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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

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सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

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जनता की अपराधी सरकार

मुद्दा

जनता की अपराधी सरकार

देविंदर शर्मा

गोदामों से सड़ांध उठ रही है. लाखों टन अनाज खुले में सड़ रहा है. यह सब ऐसे समय हो रहा है जब करोड़ों लोग भूखे पेट सो रहे हैं और छह साल से छोटे बच्चों में से 47 फीसदी कुपोषण के शिकार हैं. हां, यह आपराधिक लापरवाही है. पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान से गुजरते हुए जगह-जगह खुले में रखा गया गेहूं देखा जा सकता है. कम से कम तीन दशक से खुले में मौसम की मार झेलते हुए गेहूं को देख-देखकर अब तक आप इसके अभ्यस्त हो चुके होंगे.

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खाद्यान्न के मामले में यह आपराधिक लापरवाही थमी नहीं है. इसे जघन्य अपराध बनाने वाले वे अधिकारी और राजनेता हैं जिन्हें इस बात का अहसास नहीं है कि सड़ता हुआ अनाज करोड़ों लोगों का पेट भर सकता है. यहां तक कि भारत के प्रमुख कृषि राज्य पंजाब में भी अगर लोग भूख से नहीं मरते तो भूखे जरूर रह जाते हैं. भारत का खाद्यान्न कटोरा कहा जाने वाला पंजाब वैश्विक भूख सूचकांक में सूडान, होंडुरस और वियतनाम जैसे पिछड़े देशों से भी पीछे है.

पिछले तीन दशक से सरकार ने इस संबंध में कोई काम नहीं किया. मुझे समझ नहीं आता कि जब कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि हम इसकी जांच कराएंगे तो इसका क्या मतलब है? जबसे मैं कृषि संबंधी मामलों को देख रहा हूं तबसे बार-बार यही वायदा सुनता आ रहा हूं. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी रस्मअदायगी वाला बयान जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है. चेतावनी जारी करने से अधिक इसने कुछ नहीं किया. सुप्रीम कोर्ट ने खाद्यान्न की बर्बादी रोकने के संबंध में आज तक किसी भी राज्य के मुख्य सचिव को तलब नहीं किया.

1979 में खाद्यान्न बचाओ कार्यक्रम शुरू किया गया था. इसके तहत किसानों में जागरूकता पैदा करने और उन्हें सस्ते दामों पर भंडारण के लिए टंकियां उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था. साथ ही, कार्यक्रम के तहत देश भर में 50 क्षेत्रीय खाद्यान्न बैंक स्थापित करने की बात कही गई थी, इनमें से प्रत्येक की भंडारण क्षमता दस लाख टन तय की गई थी. चूंकि खाद्यान्न का भंडारण और वितरण कभी सरकार की वरीयता में रहा ही नहीं, इसलिए खाद्यान्न बैंकों की स्थापना नहीं हो सकी. इसके लिए हमेशा संसाधनों की कमी का रोना रोया गया है.

दिलचस्प बात यह है कि 1990 से 2010 के बीच के बीस साल के कालखंड में पंजाब सरकार ने मंडियों में सरकारी खरीद के कमीशन के तौर पर 6,800 करोड़ रुपये चुकाए हैं. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के हालिया अध्ययन में कहा गया है कि यह इतना बड़ा घपला है कि बिना कुछ किए-धरे ही इतनी मोटी रकम 20 हजार आढ़तियों के हवाले कर दी गई है. अगर केवल यही राशि गोदामों की स्थापना पर खर्च कर दी जाती तो अनाज सड़ने की समस्या का समाधान हो चुका होता.

कृषि एवं खाद्य मंत्रालय खाद्यान्न के भंडारण में विफलता का ठीकरा राज्य सरकारों के सिर फोड़ रहा है, जबकि असल समस्या यह है कि भंडार गृहों में रखा गेहूं समय से नहीं उठाया जाता. पंजाब और हरियाणा के भंडार गृहों में दो साल से भी अधिक समय से गेहूं रखा हुआ है. यहां तक कि बहुत सा गेहूं तो छह से आठ साल से भंडारगृहों की शोभा बढ़ा रहा है. इस कारण नई फसल आने के बाद गेहूं के भंडारण की समस्या विकट हो जाती है. बड़ी समस्या यह है कि खाद्यान्न की नई आवक को कहां जमा किया जाए? भंडार गृहों में रखा बहुत सा खाद्यान्न तो पहले ही मनुष्यों के इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया है.

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मुझे एक किस्सा याद आ रहा है जो विख्यात अर्थशास्त्री और पूर्व कुलपति डॉ. एसएस जॉल ने मुझे सुनाया था. उन्होंने एक किसान की कहानी सुनाई थी, जिसने अपने घर में पपीते लगा रखे थे. रोजाना वह एक पका हुआ पपीता तोड़ता था और खा लेता था. एक बार उसे दो-तीन दिन के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा. उसने तीन कच्चे पपीते तोड़ कर रसोई में रख दिए. जब वह वापस आया तो तीनों पपीते पक चुके थे, किंतु उनमें से एक जो अगले दिन खाया जाने वाला था, सड़ने लगा था. पपीते को फेंकने के बजाय उसने उसे खाना बेहतर समझा. अगले दिन दूसरे पपीते की भी वही हालत हो गई थी. उसने उसे भी खा लिया. तीसरे दिन भी ऐसा ही हुआ.

इस कहानी से यह सीख मिलती है कि जब तक भारतीय खाद्य निगम और अन्य खरीद एजेंसियां पशुओं को खिलाने लायक या फिर औद्योगिक इस्तेमाल में आने वाले घटिया खाद्यान्न को गोदामों से चलता नहीं करेंगी तब तक साल दर साल वह जनता को सड़ा हुआ खाद्यान्न खिलाती रहेंगी.

यह सब वरीयताओं को व्यवस्थित करने से जुड़ा मसला है. अगर अब तक के प्रधानमंत्रियों ने खाद्यान्न के एक-एक दाने को बचाने का प्रयास किया होता तो यह तय है कि पूरे भारत में खाद्यान्न भंडारों की कोई कमी न रहती. अगर देश विशेष आर्थिक जोन में इतनी तेजी से निवेश कर सकता है कि नौकरशाही की तमाम बाधाएं किनारे हो जाती हैं और हैरतअंगेज रफ्तार से हाईवे बना सकता है तो खाद्यान्न के भंडारण पर भी अगर उससे ज्यादा गति से नहीं तो उतनी गति से काम किया जा सकता है.

यह ठीक है कि यह देश की जिम्मेदारी है कि वह पंजाब में उत्पादित खाद्यान्न के सुरक्षित और पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था करे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पंजाब की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है. अगर पंजाब सरकार 40 नए शहर बसाने या उनका आधुनिकीकरण करने की योजना को हरी झंडी दे सकती है तो कोई कारण नहीं है कि वह अपनी उपज के भंडारण की व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित न कर सके. इस प्रकार केंद्र व पंजाब, दोनों सरकारें ही अनाज सड़ने के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं. मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि अनाज भंडारण का क्या उपाय है? इसका जवाब यह नहीं है कि आधुनिक भंडारण गृह बनाने के लिए चीन को आमंत्रित किया जाए या फिर भंडारण की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का अमेरिका से आयात किया जाए.

इस पर ध्यान नहीं दिया जाता कि प्रमुख कंपनियों में, जिनमें कारगिल, एडीएम और कॉनएग्रा जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हैं, अनाज सड़ने की दर भारतीय खाद्य निगम की तुलना में दोगुनी है. इसलिए निजी क्षेत्र के पास इस समस्या का हल नहीं है. इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय यह है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय के कार्यक्रम के तहत देश की प्रत्येक पंचायत में निर्मित राजीव गांधी पंचायत घरों को पंचायत खाद्यान्न बैंकों में बदल दिया जाए. इस तरह हर पंचायत में खाद्यान्न गोदाम बन जाएगा, जिससे स्थानीय उपज और स्थानीय गोदाम की समस्या का समाधान हो जाएगा.

पंचायत घर परियोजना के लिए धनराशि पहले ही आवंटित कर दी गई है और इन्हें कंप्यूटरों से जोड़ने का काम भी चल रहा है, ऐसे में जरूरत है तो बस इन भवनों के उपयोग में परिवर्तन करने की. खाद्यान्न भंडारण की समस्या तभी दूर हो सकती है, जब इसे सही राष्ट्रीय प्राथमिकता मिले. अनाज के गोदामों का निर्माण देश की खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी शर्त है. खाद्यान्न का भंडारण निजी क्षेत्र के आसरे छोड़ने के बजाय हमेशा सरकारी नियंत्रण में रहना चाहिए.

 

06.08.2010, 00.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 जब तक भूख आदमी को लुटेरा बना कर हर हराम के गोदाम पर टूट पड़ने को बेकरार ना कर दे, तब तक बेचारी नपुंसक सरकार क्या कर सकती है. लानत तो उन लोगों पर है, जो सड़ते हुये इन गोदामों के आसपास अपनी-अपनी आंखें बंद किये सड़ती हुई जिंदगी जीए जा रहे हैं. मूर्दे ! 
   
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