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भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

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आत्महत्या की फसल

 
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विचारहीन प्राथमिकताओं से आजादी

मुद्दा

विचारहीन प्राथमिकताओं से आजादी

मेधा पाटकर

प्रश्न उठता है कि आजादी के 62 साल बाद देश की आम जनता स्वतंत्रता के प्रतीक तिरंगे को फहराने के प्रति क्या उतनी ही उत्साहित है जितनी 50 वर्ष पूर्व थी? स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों के अलावा क्या देश के मेहनतकश, ग्रामीण व बहुसंख्य समाज भी प्रभातफेरी निकालते हुए आजाद महसूस करते हुए स्वयं को राष्ट्र की संप्रभुता और प्रगति के लाभार्थी के रूप में देख रहे हैं? क्या हम राष्ट्र की राजनीतिक आजादी के माध्यम से भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक व प्राकृतिक धरोहरों को सहेज पाए हैं? हमारी मूल विशेषता ‘विविधता में एकता’ क्या हमारे राष्ट्र बने रहने में बुनियादी, बनावट का कार्य कर पा रही है?

red fort symbol of indian independence


नागरिकों के मन में चक्रव्यूह बनकर चुभ रहे इन सवालों का जवाब देने का वक्त आ चुका है. ये सवाल आज सिर्फ राष्ट्रीय पर्व पर ही हमारे दिमाग में नहीं कौंधते बल्कि हम दिन-रात इस सवालों से घिरे रहते हैं. इन्ही सवालों के जवाब आशा-निराशा के बीच देश में फैल रहे जनसंघर्ष भी खोज रहे हैं. आज आवाज केवल बड़े जनआंदोलनों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे समूहों से भी उठ रही है. इनमें व्याप्त आक्रोश को यदि हम नज़दीक से और गहराई से देखें तो पता चलता है कि लोग यह मान चुके हैं कि आजादी को लेकर हमारे सपने पूरे नहीं हुए हैं. देशभर में राजनीति के नाम पर बढ़ रही मनमानी, लूट, हिंसा और जनता के अधिकारों की अवमानना देश के वर्तमान नेतृत्व की विकृति को सामने ला रही है.

ब्रिटिशों से छुटकारा पाने की जरूरत तब भी थी और आज भी है. आज हमें ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो जन-जन की आंकाक्षा, विश्वास और जरूरतों का सम्मान कर सके. एक ऐसी व्यवस्था जो कि हमारे समाज, जीविकाओं, ताकतों और विविधताओं को न कुचले. हम एक ऐसी व्यवस्था चाहते है, जो हमें साथ लेकर हमारी ही शक्ति और एकता से एक ऐसी सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली विकसित करें, जो सिर्फ संविधान और कानून में ही नहीं बल्कि हमारे नीति-नियमों को छोटे-छोटे स्फूर्त, सहमति और सद्भावना से संचालित कर सके. इसी के अभाव के कारण हम आजादी का खोखलापन और अभाव महसूस कर रहे हैं.

इस देश की समृद्धि हमारी मनुष्य शक्ति के साथ ही साथ भरपूर प्राकृतिक संसाधनों में छिपी हुई है. जनसंख्या के प्रश्न को कम महत्व का न मानते हुए यदि इसका हम ठीक से उपयोग करें तो यह ऊर्जा भी एक पूंजी हो सकती है. लेकिन आज ‘श्रम की प्रतिष्ठा‘ अपना स्थान खोती जा रही है. पश्चिमी सत्ता को हटा देने के बाद भी आज हम पश्चिमी विचारधारा और जीवन प्रणाली के बंधक बने हुए हैं. हमें ध्यान में रखना होगा कि स्वावलंबन के बिना वायत्ता नहीं मिल पाती है और स्वावलंबन के लिए जरुरी है हमारे हाथों में व हमारे पैरों तले उपलब्ध संसाधनों का आधार.

साधनों के अंधाधुंध उपयोग लिए दूसरों का शोषण और गैरबराबरी की बुनियाद के अलावा किसी की कब्र पर महल बनाने की ख्वाहिश न तो हमें संतोष देगी और नहीं सार्वभौमिकता. इतना ही नहीं पड़ौसी राष्ट्रों से एवं वैश्विक स्तर पर भी इसी बुनियादी सिद्धान्त के आधार पर रिश्ते बनाने होंगे. देश के भीतर भी विविध तबकों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए हमें हमारी विकास योजनाओं में साधनों के विकेंद्रित उपयोग व निवेश को अपनाना होगा.

परंतु हम तो विरोधी दिशा में चल कर कगार पहुंच चुके हैं. देश के संसाधनों व ताकत को धिक्कारते हुए हमारे राजनेता, अर्थशास्त्री व नियोजनकर्ता यहां प्रकृति और मेहनत से बनी सांस्कृतिक परम्परा को तहस नहस करने को ही विकास मान रहे हैं. विदेशीकरण और भूमंडलीकरण का भी तो यही आधार है. हमें अपने संसाधनों के विनाश और विस्थापन की कोई परवाह नहीं है. भूखे पेट और प्यासे कंठ लेकर भी हम कंपनियों के नए-नए उपयोग की अपनाने की सोचते रहे. नेतृत्व के स्तर पर भी हमें अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की हिचकिचाहट नहीं दिखाई देती. दिखावटी चर्चाओं के पार आम आदमी न केवल जलवायु परिवर्तन पर बल्कि अपने संसाधनों के भविष्य पर गंभीरता से विचार कर रहा है.

आदिवासी क्षेत्रों एवं किसानी क्षेत्रों की स्थिति से साफ जाहिर है कि लोग जंगल, नदियों, पहाड़, खेती-जमीन और जीविका के साथ-साथ इस अस्मिता भरे समाज को बचाने के लिए संघर्षरत हैं. वे शांति और इज्जत की जिंदगी चाहते हैं. हिंसा फैलने की शुरुआत तो प्रकृति व संस्कृति पर हो रहे विकास के हमले से ही हो रही है. इन आक्रमणों का डटकर सामना भी अधिकांश स्थानों पर अहिंसा से ही हो रहा है. इस दौरान विकास की अवधारणा और मार्ग, नियोजन प्रणाली और औचित्य पर बहस उठी है. संघर्षरत साथियों के अलावा निर्माण हेतु सही तकनीक, लोकतांत्रिक प्रणाली और समता, न्याय व निरंतरता की आधारभूत चौखट इसमें योगदान दे रही है.

सर्वप्रथम गांव स्तर पर विकास योजना तय करने जैसी छोटी सी बात आज बहुत बड़ी और बुनियादी बात सिद्ध हो रही है. इसे कुचलने का विरोध कई जगह सशस्त्र संघर्ष का रूप ले लेता है. यह एक दुर्देव अवश्य है परंतु यह निश्चित तौर पर मात्र कानून व व्यवस्था का मुद्दा नहीं है. यह मुद्दा है आज भी बुरी तरह से हावी ब्रिटिशों की मानसिक गुलामी का. यह मुद्दा है हमारे संविधान में ही अंतर्निहित मार्गदर्शक सिद्धांतों से प्रेरणा और दिशा लेकर मात्र पंचायती राज ही नहीं बल्कि जनवादी तंत्र और ताकत को उभारने का. हमें गैर बराबरी समाप्त करने के लिए सादगी को अपनाना होगा और अपने ही उपलब्ध संसाधनों से न्यूनतम जरूरतें पूरी करनी होगी. इन सभी को यदि हम प्रगतिशीलता का प्रतीक माने तो ही हम सही अर्थों में आजादी पाएंगे. संविधान की धारा 243 या विभाग 9 के अलावा भी हमें जटिलता को समझते हुए संवेदना के साथ नए नियमों को गढ़ने की चुनौती स्वीकारनी होगी.

हमारा ध्यान देश को महाशक्ति बनाने या सकल वृद्धि दर के उच्चांक की ओर देखने की बजाए सुदृढ़ व सुनियोजित होने के बावजूद एक पारदर्शी समाज बनाने और उसकी व्यवस्था खड़ी करने पर होना चाहिए. हम हमारे गांवों का कत्ल और सन् 2050 तक शहरी भारत वाली मानसिक विकृति को दूर कर पाएंगे की नहीं? आवश्यकता इस बात की है कि हम स्थानीय जल, जंगल का नियोजन और खेती के प्राकृतिक विकास को अहम मुद्दा बनाएं. हमें निर्माण हेतु सिर्फ ईमानदारी और संवाद वाला पथ ही मंजूर होगा. अंबानी और कंपनियों की दादागिरी को हर स्तर पर नकारते हुए हमें कहना होगा कि हम आजाद हैं तथा हमें चाहिए भूख, लाचारी और विचारहीन प्राथमिकताओं से आजादी.

13.08.2010, 16.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 धुमिल के शब्दों में- सुनसान गलियों से चोरों की तरह गुजरते हुए/ अपने आप से सवाल करता हूँ-/क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/ या इसका कोई खास मतलब होता है?/ और बिना किसी उत्तर के आगे बढ जाता हूँ/ चुपचाप।

एक और पंक्ति है-वह कौन-सा प्रजातांत्रिक नुस्खा है/ कि जिस उम्र में/ मेरी मां का चेहरा/ झुर्रियों की झोली बन गया है/ उसी उम्र की मेरी पड़ोस की महिला/ के चेहरे पर/ मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा/ लोच है।
 
   
 

bhagat singh raipur c.g.

 
 देश के ज्यादातर लोगो को तो सपना देखने का ही मौका नहीं मिला,वे तो अपने जीने लायक जगह बनाने में ही ख़तम हो गए.मेघा जी ने 25 साल से नर्मदा का आन्दोलन गाँधीवादी तरीके से चलाया, भले ही वो पूरे देश के लिए प्रेरणादायक हो लेकिन बांध को रोक नहीं सका.लेकिन जहां चरम वामपंथी ताकते हैं, वहां बड़े बांध हों या बड़े उद्योग, अभी तक अपना कम शुरु नहीं कर पाए हैं. भले ही उन्हें बहुत बहुत नुकसान उठाना पड़ा हैं. क्या यह तरीका भी लोगों के कल्याण का अनुमोदन नहीं करता.और आप का इन ताकतों के साथ खड़े होना क्या गाँधीवादी तरीको की असफलता नहीं दिखता.पता नहीं इसे आप क्या कहेंगी,मुझे तो ऐसा ही लगता हैं. 
   
 

Sainny Ashesh (sainny.ashesh@gmail.com) Western Himalayas

 
 जब तक एक व्यक्ति यह नहीं जानता की किसी भी क्षण की आज़ादी का क्या अर्थ है, तब तक राजनीतिक रूप से मिलने वाली आज़ादी एक धोखा है. दुनिया के अधिकाँश लोग तो यह भी नहीं जानते की भीतर से मनुष्य होने की आज़ादी क्यों चाहिए? उन्हें तो बरगलाने वाले राजनेता और धर्मनेता चाहिए जिनके सामने ये गिड़गिड़ा सकें या जिनकी मर्ज़ी पर खुद को छोड़ सकें.

मेधा जी, आप इस सच्चाई को जानती हैं. आप जिन लोगों के लिए अक्सर अपनी जान की भी परवाह नहीं करती, आपने अक्सर उन्हें भी वह सब करते देखा है, जो हर किस्म की आज़ादी के खिलाफ जाता है. बहुत थोड़े से लोग हैं, जो आंतरिक रूप में और उस ज़रिये बाहरी रूप में भी आज़ादी चाहते हैं और उसके लिए किसी ख़ास दिन का इंतज़ार नहीं करते. जहां तक हो सके ऐसे ही स्वाधीन लोगों को अपने साथ हमें जोड़ना होगा. उसके बाद जो होगा वह स्वीकार. इस देश के लोग घुटनो के बल चलना और ज़रा ज़रा सी बात पर घुटने टेक देने को ही नेक काम समझते आये है.

मनुष्य एक सफ़र में है, जिसमे किसी को सिर्फ दो वक्त की रोटी चाहिए और किसी को सत्ता. यहाँ अमिताभ बच्चन जैसों को नायक माना जाता है जो दौलत और शोहरत से कभी तृप्त नहीं होते और लोगों को करोडपति होने के मूढ़ मंत्र देते हैं. ऐसी दुनिया में अंतत: हम सिर्फ गिने-चुनो को ही आज़ादी का अर्थ और मर्म समझा या बता सकते हैं. आज़ादी में होना हर किसी के बूते की बात नहीं है. शराफत से जीने की आज़ादी को तो यहाँ कोई पूछता ही नहीं. नरभक्षी नेता यहाँ बहुत ज्यादा वोटों से जीत जाते हैं. मजबूरी में या बहुत तंग आकर यहाँ किसी ईमानदार नेता की तरफ ध्यान दिया जाता है.

यह कोई निराशा या हताशा नहीं, मनुष्य के अब तक के कामचलाऊ भीतरी विकास का सच है. अधिकांश लोग तो यही चाहते हैं की उनके लिए फांसी पर चढ़ने वाले अगर बार-बार न आ सकें तो किसी और भगत सिंह पर कोई और फिल्म बने और उनका मनोरंजन हो. आप जिनके लिए लड़ रही हैं, उनमे अधिकाँश आज़ादी नहीं चाहते, लेकिन दूर बैठे कई इक्का-दुक्का लोग कई जगह ज़रूर आपसे प्रेरणा प् जाते हैं. यही वास्तविक काम है. आप अद्भूत और साहसी हैं इसलिए आपके निकट खुद को पाने वाले लोग निश्चय ही कुछ और खिल जाएंगे. मगर जो आज़ादी का मतलब ही नहीं समझते, उन्हें लगातार नए से नए धोखे का शिकार होना ही है.

गुलाम रहने की अटूट आज़ादी मांगते हैं अधिकतर लोग ! उनकी समझ में नहीं आता की क्यों कुछ लोग लाल किले पर हर साल याद कराई जाने वाली आज़ादी को आज़ादी मान कर किसी और ही आज़ादी के लिए चिल्लाते रहते हैं?
 
   
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