हिज़ाब पर हंगामा क्यों
मुद्दा
हिजाब पर हंगामा क्यों
डॉ. असगर अली इंजीनियर
यूरोप में हिजाब के मुद्दे पर उठा विवाद शाँत होता नजर नहीं आ रहा है. फ्रांस की
संसद द्वारा हिजाब पर प्रतिबंध लगाए जाने से इस विवाद ने एक बार फिर जोर पकड लिया
है. इस बारे में अखबारों में बहुत कुछ छप रहा है और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी यह
चर्चा का विषय बना हुआ है. हिजाब के मुद्दे पर चल रही बहस का एक दिलचस्प पहलू यह है
कि जहां कुछ मुस्लिम महिलाएं हिजाब का विरोध कर रही हैं, वहीं कुछ गैर-मुस्लिम,
विशेषकर पश्चिमी देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ता हिजाब पर प्रतिबंध का विरोध कर रहे
हैं. वे उन देशों की निंदा कर रहे हैं, जिन्होंने कानून बनाकर हिजाब पर प्रतिबंध
लगाया है.
हमें इस मुद्दे का धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से
विश्लेषण करना होगा तभी हम इस विवाद की जड़ तक जा सकेंगे.
कुरान में मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब की अनिवार्यता की कहीं भी चर्चा नहीं है.
केवल पैगंबर मोहम्मद की पत्नियों, जिन्हें मुसलमान अपनी माँ मानते हैं, के संदर्भ
में हिजाब की चर्चा है. कुरान, मुसलमानों को यह सलाह देती है कि वे उनसे पर्दे के
पीछे से बात करें क्योंकि पैगंबर साहब के घर आने वाले कई लोग उनकी पत्नियों से
अनुपयुक्त बातें करते थे जो कि पैगंबर साहब को उचित प्रतीत नहीं होता था.
जहां तक साधारण मुस्लिम महिलाओं का प्रश्न है, कुरान में उनके लिए हिजाब पहनना कतई
अनिवार्य नहीं किया गया है. चेहरे को ढ़कने की तो कहीं कोई बात ही नहीं है. उन्हें
सिर्फ यह सलाह दी गई है कि वे अपनी ‘ज़ीनत’ का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन न करें. और
केवल वे ही अंग- अर्थात चेहरा और हाथ खुले रखें- जिन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया
जा सकता है.
कुरान, महिलाओं को यह सलाह भी देती है कि वे अपने वक्षस्थल को कंधों या सिर पर डाले
हुए कपड़े से ढ़क कर रखें. कुरान की महिलाओं को यही सलाह है, इस बारे में उलेमा लगभग
एकमत हैं.
इस्लामिक कानून के कुछ विद्वानों-विशेष कर हनबली पंथ के मानने वालों-का यह कहना है
कि महिलाओं को अपना चेहरा भी ढ़कना चाहिए. ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत ही कम है
और हिजाब पर विवाद खड़े होने और पश्चिम के कई देशों में हिजाब प्रतिबंधित किए जाने
के बाद, हनबली संप्रदाय के एक सऊदी मुती तक ने यह फतवा जारी किया है कि यूरोप में
मुस्लिम महिलाएं अपना चेहरा खुला रख सकती हैं.
दुनिया के विभिन्न मुस्लिम और गैर-मुस्लिम देशों में सभी महिलाएं अपने चेहरे को
ढ़कने वाला हिजाब नहीं पहनतीं. सऊदी अरब में महिलाएं अपने वस्त्रों के ऊपर एक ढीला
चोंगा पहनती हैं और अपना चेहरा भी ढ़कती हैं.
खाड़ी के देशों में महिलाओं को अपने वस्त्र चुनने की पूरी स्वतंत्रता है. वहां तो कई
महिलाएं अपने बाल भी कटवा लेती हैं और सिर ढ़के बगैर सरकारी और निजी दफ्तरों में काम
करती हैं. खाड़ी के देशों में महिलाएं कारें भी चलाती हैं, जिसकी सऊदी अरब में
कल्पना तक नहीं की जा सकती. पाकिस्तान में कुछ मौकों को छोड़कर अधिकांश महिलाएं अपने
सिर नहीं ढ़कतीं. भारत, जहां मुसलमान सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं, में तो मुस्लिम
महिलाओं को अनेक आज़ादियां हासिल हैं.
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9/11 के बाद यह सिर्फ सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रह गया बल्कि इस पर
राजनैतिक रंग चढ़ गया. इस्लाम को पश्चिम में सुरक्षा के लिए खतरा माना
जाने लगा. |
हिजाब का संबंध धर्म से कम और संस्कृति से ज्यादा है. हिजाब की डिजाइन, आकार आदि
अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग है. सऊदी अरब को छोड़कर, अन्य सभी देशों में बहुत
कम संख्या में मुस्लिम महिलाएं अपना चेहरा ढ़कती हैं. फ्रांस में, जहां चेहरा ढ़कने
वाले हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, मुसलमानों की आबादी लगभग 60 लाख है परंतु
केवल 400 से 2000 के बीच मुस्लिम महिलाएं ही अपना चेहरा ढ़क कर रखती हैं. आश्चर्य है
कि इतनी कम मुस्लिम महिलाओं ने फ्रांस की जनता में इतना अधिक डर पैदा कर दिया!
हिजाब के संदर्भ में हमें पश्चिमी देशों की संस्कृति पर भी एक नजर डालनी होगी.
बीसवीं सदी की शुरूआत तक यूरोप में महिलाएं पैरों सहित अपने पूरे शरीर को ढ़क कर
रखती थी. आज भी ईसाई ननों को अपना सिर ढ़कना पड़ता है. महिलाओं की स्वतंत्रता के
आंदोलन के चलते, धीरे-धीरे महिलाएं पैर ढ़क कर रखने की अनिवार्यता से मुक्त हो गईं
और बाद में तो वक्षस्थल का एक हिस्सा खुला रखने की परंपरा भी पश्चिमी संस्कृति का
हिस्सा बन गई. सन् 1950 के बाद से, अपने शरीर को खुला रखने के मामले में, यूरोप की
महिलाओं को अनेक स्वतंत्रताएं हासिल हो गईं.
शुरूआती दौर में जो मुसलमान परिवार यूरोप पहुंचे, वे श्रमिक वर्ग के थे और ज्यादा
पढ़े-लिखे नहीं थे. यूरोप में भी वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप व्यवहार
करते रहे, जिनमें चेहरा ढ़कना शामिल नहीं था. शुरूआती दौर में फ्रांस सहित यूरोप के
अन्य देशों में बसने वाले अधिकांश मुस्लिम परिवार, पाकिस्तान, तुर्की और पश्चिमी
अफ्रीकी देशों के ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे. उनके घरों की महिलाएं सामाजिक जीवन
में हिस्सा नहीं लेती थीं और उनका अधिकांश समय उनके घर में बीतता था.
धीरे-धीरे हालात बदलने लगे. इसका एक कारण तो था मुस्लिम प्रवासियों की संख्या में
वृद्धि. दूसरे ये नए प्रवासी श्रमिक वर्ग के नहीं थे बल्कि उच्च शिक्षित थे. वे
अपनी अलग पहचान बनाए रखने के इच्छुक थे. उनकी यह इच्छा और बलवती इसलिए हो गई
क्योंकि उन्हें यूरोप में रोज़गार के बाजार में नस्लीय भेदभाव और पूर्वाग्रहों का
सामना करना पड़ा. वे पश्चिम की संस्कृति में घुलमिल न सके.
नतीजा यह हुआ कि वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का अत्यधिक कड़ाई से पालन करने लगे.
सन् 1970 के दशक के बाद से मध्यपूर्व के देशों में पेट्रो डॉलरों की बरसात होने लगी
और अरब देशों से बड़ी संख्या में अभी-अभी रईस बने लोग मौज-मस्ती करने यूरोप आने लगे.
ये लोग अपने परिवारों को भी साथ लाते थे और यूरोप में सार्वजनिक स्थानों पर अपनी
विशिष्ट पोशाकों में अधिकाधिक संख्या में मुस्लिम महिलाएं दिखाई देने लगीं.
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शुरूआत में यूरोप के निवासियों में उनके प्रति गुस्सा नहीं बल्कि जिज्ञासा थी.
परंतु जल्दी ही यह जिज्ञासा, गुस्से और विरोध में बदल गई. यूरोप के लोगों को
मुस्लिम महिलाओं का पहनावा बहुत अजीब लगता था क्योंकि उनकी महिलाएं अपने शरीर को
खुला रखने की अधिकाधिक स्वतंत्रता हासिल करती जा रहीं थीं. जब दो एकदम अलग-अलग
संस्कृतियां मिलती हैं तो उनके बीच टकराहट काफी हद तक स्वभाविक है. यूरोप में यह
टकराहट दिन ब दिन और तेज होती गई क्योंकि जहां पश्चिमी महिलाओं के कपड़े और छोटे व
तंग होते गए वहीं मुस्लिम महिलाओं के शरीर का चेहरे सहित कोई भी हिस्सा दिखना बंद
हो गया.
9/11 के बाद यह सिर्फ सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रह गया बल्कि इस पर राजनैतिक रंग चढ़
गया. इस्लाम को पश्चिम में सुरक्षा के लिए खतरा माना जाने लगा. सांस्कृतिक खतरा अब
राजनैतिक खतरा बन चुका था. हट्टिंग्टन का “सभ्यताओं के टकराव” का सिद्धान्त
यूरोपवासियों को सही नजर आने लगा. मुसलमानों को संदेह की निगाह से देखा जाने लगा और
मुसलमान स्वयं को अलग-थलग और अकेला महसूस करने लगे. यद्यपि बहुत कम महिलाएं हिजाब
पहनती हैं परंतु हिजाब से संदेह का यह वातावरण और गहरा गया. मुस्लिम महिलाओं में
हिजाब का प्रचलन बहुत कम होने के बावजूद यूरोप में वह
मुसलमानों की अलग पहचान का प्रतीक बन गया.
इस तथ्य को नजरअंदाज किया गया कि हिजाब पहनने वाली हर महिला के पीछे हजारों ऐसी
मुस्लिम महिलाएं हैं, जो हिजाब नहीं पहनतीं. 9/11 के बाद से हिजाब न केवल धार्मिक
कट्टरता का प्रतीक बन गया बल्कि उसे सुरक्षा के लिए खतरा माना जाने लगा. हिजाब के
पीछे कौन है? कोई आतंकवादी महिला या फिर पुरूष जो हिजाब के अंदर बम छिपाए हुए है.
कुछ महिलाओं ने भी अनावश्यक जिद्द का प्रदर्शन करते हुए अपने चेहरे पर से हिजाब
हटाने से इंकार कर दिया. इससे डर और संदेह और बढ़ा. धीरे-धीेरे हिजाब-विरोधी आंदोलन
जोर पकड़ता गया.
यह मुद्दा मानवाधिकारों से भी जुड़ा हुआ है. क्या किसी महिला को कोई विशेष पोशाक
पहनने या न पहनने के लिए मजबूर किया जा सकता है? हिजाब पर प्रतिबंध के समर्थकों का
कहना है कि महिलाओं को उनके परिवार द्वारा चेहरा ढ़क कर रखने के लिए मजबूर किया जाता
है और यह उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है. कुछ मामलों में यह सही भी हो सकता है
परंतु अधिकतर महिलाएं अपनी मर्जी से हिजाब पहनती हैं. इस मामले में सच का पता कैसे
चले जब तक कि महिलाएं स्वयं उनके साथ जबर्दस्ती किए जाने की शिकायत न करें.
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सरकोज़ी, हिजाब पर प्रतिबंध लगाने पर आमादा हैं परंतु इसका कारण फ्रांस
की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति नहीं है. इसका कारण यह है कि वे मूलतः
दक्षिणपंथी हैं और अपने दक्षिणपंथी समर्थकों को प्रसन्न करने के लिए यह
कदम उठा रहे हैं. |
हिजाब पर प्रतिबंध लगने से तो महिलाओं का दमन बढ़ेगा ही. अगर सचमुच उन्हें उनके
परिवार द्वारा चेहरा ढ़क कर रखने के लिए मजबूर किया जा रहा है तो एक ओर उनका परिवार
उनके साथ जबर्दस्ती करेगा तो दूसरी ओर, अगर वे हिजाब पहनकर बाहर निकलेंगी तो उन्हें
जुर्माना भरना पड़ सकता है या जेल भी जाना पड़ सकता है. इस तरह, वे अपने परिवार और
राज्य, दोनों के दमन का शिकार होंगी. यह एक जेल से दूसरी जेल में जाने के समान
होगा. राज्य उन्हें स्वतंत्रता दिलवाने की बजाय उनका और अधिक दमन करेगा.
इस तर्क में अब कोई दम नहीं रहा है कि फ्रांस या बेल्जियम (जहां भी हिजाब
प्रतिबंधित कर दिया गया है) या यूरोप के किसी अन्य देश की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को
हिजाब से खतरा है. फ्रांस, बेल्जियम या कोई भी अन्य यूरोपीय देश अब एकल संस्कृति
वाला देश नहीं रह गया है. ये सभी देश बहुसांस्कृतिक बन गए हैं और वहां सार्वजनिक
व्यवहार के मानदंड अब वहां के बहुसांस्कृतिक समाज के अनुरूप होने चाहिए.
पश्चिमी देशों का हमेशा से यह दावा रहा है कि वे सहिष्णु हैं जबकि पूर्वी राष्ट्रों
में सहिष्णुता का अभाव है. सच यह है कि पूर्वी देश हमेशा से बहुसांस्कृतिक,
बहुधार्मिक व सहिष्णु रहे हैं. पश्चिम, लंबे समय तक एकल संस्कृति और एकल धर्म का
क्षेत्र रहा है और अब, जब वहां बहुसंस्कृतिवाद का उदय हो रहा है, तब उसके सहिष्णु
होने के दावे का खोखलापन सामने आ रहा है. पश्चिम में नस्लीय असहिष्णुता तो हमेशा से
रही है, अब ये देश सांस्कृतिक दृष्टि से भी असहिष्णु बनते जा रहे है.
यह मुद्दा एक राजनैतक चुनौती भी है. सरकोज़ी, हिजाब पर प्रतिबंध लगाने पर आमादा हैं
परंतु इसका कारण फ्रांस की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति नहीं है. इसका कारण यह है कि वे
मूलतः दक्षिणपंथी हैं और अपने दक्षिणपंथी समर्थकों को प्रसन्न करने के लिए यह कदम
उठा रहे हैं. आर्थिक मंदी से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी पश्चिमी राजनेता
धर्मनिरपेक्षता आदि से संबंधित विवाद खड़े कर रहे हैं. ठीक उसी तरह जैसे मुसलमान
अपनी अलग पहचान पर जोर देने के लिए और अपनी आर्थिक बदहाली पर आक्रोश व्यक्त करने के
लिए धार्मिक मुद्दे उठाते रहे हैं.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये सारी समस्याएं अस्थायी हैं. शनैः-शनैः एक नया
यथार्थ उभर रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मुसलमानों की नई पीढ़ी, जिसका
जन्म यूरोप में हुआ है, की एक अलग पहचान है. यह पीढ़ी प्रवासी की श्रेणी में नहीं
आती क्योंकि उसका जन्म और पालन-पोषण यूरोप में ही हुआ है. इसी संदर्भ में एक नया
शब्द, “यूरो-इस्लाम” अस्तित्व में आ गया है यद्यपि वह अभी बहुत प्रचलित नहीं है.
यूरोप में मुसलमानों की नई पीढ़ी सामने आ रही है. इनके अभिभावकों को यह डर सता रहा
है कि यह पीढ़ी अपनी संस्कृति और भाषा से दूर जा रही है और वे अपनी संतानों को अपनी
संस्कृति और भाषा से जोड़े रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. परंतु वे एक हारी
हुई लड़ाई लड़ रहे हैं. यूरो-इस्लाम, अफ्रीकी और एशियाई इस्लाम से निश्चित रूप से
भिन्न होगा. इसकी संस्कृति, अफ्रीकी या एशियाई नहीं बल्कि यूरोपीय व पश्चिमी होगी.
यूरो-इस्लाम के नए धर्मशास्त्री भी उभरेंगे.
परिवर्तन के इस दौर की अपनी समस्याएं हैं जिन्हें विवाद के स्थान पर रचनात्मकता के
रास्ते पर चलकर सुलझाया जाना चाहिए. किसी भी नई संस्कृति के उदय के संक्रमण काल में
अत्यंत संवेदनशीलता और परिपक्वता से काम लेने की जरूरत होती है. यूरोप के प्रवासी
मुसलमानों और उनकी नई पीढ़ी को इस चुनौती का समझदारी से और बिना अपना आपा खोए
मुकाबला करना चाहिए.
07.08.2010,
11.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित