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पीपली लाइव का सीधा प्रसारण

बात पते की

पीपली लाइव का सीधा प्रसारण

रामकुमार तिवारी

इधर कुछ महीनों से मीडिया में पीपली लाईव ने अपनी ऐसी धमक बनाई है कि देश का एक बड़ा वर्ग इस फ़िल्म पर न्यौछावर हुआ जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे इस फिल्म की स्तुति में यह कह रहे हैं कि " किसी भी नेता के भाषण या हमारे महाविद्यालयों के शोध पत्र से ज्यादा सारगर्भित और महत्वपूर्ण है यह फिल्म. इसके लिए अनुषा रिजवी को डॉक्टरेट की उपाधि दी जानी चाहिये."

peepli-live


‘पीपली लाइव’ पर जय प्रकाश चौकसे की यह टिप्पणी चौकस लगी कि इसमें किसी नेता के भाषण से ज्यादा सार है. बस ! इससे ज्यादा नहीं.

देखते-देखते यह कैसा दौर आ गया कि एक सनसनी का तुमार कुछ इस तरह ताना जा सकता है कि वह महानता की जगह घेर ले और समाज बौरा जाये. लगभग दो लाख किसानों की आत्महत्याओं को इस तरह तयशुदा मजाक बना दिया जाये कि वे सोच-समझकर परिवार, समाज में लंबे समय तक बातचीत करके बेहद व्यवसायिक रूप से मुआवजा के लिए ही की गई है. जीवन का कैसा अवमूल्यन है और मृत्यु का कैसा अपमान. आत्महत्या की त्रासदी को एक आर्थिक विकल्प के रूप में किस तरह घटा दिया गया है.

फिल्म निर्माण रचनात्मक अवदान है न कि एक सनसनी मात्र कि देखो! हमने किस तरह मीडिया, व्यवस्था और राजनीति को उघाड़ दिया है. बस हो गया हमारे कर्तव्य का निर्वहन. क्या एक कला माध्यम को देय सिर्फ इतना ही हो सकता है ?

हम आमिर खान या आमिर खान जैसे फिल्मकारों से ईरान के महान फिल्मकार अब्बास कियारोस्तामी की तरह किसी ऐसी फिल्म की उम्मीद नहीं कर सकते जो अपने मुल्क और उसकी जनता से बेपनाह मुहब्बत करते हुए एक-एक शॉट्स और एक-एक फिल्म इस तरह रचता हो, जिसमें उनके देश ईरान और उनके जन-जन की आत्मा का सौंदर्य अपनी मानवीय गरिमा के साथ प्रकट होते हैं. कुछ यूं कि दूर देशों के दर्शक भी उनके देश ईरान और उसकी जनता से प्रेम करने लगते हैं और उनके अंदर भी ईरान को देखने और उसकी जनता से मिलने की इच्छा जन्म लेने लगती है.

इस समय ईरान के हालात बेहद खराब है. राजनीति के हुक्मरानों ने अब्बास कियारोस्तामी साहब को उन्हीं के घर में नजरबंद कर दिया है. उन पर फिल्म न बनाने की पाबंदी भी लगा दी गई है. अमरीका सहित पूरे दुनिया के दरवाजे उनके लिए खुले हैं, फिर भी अब्बास साहब अपना घर और मुल्क छोड़कर नहीं जाना चाहते. क्या करें ? उन्हें नींद अपने मुल्क और अपने घर में ही आती है. अपने देश और अपनी जनता से ऐसी मुहब्बत का जज्बा ही ऐसी रचनात्मकता को जन्म दे सकता है.....खैर छोडिये. फिलहाल तो हम अपने ही देश की फिल्मों और फिल्म निर्माताओं की बात करें.

किसानों की पृष्ठभूमि पर बनी महबूब खान की फिल्म ‘मदर इंडिया’ को तो कम से कम हमारी दृष्टि चेतना का हिस्सा होना ही चाहिये. बैंक ऋण की जगह पुरातन महाजनी पंजे में फंसे किसान परिवार की गाथा का कैसा फिल्मांकन था ? ‘‘पीपली लाइव’’ के नत्था की परिस्थिति मदर इंडिया की अबला नारी से ज्यादा बद्दतर तो नहीं थी. लेकिन उसमें जीवन कैसे संभव हुआ, हर सर्वहारा को थामता हुआ हिम्मत देता हुआ. वह फिल्म के माध्यम से हमारा जागरण काल था. जिजीविषा, संघर्ष, आम गौरव की फिल्मी गाथा ने किस तरह मूल्यों का सृजन किया था. इतनी फिल्मी लंबी यात्रा के बाद उसी परिस्थिति पर बनी फिल्म ‘‘पीपली लाइव’’ का ट्रीटमेंट हमें सोचने पर विवश करता है. हम कब कहां से कहां आ गये और ऊपर से सफलता, महानता का इतना शोर ?

'पीपली लाइव' में न तो आत्यहत्या के मनोविज्ञान की समझ है और न ही समाज के बहुआयामों की.


कला में सिर्फ भौडा कटु यथार्थ ही सब कुछ नहीं होता, रचना अपने होने में जो अतिरिक्त, जो नहीं है, उसे सृजित करती है, जोड़ती, अलगाती है. तभी तो वह रचना है, कला है, फिल्म है.

आइडिया में कभी संवेदना नहीं होती. सिर्फ एक होशियारी होती है. जो अपनी सामाजिक भूमिका के लिए एक पेशेवर संवेदना का स्वांग रचकर समाज की भावनाओं की मार्केटिंग करती है. वह समाज को झकझोरने की जगह एक क्षणिक उत्तेजना पैदा करके एक अभ्यस्ती बनाने लगती है.

‘‘पीपली लाइव’’ में न तो आत्यहत्या के मनोविज्ञान की समझ है और न ही समाज के बहुआयामों की. फिल्म के लिहाज से भी यह आमिर खान की सबसे कमजोर फिल्म है. फिल्म की लय जगह-जगह टूटी हुई है. कहीं-कहीं तो वह फिल्म का कोलॉज लगती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

dayanaand (dayanandk7@rediffmail.com) chandrapur

 
 पीपली लाइव एक व्यंग्य है,किसान आत्म्यहत्य पर. इसे समझने के लिए समझ चाहिए. 
   
 

Arun Kathote (arunkathote@yahoo.co.in) Raipur (Chhattisgarh)

 
 आपने सही फरमाया है. it is like art for art sake tradition film. जो माध्यम अपने कल का हुबहू वर्णन करे और परदे के पीछे की सच्चाई से रूबरू न कराये उसके क्या मायने? फिल्म में नत्था का किरदार निभाने वाला ओंकारदास मानिकपुरी यहाँ वाहवाही लूट रहा है, जबकि हकीकत में उसकी जिन्दगी भी नत्था जैसी ही है. जैसी उम्मीद थी हमारे सीएम ने भी उसे 1 लाख रुपए देकर अपनी सहनुभूति जताई. कुल मिलकर फिल्म आखिर में हासिल आया शून्य जैसे नतीजो पर ठहर जाती है. 
   
 

shweta (shwetasharma_88@yahoo.co.in) delhi

 
 तारे ज़मीन पर को मैंने इस तरह देखा कि अगर किसी कमजोर बच्चे को भी स्पेशल केयर व ट्रिटमेंट दिया जाता है तो वो भी कुछ करने का माद्दा रखता है...तो अगर किसी के टैलेंट को निखारने के लिए इमोशन को डाला गया फिल्म में तो गलत कहा से है ये? 
   
 

SANAT (SANMATIJDP@GMAIL.COM) JAGDALPUR

 
 आज हम सब वही देखते है सुनते है जो हमें बाज़ार दिखाता/सुनाता है. इसलिए हमें तो उम्मीद ही नहीं रखनी चाहिए की कुछ सार्थक दिखाया जायेगा. 
   
 

Hitendra Patel (hittisaba@gmail.com) Kolkata

 
 तिवारी जी ने इस फिल्म को देखने और समझने का एक पर्सपेक्टिव दिया है. यह बात काबिले गौर है कि आमिर की तीनों फिल्मों का (जिसके बारे में तिवारी ने उल्लेख किया है) लोगों ने इतना स्वागत किया है मानो यह नये भारत की नयी सेंसिबिलिटी का प्रामाणिक दस्तावेज हो. यहाँ मदर इंडिया का उल्लेख करके मेहबूब खान और आमिर खान के बीच के गुणात्मक अंतर को दिखला कर तिवारी ने बिल्कुल सही किया है. ग्लोबलाइजेशन के इस भयानक दौर में कुछ अजीब किस्म का बोध बना है जो विरासत को समझे बिना ही महान और युगांतकारी फिल्में बनाने का प्रचार कर रही हैं. एक समय लगान को लेकर कितना हल्ला हुआ था. क्या जिसने दिलीप कुमार अभिनीत नया दौर देखी है उसके लिए यह फिल्म इतनी आह्लादित कर देने वाली हो सकती है? तारे ज़मीं पर भी ओवर इस्टिमेटेड फिल्म है हालाँकि इसका एक सकारात्मक प्रभाव भी पडा है. कभी कृष्ण कुमार ने श्याम बेनेगल की फिल्म को देखते हुए यह टिप्पणी की थी कि इसमें देश के प्रति आंतरिक दृष्टि का अभाव है. मुझे लगता है आमिर खान की फिल्मों की सफलता को ठीक से समझना चाहिए. थ्री इडियट्स कहीं से भी महान फिल्म नहीं है. ये फिल्में आज के मिड्ल क्लास को भा रही हैं और इसे ही महान माना जा रहा है यह अपने आप में इस समय के भारतीय समाज पर एक टिप्पणी है. तिवारी जी को बधाई इस बात के लिए भी कि उन्होंने ईरानी निर्देशक और भारतीय महान निर्देशक के गुणात्मक अंतर को पाठकों के समक्ष रखा. 
   
 

sanjeev pandey () bilaspur cg

 
 सटीक समीक्षा और खट्टी-मीठी प्रतिक्रिया पाने के लिये मेरी बधाई. 
   
 

वेदिका इंदौर

 
 ऐसा है कि कुछ बातें होती है, चाहे आप माने या न माने. ये सारी बातें तब पता लगती हैं जब आप उस जगह जायें और मालूमात करें. असुन्दरता भी होती है और उसे "कमजोरी" नही सच्चाई कहते है. उसे स्वीकारना होता है और बाकि सबके अपने व्यक्तिगत मत है. हर पहलु को देख कर लिखा गया होता तो और भी अच्छा होता. बाकि रही फिल्म, मुझे तो अच्छी लगी. दाद देनी चाहिए फ़िल्मकार को की इस विषय पर हिम्मत दिखाई. 
   
 

राहुल सिंह (rahulsinghcg@gmail.com) रायपुर

 
 फिल्‍म की ऐसी प्रशंसा होने लगे कि उसकी कमी की ओर ध्‍यान दिलाना बौद्धिक वर्ग को बरदाश्‍त न हो, तब यह समीक्षा अधिक प्रासंगिक और सार्थक हो जाती है. फिल्‍म की कमियों की चर्चा क्‍यों न हो, बेशक यह एक कोलॉज लगती है, जिसमें कई बार निरंतरता टूटती है. बताया जाता है कि लंबी शूट हुई फिल्‍म को विदेशों में प्रदर्शन के अनुरूप काट-छांट कर पौने दो घंटे किया गया है. गांव और शहरी जीवन(जैसा आमिर खान कहते हैं)को दिखाते हुए फिल्‍म किसान समस्‍या पर आ गई है, लेकिन शायद थोड़ी और बहक कर मीडिया पर चली गई है, ऐसा लगता नहीं कि यह निर्माता निर्देशक का वांछित था. लेकिन पात्रों का चयन लाजबाव है और इस मामले में फिल्‍मकार की समझ आम से बहुत आगे है, इसके लिए सिर्फ एक पात्र का जिक्र करना हो तो वह ड्यूटीफुल, निष्‍काम कर्मयोगी का भाव साधे 'बीडीओ' ही होगा. ऐसे कई मजबुत पक्षों की बात भी हो सकती है, लेकिन इसलिए फिल्‍म की कमियों को तो नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.  
   
 

bhoopender (bhoopen1980@gmail.com) c.g

 
 तिवारी जी, यह एक फिल्म है जिसमे विषय निर्देशक का है. जो उन पर निर्भर करता है. इसमें सिर्फ समाज का एक पहलु दिखाया गया है. जो जरुरी नहीं की क्रांति ला दे. आप इसकी आलोचना मात्र इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि सभी लोग इसे सराह रहे है. या फिर उसमे गाँव के कलाकारो ने भाग लिया है. ओंकार को चाहे कितना भी पैसा मिला उसे एक पहचान जरुर मिली है. यह वाकई बहुत अच्छी फिल्म है इसकी बुराई नहीं की जानी चाहिए. 
   
 

Ravindra Goyal (goyalkr@gmail.com) Raipur

 
 पीपली लाइव पर आपकी सटीक टिप्प्णी पसंद आई। निश्चित ही यह एक बार फिर साबित करता है कि हर चीज़ को देखने का हर व्यक्ति का अपना नज़रिया होता है। जिसके आधार पर वो अपनी राय कायम करता है। हमारा भी यही मानना है कि हर चीज़ को एक ही रंग के चश्में से नहीं देखने चाहिए और हर विचार को सम्मान देना चाहिए। यही विकास की सीढी है।  
   
 

Biju Negi (negi.biju@gmail.com) Dehra Dun

 
 व्यंग्य, साहित्य व कला का एक अभिन्न अंग है. Satire is an integral part of literature and arts. I understand that Aamir has stated that "Peepli Live" is a satire. I have seen the film, and found it a very strong satire on - our senseless TV channels, and politicians/bureaucrats. By and large, these are the sectors who have constantly belittled the tragedy of the farmers. 
   
 

संवेदना जेएनयू, नई दिल्‍ली

 
 अच्‍छी समीक्षा के लिए बधाई. 
   
 

Pushpa Tiwari (mepushpa_tiwari@rediffmail.com) दुर्ग, छत्तीसगढ़

 
 किसी भी सिनेमा को इतनी बारीक समझ के साथ देखना औऱ फिर उसकी तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करना बहुत बड़ी बात है. रामकुमार तिवारी ने सच लिखा है कि नाम बिकता है तो हर चीज अच्छी हो, जरुरी नहीं. आज के अंधाधुंध समय में मार्केटिंग आनी चाहिये. पीपली लाईव अच्छी तो है लेकिन एक स्तर तक. गहराई में जायें तो तिवारी जी की बात बिल्कुल सच है. बधाई रामकुमार तिवारी. तुम में मैं जयप्रकाश चौकसे का विकल्प देखती हूं. 
   
 

hempandey india

 
 निश्चित रूप से पिपली लाइव एक शानदार फिल्म है.उसमें अनेक मुद्दे उठाये गए हैं- किसी खास आदमी को लाभ पहुँचाने के लिए उसे सरकार द्वारा चलाई जा रही किसी योजना में फिट कर देना,या फिर कोई ऐसी योजना शुरू करवा देना जिससे उसे फायदा मिले,राजनीतिज्ञों द्वारा आत्मह्त्या जैसे मुद्दे का भी राजनीतिकरण करना, टी आर पी बढाने के लिए टी वी चैनलों की भोंडी प्रतियोगिता आदि.
'आत्म ह्त्या के मनोविज्ञान' की बात पर जरूर इसे हल्का कह सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि हमारे देश की एक बड़ी जनसंख्या के लिए आज भी एक लाख रुपये एक बहुत बड़ी रकम है. 'इस मायने में एक लाख रुपये के लिए आत्म ह्त्या' संकेतात्मक सच है. hiranya_pandey2000@yahoo.com
 
   
 

SHIVAM BUNDELKHAND

 
 Peepli Live the movie which revolves around a debt ridden farmer committing suicide for the sake of compensation, trivializes this emotional issue and is "far from reality", said Sanjay Pandey, the convener of Bundelkhand Akikrit Party.
Pandey said that this film is based on the suicide cases of farmers in Bundelkhand as well as in Vidarbha during last five dry years.
Peepli Live film has shown Natha, a poor farmer from Peepli village in Bundelkhand is about to lose land due to an unpaid government loan has got a quick fix to the problem is the very same government’s program that aids the families of indebted farmers who have committed suicide and as a means of survival Farmer Natha can choose to die and futher shown that His brother is happy to push him towards this unique ‘honour’ of suicide but Natha is hesitant ,this is totally untrue too much twisted from the ground reality and insult of poor dying farmers of Bundelkhand who are the victims of wrong policies of the government. So this movie has diverted from the basic issue of farmers' suicide and hurt the sentiments of the rural folk.

"Although the film released last week has been hailed by critics as one of the smartest social satires to hit the Indian screens in years, it has not gone down well with the farming community", Pandey added. Sanjay Pandey said that these critics perhaps forgot the emotional edge of innocent farmers because maximum of critics and the members of The Censor Board of Film Certification belonging to urban areas do not know the the poverty of Bundelkhand in reality. Also the central theme of the movie is the rural urban divide. Perhaps that's why the movie has received a harshly response in the metros.

According to Sanjay Pandey, Peepli Live has made big question mark to farmers' widows who are demanding compensation after their bread earner farmer's suicide due to debt and crop failure . As this movie shows that farmers had been committing suicides for getting aid where as government had already denied these cases of suicides without even visiting house of dying family members. So Peepli Live will give strong support to such politicians and bureaucrats who never accepted these suicide cases due to starvation and debt. The film has tried to prove that farmers are not forced to kill themselves due to crises where as they themselves killing for money.

Finally Pandey said, "In the country of " JAI -JAWAN, JAI-KISAN" the two hour entertainment of cinema-lovers is not much important than the respect of 60 crore farmers. Hence the film should be baned and the censorship certificate to the film should be taken back"
 
   
 

sunil kumar tamboli (tamboli.sunil07@gmail.com) , indore

 
 दीपक जी, आप पहले अपनी समझ बढ़ायें. कोई भी लेखक अपना ही मत लिखता है. आपने प्रतिक्रिया गणेश भगवान से पूछ कर नहीं लिखी होगी, न ही बजरंगबली ने आपको प्रतिक्रिया लिख कर दे दी होगी. रही बात अच्छा औऱ बुरा करने की, तो जिस-जिस को आमिर खान की फिल्म खराब लगे, वो उसे व्यक्त करने के बजाये खुद फिल्म बनाने लग जाये ? अपने इंदौर में तो नगर-निगम की सफाई का हाल हम सब जानते हैं, तो आप सलाह देंगे कि जिस-जिस को सफाई नहीं दिख रही हो, वह सफाई करने लग जाये ?
एक उदार समाज में सहमति-असहमति की जगह रहने दें. उसे घटिया कहने के बजाये अपने तर्क रखते तो अच्छा होता.
 
   
 

Jagat Singh Verma , Pune

 
 Peepli live is overrated film which has made mockery of a very serious issue of Farmer suicide! Farmers in India are not committing suicide to get any compensation from Govt., but out of distress and helplessness. if Mr. Khan and group of friends decide to make film only to make mockery out of it then it is not fair! The whole issue of suicide has been made to look funny. But none of the creative team has ever experienced such act within their family members. It is very sorry to say that such an emotive and important issue is being portrayed in a manner where the sensitivity and seriousness of the prime subject is being looked like a scam. If any one consider this as best film of year then these people are nothing but the same media which Peepli has portrayed! SHAME ON YOU!  
   
 

KISHORE TIWARI . Vidarbha Jan Andolan Samiti

 
 Our objection is to a scene in the film which shows a brother telling a farmer to commit suicide so that he can avail of the Rs1 lakh compensation by the state government.

Had the filmmaker stuck to a script highlighting the plight of the farmers, we would have appreciated it. But such depiction is not only false, but also insensitive.

Despite the huge package promised by the Centre and the state, only 8% of farmers’ families availed of the compensation. It is an insult to poor farmers of Vidarbha who have been victims of globalisation and wrong policies of the state. We will not tolerate further as this movie revolves around a debt ridden farmer committing suicide for the sake of compensation, trivialising the issue and is far from reality.

In villages, nobody is so insensitive. Nobody is going to kill an 85-year-old father or a mother for Rs1 lakh.

Farmers are driven to suicide because of wrong policies by the government. Instead of focusing on the deep-rooted problems responsible for farmers’ distress, the film highlights greed. It sends a wrong message to the public on a crucial issue.
 
   
 

shahroz (shahroz_wr@yahoo.com) delhi

 
 आमिर खान के पास भारतीय समाज की कमजोरियों का अच्छा अध्ययन है. वे जानते हैं कि इस विस्मृति के दौर में चेतना से कटे-पिटे समाज में क्या और किस तरह परोसा और बेचा जा सकता है. 
   
 

deepak (sweetharry21@yaahoo.cco.in) indore

 
 यह लेख बहुत घटिय़ा है, जिसने भी लिखा है उसने अपना व्यक्तिगत मत लिखा है. यदि कोई आदमी कुछ अच्छा कर रहा है तो आप उसकी बुराई कर रहे हैं. ना तो आप अच्छा करेंगे न ही किसी को करने देंगे. यही इस देश का दुर्भाग्य है. 
   
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