सामुदायिक समीकरण बनाम विकासीय समीकरण
बिहार चुनाव
सामुदायिक समीकरण बनाम विकासीय समीकरण
जुगनू शारदेय
पटना से
15 वीं बिहार विधान सभा का चुनाव 2010 में दशहरा के बाद होने वाला है. 2005 के चार
चरणों में पहला चरण का पहला मतदान 18 अक्टूबर को हुआ था और आखिरी चौथे चरण का चुनाव
19 नवंबर को हुआ था. इस बार भी कुछ कुछ ऐसा ही होने वाला है. इस पर फर्क पड़ सकता है
कि चुनाव कितने चरणों में होता है. मतदान की तारीखों में एक दो दिन का आगे पीछे हो
सकता है. इस चुनाव में परिसीमन के कारण कुछ चुनाव क्षेत्रों का इतिहास – भूगोल और
आर्थिकता के साथ चुनाव क्षेत्रों का नंबर भी बदला है. लेकिन राजनीति पर बहुत बड़ा
असर नहीं पड़ा है. 2007 से ही राजनीति के खिलाड़ियों को इसका पता था. बिहार लोकसभा
2009 का चुनाव इसी परिसीमन के आधार पर लड़ चुका है.
243 चुनाव क्षेत्रों में नंबर के हिसाब से आखिरी नंबर 243 जमुई जिला के चकाई विधान
सभा क्षेत्र का है. यह एक अदभुत चुनाव क्षेत्र है. हम चकाई के बहाने सामुदायिक
समीकरण वोट पर क्या असर पड़ता है , इसको समझने की कोशिश करते हैं. 1951 और 1957 में
यह चुनाव क्षेत्र नहीं था. 1962 में जब बना तो आदिवासी समुदाय के लिए सुरक्षित
क्षेत्र था. 1967 से यह सामान्य चुनाव क्षेत्र हो गया. यह दो दबंग समुदायों -
राजपूत और यादव का भी चुनाव क्षेत्र है. इस मान्यता का आधार इतना है कि 1962 से
2005 तक जीतने वाले की जाति राजपूत या यादव रही है. सैद्धांतिक खुजली को खुजलाना
चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि यह तथाकथित सांप्रदायिकता और गैर सांप्रदायिकता का
प्रतिनिधित्व का भी क्षेत्र है. विजेता राजपूत उन पार्टियों का प्रतिनिधित्व करता
रहा है जो तथाकथित सेक्यूलर माने जाते हैं जबकि यादव ने उस पार्टी का सहारा लिया जो
सांप्रदायिक मानी जाती है.
यह दादा से पोता का भी क्षेत्र है. दादा श्रीकृष्ण सिंह 1967 में यहां से संयुक्त
सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जीते. 1967 की संविद (संयुक्त विधायक दल ) में मंत्री
भी थे. कहना चाहे तो यह भी कह सकते हैं कि संसोपा में वह राजपूत समुदाय के
प्रतिनिधि थे. 1969 में भी वही जीते लेकिन 1972 में कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह से
हार गए. बाद में चंद्रशेखर सिंह बिहार 1983 के मध्य से 1985 के आरंभ तक मुख्य
मंत्री. 1977 में लोकसभा के विजेता श्रीकृष्ण सिंह के पुत्र और बिहार आंदोलन के एक
नेता नरेंद्र सिंह चकाई से विधान सभा का चुनाव हार गए. बाहर के लोगों के लिए वह एक
अनाम निर्दल उम्मीदवार फाल्गुनी प्रसाद यादव से हार गए. स्थानीय लोगों के लिए
फाल्गुनी प्रसाद यादव अनाम नाम नहीं था. यह 1969 और 1972 में जनसंघ के टिकट पर
चुनाव लड़ चुके थे.
1980 में भी फाल्गुनी प्रसाद यादव ही जीते लेकिन 1985 में कांग्रेसी उम्मीदवार
नरेंद्र सिंह से हार गए. बाद में फाल्गुनी प्रसाद यादव 1995, और अक्तूबर 2005 में
भी जीते जबकि मार्च 2005 के चुनाव में वह नरेंद्र सिंह के पुत्र अभय सिंह से चुनाव
हार गए. 2000 में नरेंद्र सिंह जमुई और चकाई दोनों से लड़े और दोनों जीते.जमुई से
उन्होने इस्तीफा दे दिया और चकाई अपने पास रख ली. अक्तूबर 2005 में चकाई के बजाय
अभय सिंह को जमुई से चुनाव लड़ना पड़ा. भाजपा ने चकाई सीट जदयू से ले ली. इसके पीछे
का ठोस कारण फाल्गुनी प्रसाद यादव का इस चुनाव क्षेत्र से बार बार जीतना था. वास्तव
में यहां जीत हार यादव या राजपूत की होती है. फाल्गुनी प्रसाद यादव की बार बार जीत
ने यह साबित भी किया कि राजपूत की तुलना में यहां यादव का सामुदायिक समीकरण बेहतर
है. दुर्भाग्यवश अभय सिंह की मृत्यु 2009 में हो चुकी है.
संसदीय लोकतंत्र की चाहे जितनी भी खामियां हों पर चुनाव में एक खूबी है कि जीतने के
लिए पांच समुदायों का मिलन जरूरी होता है. फाल्गुनी प्रसाद यादव ने यह साबित किया
कि वह पांच समुदायों के मिलन के मामले में राजपूत समुदाय से ज्यादा तेज हैं.
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यह भी एक अजीब संयोग
है कि समाजवादी पार्टियों के अधिकांश नेताओं की उनके विधान सभा क्षेत्र
में सवर्ण समुदाय– खास कर राजपूत समुदाय का समर्थन मिलता था. |
चकाई का विश्लेषण यह भी बयां करता है कि विजेता हमेशा किसी न किसी लहर के बल पर
जीता है. सिर्फ 1977 में जनता पार्टी की लहर के बावजूद नरेंद्र सिंह की हार हुई. तब
फाल्गुनी प्रसाद यादव बहैसियत निर्दल जीते. चकाई के अलावा भी कुछ और चुनाव क्षेत्र
थे , जैसे औरंगाबाद जहां से विधान सभा से इस्तीफा देने वाले विधायक की हार हुई थी.
1972 में चंद्रशेखर सिंह की जीत के पीछे कांग्रेस की लहर थी तो 1985 और 1990 में
नरेंद्र सिंह के जीत के साथ कांग्रेस और जनता दल की लहर जुड़ी हुई थी. 2005 में भी
अभय़ सिंह रामबिलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार थे. उनके समर्थन में
यादव और लालू प्रसाद विरोधी लहर थी. 2005 के फरवरी और अक्टूबर के चुनाव में
रामबिलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और लालू प्रसाद का राष्ट्रीय जनता दल अलग
अलग लड़े थे.
लेकिन नवंबर 2005 में नीतीश कुमार की लहर के सामने उनके विरोधी कुछ न कर सके. फिर
परंपरागत विरोधी का नरेंद्र सिंह का परिवार भी चुनाव नहीं लड़ रहा था.यह भी मजे की
बात है कि एक ही समूह राजग में रहने के बावजूद कभी भी दोनों में नहीं पटी.इसलिए
जिनको सांप्रदायिकता की खुजली मिटानी हो मिटा लें. झगड़ा सिर्फ यादव बनाम राजपूत है.
नरेंद्र सिंह को राजपूत प्रतिनिधि के तौर पर नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिमंडल में
शामिल भी किया.
1967 के बाद से बिहार में एक विचित्र स्थिति बनी है. एक मायने में यह भी कहा जा
सकता है कि यह 1967 के पहले से था. यह भी एक अजीब संयोग है कि समाजवादी पार्टियों
के अधिकांश नेताओं की उनके विधान सभा क्षेत्र में सवर्ण समुदाय – खास कर राजपूत
समुदाय का समर्थन मिलता था. यह भी एक अजीब संयोग है कि लोक सभा में लालू प्रसाद के
चार सदस्यों में से तीन राजपूत हैं. दिवंगत दिग्विजय सिंह भी राजपूत थे. जमुई के
पड़ोसी जिला बांका से लोकसभा 2009 का चुनाव नीतीश कुमार का विरोध कर जीते थे.
दिग्विजय सिंह का अपना घर गिद्धौर भी इस जमुई जिला के झाझा चुनाव क्षेत्र में शामिल
है.
बिहार के राजपूत समुदाय की वोटवादी मानसिकता यह है कि पहले वह राजपूत समुदाय के
उम्मीदवार को ही वोट देना पसंद करते हैं. संयोग से अब कोई ऐसा राजपूत नेता नहीं रहा
जो इस समुदाय का वोट किसी अन्य समुदाय को दिला सके. अभी तक इस समुदाय की जैसी
मानसिकता समझ में आ रही है , उससे लगता है कि वह जदयू के गैर राजपूत समुदाय को वोट
नहीं देगा. अन्य पिछड़े समुदाय आम तौर पर इस समुदाय को तभी वोट देते हैं जब
उम्मीदवार उस नेता के साथ हो जिसके पक्ष में हवा बह रही हो. आम तौर पर इसका वोटर
भाजपा का भी वोटर है. ऐसी हालत में जब तक सभी पक्षों के उम्मीदवार सामने नहीं आते
तब तक आसानी से कहा जा सकता है कि इस समुदाय का वोट जनता दल यू को नहीं मिलने वाला
है. यह आसान बयां भी बहुत सारे पेंचों से भरा पड़ा है.
लेकिन क्या बिहार में आने वाले चुनाव में यादव और राजपूत मतदाता , और भूमिहार
मतदाता के विरोध बाद भी नीतीश कुमार जीतने वाले हैं. यहां आंकड़ों से यह भी साबित
होता है कि राजपूत – भूमिहार समुदाय अपनी ताकत पर सिर्फ 40 चुनाव क्षेत्रों में हार
जीत को प्रभावित करते हैं.
2005 में नीतीश कुमार को राजपूत – भूमिहार समुदाय का समर्थन मिला था. अब क्या नीतीश
कुमार के पक्ष में कोई हवा है. अनेक लोगों का मानना है कि इस चुनाव का नारा है
नीतीश कुमार हमारा है. सच तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे.
16.08.2010,
04.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित