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बच्चों की कब्रगाह है मेलघाट

मुद्दा

 

बच्चों की कब्रगाह है मेलघाट

शिरीष खरे मेलघाट से लौटकर

विदर्भ को देश भर में किसानों की आत्महत्या वाले इलाके के रुप में जाना जाता है लेकिन इसी इलाके में सतपुड़ा पर्वत में बसी मेलघाट की पहाड़ियों में छोटे बच्चों की मौत के आंकड़े पहाड़ियों से ऊंचे होते चले जा रहे हैं. साल दर साल कोरकू आदिवासियों के हजारों बच्चे असमय काल के गाल में समाते चले जा रहे हैं.

कुपोषण


मेलघाट में 1993 को पहली बार कुपोषण से बच्चों के मरने की घटनाएं सामने आई थीं. यही वह समय था, जब देश की मौजूदा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल यहां से संसद में पहुंची थीं. मगर 1993 से अब तक कुल 10 हजार 762 बच्चों की मौत हो चुकी है. तब से अब तक सरकार द्वारा यहां अरबों रूपए खर्च किए जाने के बावजूद मौत का तांडव है कि रूकने के बजाय और तेज़ होता जा रहा है.

इस साल भी मानसून से पहले किये गए सर्वेक्षण से जो आंकड़े आए हैं, उनमें भी वहीं हैरतअंगेज, चिंतनीय और शर्मनाक कहानियां छिपी हुई हैं. बल्कि इस साल तो बीते साल के मुकाबले कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या में दोगुनी बढ़ोतरी होने की आशंकाएं जतायी जा रही हैं.

मेलघाट में बीते 5 सालों में 0 से 6 साल तक के बच्चों की मृत्यु दर के सरकारी आकड़ों को देखा जाए तो यहां 2005-06 में बाल मृत्यु का आंकड़ा 504 था, 2006-07 में जो 490 पर अटका, 2007-08 में यह 447 तक तो जा पहुंचा, मगर 2008-09 में यह बढ़कर 467 हो गया, और 2009-10 में यह और बढ़कर 510 तक आ पहुंचा. गौरतलब है कि बीते तीन सालों से यहां बच्चों की मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है. इस साल कुपोषण के ग्रेड-4 में 39 बच्चे पाये गए हैं, जो कि बीते साल के मुकाबले 10 ज्यादा हैं. जबकि इस साल कुपोषण के ग्रेड-3 में 442 बच्चे पाये गए हैं, जो कि बीते साल के मुकाबले 213 ज्यादा हैं.

बीते 17 सालों के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मेलघाट में सलाना 700 से 1000 बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड़ देते हैं. जहां 2007-08 में सबसे कम 447 बच्चे मारे गए, वहीं 1996-97 में सबसे ज्यादा 1050 बच्चे मारे गए.

इस साल भी मेलघाट में मरने वाले बच्चों का सरकारी आंकड़ा 500 को पार कर चुका है, इसलिए हर साल की तरह इस साल भी कोई न कोई सरकारी दौरा और आयोजन होना है, मगर उसके बाद प्रशासनिक अमला किस तरह से कुंभकरणी नींद में डूब जाता है,यह जानने के लिये हर साल के आंकड़ों पर नजर डालना काफी है.

यह बरसात का मौसम है. बरसात के मौसम में लोग काम के लिए घर से बाहर नहीं निकल पाते हैं, इसलिए उनके सामने भोजन का संकट रहता है. सबसे ज्यादा बच्चे भी इसी मौसम में मरते हैं. इसी मौसम के बीतते ही प्रशासनिक अमला थोड़े दिनों के लिए जाग जाता है.

1993 के बरसात का मौसम बीतते ही सबसे पहले महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने यहां दौरा किया था. उसके बाद से हर साल के सर्द समय में कभी सरकारी दौरों तो कभी मेलघाट कुपोषण की चर्चाओं से सरकारी भवनों के भीतर गर्मी तो बनी रहती है, मगर उन चर्चाओं की गर्मी से मेलघाट अछूता ही रह जाता है.

सरकारी दौरा तारीख बताकर किया जाता है. तारीख के फाइनल होते ही यहां के शांत सरकारी भवनों में अचानक हलचल मचती है. सूचना मिलते ही सारे कर्मचारी और साधन सक्रिय हो जाते हैं. क्योंकि नेताओं को मुख्य सड़क के गांवों और अस्पतालों को ही देखने समझने के लिए निकाला जाता है, इसलिए दूर-दराज के कर्मचारियों को बेफ्रिकी रहती है. इस समय में उनके लिए सुविधाओं वाली जगहों पर ही ठहरने के इंतजाम किए जाते हैं, इसलिए उनके पीछे रहने वाले अधिकारियों द्वारा कुपोषण के कारण तो गिनाए जाते हैं, मगर योजनाओं या उनमें होने वाली अनियमितताओं को छिपाने का सिलसिला जारी रहता है.

अमरावती जिले में आने वाला मेलघाट प्रदेश के अत्यंत गरीब जिलों में से एक है. यहां 51.28% परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं. जाहिर है, गरीबी की स्थिति बेकारी का नतीजा होती है और इसका सीधा असर स्वास्थ्य की स्थितियों पर पड़ता है. लेकिन यह बात चौंकाने वाली है कि इतनी बड़ी आबादी और उसकी नाजुक परिस्थितियों के मुकाबले यहां अस्पताल और उसमें कुल बिस्तरों की संख्या नही के बराबर है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ansh baba (baba.ansh@gmail.com) bhopal

 
 खरे जी, यह भारत का आइना है साहब. जिस देश में माओं के गर्भ में कुपोषण पलता है, वहां क्या उम्मीद कीजियेगा, जहाँ सांसद और मंत्रियों को अपने वेतन भत्ते बढ़वाने से फुरसत नहीं हो वो क्या करेंगे. इन्हें मेलघाट में रखना चाहिए, उन आदिवासियों की मुफलिसी के बीच, तब शायद समझ आ जाये. मजे की बात है हमारी सरकारें उपलब्धियों के आंकड़े गिनती है और उसी से अँधेरे को छुपाती है. कितनी भयावह स्थिति है, डॉक्टर है तो दवा नहीं, दवा है तो देने वाला नहीं, सभी हैं तो कोई जाने को तैयार नहीं. बहुत बढ़िया खरे जी. 
   
 

Akhileshwar Pandey (apandey833@gmail.com) Meerut.

 
 मेलघाट लाइव रिपोर्ट... बहुत-बहुत बधाई शिरीष भाई. 
   
 

अंशुमन शिंदे अमरावती, फिलहाल मुंबई

 
 १३-१४ साल पहले मेलघाट में बच्चों की लगातार हो रही मौतों को लेकर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने कहा, "सरकार का यह प्राथमिक दायित्व है कि वह मेलघाट में रहने वाले आदिवासियों को पेटभर खाना, स्वास्थ्य सेवाएं और उचित रोजगार के अवसर मुहैया करवाए"

अभी बीते साल ही अदालत ने मेलघाट में मरने वाले बच्चों के लिए कहा कि अदालत को यह कहने में कोई हिचक नहीं कि महाराष्ट्र की सरकार ने कुपोषण और बाल मृत्यु रोकने के लिए न के बराबर कोशिशें की हैं। बैठकों का कोई नतीजा नहीं निकल रहा है। अदालत के फैसले को सरकार लागू नहीं करा पाई है।
 
   
 

अंशुमन शिंदे अमरावती, फिलहाल मुंबई

 
 मेलघाट में बच्चों की मौतों से परेशान होकर महाराष्ट्र सरकार ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी के साथ विशेष रूप से काम करने के लिए तीन और जिला स्वास्थ्य अधिकारियों की नियुक्ति की है। डॉक्टर येलूरकर कुछ महीने पहले ही यहां आए हैं।

यहां १८-२० महीने से तीन स्वास्थ्य अधिकारी बदले गए। मगर इनकी हालत भी देख लीजिये :

चार साल पहले धारनी गांव में स्वास्थ्य केंद्र में अतिरिक्त जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर डालू की नियुक्ति हुई है। कुछ दिन काम करने के बाद वे एक हादसे में घायल हो गए और लंबी छुट्टी पर ऐसे गए कि उसके बाद उनका प्रमोशन हो गया और वे सार्वजनिक कुटुम्ब कल्याण प्रशिक्षण केंद्र के प्रिंसिपल बन गए। तब से यहाँ कोई डॉक्टर नहीं है।

छह साल पहले दूसरे अतिरिक्त स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर खनाडे की अमरावती में नियुक्ति हुई। शीघ्र ही उनका भी तबादला हो गया। उनकी जगह पर डॉक्टर जाजू को आना था, मगर उन्होंने ज्वाइन नहीं किया। तब से वह जगह खाली है।

तीन साल पहले जिले के लसीकरण अधिकारी डॉक्टर सोनावणो का तबादला यवतमाल जिले में हुआ। वे रिटायर हो गए लेकिन उनकी जगह किसी ने ज्वाइन नहीं किया।

प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता के चलते प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है। कहने को सीएम अशोक चव्हाण ने हर जिले के लिए प्रभारी मंत्री के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन कराने के लिए प्रभारी सचिवों की नियुक्तियां की हैं, मगर नाकारा अधिकारीयों से आज तक कौन पार पा सका है।
 
   
 

Gulshan (lifeisonelove@gmail.com) Uttarkashi

 
 Nice articale....keep it Guru.  
   
 

editor (editor.samajkalyan@gmail.com) samaj kalyan,cswb, new delhi

 
 बेहद अच्छा प्रयास.अल्लाह करे जोर-ए-कलम और जियादा. 
   
 

shikha varshney (shikha.v20gmail.com) london

 
 चिंताजनक हैं स्थितियां. 
   
 

jai kumar jha (honestyprojectdemocracy@gmail.com) delhi

 
 हमने आपकी यह पोस्ट ईमेल से देश के गणमान्य लोगों को पढने और इंसानियत के नाते कुछ करने के लिए भेज दिया है. अपने इंसानियत के आग्रह के साथ. देखते है कुछ होता है या नहीं.
..........
सभी गणमान्य लोगों को सादर नमस्कार,

जिस देश में अरबों रुपया बिना वजह और बिना जरूरत के सड़कों के निर्माण में सिर्फ इसलिए लगा दिया जाता है कि उसमें सिर्फ और सिर्फ लूट का इरादा होता है और उसी देश में सुविधाओं के अभाव में इंसानियत दम तोड़ती है. आप लोगों के इन पदों पर बैठकर इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ नहीं किया जाना और देश में लूट का तंत्र स्थापित हो जाना मुझ जैसे नागरिकों के दिलों में आपके लिए कैसे सम्मान पैदा करेगा? जरा सोचिये, पढ़िए इस आलेख को और अगर इंसानियत के नाते कुछ कर सकते हैं तो कीजिये अन्यथा इंसानियत को भ्रष्टाचार और लूटेरे ख़त्म कर देंगे. आज जरूरत है आप लोगों द्वारा कुछ ठोस और ईमानदारी भरे प्रयास की. देश में साधन और संसाधन की कमी नहीं है बस उसके सदुपयोग और लूटेरों से बचाने की जरूरत है. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने की जरूरत है.
आशा है आप लोग कुशल होंगे,
आपका
जय कुमार झा
 
   
 

पशुपति शर्मा (pashupatiantu@gmail.com) दिल्ली

 
 शिरीष की एक और झकझोरने वाली रिपोर्ट। ढाई रूपये दिन का खाना कैसा होगा समझा जा सकता है। राशन की दुकान के विरोध का क्या नतीजा होता है,ये भी कमाल है। इलाज कराना है तो 100-150 किमी भागो, ऐसे में मौत तो मानो पहले से खाते में लिख दी गयी है। पता नहीं कैसे प्रशासन और सरकार आंख मूंदे बैठे है जबकि मेलघाट में हर दिन एक बच्चे की मौत का भयावह आंकड़ा चिता की आग की तरह आंखों के सामने नाच रहा है। 
   
 

kase kahun mp

 
 मेलघाट जैसी और न जाने कितनी ही जगहों पर ऐसी परिस्थितियों में जी रहे है लोग.सबसे ज्यादा तकलीफ होती है कि ये भोले-भले आदिवासी है. आज़ादी के इतने सालों बाद भी हम निचले तबके तक मूलभूत सुविधाएं नहीं उपलब्ध करा पाए, ये शर्मनाक है.बहुत अच्छी खोजी रिपोर्ट के लिए बधाई. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 मुंबई और समूचे महाराष्ट्र को अपनी जागीर बांटने वाले सियासी शहंशाह बताएं कि उन्हें क्यों अपने राज्य की इस घोर कंगाली की खबर नहीं है. खासकर शिव सेना के लोग बताएं जो महाराष्ट्र की 'इज्ज़त पर आंच' आते ही दूसरों पर हमला बोल देते हैं. अगर उन्हें वास्तविकता का पता है तो भी वे अपराधी हैं, और अगर नहीं है तो भी.

महाराष्ट्र का ठाकरे परिवार देश के अन्य प्रदेशों के लोगों को हिकारत की नज़र से देखता है. मगर क्या वह अपने प्रदेश के उन लोगों के बच्चों से प्यार करता है जो घोर गरीबी, भूख और कुपोषण से मर रहे हैं? राष्ट्र में महाराष्ट्र ! वाह! महाराष्ट्र में राष्ट्र हो तो कोई बात बने !

अगर इसी तरह बच्चे लगातार मरेंगे तो लोग यह सोच कर नए बच्चे पैदा करते जायेंगे कि शायद कोई बच जाए. इस लानत पर महाराष्ट्र के सारे सियासी लोग तो जवाब दें ही, वे सारी संस्थाएं भी जवाब दें जो हर कहीं मुसीबत के मारे बच्चों की देख-रेख के दावे करती हैं.
 
   
 

shahroz (shahroz_wr@yahoo.com) delhi

 
 खेल को ही देश समझने वाले साथियो को ज़रा इन बच्चों की भी ख़बर होनी चाहिए.मुस्कान सिर्फ मुस्कान होती है और क्या इन मुस्कानों को हम बंधुआगिरी के सुपुर्द कर दें !!!!!! श्रीश बेहद इमानदारी के साथ अपने फ़र्ज़ को निभा रहे हैं.काश और साथियों को भी फ़िज़ूल की बहस में पड़ने की बजाय कुछ सार्थक करने की प्रेरणा इन से मिले !!सिर्फ चालीस लाख के गमले और चालीस लाख के गुब्बारे ख़रीदे जा रहे हैं.किसानों और दलितों का करोड़ों खेल में बहाया जा रहा है लेकिन हमारे साथी एक फ़िज़ूल की बहस को टूल दे कर अपनी क्रान्ति कर रहे हैं.!!!! 
   
 

Samwaad (razlko@yah00.c0m) Lucknow

 
 शर्मनाक है ये स्थितियां. 
   
 

Akhilesh (sahajexpress@gmail.com) Katni mp

 
 बड़ा ही मार्मिक और यथार्थ चित्रण किया है. वास्तव में भारत की हकीकत तो यही है. 
   
 

Makarand Barwani

 
 Very nice article.I hope it will shake the health of the government authorities and policy makers.Good job done Shirish. 
   
 

अविनाश वाचस्‍पति (avinashvachaspati@gmail.com) नई दिल्‍ली

 
 जानकारी तो आपने खरी दी है खरे जी। गरीब कोई भी हो परंतु नेताओं से अधिक गरीब कोई नहीं है इस धरती पर।  
   
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