द है और इसके अर्थ बड़े ही लुभावने लगते हैं. पर इसकी साजिश और अंदर का रहस्य खतरनाक है. क्या हम नहीं जानते कि बिना ग्रामसभा, पंचायत और जन-भागीदारी समिति की बहस या सलाह से कितने सारे नियम-कायदे, बिल पास हो रहे हैं या बदले जा रहे हैं ?

पिछले कुछ सालों में कितनी महाकाय देशी-विदेशी कंपनियों को जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा को उलीचने का अधिकार और कब्जा मिल गया है. क्या ये एनजीओ इतने नादान हैं कि निजीकरण, भूमंडलीकरण के इस दौर में अपनी जिम्मेदारी से दूर भागती सरकार की बदमाशी को नहीं समझ पाते? क्या आप आज के दौर की ताकतवर असली पंचायत तथा उसके सरपंच अमरीका और ओबामा (कुछ समय पूर्व तक बुश) तथा उसके आसपास फलती-फूलती विश्वबैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियां या डब्ल्यूटीओ की ताकत को नहीं जानते?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Suman Sengupta कोलकाता

 
 हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने खुलेआम कातिल पंचायतों का समर्थन करते हुये कहा था कि खाप पंचायतें सामाजिक काम में जुटी हैं, वो कोई कानून नहीं तोड़तीं। हुड्डा ने कहा था कि खाप किसी जाति के आधार पर नहीं बनती। कुछ गांव मिलकर खाप बनाते हैं। वे तो ऐसे ही हैं जैसे एनजीओ। तो एनजीओ के चरित्र को ऐसे ही समझने की जरुरत है। 
   
 

संजय कुमार गोयल , न्यू पाटलीपुत्रा कॉलोनी, पटना 800 013

 
 एनजीओ वो दलदल है, जिसमें शामिल अधिकांश लोग लोभ और करिअर के लिये हैं. इनसे उम्मीद रखना बेमानी है। इनका सारा साम्राज्य धन पर टिका है।
विदेशों से धन प्राप्त करने वाली एनजीओ की संख्या 1993-94 में 15,039 थी जो दुगनी से ज्यादा बढ़कर 2007-08 में 34,083 हो गई है। विदेश से आने वाला धन इस अवधि में 1865 करोड़ रु. से बढ़कर 9663 करोड़ रु. यानी पांच गुने से ज्यादा हो गया है। सबसे ज्यादा दान देने वाली संस्थाओं में कुछ इस प्रकार हैं: वल्र्ड विजन, गोस्पेल फॉर एशिया, प्लान इंटरनेशनल, क्रिश्चियन चिल्ड्रन फंड, कंपेशन इंटरनेशनल, डॉ. विक्रम पंडित (सभी संयुक्त राज्य अमरीका), ब्रम्हानंद सरस्वती ट्रस्ट, एक्शन ऐड इंटरनेशनल, ऑक्सफेम इंडिया ट्रस्ट, स्वामी नारायण हिन्दू मिशन (सभी ब्रिटेन) फाउन्डेशन विसेन्टे फेरर (स्पेन) आदि। देश में आने वाला 80 प्रतिशत विदेशी दान अमरीका-कनाडा-यूरोप-जापान-आस्टेªलिया-संयुक्त अरब अमीरात आदि करीब 15 देशों से आता है। पूरी दुनिया को लूट कर अमीर बने इस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देशों में अचानक उमड़ी इस दरियादिली और परोपकारी भावना के पीछे राज क्या है ?
 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) , नोएडा

 
 हम सब लोभ और लाभ के शिकार हैं. केवल एनजीओ ही क्यों, दूसरे सेक्टर के लोग भी तो यही कर रहे हैं. पद, पैसा और पुरस्कार पाने की हवस में लोग क्या-क्या नहीं कर गुजर रहे हैं. दुखद ये है कि कहीं से उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 एक दिन अचानक मैं कुल्लू घाटी के दूर-दराज़ के एक इलाके में पंहुचा. वहाँ गेस्ट हाउस में गया तो देखा वहाँ कुछ देशों के शिक्षा संस्थानों से आई हुयी नवयुवतियां हताश-निराश बैठी हैं. उनके साथ दो विदेशी लड़के भी थे. उन्होंने बताया कि वे यहाँ एन जी ओ द्वारा संचालित एक कार्यक्रम में आये हैं, जिसके बारे में उन्होंने इन्टरनेट पर पढ़ा था. हरेक से एक महीने के लिए 30-30 हज़ार रुपये अग्रिम ले लिए गए थे. इसके बदले उनसे रोज़ आस-पास के ऊबड़-खाबड़ खेतों में काम कराया जा रहा था. इस काम में बड़े-बड़े पत्थर उठा कर खेतों के बाहर ले जाने से लेकर पौधे लगाने तक का कम शामिल था. खाने के नाम पर बेस्वाद भोजन था.

जब मैंने संस्था के लोगों से मिलना चाह तो गेस्ट हाउस में काम करने वाले दो लड़कों ने बताया कि उन्हें काम सौंप कर वे लोग कुछ दिन से कहीं चले गए हैं और वे दोनों तो यहाँ इस उम्मीद में काम कर रहे हैं कि उन्हें उनकी कई महीनो से नहीं दी गयी मजदूरी मिल जायेगी. खेत के मालिक ने बताया कि उससे खेत किराए पर लिए गए हैं और यह सब पिछड़े हुए क्षेत्रों में विकास के नाम पर चल रहा है.

एक लड़की के हाथ में गैंती से चोट लगी थी और दूसरी एक लड़की बुखार से तप रही थी. उन्होंने बताया कि रात को यहाँ शराब में धुत्त कुछ लोग आ पहुचे तो उन्हें गाँव की एक लड़की के घर में जाकर रात काटनी पड़ी.

मैंने इस पाखण्ड और बेहूदगी के खिलाफ अधिकारियों और मुख्यमंत्री को पत्र भेजे तो दिखावे भर की ही कार्रवाई हुयी और सुधार करने की बात समाचार पत्रों में कही गयी. लेकिन जैसा कि आपने कहा है, हालत हर कहीं भयावह है. ऊपर से लेकर नीचे तक नीच लोग मिले हुए हैं. दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल याद आ रही है :
पाक चुकी हैं आदतें, बातों से सर होंगी नहीं;
कोई हंगामा करो, ऐसे गुज़र होगी नहीं.
 
   
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