पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
Photobucket
 पहला पन्ना > मुद्दा > समाजPrint | Send to Friend | Share This 

हिज़ाब पर हंगामा क्यों

मुद्दा

हिजाब पर हंगामा क्यों

डॉ. असगर अली इंजीनियर

यूरोप में हिजाब के मुद्दे पर उठा विवाद शाँत होता नजर नहीं आ रहा है. फ्रांस की संसद द्वारा हिजाब पर प्रतिबंध लगाए जाने से इस विवाद ने एक बार फिर जोर पकड लिया है. इस बारे में अखबारों में बहुत कुछ छप रहा है और इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है. हिजाब के मुद्दे पर चल रही बहस का एक दिलचस्प पहलू यह है कि जहां कुछ मुस्लिम महिलाएं हिजाब का विरोध कर रही हैं, वहीं कुछ गैर-मुस्लिम, विशेषकर पश्चिमी देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ता हिजाब पर प्रतिबंध का विरोध कर रहे हैं. वे उन देशों की निंदा कर रहे हैं, जिन्होंने कानून बनाकर हिजाब पर प्रतिबंध लगाया है.

Burka-veil


हमें इस मुद्दे का धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषण करना होगा तभी हम इस विवाद की जड़ तक जा सकेंगे.

कुरान में मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब की अनिवार्यता की कहीं भी चर्चा नहीं है. केवल पैगंबर मोहम्मद की पत्नियों, जिन्हें मुसलमान अपनी माँ मानते हैं, के संदर्भ में हिजाब की चर्चा है. कुरान, मुसलमानों को यह सलाह देती है कि वे उनसे पर्दे के पीछे से बात करें क्योंकि पैगंबर साहब के घर आने वाले कई लोग उनकी पत्नियों से अनुपयुक्त बातें करते थे जो कि पैगंबर साहब को उचित प्रतीत नहीं होता था.

जहां तक साधारण मुस्लिम महिलाओं का प्रश्न है, कुरान में उनके लिए हिजाब पहनना कतई अनिवार्य नहीं किया गया है. चेहरे को ढ़कने की तो कहीं कोई बात ही नहीं है. उन्हें सिर्फ यह सलाह दी गई है कि वे अपनी ‘ज़ीनत’ का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन न करें. और केवल वे ही अंग- अर्थात चेहरा और हाथ खुले रखें- जिन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया जा सकता है.

कुरान, महिलाओं को यह सलाह भी देती है कि वे अपने वक्षस्थल को कंधों या सिर पर डाले हुए कपड़े से ढ़क कर रखें. कुरान की महिलाओं को यही सलाह है, इस बारे में उलेमा लगभग एकमत हैं.

इस्लामिक कानून के कुछ विद्वानों-विशेष कर हनबली पंथ के मानने वालों-का यह कहना है कि महिलाओं को अपना चेहरा भी ढ़कना चाहिए. ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत ही कम है और हिजाब पर विवाद खड़े होने और पश्चिम के कई देशों में हिजाब प्रतिबंधित किए जाने के बाद, हनबली संप्रदाय के एक सऊदी मुती तक ने यह फतवा जारी किया है कि यूरोप में मुस्लिम महिलाएं अपना चेहरा खुला रख सकती हैं.

दुनिया के विभिन्न मुस्लिम और गैर-मुस्लिम देशों में सभी महिलाएं अपने चेहरे को ढ़कने वाला हिजाब नहीं पहनतीं. सऊदी अरब में महिलाएं अपने वस्त्रों के ऊपर एक ढीला चोंगा पहनती हैं और अपना चेहरा भी ढ़कती हैं.

खाड़ी के देशों में महिलाओं को अपने वस्त्र चुनने की पूरी स्वतंत्रता है. वहां तो कई महिलाएं अपने बाल भी कटवा लेती हैं और सिर ढ़के बगैर सरकारी और निजी दफ्तरों में काम करती हैं. खाड़ी के देशों में महिलाएं कारें भी चलाती हैं, जिसकी सऊदी अरब में कल्पना तक नहीं की जा सकती. पाकिस्तान में कुछ मौकों को छोड़कर अधिकांश महिलाएं अपने सिर नहीं ढ़कतीं. भारत, जहां मुसलमान सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं, में तो मुस्लिम महिलाओं को अनेक आज़ादियां हासिल हैं.

9/11 के बाद यह सिर्फ सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रह गया बल्कि इस पर राजनैतिक रंग चढ़ गया. इस्लाम को पश्चिम में सुरक्षा के लिए खतरा माना जाने लगा.


हिजाब का संबंध धर्म से कम और संस्कृति से ज्यादा है. हिजाब की डिजाइन, आकार आदि अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग है. सऊदी अरब को छोड़कर, अन्य सभी देशों में बहुत कम संख्या में मुस्लिम महिलाएं अपना चेहरा ढ़कती हैं. फ्रांस में, जहां चेहरा ढ़कने वाले हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, मुसलमानों की आबादी लगभग 60 लाख है परंतु केवल 400 से 2000 के बीच मुस्लिम महिलाएं ही अपना चेहरा ढ़क कर रखती हैं. आश्चर्य है कि इतनी कम मुस्लिम महिलाओं ने फ्रांस की जनता में इतना अधिक डर पैदा कर दिया!

हिजाब के संदर्भ में हमें पश्चिमी देशों की संस्कृति पर भी एक नजर डालनी होगी. बीसवीं सदी की शुरूआत तक यूरोप में महिलाएं पैरों सहित अपने पूरे शरीर को ढ़क कर रखती थी. आज भी ईसाई ननों को अपना सिर ढ़कना पड़ता है. महिलाओं की स्वतंत्रता के आंदोलन के चलते, धीरे-धीरे महिलाएं पैर ढ़क कर रखने की अनिवार्यता से मुक्त हो गईं और बाद में तो वक्षस्थल का एक हिस्सा खुला रखने की परंपरा भी पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा बन गई. सन् 1950 के बाद से, अपने शरीर को खुला रखने के मामले में, यूरोप की महिलाओं को अनेक स्वतंत्रताएं हासिल हो गईं.

शुरूआती दौर में जो मुसलमान परिवार यूरोप पहुंचे, वे श्रमिक वर्ग के थे और ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. यूरोप में भी वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप व्यवहार करते रहे, जिनमें चेहरा ढ़कना शामिल नहीं था. शुरूआती दौर में फ्रांस सहित यूरोप के अन्य देशों में बसने वाले अधिकांश मुस्लिम परिवार, पाकिस्तान, तुर्की और पश्चिमी अफ्रीकी देशों के ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे. उनके घरों की महिलाएं सामाजिक जीवन में हिस्सा नहीं लेती थीं और उनका अधिकांश समय उनके घर में बीतता था.

धीरे-धीरे हालात बदलने लगे. इसका एक कारण तो था मुस्लिम प्रवासियों की संख्या में वृद्धि. दूसरे ये नए प्रवासी श्रमिक वर्ग के नहीं थे बल्कि उच्च शिक्षित थे. वे अपनी अलग पहचान बनाए रखने के इच्छुक थे. उनकी यह इच्छा और बलवती इसलिए हो गई क्योंकि उन्हें यूरोप में रोज़गार के बाजार में नस्लीय भेदभाव और पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा. वे पश्चिम की संस्कृति में घुलमिल न सके.

नतीजा यह हुआ कि वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का अत्यधिक कड़ाई से पालन करने लगे. सन् 1970 के दशक के बाद से मध्यपूर्व के देशों में पेट्रो डॉलरों की बरसात होने लगी और अरब देशों से बड़ी संख्या में अभी-अभी रईस बने लोग मौज-मस्ती करने यूरोप आने लगे. ये लोग अपने परिवारों को भी साथ लाते थे और यूरोप में सार्वजनिक स्थानों पर अपनी विशिष्ट पोशाकों में अधिकाधिक संख्या में मुस्लिम महिलाएं दिखाई देने लगीं.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

asad delhi

 
 I think that apposition of these kind of acts should tbe left to non muslims. Muslims should first appose rules and laws in muslims countries which descreminate minorites / non muslims in their country. We, muslims, should now start improving ourself according to progressive and democratic values. There are some descremination with muslims but before addressing those it is necessary for muslims to find their onw shortcoming and improve it. This is only way of betterment of muslims as a whole. Only muslims can change their image and position in modern society.

As far as hijab is concern, it is true that few fanatic politions in west are using it against muslims, but we, muslims, should not make a big issue so they can not use it against us. We should follow all laws of the land where we live. Obviously we should appose those law which are descreminating by non voilent, democratic way.
 
   
 

dr.rajesh kapoor (dr.rk.solan@gmail.com) himachal

 
 असगर अली साहब, आप जैसे मुसलमानों के कारण ही इस्लाम की स्वीकार्यता बढ़ेगी और शक्ल सुधरेगी. मेरी शुभकामनाएं. 
   
 

shahroz (shahroz_wr@yahoo.com) delhi

 
 कुरान में उनके लिए हिजाब पहनना कतई अनिवार्य नहीं किया गया है. चेहरे को ढ़कने की तो कहीं कोई बात ही नहीं है. उन्हें सिर्फ यह सलाह दी गई है कि वे अपनी ‘ज़ीनत’ का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन न करें. और केवल वे ही अंग- अर्थात चेहरा और हाथ खुले रखें- जिन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया जा सकता है.

कुरान, महिलाओं को यह सलाह भी देती है कि वे अपने वक्षस्थल को कंधों या सिर पर डाले हुए कपड़े से ढ़क कर रखें. कुरान की महिलाओं को यही सलाह है, इस बारे में उलेमा लगभग एकमत हैं.
 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) , Noida, UP

 
 कट्टरपंथियों के पास जब कोई मुद्दा नहीं बचता तब वे ऐसे ही मुद्दों के साथ समाज में गंदगी फैलाते हैं. हिजाब पर इतना हंगामा मचाने की जरुरत नहीं है. दूसरी ओर अपनी समस्या को सुलझाने के बजाय हिजाब पर प्रतिबंध लगाना भी नौटंकी है. इससे आतंकवाद रुकता नहीं है. हां, उसे और एक अवसर जरुर मिल जाता है. सरकोजी जैसे लोग मूलतः नौटंकीबाज हैं. 
   
 

संपादक () . रविवार

 
 सैन्नी जी, अलग-अलग फांट और ऊपर से उर्दू की कम जानकारी के कारण अक्सर यह समस्या सामने आती है. हमने इस आलेख में सुधार कर दिया है. आपका आभार. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 बहुत ही लाजवाब तहरीर. असगर साहब को आदाब और सलाम पहुंचे. वो सही फरमाते हैं की ये चीज़ें वक्त के साथ-साथ बदलती हैं. उतर रहा है रुख से नकाब आहिस्ता-आहिस्ता.
बुजुर्गों की एक कहावत याद आई है-जैसा देश वैसा भेष !

अकबर इलाहाबादी का एक शेर भी, जिसमें कहा गया है कि पर्दा तो मर्दों की अक्ल पर पड़ गया है. बहुत सोच-समझ कर, औरत से उसके दिल का हाल पूछ कर ही कोई जान सकता है कि क्यों ऐसी चीज़ें उसे अपने लिए अच्छी लगती हैं, जिन्हें, अगर उसका वश चले या उसकी बनाई दुनिया हो तो वो उतार फेंके?

'परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ' जैसे गीत कभी इसलिए प्यारे लगते थे कि परदे की न सिर्फ अपनी मौज थी, एक हस्सें-तरीन रहस्य भी था. खुदा अगर परदे से बाहर आ गया तो क्या होगा?
और अगर पहचान सकें तो खुदा हर कहीं मौजूद है. कितनी ही नूरानी सूरतें हैं, जो ज़माने की बुरी नज़र से खौफ खा कर परदे में हैं. सियासत की पर्देदारियों और उनमें छिपी मक्कारियों को कौन नहीं जानता? मेरे जैसे मामूली अनाड़ी और पहाड़ी के चेहरे से पर्दा उठाने को कई लोगों के हाथ मचलते हैं. उनका बस चले तो मेरी नाज़ुक मुंडी ही मरोड़ दें.

अंत में : असगर साहब जैसे बेहतरीन अदीब की तहरीर में 'हिज़ाब' और 'जीनत' शायद किसी अनजान की चूक से आ गए. मुझे लगता है की 'हिजाब' और 'ज़ीनत' होना चाहिए. हालांकि बात समझ में आ गई, फिर भी अक्सर उर्दू में जरा-सी चूक से मतलब उलट जाया करते हैं. असगर साहिब ऐसे सुलझे हुए मज़मून लिखते रहें और संपादक उन्हें सही कर के दूर तलक पहुंचाते रहें. ऐसी तहरीर को पढने के लिए कौन न अपना नकाब उलट दे बेसाख्ता!
 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in