ब्रिटिश कंपनी से लड़ाई अभी जारी है
मुद्दा
ब्रिटिश कंपनी से लड़ाई अभी जारी है
वासुदेव महापात्रा
भुवनेश्वर से
ओडीशा के नियामगिरि पर्वत श्रृंखला और उसके आसपास रहने वाले अदिवासी समुदाय के जीवन और ब्रिटिश कंपनी वेदांता के लोभ पर टिके हितों के बीच का टकराव बढ़ता जा रहा है. आदिवासी नाराज हैं और चुप हैं. हालांकि
पर्यावरण मंत्रालय के आदेश पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य एन सी सक्सेना की
अगुवाई में गठित चार सदस्यीय समिति ने साफ तौर पर कहा है कि नियामगिरी में खनन का
फैसला उचित नहीं है. लेकिन आदिवासियों ने पिछले सात सालों में जो कुछ देखा-भुगता
है, उससे उन्हें उम्मीद नहीं है कि ऐसी रिपोर्टों का कोई खास मतलब होगा.
आदिवासी समुदाय, ब्रिटिश कंपनी वेदांता रिसोर्सेज़ प्राईवेट लिमिटेड के नियामगिरि
की चोटियों पर बॉक्साइट उत्खनन की योजना का अंत तक विरोध करने और अपने जीवनयापन के
लिए सब सुविधाएं प्रदान करने वाली पहाड़ी और उसकी चोटियों को बचाने के अपने प्रण पर
कायम है. आखिर ये पहाड़ महज बाक्साइट का पहाड़ भर नहीं है. ये पहाड़ डोंगरिया कोंध
आदिवासी समुदाय का राजा भी है-नियमराजा. नियम बनाने वाले इस राजा की आदिवासी पूजा
करते हैं.
नियामगिरि की चोटियों पर फैले हुए घने जंगल अपने पेड़ों, वनोपज और विविध जनजीवों के
कारण अनूठे हैं. लेकिन सरकार में बैठे कुछ लोगों और लंदन स्थित ब्रिटिश कंपनी
वेदांता के लिए इस भूमि पर फैले हुए वनोपज और वन्य जीवों का कोई खास महत्व नहीं है.
महत्व है तो उन बॉक्साइट के भंडारों का जो इस भूमि के गर्भ में समाए हैं.
यह ब्रिटिश कंपनी और कारपोरेट घरानों की नाक की बाल, ओडीशा सरकार, के लिए इन
चोटियों में मौजूद बॉक्साइट भंडार इतने ललचाने वाले हैं कि वे इस अद्भुत हरियाली को
नष्ट कर वहां और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले हज़ारों आदिवासी परिवारों को
विस्थापित करने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाएंगे. इस उत्खनन प्रोजेक्ट का विरोध करने
वाले आदिवासियों के प्रति पुलिस और स्थानीय प्रशासन का रवैया दमनात्मक है. वेदांता
का विरोध करने वालों पर झूठा आरोप लगा कर उनके साथ मारपीट करने, धमकाने औऱ जेल
भेजने का एक अंतहीन सिलसिला जारी है.
हाल ही में वेदांता के खिलाफ लड़ने वाले एक दलित नेता की हत्या हो गई, लेकिन पुलिस
द्वारा इस मामले में कोई भी जांच या गिरफ्तारी नहीं हुई . कुछ समय पहले ही 16 लोगों
को झूठे आरोपों में बिना किसी जुर्म के जेलों में बंद कर दिया गया. छह महीने पहले
पांच दलित औरतों को वेदांता के खिलाफ आंदोलन करने की वजह से जेल में डाल दिया गया
था.
नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल मूवमेंट के संयोजक प्रफुल्ल समांतारा के अनुसार, “इस आंदोलन
को दबाने और आदिवासियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए, राज्य पुलिस बड़ी
चालाकी और धूर्तता के साथ नियामगिरि बचाओ आंदोलन को सशस्त्र माओवादी आंदोलन के साथ
जोड़ने की कोशिश कर रही है.”
हाल ही में, 9 अगस्त को वेदांता विरोधी आंदोलन के नेताओं, डोंगरियाकोंध आदिवासी,
लाडो सिकाका और साना सिकाका का पुलिस द्वारा अपहरण कर लिया गया. हालांकि जब दुनिया
भर से राज्य सरकार पर दबाव पड़ा तो 12 अगस्त को उन्हें पुलिस ने अपने चंगुल से
मुक्त किया. इस अपहरण को राज्य पुलिस द्वारा योजनाबद्ध तरीके से क्रियान्वित किया
गया था और पुलिस के सशस्त्र जवान सादी वर्दी में आये थे.
दोनों आदिवासी नेता अपने समुदाय के साथियों के साथ नियामगिरि के आदिवासियों के
अधिकार और वन से संबंधित एक कार्यशाला में भाग लेने के लिये दिल्ली जा रहे थे. यह
आयोजन रिसर्च फाउंडेशन फॉर साइंस टेक्नालॉजी एंड इकोलॉजी और सेव नियामगिरि मूवमेंट
द्वारा दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में किया गया था. इस आयोजन में कुछ दूसरे
डोंगरिया कोंध समुदाय के प्रतिनिधि भी भाग लेने वाले थे. लेकिन उनकी कार की चाबियां
और फोन अपहरणकर्ताओं के कब्जे में थीं, ऐसी हालत में उन्हें मजबूरन अपने साथियों को
पूरा मामला बताने के लिये लौटना पड़ा.
नियामगिरि बचाओ आंदोलन में सक्रिय रहे एनएपीएम के संयोजक प्रफ्फुल समांतरा कहते
हैं- " डोंगरिया आदिवासी नेताओं को पुलिस ने बंदूक की नोंक पर दिनदहाड़े उठाया,
उन्हें मारा-पीटा और प्रताड़ित किया गया. उन्हें इस बात की चेतावनी दी गई कि वे
आंदोलन से दूर रहें. लेकिन लाडो सिकाका जैसे नेताओं ने साफ शब्दों में पुलिस को जता
दिया कि वे नियामगिरि के आंदोलन से मुंह नहीं मोड़ सकते, भले ही इसके लिये उन्हें
कोई भी नुकसान उठाना पड़े."
वे कहते हैं- "यह सब कर के अगर वेदांता नियामगिरि पहाड़ियों पर खनन की सोच रहा है
तो उसे अपनी सोच बदलने की जरुरत है. उनके इस तरह के हर दमनकारी कदम ने हमारे हौसले
और आंदोलन को और मजबूती दी है."
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आदिवासियों ने कसम खाई है कि नियामगिरि, उनके भगवान, उनकी आत्मा का त्याग किसी भी
कीमत पर, किसी के भी सामने नहीं करेंगे. वे नियामगिरि को इसलिये पूजते हैं क्योंकि
यह पुरखों के जमाने से उनके लिये जीवन स्रोत है. इसलिये ये आदिवासी हर उस सत्ता को
खारिज करते हैं, जो उनके ईश्वर को किसी बाहरी व्यक्ति या कंपनी को सौंपना चाहता है.
नियामगिरि सुरक्षा कमेटी के अध्यक्ष कुमटी मांझी जोर देकर कहते हैं- "कोई भी सरकार
किसी बाहरी को यह नहीं दे सकती. यह हमारी संपत्ति है, आदिवासियों की संपत्ति ! कोई
भी इसे किसी बाहरी को हस्तांतरित नहीं कर सकता."
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नियामगिरि को
बचाने का आंदोलन अपनी ताकत जुटा रहा है. आदिवासियों ने बजाप्ता एक
समारोह में यह शपथ ली है कि वे नियामगिरि को बचाने के लिये आखिरी दम तक
लड़ेंगे. |
असल में नियामगिरि उनके लिये जीवन और जीविका का एक ऐसा आधार है, जिसे वे किसी भी
कीमत पर खोना नहीं चाहते. भले इसके लिये हथियार ही क्यों न उठाना पड़े. वे अपने
आराध्य नियमराजा को बचाने के लिये कुछ भी कर सकते हैं.
"अगर वेदांता नियामगिरि को लेने के लिये आता है तो हम उन्हें टुकड़ों में काट
देंगे. टुकड़ों में इस तरह..." अपने कंधे पर रखी कुल्हाड़ी की ओर इशारा करते हुये
डोंगरिया साना मांझी गुस्से से भर जाते हैं. भावुकता में भरे साना कहते हैं कि
नियामगिरि पर कब्जे के लिये किसी भी सुरक्षा बल के खिलाफ हम अपने शस्त्र उठाने में
नहीं हिचकेंगे.
कुमटी मांझी भी अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये तैयार हैं. कुमटी कहते हैं-
"अगर हम नियामगिरि के साथ जी सकते हैं और नाच सकते हैं तो हम उसके लिये मर भी सकते
हैं. हमने नियामगिरि को बचाने के लिये 20 हजार जीवन बलिदान करने की कसम खाई है."
नियामगिरि को बचाने वाले आंदोलनों में सक्रिय गांधी मरदान सुरक्षा आंदोलन के नेता
प्रदीप पुरोहित समझाने वाले अंदाज में कहते हैं- " नियामगिरि की पहाड़ी श्रृंखला और
आसपास के इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को इसी पहाड़ से सबकुछ मिलता है. वे इस
पर्वत श्रृंखला पर अनाज उपजाते हैं और सब्जियां भी. बहते झरनों से पानी और घने
जंगलों से साफ हवा. यह उनके जीवन में उत्सव का एकमात्र कारण है. यही कारण है कि वे
किसी भी कीमत पर इसे छोड़ने के लिये तैयार नहीं हैं."
प्रदीप को विश्वास है कि वेदांता के ही एक उपक्रम बालको से उनके संगठन और
आदिवासियों ने लड़ाई लड़ते हुये गांधी मरदान को बचा लिया था, नियामगिरि की लड़ाई भी
वे जीत लेंगे.
नियामगिरि को बचाने का आंदोलन अपनी ताकत जुटा रहा है. आदिवासियों ने बजाप्ता एक
समारोह में यह शपथ ली है कि वे नियामगिरि को बचाने के लिये आखिरी दम तक लड़ेंगे.
ब्रिटिश कंपनी वेदांता के खिलाफ कई संगठनों ने मोर्चा खोल रखा है. सरकार की कई
कमेटियां मामले की जांच कर रही हैं लेकिन वेदांता के दबाव और प्रलोभन की राजनीति को
जानने वाले सरकारी रिपोर्टों से कोई बहुत खुश नहीं हैं.
ज्ञात रहे कि पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के आदेश पर की गई जांच रिपोर्ट के अनुसार
भी वेदांता के खदान के आने से लगभग सत्तर लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद
हो जाएंगे और डोंगरिया कोंध जनजाति का अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाएगा. कमेटी ने अपनी
रिपोर्ट में साफ कहा है कि किसी निजी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए प्रस्तावित खनन
स्थल पर दो आदिम जनजाति समूहों-कुटिया और डोंगरिया कोंध- के अधिकारों को छीन कर
प्रस्तावित इलाके में खनन की अनुमति देने से जनजातियों का कानून से भरोसा टूट
जाएगा.
इस बदनाम ब्रिटिश कंपनी वेदांता को लेकर कमेटी ने राय दी है कि चूंकि वेदांता ने
बार-बार कानून का उल्लंघन किया है, लिहाजा इसे प्रस्तावित खनन इलाके में जनजातियों
के अधिकारों की कीमत पर खनन की फिर अनुमति देने से देश की सुरक्षा और बेहतरी के लिए
गंभीर खतरा पैदा हो सकता है.
एनएपीएम के प्रफ्फुल समांतरा कहते हैं- " पिछले सात सालों से वेदांता के खिलाफ
आंदोलन चल रहा है. लोगों ने अब तक वेदांता को खनन नहीं करने दिया है. उच्चतम
न्यायालय की सेंट्रल इंपावर कमेटी ने साफ तौर पर नियामगिरी में खनन प्रतिबंधित करने
की अनुशंसा की थी. लेकिन इस अनुशंसा को ताक पर रख कर रिफ़ाइनरी बनाने का काम शुरु
कर दिया गया."
आदिवासियों का धैर्य टूट रहा है. जाहिर है, आक्रोशित जनसैलाब कोई सकारात्मक संकेत
नहीं दे रहे हैं. सरकार ने अगर समय रहते आदिवासियों के हित में कोई कदम नहीं उठाया
तो नियामगिरि को धधकने से रोक पाना मुश्किल होगा.
17.08.2010,
17.35 (GMT+05:30) पर प्रकाशित