सरकार चलाने का शॉर्ट कट
बाईलाइन
सरकार चलाने का शॉर्ट कट
एमजे अकबर
विपक्ष कभी नहीं चाहता कि उसकी मांगें पूरी हों. लगता है सरकारें लोकतांत्रिक
द्वंद्व के इस बुनियादी तथ्य को समझ नहीं पातीं. विपक्ष चाहता है कि सरकार अपने
अड़ियल रुख पर कायम रहे, ताकि वह मुद्दे को उस सीमा तक खींच सके, जहां वह जनता की
चेतना में गहरे तक रच-बस जाए और उसका हल लगातार देरी कर के भी नहीं निकाला जा सके.
किसी भी आरोप का राजनीतिक मोल तब तक नहीं है, जब तक वह विरोध के मुखर अभियान का
हिस्सा नहीं बन जाता. सैद्धांतिक रूप से तो विपक्ष कॉमनवेल्थ गेम्स के मुद्दे पर
शोर-शराबा करते हुए सदन की एक दिन की कार्रवाई को हंगामे की भेंट चढ़ा देता है
क्योंकि वह भ्रष्टाचार की जवाबदेही तय करना चाहता है. लेकिन व्यावहारिक रूप से
विपक्षी पार्टियों को इस मौके का अधिकतम फायदा उठाना चाहिए. उसे इसके लिए हर कस्बे,
गाँव और शहर में जाकर संदेश फैलाना चाहिए कि इस सरकार ने न सिर्फ जनता का पैसा
चुराया है, बल्कि यह इतनी मोटी चमड़ी की है कि वो चोरों के खिलाफ इसके लिए कुछ कर
भी नहीं रही है. इस प्रचार से विपक्ष अपनी प्रामाणिकता की पुष्टि करता है.
लेकिन हकीकत यह है कि अब वाकई इससे फर्क नहीं पड़ता कि सुरेश कलमाडी की विदाई अभी
होगी या खेलों के बाद. भारत में खेलों के सामंत के रूप में उनकी भूमिका अब खत्म हो
चुकी है. सवाल यही है कि उन्हें विदाई की पार्टी, जो कि यकीनन कॉमनवेल्थ खेलों का
समापन समारोह होगा; में कोई अच्छा-सा तोहफा दिया जाता है या एकांतवास में भेज दिया
जाता है?
जहां तक इस भ्रष्टाचार से संबद्ध लोगों का सवाल है, उनके लिए यश और अपयश के बीच का
फर्क खत्म हो गया है. वैसे जिस दुस्साहस और बड़े पैमाने पर ये भ्रष्टाचार किया गया
है, इस फर्क के खत्म होने से अलग कुछ हो भी नहीं सकता था. मुमकिन है कि आरोपों के
घेरे में आये लोगों को लगा हो कि उन्होंने सब तरफ से स्थिति एक बराबर कर ली है. इस
राजनीतिक विभाजन के उस पार जनता के खर्चों पर बहुत सारे दौरे थे.
भाजपा के विजय गोयल और कांग्रेस के जगदीश टाइटलर ‘तकनीकी अध्ययन’ के लिए बीजिंग गए
थे, लेकिन दोनों का ही कॉमनवेल्थ खेलों से कोई वास्ता नहीं था. लेकिन वे अब तक
तकनीकी डॉक्टरेट पाने के हकदार तो बन ही गए होंगे. संभव है कि उन्हें एशियाई खेलों
के लिए प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया जा रहा हो.
दिल्ली के कांग्रेस विधायक हारून यूसुफ और एएस लवली ये पता करने के लिए मेलबर्न गए
थे कि वे कैसे अपने शहर का यातायात संभाले. निश्चय ही इसी वजह से अभी से दिल्ली का
यातायात ऑस्ट्रेलिया के यातायात से बेहतर और सुचारु ढंग से चलने लगा है. स्वाभाविक
है कि उन्होंने प्रथम श्रेणी में यात्रा की होगी. यह दोस्तों के बीच होने वाले बड़े
बजट के पारस्परिक आदान-प्रदान के; और जनता के सामने खुलासे के लिए एक बीमे के अलावा
कुछ नहीं है. जिसके पीछे यह सोच थी कि अगर अगर सब दोषी हैं तो कोई दोषी नहीं है.
अगर इन लोगों को अपनी करनी पर जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास नहीं होता तो वे सभी के
सभी बच सकते थे. लेकिन हमेशा ही कुछ लोग से होते हैं जो साथ खड़े होने से मना कर
देते हैं. उन्हीं की वजह से लोकतंत्र लोकतांत्रिक बना रहता है.
वक्त भ्रष्टाचार को दुधारू गाय बना देता है. यदि टेलीकॉम घोटाले के बाहर आने के बाद
ही ए राजा को कैबिनेट से हटा दिया जाता तो उनकी वजह से चुनावी राजनीति में हो सकने
वाले नुकसान को पाटा जा सकता था. चूंकि वे पद पर बने हुए हैं, इसलिए अगले साल
विधानसभा चुनाव में वे जयललिता के अच्छे, ‘मोबाइल’ शिकार साबित होंगे. यहां
‘मोबाइल’ का रूपक खूब सटीक है. एक अच्छा कार्टूनिस्ट राजा के पोस्टरों पर कमाल का
काम कर सकता है.
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सरकार चलाने का
कोई शॉर्ट कट नहीं होता. अगर चुनाव करीब न हों तो क्या सरकार को विपक्ष
के विरोध की परवाह करनी चाहिए? |
हालांकि सरकारें राजनीति के दूसरे बुनियादी तथ्य को बखूबी समझती हैं. और वह यह कि
संसद और मीडिया का गुस्सा हमेशा बना नहीं रहता. वे उम्मीद करती हैं कि नाराजगी की
शुरुआती लहर खत्म हो जाने के बाद मतदाता इस तरह के मसलों पर ज्यादा ध्यान नहीं
देंगे. एक बार खेल खत्म हो जाए, फिर किसे परवाह है कि कौन किसको जिम्मेदार ठहरा रहा
है? सरकार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही विपक्ष की क्षमता है कि वह
ऐसा करे. लेकिन असल मसले की अनदेखी कर जाने की आदत नुकसान का सौदा भी साबित हो सकती
है.
कश्मीर में यही हुआ. अब ये हाल हो गए हैं कि लोग किसी नेक हरकत को भी गंभीरता से
नहीं लेते. जब उमर अब्दुल्ला एक अस्पताल का दौरा करने गए तो उन्हें बाकायदा वहां से
खदेड़ दिया गया. वे अपनी राजधानी में चंद किलोमीटर की यात्रा भी कार से नहीं कर
सकते. उन्हें हेलीकॉप्टर चाहिए. जब वे लेह के बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा करने गए तो
उन्होंने वहां श्रीनगर से ज्यादा मुस्तैदी दिखाई. शायद उन्हें और दिल्ली को लगता हो
कि रमजान का पाक महीना अपने साथ अमन-चैन की सौगात लेकर आएगा.
लेकिन सतह पर बनी रहने वाली शांति कभी भी असल शांति नहीं होती. सरकार चलाने का कोई
शॉर्ट कट नहीं होता. अगर चुनाव करीब न हों तो क्या सरकार को विपक्ष के विरोध की
परवाह करनी चाहिए? यही अकेला ऐसा जिम्मेदार क्षण है, जिसे सरकार संजीदगी से लेती
है. चूंकि हमारे यहां ‘लॉ ऑफ रिकॉल’ नहीं है, इसलिए सरकारें सड़कों पर उफनते आक्रोश
की ज्यादा फिक्र नहीं करतीं, क्योंकि वे जानती हैं कि चुनाव आते-आते गुबार ठंडा हो
जाएगा. लेकिन जनसमर्थन में आने वाली कमी सत्ता तंत्र की नींव में सेंध भी लगा सकती
है.
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लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं.
08.08.2010,
02.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित